वसीम बरेलवी की शायरी को भारत और सीमाओं से परे, जो अपार लोकप्रियता मिली, वह अभूतपूर्व है। विस्तृत हिंदी और उर्दू की दुनिया प्रोफेसर वसीम बरेलवी की खूबसूरत शायरी और व्यक्तित्व की मुरीद है। अंतर्राष्ट्रीय शायर की शायरी कानों में रस घोलती है। उत्तर प्रदेश के बदायूं की साहित्यिक पत्रिका ‘लम्हें-लम्हें’ ने 1996 में वसीम बरेलवी विशेषांक प्रकाशित किया। इसका दूसरा संस्करण 2006 व तीसरी पुस्तक 2008 में प्रकाशित हुआ। यह विरल अवसर था कि एक साहित्यिक पत्रिका ने किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और सृजन पर केंद्रित विशेषांक तीन बार प्रकाशित किए। यह उनकी व्यापक लोकप्रियता का परिचायक ही है। उसके बाद ‘जहाने-ए-कुतुब वसीम बरेलवी’ अंक प्रकाशित हुआ। अब पांचवीं बार वसीम बरेलवी पर केंद्रित विशेषांक ‘वसीम बरेलवी : जहां रहेगा रौशनी लुटाएगा’, साहित्य प्रेमी नीरज जैन के संयोजन और फारुक अर्गली के संपादन में प्रकाशित हुआ है। यूं तो इसमें देश के शीर्ष साहित्यकारों, शायरों और बुद्धिजीवियों के लेख शामिल हैं, लेकिन ‘वसीम की कहानी वसीम की जबानी’ शीर्षक से हसीब सोज़ से बातचीत पर आधारित लेख बरेलवी के व्यक्तित्व को गहरे तक अभिव्यक्त करता है। संकलन में शामिल रंगीन चित्र उनकी यात्रा के जीवंत दस्तावेज हैं।
फ़िराक़ गोरखपुरी की ‘मेरा महबूब शायर’ शीर्षक अभिव्यक्ति वसीम बरेलवी के कृतित्व और व्यक्तित्व की गहरी व्याख्या करती है। वे लिखते हैं—‘वसीम के कलाम में ज्ञान और विवेक परतों का विश्लेषण है। ऐसी विवेकशीलता और ज्ञान, जो मदमस्ती और आनंद की पुष्पांजलि है। ये शारीरिक बनावट से ऊपर उठकर कायनात की रंगीनियों और आकर्षण से आनंद प्राप्त करते हैं। वसीम की शायरी जीवन की अनुभूतियों को बढ़ाने वाली शायरी है। अनुभव के इस दर्पण में जीवन के प्रतिबिंब निकट आकर उदीयमान होते हैं। वसीम हर प्रतिबिंब के स्थायी अस्तित्व का अनुभव करते हैं।’
‘वसीम बरेलवी : जहां रहेगा रौशनी लुटाएगा’ संकलन में देश के शीर्ष शायरों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की 58 रचनाएं संकलित हैं। डब्ल्यू.बी.एस फाउंडेशन के तत्वावधान में प्रकाशित इस संग्रहणीय अंक के प्रकाशन का श्रेय कंप्यूटर इंजीनियर और साहित्य प्रेमी नीरज जैन को है। उन्हें अपनी चौथी औलाद बताते हुए पुस्तक में वसीम बरेलवी आत्मीयता के साथ लिखते हैं—‘15 जनवरी, 2023 में कार हादसे के बाद नीरज ने मेरी जैसी सेवा की, वैसा कोई आज्ञाकारी बेटा ही कर सकता है। मेरे बच्चे तो बाहर हैं, नीरज जी मेरी सांसों की पहरेदारी का दायित्व संभाले हुए हैं। मेरा रुआं-रुआं उनके और उनके परिवार के लिए दुआगो है।’ निस्संदेह, यह रचना बरेलवी के चाहने वालों के लिए संग्रहणीय है।
पुस्तक : वसीम बरेलवी : जहां रहेगा रौशनी लुटाएगा संकलन : नीरज जैन संपादन : फ़ारुक़ अर्गली प्रकाशकः डब्ल्यूबीएस फाउंडेशन, नई दिल्ली पृष्ठ : 520 मूल्य : रु. 499.

