बादल युग की साक्षी 114 वर्षीय सुरजीत कौर का निधन
सियासी गांव बादल में सोमवार को एक सौ चौदह वर्षीय वृद्ध महिला सुरजीत कौर का निधन हो गया। गांव में उन्हें गाजे बाजे और पटाखों के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम संस्कार के अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीणों...
सियासी गांव बादल में सोमवार को एक सौ चौदह वर्षीय वृद्ध महिला सुरजीत कौर का निधन हो गया। गांव में उन्हें गाजे बाजे और पटाखों के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम संस्कार के अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीणों के साथ परिजन और रिश्तेदार मौजूद रहे।
दीर्घायु सुरजीत कौर ने गुलाम भारत से स्वतंत्र भारत तक का एक सदी से अधिक लंबा सफर अपनी आंखों से देखा। वे गांव बादल में पांच बार मुख्यमंत्री रहे स्व. सरदार प्रकाश सिंह बादल के सरपंच बनने से लेकर उनके राजनीतिक शिखर और जीवन के अंतिम दौर तक की मूक साक्षी रहीं।
परिजनों के अनुसार सुरजीत कौर ने जीवन भर स्वस्थ जीवन जिया। करीब डेढ़ माह पूर्व बिना किसी गंभीर बीमारी के उन्होंने चारपाई पकड़ी थी। परिवार ने उनकी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का श्रेय देशी घी के नियमित सेवन को दिया। वे वर्ष 2010 तक स्वयं खेतों में नरमा चुगने जाती थीं।
जानकारी के अनुसार सुरजीत कौर मूल रूप से जिला फिरोजपुर के गांव आसल से संबंधित थीं। स्वतंत्रता से पूर्व उनका विवाह वर्तमान पाकिस्तान के गांव मल्लूवाला निवासी जरनैल सिंह से हुआ था। वर्ष 1947 के विभाजन के बाद परिवार भारत आ गया और वर्ष 1949 में गांव बादल में जरनैल सिंह और उनके दो भाइयों को करीब छह एकड़ भूमि आवंटित हुई। खेती में निरंतर परिश्रम के चलते परिवार ने इसे बढ़ाकर लगभग तीस एकड़ तक पहुंचाया।
कुदरत ने उन्हें संतान सुख नहीं दिया। इसके चलते वृद्धावस्था में पति जरनैल सिंह ने अपने छोटे भाई रसाल सिंह के पुत्र बलदेव सिंह को गोद लिया। सुरजीत कौर अपने पीछे पुत्र पुत्रवधू, दो पौत्र, दो पौत्रियां, एक पड़पौत्र और एक पड़दौहता सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गई हैं। उनके पोते लवप्रीत सिंह ने बताया कि दादी सादगी, मेहनत और सकारात्मक सोच की मिसाल थीं और जीवन भर दवाइयों से दूर रहीं।

