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कवि का जीवन और समाज की झलक

पुस्तक समीक्षा

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डॉ. जयभगवान शर्मा संस्कृत, हिन्दी और हरियाणवी भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। अब तक इनकी तीनों भाषाओं में 14 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कवि के अनुसार, उनकी पुस्तक ‘गवाक्ष’ शब्द का अर्थ ‘झरोखा’ है।

कवि ने अपने जीवन की तमाम स्मृतियों और घटनाओं को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इस संग्रह में कुल 48 कविताएं संकलित की गई हैं। कवि के अनुसार, उसने अपने काव्य-संग्रह में प्राकृतिक परिदृश्य, सामाजिक परिवेश, भारतीय दर्शन, आत्मिक अनुभूति और युग सापेक्ष जीवन दर्पण को प्रस्तुत किया है। उन्होंने प्रदूषण के कहर को भी दर्शाया है। अपनी प्रथम कविता में कवि समाज और लोक कल्याण की भावना को अभिव्यक्त करते हैं।

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कवि आमजन से अधिक संवेदनशील होता है। उसे अपने समाज और व्यक्तियों की समस्याएं सदैव सताती रहती हैं, और वह इन समस्याओं के समाधान के बारे में निरंतर चिंतन करता रहता है। इसी चिंतन में से कविता का जन्म होता है। कवि प्रदूषण के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का प्रयास करता है।

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आज की दुनिया में सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता जा रहा है। रिश्तों में मिठास और अपनापन समाप्त-सा हो गया है। ऐसे समय में मन का शांति और संतुलन मानो कहीं खो गया है। कवि रिश्तों में आई दरार के बारे में लोगों को अवगत करता है।

कवि प्रकृति प्रेमी भी है। वह पंछियों की तरह स्वच्छंद घूमना चाहता है, बादलों की तरह उड़ना चाहता है। अपनी जन्मभूमि हरियाणा की पावन धरती का गुणगान करते हुए, कवि उसे समता का संदेश देने वाला और स्वर्ग के समान बताता है। कवि के अनुसार, आज का इंसान दोहरा जीवन जी रहा है, इसलिए वह हर पल एक मुखौटा पहनकर रखता है।

पुस्तक : गवाक्ष (कविता-संग्रह) लेखक : डॉ. जयभगवान शर्मा प्रकाशक : निर्मला प्रकाशन, चरखी दादरी पृष्ठ : 136 मूल्य : रु. 300.

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