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Sep 28, 2021

नाकामी छिपाने की कोशिश

25 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘चेहरे बदल कर नाकामी छिपाती राजनीति’ राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन करके हकीकत छिपाने की असफल कोशिश का चित्र दर्शाता है। हमें यह सोचने पर विवश करता है कि राजनीतिक दल कैसे नाटकबाजी के जरिये जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाना चाहते हैं। सोशल मीडिया के दौर में जनता आज जागरूक हो गई है। यदि जनता क्षेत्र, जाति, निहित स्वार्थों व धर्म जैसे संकीर्णताओं से उबर कर राज्य व देश हित में वोट करे तो राजनीतिक दलों की अक्ल ठिकाने आ जायेगी। तभी हमारे देश में लोकतंत्र मजबूत होगा। लेख राजनीति का संकुचित चेहरा दिखाने में कामयाब रहा है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

राजनीतिक निहितार्थ

संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर किया जा रहा भारत बंद अब पूरी तरह से राजनीतिक हो चुका है। बंद का उद्देश्य किसानों के सरोकार नहीं बल्कि भाजपा के नेतृत्व में ठीक-ठाक से चल रही हरियाणा, उ.प्र. एवं केंद्र सरकार के विरुद्ध राजनीतिक मोर्चा खड़ा करना लग रहा है। ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि संयुक्त किसान मोर्चा मेहनतकश अन्नदाता का कोई हितसाधन का रहा है। अपितु कृषक वर्ग का ध्यान खेती किसानी छोड़ धरना प्रदर्शनों में उलझाए रखना है। अब धरना प्रदर्शनों से आम जनों का मोहभंग हो गया है।

युगल किशोर शर्मा, फरीदाबाद

तालिबान से भारत को चुनौती Other

Sep 27, 2021

कारगर नीति बने

अफगानिस्तान में दुनिया की पहली ऐसी सरकार होगी, जिसमें करोड़ों डॉलर के घोषित इनामी अंतर्राष्ट्रीय आतंकी सत्ता के केंद्र में विराजमान होंगे। सबसे बड़ी चुनौती तालिबान सरकार में हक्कानी गुट की बढ़ती ताकत है। उसके आतंकवादी पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते भारतीय कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ा सकते हैं। तालिबान सरकार के अतीत, नीति और इरादों से साफ है कि भारत को तालिबान के मामले में अत्यंत सावधानी बरतनी होगी। शांति, सभ्यता और मानवता में विश्वास रखने वाले सभी देशों को इस संभावित खतरे से निपटने के लिए समन्वित रणनीति बनानी चाहिए।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

आर्थिक झटका

तालिबानी की वापसी ने न केवल अफगानिस्तान की हालत खराब कर दी है बल्कि भारत के लिए भी भारी संकट पैदा कर दिया है। भारत वहां विकास कार्यों में पिछले 20 सालों में 3 अरब डॉलर लगा चुका है। आज तक भारत ने अफगानिस्तान से 1.4 अरब डॉलर का व्यापार किया है। अफगानिस्तान को हमने 6,129 करोड़ रुपये के उत्पाद भेजे हैं और वहां से 3,783 करोड़ रुपये का आयात किया गया है। सामरिक लिहाज से तो भारत का नुकसान हो ही रहा है, उसे बड़ा आर्थिक झटका भी लगा है। अब ऊपर से आतंक की एक नयी शुरुआत हो गयी है।

नितेश मंडवारिया, नीमच, म.प्र.

जुगलबंदी खतरनाक

बीस वर्ष पूर्व जब अफगानिस्तान में अमेरिका अपनी फौज लेकर पहुंचा था तो उसके अपने स्वार्थ थे। अफगानिस्तान में लोकतंत्र की बहाली तथा शांति स्थापित करना सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए था। उसके स्वार्थ कितने पूरे हुए, यह तो कहा नहीं जा सकता, परन्तु जिस तरीके से अमेरिका अफगानिस्तान छोड़ कर भागा है, उससे पूरी दुनिया में आतंकी संगठनों के हौसले बढ़ गये हैं। पूरी दुनिया के साथ भारत के लिए भी खतरा बढ़ गया है। तालिबान आतंकवादियों की सरकार है। पाकिस्तान व चीन हमारे विरोधी देश हैं, ऐसे में इनकी जुगलबंदी हमारे लिए बड़ी चुनौती है।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, खलीलपुर

