निर्णायक महोदय कुर्सी पर निर्विकार भाव से बैठे थे। दर्शक दीर्घायें अभी खाली थीं। फोन की घंटी फिर बज रही थी। एक प्रतिभागी ने दूसरे कोने पर जाकर अपनी स्पीच दोहरानी शुरू कर दी थी— ‘गौतम बुद्ध ने रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था का विद्रोह किया। उन्होंने ऊंच-नीच, जात-पांत को न मानकर मानव प्रेम पर बल दिया।’ ज्योतिका प्रसाद को भैया याद आ गये। वह भी तो ऐसी ही परिष्कृत और ओजपूर्ण भाषा का प्रयोग करते थे। अभी तक हॉल खाली था। आज छुट्टी का दिन है। उन्हें श्रोताओं की चिंता होने लगी। स्कूली पोशाक में हाथ में कागज लिये रट्टा लगाते हुए लॉन के चक्कर लगा रहे यह बच्चे। रंग-बिरंगी स्कूली पोशाकों में सजे-संवरे फूलों के बीच फूलों की तरह खिलखिलाते यह बच्चे।
दो बजे दोपहर का समय। इस समय ज्योतिका प्रसाद को नींद की ऐसी खुमारी आती है कि दुनिया जहान के बाकी सारे कामों के सामने यह नशीली, गुनगुनी धूप की तरह गुदबुदी नींद उन्हें दुनिया की सबसे अमूल्य निधि लगती है। ऐसे समय वह सारे जरूरी रोजमर्रा के कामों को ताक पर रखकर सिर से पैर तक चादर तान बिस्तर पर लेट जाती है। दुनिया के काम तो कभी खत्म नहीं होते, फिर दिन में दो घड़ी आराम कर क्यों न अपने तन-मन को कुछ आराम दिया जाये। अब तो ज्योतिका प्रसाद का बाॅडी सिस्टम ऐसा हो गया है कि दोपहर की नींद लेने के बाद वह रात तक के लिए तरोताजा हो जाती है।
नींद की एक प्यारी-सी झपकी आयी ही थी कि माइक की ‘हैलो, हैलो’ की आवाज से ज्योतिका प्रसाद की नींद टूट गई। आज तो हो गयी उनकी सोने की छुट्टी। छह महीने की दौड़धूप के बाद कमरा मिला भी तो कम्युनिटी हॉल के बाजू में। कभी कला विभाग तो कभी संस्कृति विभाग, कभी विमेन्स क्लब तो कभी इनरव्हील क्लब के कार्यक्रम, तंबोला और तीज से लेकर साहित्यिक गोष्ठियों के आयोजन इसी कम्युनिटी हॉल में होते हैं। कौन कहता है कि हम अपनी संस्कृति से विमुख हो रहे हैं। कभी-कभी तो यह नृत्य और संगीत के कार्यक्रम अच्छे लगते हैं लेकिन आज छुट्टी के दिन तो इस कार्यक्रम को झेलना किसी सज़ा से कम नहीं। बिना टिकट और निमंत्रण के पूरे प्रोग्राम का विजुअल न सही पर ऑडियो तो सुनना ही पड़ेगा।
ज्योतिका प्रसाद ने खिड़की से नीचे झांका। कुछ स्कूली बच्चे अपनी स्कूली पोशाक में हाथ में कागज लिये रट्टा लगाते हुए लॉन के चक्कर लगा रहे थे। आज बुद्ध पूर्णिमा की छुट्टी है। जरूर ही बुद्ध पूर्णिमा के उपलक्ष्य में किसी वाद-विवाद या भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। बच्चों के भाषणों की कुछ पंक्तियां कानों में पड़ीं—‘आज विश्व को आवश्यकता है एक बुद्ध की, जो मानव जाति को एक बार फिर अहिंसा और प्रेम का संदेश दे, जिससे संसार में सुख शांति हो।’ एक दूसरा प्रतिभागी, जो किसी पब्लिक स्कूल का छात्र होगा एक कोने में रिहर्सल कर रहा था—‘बुद्धा इज बौर्न वन्स इन ए सेंचुरी! ही इज बौर्न इन द टाइम आफ क्राइसेस एंड कैओस।’ ‘बुद्ध जैसे एक सदी में एक बार पैदा होते है। वह संकट और अव्यवस्था के समय पैदा होते है।’
