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हमारे समय के अंतर्विरोधों का दस्तावेज

पुस्तक समीक्षा

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हृषीकेश सुलभ का सद्य: प्रकाशित उपन्यास ‘जूठी गली’ पाठक को उनकी आंखिन देखी लोक के रूबरू ले जाकर खड़ा कर देता है, जिसके भीतर वर्तमान की आंधी में इतिहास की परतें एक-एक करके खुलती चली जाती हैं। बल्कि इतिहास की छोटी-सी गुंजलक भी पाठक की हमकदम बन उसके साथ-साथ कदमताल करती चलती प्रतीत होती है। उपन्यास की मार्फत पता चलता है कि अठारहवीं सदी के शुरू में पटना का नाम अजीमाबाद हुआ और उन्हीं दिनों जूठीगली की नींव पड़ी और उन दिनों से जब-तब यह गली जिंदा है।

सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम सालों में जब औरंगजेब का पोता अजीम-उस-शान सूबेदार बना, तो उसी ने अपने शासन के दौरान पटना को अजीमाबाद नाम दिया। दीवान जूठी लाल जब बसने के लिए इस शहर में आए थे, तब पटना का नाम अजीमाबाद हो चुका था और उपन्यास की पूरी कहानी दीवान जूठी लाल और यहां के अन्य बाशिंदों के इर्द-गिर्द घूमती प्रतीत होती है।

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लेखक को कथा कहने में अद्भुत महारत हासिल है। किस्सा-दर-किस्सा इस तरह से खुलता चला जाता है और इसके साथ ही खुलती चलती हैं इतिहास की परतें। अजीमाबाद के साथ ही जूठी गली की नींव पड़ी थी। उन दिनों से अब तक बकौल लेखक, ‘यह गली अब तक जिंदा है।’ लोग जनमते और विदा होते रहे, मकान बिकते-ढहते-बनते रहे, जूठी गली अपना रूप बदलती रही और किसी जिंदा इंसान की तरह धड़कती रही। इस गली के लोग खबरों के रसिया हैं। खबरें इस गली में हवा के पर लगाकर उड़ती हैं।

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दूषित राजनीति ने जूठी गली को भी अनेक घाव दिए हैं और सुखदेव बाबू जैसे जिन लोगों को ये घाव मिले हैं, वे उन्हें सहजते हुए जीते हैं। सुखदेव बाबू की मृत्यु पर जैसा कि जूठी गली की रवायत बनी हुई थी, खूब धूमधाम से उन्हें विदा किया गया और जूठी गली के हर परिवार से कोई न कोई उनकी शवयात्रा में शामिल हुआ था। लेकिन उनके अंतिम संस्कार में सुखदेव बाबू के दोनों बेटों की बीवियां उनके साथ नहीं आई थीं।

हृषीकेश सुलभ के इस सद्य: प्रकाशित उपन्यास ‘जूठी गली’ की यह अलग से रेखांकित की जाने वाली खासियत यह है कि इसमें तीसियों पात्र हैं, लेकिन वे अपने परिवेश सहित उपस्थित हुए हैं। सुलभ जी अपनी रचनाओं में पात्रों की पैरवी स्वयं नहीं करते, बल्कि उनका परिवेश उनकी कथा को सघनता से प्रकट करता है। उनकी कहनशैली बेहद आत्मीय है।

सच तो यह है कि हृषीकेश सुलभ का सद्य: प्रकाशित उपन्यास ‘जूठी गली’ हमारे समय के अंतर्विरोधों का जीवंत दस्तावेज है।

पुस्तक : जूठी गली लेखक : हृषीकेश सुलभ प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 246 मूल्य : रु. 399.

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