बड़ा खतरा

वैसे तो तालिबान की वापसी से पूरे विश्व की शांति को खतरा है लेकिन तालिबान को पाकिस्तान के समर्थन के कारण विशेषकर भारत के लिये यह वास्तव में बहुत गम्भीर खतरा है। कश्मीर में अपनी असफलता के कारण तिलमिलाया पाकिस्तान अपनी खीझ मिटाने के लिये अपनी धरती पर पल रहे आतंकवादियों के साथ-साथ तालिबानी आतंकवादियों का उपयोग भारत के विरुद्ध करने का पूरा प्रयास करेगा। इसके साथ हमें अपनी धरती पर पाकिस्तान की आईएसई के स्लीपर सेल्ज़ से भी सावधान रहना होगा।

अनिल कुमार शर्मा, चंडीगढ़

कूटनीतिक पहल हो

एक महत्वपूर्ण और विश्वासी पड़ोसी के रूप में अफगानिस्तान में हुए उलटफेर का सीधा असर भारत पर पड़ना लाज़िमी है। अफगानी सत्ता पर काबिज तालिबान एक चरमपंथी संगठन है, जिसके खौफनाक इरादों से दुनिया सहमी हुई है। यहां लोकतंत्र की बात करना बेमानी होगा। भारत उन पड़ोसी मुल्कों में है, जिनका अफगानिस्तान से कारोबारी रिश्ता रहा है। दूसरी तरफ संवेदनशील सीमांत क्षेत्र भारत के लिए हमेशा से चुनौती रहे हैं। चीन और पाकिस्तान से बनते-बिगड़ते रिश्तों के बीच तालिबान की वापसी निश्चित रूप से बड़ी चुनौती है। ऐसे में हमारा हर अगला कूटनीतिक कदम महत्वपूर्ण होना चाहिए।

एमके मिश्रा, रांची, झारखंड

सतर्क रहें

तालिबान, पाकिस्तान व चीन की जुगलबंदी भारत के लिये बड़ी चुनौती है। अफगानिस्तान में तेज़ी से आये बदलाव और मौजूदा हालात से ऐसा लगता है कि तालिबान लंबे समय के लिए रहने वाला है। सबसे बड़ी बात तालिबानों की विचारधारा पहले जैसी ही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। वे लोकतंत्र के खिलाफ थे और आज भी हैं। भारत के लिए इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि जम्मू-कश्मीर के रास्ते भारत में चरमपंथियों की घुसपैठ की घटनाएं बढ़ सकती हैं। पाकिस्तान तो ऐसा करने की पूरी कोशिश करता रहेगा।

नेहा जमाल, मोहाली, पंजाब

पुरस्कृत पत्र

मुश्किल चुनौती

अफगानिस्तान में तालिबानियों की सरकार में 18 मंत्री घोषित आतंकवादी हैं। अब चीन और पाकिस्तान की सरपरस्ती में भारत के पड़ोस में आतंक की एक बड़ी फैक्टरी चलेगी। हमारे संसाधन विकास की जगह आतंकवाद नियंत्रण में खर्च होंगे। तालिबान चीन और पाकिस्तान की मदद से सभी देशों के लिए कोई न कोई समस्या खड़ी करता रहेगा। कोढ़ पर खाज ये कि अमेरिका के लौटने और रूस के तालिबान के प्रति नरम रुख के कारण भारत को तालिबान, चीन और पाकिस्तान की इस चुनौती से सैन्य शक्ति और कूटनीति के दम पर अकले ही निपटना होगा।

बृजेश माथुर, बृज विहार, गाज़ियाबाद

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Sep 25, 2021

सिद्धांतवादी राजनीति

आज की राजनीति में चौ. देवी लाल जैसे सिद्धांतवादी नेताओं का मिलना मुश्किल है। चौ. देवी लाल के समय में राजनीति में सिद्धांत को वरीयता दी जाती थी। वे सादगी से राजनीति करने को अपना धर्म समझते थे। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कुल बाइस चुनाव लड़े, जिनमें से बारह चुनाव जीते तथा दस चुनाव हारे। उनकी अधिकतर उम्र विपक्ष का झंडा उठाकर तत्कालीन सत्ताधारी दलों के विरुद्ध खबर लेने में ही गुजरी। उनके द्वारा किये गये कार्यों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। जनता तथा समाज के लिए अपना सारा जीवन अर्पण करने वाले इस महान योद्धा का अंतिम समय दुखदायी रहा। क्या समाज व जनता ने उनके साथ अन्याय नहीं किया?