लगता है जैसे अभी कल ही की बात हो। एक समय था जब ज्योतिका प्रसाद को भी इन भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में अपनी वक्तृता से श्रोताओं को प्रभावित करने में असीम आनंद की अनुभूति होती थी। डायस पर हाथ रखकर, ‘अध्यक्ष महोदय एवं निर्णायक गण’ को संबोधित कर अंत में श्रोताओं की ओर मुखारित हो अपने स्वर को मंद से मध्यम, मध्यम से तार सप्तक और फिर तार सप्तक से सम पर लाना, तो कभी बुलंद स्वर में डायस ठोकते हुए विपक्षी वक्ताओं के कथ्यों और तर्कों की धज्जियां उड़ा देना, तो कभी अपने अकाट्य तर्कों से प्रतिभागियों के चेहरे को आभाहीन कर देना, फिर निर्णायकों की प्रशंसात्मक दृष्टि और अंत में श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान सभाकक्ष! क्या कुछ रोमांचक नहीं होता था उन वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में? किसी वक्ता की कोई शब्दावली या मुखमुद्रा अच्छी लगी तो अगले भाषण में बखूबी उसे अपना लिया। भाषण की समाप्ति पर मंच से नीचे उतरते हुए जो गर्व और विजयाभास होता था वह क्या ओलंपिक खेलों में पदक जीतने से कम था?
अचानक अतीत की इन रोमांचक स्मृतियों को ताजा करने की ज्योतिका प्रसाद की इच्छा बलबती हो उठी। कम्युनिटी हॉल में जाकर देखें तो सही कैसा लगता है इन स्कूली बच्चों को सुनना। वैसे भी नींद तो अब आयेगी नहीं। पहले और अब की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में कुछ अंतर तो जरूर आया होगा। यही सब सोचते हुए वह कम्युनिटी हॉल पहुंच गयी।
लॉन में दुर्गादासजी खड़े थे। संस्कृति विभाग में अधिकारी हैं। ऐसे आयोजनों के सिलसिले में अक्सर कम्युनिटी हॉल में आते रहते हैं।
‘नमस्कार। आज यहां कैसे आना हुआ?’ ज्योतिका प्रसाद ने शिष्टाचारवश दुर्गादासजी से पूछ लिया।
‘ड्यूटी पर हूं। आज बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर डिपार्टमेंट ने इंटर स्कूल भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया है। मैडम मैं तो आपके बारे में सोच ही रहा था, अच्छा हुआ आप यहां आ गयीं। आज के हमारे फंक्शन में निर्णायक का पदभार आपको संभालना होगा।’
‘निर्णायक? क्षमा कीजिये आज छुट्टी का दिन है। कई छोटे-बड़े काम निपटाने होते हैं। मैं तो माइक की आवाज सुनकर यूं ही आ गयी थी।’ ज्योतिका प्रसाद ने कहा।
‘मैडम आपसे अच्छा निर्णायक इस कार्य के लिए और कौन हो सकता है? लखनऊ विश्वविद्यालय की हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में एम.ए., पीएच.डी., मना मत कीजिये।’ दुर्गादासजी बड़े विनम्र स्वर में बोले।
निश्चय ही आज छुट्टी के दिन उन्हें कोई निर्णायक नहीं मिला होगा वरना इससे पहले तो लखनऊ विश्वविद्यालय की एम.ए., पीएच.डी. होने के बावजूद उन्हें आज तक कला औरस ंस्कृति विभाग से कभी किसी गोष्ठी या सेमिनार का निमंत्रण नहीं मिला था।
‘किन्तु इस भाषण प्रतियोगिता में कौन भाग ले रहा है, किस विषय पर भाषण प्रतियोगिता हो रही है, क्या नियम है मुझे तो इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है।’
