समकालीन हिन्दी साहित्य में लघुकथा के परिदृश्य को समझने के लिए ‘दृष्टि’ पत्रिका का नवीनतम अंक एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह अंक केवल एक साधारण पुनर्प्रकाशनभर नहीं है, बल्कि हमारी साहित्यिक स्मृतियों को सहेजने और उन्हें पुनर्जीवित करने का एक गंभीर प्रयास है। इस विशेषांक के माध्यम से वर्ष 1981 में प्रकाशित हरियाणा के पहले लघुकथा संकलन ‘अक्षरों का विद्रोह’ को आज के पाठकों के समक्ष नए रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘दृष्टि’ पत्रिका के संपादक अशोक जैन और मूल संकलन के संपादक सुशील राजेश की यह संयुक्त पहल पाठकों को लघुकथा विधा के ऐतिहासिक विकास को गहराई से समझने का एक सशक्त अवसर प्रदान करती है।
इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल रचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि एक पूरे दौर का जीवंत दस्तावेज है। इसमें शामिल लघुकथाएं उस समय के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय यथार्थ को बेहद तीखे और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करती हैं। गरीबी, सामाजिक व आर्थिक शोषण, राजनीतिक चालाकियां, नारी जीवन की पीड़ा और अन्य विसंगतियां इन रचनाओं में गहरे संवेदनात्मक स्तर पर उभर कर सामने आती हैं। इन कहानियों से गुजरते हुए पाठक उस दौर की परिस्थितियों से एक सहज और गहरा जुड़ाव महसूस करता है।
डॉ. लता अग्रवाल ‘तुलजा’ द्वारा लिखा गया प्रस्तुति आलेख इस विशेष अंक की वैचारिक आधारशिला है। वह स्पष्ट करती हैं कि अक्षरों में केवल अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन लाने की अपार शक्ति भी निहित होती है। उन्होंने लघुकथा को ‘अर्जुन के अचूक तीर’ की तरह तीक्ष्ण और प्रभावी विधा बताया है, जो कम से कम शब्दों में बड़े से बड़ा सत्य व्यक्त करने की क्षमता रखती है। संकलन में शामिल ‘सुअर’, ‘गरीब’, ‘नेतृत्व’ और ‘कानून’ जैसी प्रतिनिधि रचनाएं यह स्थापित करती हैं कि लघु आकार इस विधा की कमजोरी नहीं, बल्कि इसकी सबसे बड़ी ताकत है। सीमित शब्दों में भी गहरे सामाजिक प्रश्न बेहद प्रभावी ढंग से उठाए गए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1980 के दशक में लिखी गई ये लघुकथाएं आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती हैं, जो इनकी कालजयी प्रकृति को प्रामाणित करता है। भाषा के स्तर पर भी यह संकलन अत्यंत समृद्ध है। हरियाणवी परिवेश की स्पष्ट झलक और स्थानीय बोली की सहजता इसे और अधिक जीवंत व पठनीय बनाती है।
पुस्तक : दृष्टि अक्षरों का विद्रोह संपादक : अशोक जैन प्रकाशक : एब्रो इंटरप्राइसिस चावड़ी बाजार, दिल्ली पृष्ठ : 84 मूल्य : रु. 180.