जोगिन्द्र सिंह हुड्डा, बहादुरगढ़

चीन से दोस्ती

21 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का लेख ‘संकट से मुकाबले के रणनीतिक विकल्प’ तालिबानियों द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद कश्मीर को लेकर भारत के लिए संभावित सुरक्षात्मक विकल्पों का विश्लेषण करने वाला था। इस समय अमेरिका की सुपर पावर की हैसियत पहले जैसी नहीं रही। इस समय भारत के लिए चीन के साथ हाथ मिलाना ज्यादा ठीक रहेगा। हमें चीन के साथ सीमा विवाद हल कर लेना चाहिए। इससे दोनों देशों में व्यापारिक संबंध और सुदृढ़ होंगे, चीन भारत की घेराबंदी की नीति पर पुनर्विचार करेगा। तब वह तालिबानियों-पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ समस्याएं पैदा नहीं करेगा।

शामलाल कौशल, रोहतक

भारत की भूमिका

हाल ही में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका द्वारा चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ऑकस समूह का गठन किया गया, जो साझा हितों की रक्षा और परस्पर सहयोग का ढांचा विकसित करेगा। भारत और जापान को संगठन में शामिल नहीं किया गया। लेकिन भारत के बगैर आज की परिस्थितियों में लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा‌। विश्व कल्याण की भावना ऑकस के उद्देश्यों में है तो भारत को शामिल करना ही होगा।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, म.प्र.

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Sep 24, 2021

गुण भी देखिये

देश के अधिकतर नेता धर्मनिरपेक्षता का नाम तो लेते हैं, लेकिन चुनावों में, सत्ता बांटने में किसी भी व्यक्ति के गुण, उसकी सार्वजनिक जीवन की विशेषता, राजनीति में बेदाग होना देखा नहीं जाता। केवल धर्म, संप्रदाय, जाति के आधार को ही मुख्य माना जाता है। पंजाब कांग्रेस ने भी एक बार पुनः यह सिद्ध कर दिया। कांग्रेस के सूत्रों के अनुसार जब मुख्यमंत्री के लिए विधायकों की मीटिंग में विधायकों से राय ली गई कि मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए तो सबसे ज्यादा वोट सुनील जाखड़ के नाम पर पड़े थे। उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। केवल जाति का ढिंढोरा पीट-पीट कर उस व्यक्ति को बनाया जिसका नाम कहीं विधायकों की बैठक में नहीं आया था। पंजाब को अच्छा मुख्यमंत्री मिलना चाहिए। वो किस जाति, धर्म, संप्रदाय का है, इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता। जनता को तो जनप्रतिनिधि जनता का हित करने वाला चाहिए, लेकिन राजनेताओं के मन में क्या है, वह खुलकर सामने आ गया।

लक्ष्मीकांता चावला, अमृतसर

अपनों की प्रेरणा

19 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में रेनू सूद सिन्हा/सारिका शर्मा का संयुक्त ‘साथ है परिवार तो सपना साकार’ लेख टोक्यो पैरालंपिक विजेताओं की अर्जित उपलब्धियों काे विस्तार सहित समझाने वाला था। माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी का स्नेहिल सहयोग सफलता के आयामों को पा सकने में अहम भूमिका अदा करता है। पदक विजेताओं के चेहरों की रौनक, अपनों के संग सुखद अंतरंग अनुभूतियां भविष्य की प्रेरणास्रोत बन गई।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

नशे का जखीरा

तालिबानियों की सत्ता आते ही नशे की तस्करी शुरू हो गई। गुजरात के राजस्व खुफिया विभाग ने इक्कीस हजार करोड़ की हेरोइन जब्त की है। अफगानिस्तान से भेजी गई हेरोइन गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर उतारी गई थी। इसमें दो व्यक्तियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। भारत सरकार को अफगानिस्तान से आने वाले प्रवासियों पर निगरानी रखनी होगी।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