‘अरे मैडम। आज बुद्ध पूर्णिमा है। गौतम बुद्ध की समाज में सामयिकता विषय पर भाषण प्रतियोगिता रखी है। लोकल स्कूलों में सभी जगह सर्क्युलर भेज दिया था। प्रतियोगिता का निर्णय देर से लिया गया इसलिए मालूम नहीं कितने स्कूलों से पार्टिसिपेंट्स आते हैं। वैसे कुछ बच्चे तो आ गये हैं। कुछ भी कहें मैडम लेकिन पब्लिक स्कूलों की बात ही कुछ और है। अब देखिये इनमें से ज्यादातर बच्चे पब्लिक स्कूलों से आये हैं। हमारे सरकारी स्कूलों में तो बस हड़ताल करवा लीजिए, एक्स्ट्रा एक्टिविटी के नाम पर तो यह स्कूल जीरो है।’
उन्होंने पूछा, ‘अन्य निर्णायक कौन है?’
‘निर्णायक हमने यूनिवर्सिटी से इतिहास विभाग से बुलाये हैं। दो निर्णायकों की स्वीकृति मिल गयी है, तीसरी निर्णायक तो आप हैं ही।’
‘बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर ऐसे आयोजन क्या आप हर साल करते हैं?’ ज्योतिका प्रसाद ने पूछा।
‘यह आयोजन तो पहली बार हो रहा है। पहले तो छुट्टी डिक्लेयर हो जाती थी। हमें कहा गया बुद्ध पूर्णिमा का फंक्शन सेलिब्रेट करो। हमने कहा ठीक है। भाषण प्रतियोगिता का आयोजन कर लेते हैं।’ दुर्गादासजी के स्वर से जाहिर था इस आयोजन में वह बेमन से शरीक थे।
इतने में कौशलजी भी पहुंच गये। कला और संस्कृति विभाग के दूसरे पदाधिकारी। आते ही दुर्गादासजी पर अपनी नाराजगी जाहिर की। ‘आप यहां खड़े हैं और मैं डिपार्टमेंट में फोन किये जा रहा हूं। किसी ने फोन नहीं उठाया।’
‘मेरी ड्यूटी तो यहां लगी हैं। आपको पता तो है फोन डायरेक्टर साहब के कमरे में है। मैं भी शर्मा के फोन का इंतजार कर रहा हूं। प्राइज खरीदने के लिए उससे कहा था। पता नहीं सर्टिफिकेट भी उसने तैयार किये या नहीं। नाश्ते का इंतजाम हो गया होगा?’
‘कहां से हुआ?’ कौशलजी झल्लाये। ‘इसीलिए तो आपको फोन कर रहा था। स्टार बेकरी को बिस्कुट और पेस्ट्री का आर्डर दिया था। अभी तक तो डिलीवरी हुई नहीं।’
‘मैडम आसपास कोई दुकान तो होगी?’ कौशल साहब ने ज्योतिका प्रसाद से पूछा।
‘पीछे की गली में एक मिठाई की दुकान है तो सही, समोसे भी बनाता है।’
‘बस फिर ठीक है। शर्मा से कहो यहीं से नाश्ते का इंतजाम कर लेगा।’
ज्योतिका प्रसाद सोच-विचार में पड़ गई थी। उन्हें निर्णायक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। पूरी वाद-विवाद या भाषण प्रतियोगिताओं का दारोमदार निर्णायकों पर ही तो होता है। कितनी बार अच्छे से अच्छे वक्ताओं को साधारण वक्ताओं से परास्त होते उन्होंने देखा है। विषय-वस्तु, प्रस्तुतीकरण, भावाभिव्यक्ति, सभी मानकों के आधार पर ही निर्णय होना चाहिए। निर्णायकों के निर्णय से असंतुष्ट और हताश होने का उनका अपना पुराना अनुभव है। वह किसी वक्ता के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगी। सभी निर्णायक निश्चय कर लेंगे कि अंकों का विभाजन किस प्रकार होगा। अन्य दो निर्णायकों के आते ही वह परस्पर विचार-विमर्श कर लेंगे। अभी तो उन्हें यह भी नहीं मालूम कि भाषण प्रतियोगिता का विषय क्या है?
‘प्रतियोगिता का विषय क्या है?’ उन्होंने कौशल साहब से पूछा।
‘प्रतियोगिता का विषय तो मुझे भी ठीक से नहीं मालूम मैडम, कुछ बुद्ध से सम्बन्धित विषय ही होगा। हमारे डायरेक्टर साहब तो चाहते थे कि सेमिनार कर लिया जाये पर इतने कम नोटिस पर सेमिनार करना क्या कोई आसान काम है। इसलिये यह भाषण प्रतियोगिता रखी गयी।’ कौशल साहब का उत्तर था।
इतने में संस्कृति विभाग का फोटोग्राफर भी पहुंच गया था। आते ही उसने बैनर की एक-दो फोटो खींच ली। लॉन में चहलकदमी करते हुए, रंग-बिरंगी स्कूली पोषाकों में सजे-संवरे बच्चे फूलों के बीच फूलों की तरह खिलखिलाते पूर्वाभ्यास में व्यस्त थे। कोई कागज हाथ में लिये स्पीच याद कर रहा था तो कोई रट्टा लगाते प्रतिद्वंद्वी के उपहास की मुद्रा में कोट का कालर ठीक कर रहा था।
इन भाषणों की तैयारी के पीछे की पृष्ठभूमि को ज्योतिका प्रसाद से अधिक कौन जानता है? स्पीच लिखवाने के लिए कभी एक मैडम तो कभी दूसरी मैडम के पीछे भागते कई दिन निकल जाते तब कहीं जाकर दो-चार बुलैट प्वाइंट मिल पाते। घर में भैया की मिन्नते करते आखिर में वह गुस्से में अपना निर्णय सुना देती।
‘ठीक है मत लिखिये हमारी स्पीच। हम कल अपनी मिस से मना कर देंगे।’ भैया कुछ नरम पड़ते लेकिन नसीहत देना न भूलते।
‘अरे ज्योतिका यह स्पीच बगैरा सब फिजूल के काम हैं। कोई सुनता भी है क्या इन भाषणों को? जितना समय तू यह स्पीच रटने में लगाती है उतना अपनी पढ़ाई में लगायेगी तो टॉप करेगी टॉप। बेकार में रोज एक सिरदर्दी मोल ले लेती है।’ ऐसे मौके पर मां उसका पक्ष लेकर भैया को चुप करा देती। बेचारे भैया! चुपचाप उसके हाथ से कॉपी-पेन लेकर स्पीच लिखने बैठ जाते। आधा-पौना घण्टा में कांट-छांट कर मसौदा तैयार। वह इंटरनेट का जमाना नहीं था फिर भी भैया जो लच्छेदार शब्दावली और तर्कों की फेहरिस्त तैयार करते उसे पढ़ उसकी नाराजगी पल में रफूचक्कर हो जाती। भैया के शब्द और उसकी आवाज की जुगलबन्दी की बदौलत ज्योतिका प्रसाद ने न जाने कितने कप और ट्रॉफियां जीतीं। यूनिवर्सिटी तक पहुंचते तो वह खुद भी स्पीच लिखने में माहिर हो गयी थी।
कौशल साहब फोन पर किसी से बात रहे थे। दुर्गादास जी से बोले, ‘शर्मा का फोन था। आपने क्या उससे सर्टिफिकेट के लिए कहा था?’
‘हां। क्या कहा उसने?’