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Sep 23, 2021

पर्यावरण और ईंधन

वर्ष 2070 तक पेट्रोल-डीजल खत्म होने की आशंका है। इसलिए वैज्ञानिक अब वाहनों के ईंधन के लिए नये-नये विकल्प खोज रहे हैं। ईंधन के प्रयोग से पर्यावरण को खतरा पैदा न हो, इसके लिए हाइड्रोजन ऊर्जा एक अच्छा विकल्प है। यह पर्यावरण सुरक्षा के लिए भी जरूरी है कि वाहनों की बढ़ती संख्या को कम करने के लिए भी उपाय किए जाएं। बढ़ते वाहनों से सड़कों का विस्तार करना पड़ेगा, इसके लिए भारी संख्या में पेड़ों को भी काटना पड़ेगा। कृषि योग्य भूमि को सड़कों के विस्तार के लिए प्रयोग किया जाएगा, इससे पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

यात्रा के लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से 24 सितंबर को वाशिंगटन में होने वाली वार्ता में महत्वपूर्ण समझौतों जैसे व्यापार, निवेश और रक्षा में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी, बाइडेन प्रशासन के समक्ष अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर भी भारतवर्ष का आतंकवाद विरोधी पक्ष मजबूती से रख पाएंगे। वैश्विक मुद्दों साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, उभरती प्रौद्योगिकियों, बुनियादी ढांचे, जलवायु परिवर्तन आदि पर भारतवर्ष अमेरिका की समान सोच पर महत्त्वपूर्ण समझौते होने की सम्भावनाएं हैं।

युगल किशोर शर्मा, फरीदाबाद

वादों पर कार्रवाई

देश में अगले साल कई राज्यों में चुनाव होने हैं। चुनाव की सरगर्मियां बढ़ रही हैं, लुभावने घोषणापत्र भी तैयार किये जा रहे हैं। उसमें आम आदमी पार्टी के वादे तो अलग ही नजर आ रहे हैं। जनता की समस्याओं को आज तक किसी भी राजनीतिक दल के घोषणापत्र ने दूर नहीं किया। इतना ही नहीं, चुनाव जीतने के बाद नेता लोग जनता से मुखातिब नहीं होते हैं। निर्वाचन आयोग से गुजारिश है कि घोषणापत्र में किये गये वादे पार्टी पूरा नहीं करती है तो कानूनी शिकंजा कसकर उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।

शशांक शेखर, नोएडा

भविष्य की चिंता Other

Sep 22, 2021

हिंसा, मारकाट और आतंक के बल पर अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार एक बार फिर कायम हो गई। प्रशासन के लिए जिस सरकार ने आकार लिया है, उसका वीभत्स चेहरा दुनिया को डराने लगा है। कई देशों ने इसके प्रति नाराजगी जाहिर की है, वहीं अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप शासन की जरूरत भी चाही है। विश्व बिरादरी से संतुलन और समन्वय की दिशा में अगर तालिबान का रुख अंतर्राष्ट्रीय कायदे कानून के हिसाब से नरम नहीं हुआ तो यह मान लिया जाना चाहिए कि अफगानिस्तान मुट्ठी भर देशों के साथ दुनिया से संघर्षरत रहेगा।

अमृतलाल मारू, दसई, म.प्र.

खेलों पर जोर

खेल मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए अच्छी पहल की है। वे टोक्यो में आयोजित ओलंपिक खेलों और पैरालंपिक में अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को देखकर और अधिक उत्साही हो गए हैं। उन्होंने राज्यों से कहा है कि खेलकूद के संबंध में चर्चा करें और यह खेल के क्षेत्र में अच्छा बुनियादी ढांचा बनाने के लिए मार्गदर्शन करेगा। उन्होंने अधिक से अधिक पदक जीतने पर जोर दिया ताकि हमारा देश शीर्ष के पदकों की संख्या को छू ले। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी खेल के प्रति रुचि देश में खिलाड़ियों के लिए एक नया उत्साह का संचार करेगी।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, मंडी