‘कह रहा था दत्ता साहब तो कल छह बजे तक मीटिंग में थे उसके बाद सीधे घर चले गये। इसलिये सर्टिफिकेट में साइन तो हो ही नहीं पाये।’
‘इस शर्मा से तो कोई काम कहना बेकार है। अब सर्टिफिकेट के बिना प्राइज डिस्ट्रिब्यूशन कैसे होगा।’ दुर्गादास झल्लाकर बोले।
‘विजेताओं को कप देंगे। पार्टिसिपेन्ट्स के सर्टिफिकेट बाद में उनके स्कूलों में भिजवा देंगे।’ कौशल साहब ने सुझाव दिया।
‘हां, यही ठीक रहेगा। सर्टिफिकेट होते तो आज ही काम निपट जाता।’
इसी दौरान एक सज्जन पहुंच गये थे। वह निर्णायक महोदय थे। दुर्गादासजी ने ज्योतिका प्रसाद से उनका परिचय कराया। किन्तु या तो वे ज्योतिका प्रसाद से प्रभावित नहीं हुए या फिर बातचीत के मूड में नहीं थे। ज्योतिका प्रसाद असमंजस में थी कि उनसे निर्णय संबंधी सामान्य नियमों के विषय में बातचीत कैसे करें। वह लॉन के दूसरे छोर पर आ गयी। कुछ बच्चों के साथ उनके अभिभावक भी थे। कुछ टीमों के साथ उनके शिक्षक शिक्षिकायें भी थीं। एक शिक्षिका एक लड़की को हिदायत दे रही थी—
‘इतनी जल्दी नहीं श्रेया, थोड़ा आराम से बोलो। तुम्हारी बात सुनने वालों को समझ में भी तो आनी चाहिए। घंटी चार मिनट बाद बजेगी। ऐसा नहीं कि घंटी सुनते ही तुम आधी स्पीच छोड़कर वहां से चली जाओ। उसके बाद एक मिनट का समय और मिलेगा। और श्वेता तुम। पिछली बार जैसी गलती मत करना कि दूसरी घंटी बज गयी और तुम बोले ही जा रही हो। पांच मिनट से ज्यादा समय लिया तो नंबर कट जायेंगे।’
प्रतियोगिता के नियमों से संबंधित जानकारी निर्णायकों को भी अवश्य दी गयी होगी। दुर्गादासजी से नियमों की एक प्रति मांग लेना ठीक रहेगा। निर्णायक महोदय कुर्सी पर निर्विकार भाव से बैठे थे। दर्शक दीर्घायें अभी खाली थीं। फोन की घंटी फिर बज रही थी। एक प्रतिभागी ने दूसरे कोने पर जाकर अपनी स्पीच दोहरानी शुरू कर दी थी—
‘गौतम बुद्ध ने रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था का विद्रोह किया। उन्होंने ऊंच-नीच, जात-पांत को न मानकर मानव प्रेम पर बल दिया।’
ज्योतिका प्रसाद को भैया याद आ गये। वह भी तो ऐसी ही परिष्कृत और ओजपूर्ण भाषा का प्रयोग करते थे। अभी तक हॉल खाली था। आज छुट्टी का दिन है। उन्हें श्रोताओं की चिंता होने लगी। स्कूली पोशाक में हाथ में कागज लिये रट्टा लगाते हुए लॉन के चक्कर लगा रहे यह बच्चे। रंग-बिरंगी स्कूली पोशाकों में सजे-संवरे फूलों के बीच फूलों की तरह खिलखिलाते यह बच्चे। क्या हॉल की इन खाली कुर्सियों के लिए यहां आये हैं? निशा और प्रभा अपने फ्लैट में होगी। उन्हें इस प्रतियोगिता के बारे में बताना ठीक रहेगा, नीचे कंपाऊंड में बच्चे जरूर खेल रहे होंगे, भाषण सुनने न सही, मिठाई खाने तो आ ही सकते हैं। यही सोचती वह अपनी बिल्डिंग की ओर चल दी।