समझ का फेर

पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को जिस कदर अपमानित कर दरकिनार किया गया है, उससे पार्टी को बड़ी हानि हुई है। हरियाणा में भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा को राज्य चुनाव से पहले दरकिनार करने की कोशिश की गई थी। उसका नतीजा यह रहा कि पार्टी वहां सत्ता के बहुत करीब पहुंच कर भी दूर रही। सभी घटनाओं से साफ है कि पार्टी नेतृत्व को साफ़ समझ ही नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस लगातार हाशिये पर जा रही है।

वेद मामूरपुर, नरेला

राजनीतिक हसरत Other

Sep 21, 2021

अठारह सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘राजा पर राजनीति के अनुत्तरित प्रश्न’ महापुरुषों की गरिमामय विरासत पर राजनीतिक कब्जेदारी की हकीकत का चित्र दर्शाता है। लेख यह सोचने पर विवश करता है कि राजनीतिक दल कैसे एक महान स्वतंत्रता सेनानी के बड़े कद को जातिवादी सांचे में ढालकर संकुचित करना चाहते हैं। लेकिन एक अच्छी बात जरूर है कि नई पीढ़ी के लोग राजा महेंद्र प्रताप सिंह के योगदान से परिचित हुए। ऐसे ही प्रयास दूसरे भूले-बिसरे स्वतंत्रता सेनानियों को नई पीढ़ी से अवगत कराने के लिये भी होने चाहिए। लेख राजनीति का संकुचित चेहरा दिखाने में कामयाब रहा है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

रिश्तों की अहमियत

चौदह सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में क्षमा शर्मा का ‘असहनशीलता के दौर में रिश्तों का कत्ल’ संतानों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला था। बच्चों में ऑनलाइन शिक्षा के बहाने मोबाइल से प्रेरित हिंसक फिल्मी कार्टून, धारावाहिक किशोर काल में पथभ्रष्ट करते हैं। माता-पिता को युवा काल की भावनाओं, रुचियों काे व उनकी मानसिकता को स्नेहिल मित्रवत‍् बर्ताव करते हुए समझना चाहिए।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

कैसे बने स्वच्छ परीक्षा प्रणाली Other

Sep 20, 2021

मिलीभगत का खेल

बेहद सख्ती के बावजूद पेपर लीक होने की बीमारी संबंधित पक्षों में मिलीभगत के कारण बदस्तूर जारी है। इसका एकमात्र इलाज ऑनलाइन परीक्षाएं करवाना है। परीक्षाएं करवाने के लिए एक अलग बोर्ड बनवाया जाए, जिसमें उसी समय तीन या चार प्रकार के प्रश्न पत्र तैयार करवाए जाएं और पेपर शुरू होने से पहले बोर्ड का केंद्रीय अधिकारी परीक्षा केंद्रों में टीवी स्क्रीन पर प्रश्न-पत्र विद्यार्थियों के लिए प्रदर्शित करे। जब तक पेपर का समय खत्म न हो पेपर सेट करने वाले लोग वहीं रहें। इस तरह पेपर लीक नहीं होगा। परीक्षा केंद्रों के अंदर-बाहर चुस्त-दुरुस्त तथा सख्त प्रबंध होने चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

बेरोजगारों से अन्याय

पेपर बनाने वाली, प्रिंट कराने वाली एजेंसियों के भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी ही मुख्य रूप से पेपर लीक करने के मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, जिसमें राजनीतिक भ्रष्टाचार भी शामिल है। इस सारी प्रक्रिया पर निगरानी रखने के लिए अलग से सेल बनाने की जरूरत है, जिसमें उच्चकोटि के ईमानदार अधिकारी हों तथा जो आधुनिक साइबर तंत्र प्रणाली से लेस हो। सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा जुर्म करने वाले को सख्त सजा का प्रावधान भी अति आवश्यक है। पीपर लीक होना योग्य बेरोजगार युवाओं के साथ अन्याय है।

एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र

लालच का कहर

पेपर लीक होने का मुख्य कारण है रातों-रात धन कुबेर बनने की चाहत। अभी हरियाणा पुलिस में भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने में लाखों करोड़ों का लेन-देन हुआ। परीक्षा आयोजन में सरकार का काफी मात्रा में खर्च किया गया धन बेकार गया। उम्मीदवारों का परिश्रम, आने-जाने में हुआ व्यय, परीक्षा शुल्क सब बेकार हुआ। व्यवस्था तंत्र के प्रति लोगों का विश्वास डगमगाया। सुप्रीम कोर्ट को भी तल्ख़ टिप्पणी करनी पड़ी। पेपर लीक की जिम्मेदारी तो उनकी ही है जो पेपर सेट करने में, चुनाव करने में, प्रिंटिंग करने व करवाने में और परीक्षा केंद्रों तक पेपर पहुंचाने की व्यवस्था संभाल रहे थे। ईमानदार अधिकारियों को इस महत्वपूर्ण कार्य को सम्पन्न कराने की जिम्मेवारी लेनी होगी।

शेर सिंह, हिसार

बड़ी साजिश

देश में पेपर लीक करने वाले गिरोह सक्रिय हैं, जिसके चलते एक सुनियोजित तरीके से कार्य हो रहा है। इस वजह से योग्य उम्मीदवार सफलता से वंचित रह जाते हैं। स्वच्छ परीक्षा प्रणाली को सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम उठाए जाने चाहिए ताकि पेपर लीक करने वालों को न केवल पकड़ा जा सके बल्कि इस अपराध को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए ताकि करोड़ों में पेपर खरीदने व बेचने वालों पर नकेल लगाई जा सके। कोचिंग सेंटरों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। पेपर संपन्न कराने वालों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

श्रीमती केरा सिंह, नरवाना

शिकंजा कसें

प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के मामले ज्यादा बढ़ रहे हैं। यह कोई एक दिन की बात नहीं है इससे पहले भी आनॅलाइन और आफॅलाइन परीक्षाओं में पेपर लीक के बहुत से मामले उठते रहे हैं। सरकार ने अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए पेपर लीक करने वाले लोगों को कभी सामने लाने का काम ही नहीं किया। पेपर सेट करने वाले या पेपर पि्रंट करने और करवाने वाले या उत्तरकुंजी बनाने वाले दो-तीन लोगों के इर्दगिर्द ही सारा खेल होता है। इस सारे खेल के लिए जिम्मेदार लोगों पर एक बार कड़ी कार्रवाई हो जाए तो भविष्य में इस प्रकार की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

जगदीश श्योराण, हिसार

समीक्षा जरूरी

देशभर में स्कूल कॉलेज से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की निर्धारित स्वच्छ प्रक्रिया के बीच किसी भी तरह की नकल एक अनुचित कार्य है। पेपर लीक होने से तो इसकी पूरी व्यवस्था ही कटघरे में खड़ी हो जाती है। बिना पैसे के घालमेल के ऐसा होना असम्भव है। बार-बार पेपर लीक होने से तो सरकार का नौकरी का दावा खोखला नजर आ रहा है। परीक्षाओं में नकल होने से मेहनती बच्चे अपने आप को ठगा-सा महसूस करते हैं। लोगों में परीक्षा की पवित्रता का भरोसा कायम रखने के लिए अपराधियों को सख्त सजा देने व पूरे सिस्टम की व्यापक समीक्षा की जरूरत है।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद

पुरस्कृत पत्र

सख्ती से बनेगी बात

किसी भी शैक्षिक या प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण विषय है। पेपर लीक की निरंतर पुनरावृत्ति से राष्ट्र की युवाशक्ति का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। राष्ट्र की शैक्षिक और प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन में आमूलचूल परिवर्तन समय की मांग है। पेपर लीक रोकने के लिए गोपनीयता और सुरक्षा के कठोर मापदंड तय करके उनकी अनुपालना सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर कठोर कानून बनाया जाना चाहिए। पेपर लीक मामलों में कानूनी कार्रवाई, सख्त कानूनी सज़ा और आर्थिक दंड का अपराधियों में डर होना जरूरी है।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

समय की पहल Other

Sep 18, 2021

सरकार ने टेलीकॉम सेक्टर को बचाने के लिए जो राहत पैकेज प्रदान किया है, वह सराहनीय है। इस राहत से टेलीकॉम सेक्टर में फौरी तौर पर जान आएगी और डूबने के कगार पर खड़ी वोडाफोन को भी उबरने का मौका मिल जायेगा। अब कंपनियों को चार साल तक एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू और स्पेक्ट्रम का बकाया नहीं चुकाना पड़ेगा। इस राहत से केंद्र सरकार पर अतिरिक्त भार पड़ेगा। अब कंपनियों का भी फ़र्ज़ बनता है कि वे 5-जी के क्षेत्र में कदम रखते हुए अपने नेटवर्क में सुधार और उपभोक्ताओं के हितों का भी ध्यान रखें।

चंद्र प्रकाश शर्मा, दिल्ली

राष्ट्रभाषा का दर्जा

किसी भी देश की परिकल्पना हम उसके भाषायी आधार पर करते हैं। अगर किसी देश की मातृभाषा ही अस्तित्व खोने लगे तो यह बेहद चिंतनीय है। ऐसा क्यों होता है कि जब कोई विशेष दिवस आता है तभी हम उसकी विशेषता पर ध्यान देते हैं। उसी तरह आज हमारी मातृभाषा के साथ बर्ताव हो रहा है। आज पूरे भारत में भले ही 'हिंदी' को राजभाषा और आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त हो, लेकिन ये सिर्फ कहने मात्र का है। आज मातृभाषा का अस्तित्व छात्रों में सिर्फ पढ़ने के लिए रह गया है, न कि रुचि के लिए। सरकार को चाहिए कि हिंदी भाषा को राजभाषा से राष्ट्रभाषा की ओर ले जाए, जिससे हमारी मातृभाषा का वजूद कायम रहे।

शशांक शेखर, नोएडा

तालिबान से मुकाबला

पंजशीर के लड़ाके अभी भी युद्ध के मैदान में डटे हुए हैं। अहमद मसूद के इन लड़ाकों ने दुनिया भर से मदद की अपील की है। तालिबान ने प्रचार किया है कि उसने पंजशीर पर कब्जा कर लिया है। पंजशीर के लोगों ने अपनी आजादी के कई वीडियो जारी किए हैं। उन्होंनेे कहा है कि अगर दुनिया हथियार और अन्य वित्तीय सहायता प्रदान करे तो वे अफगानिस्तान में लोकतंत्र स्थापित कर देंगे।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, मंडी

भविष्य पर सवाल Other

Sep 17, 2021

बारह सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में सुषमा रामचंद्रन का लेख ‘वर्क फ्रॉम होम’ कोरोना महामारी के कारण प्रभावित हुई शैक्षिक-शिक्षण कार्यशैली का विस्तार से खुलासा करने वाला था। घर बैठे बच्चों को मोबाइल इंटरनेट व्हाट्सएप द्वारा दी जाने वाली शिक्षा आधी-अधूरी ज्ञान की सूचक है। कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते बच्चों के लिए मोबाइल टच खरीद पाना उनकी विवशता का मजाक है। ऑनलाइन घर बैठे शिक्षा बच्चों के मन में उठने वाली जिज्ञासा भरे अप्रत्यक्ष प्रश्नों का समाधान नहीं है। मोबाइल शिक्षा बच्चों को गुणकारी संस्कार न डाल कर उन्हें अपने लक्ष्य से भटका रही है। बोर्ड परीक्षाएं घर बैठे पास करना उनके लिए महान उपलब्धि है। ऐसे में बच्चों का भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

ड्रोन से अतिक्रमण

पाकिस्तान की तरफ से कई बार ड्रोन को भारतीय क्षेत्र में देखे जाने की घटना सामने आई। अभी कुछ दिनों पूर्व जम्मू में फिर दिखा ड्रोन बीएसएफ के जवानों ने खदेड़ा है। हवाई सीमा उल्लंघन कर नियमों को तोड़ रहा है। भारतीय क्षेत्र में ड्रोन की घुसपैठ का मुंह तोड़ जवाब देना आवश्यक है। तालिबान समर्थक पाक आतंकवादियों के संग़ठन के साथ मिलकर नई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के चक्कर में है। ड्रोन को खत्म करने हेतु ड्रोनरोधक सिस्टम लगाना आवश्यक है ताकि दोबारा घुसपैठ करने की हिमाकत न कर सके। सबक सिखाना भी आवश्यक है।

संजय वर्मा, धार, म.प्र.

संस्कृत को सम्मान

हि.प्र. के शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने देश की विरासत संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए तीसरी से पांचवीं कक्षाओं के लिए संस्कृत को अनिवार्य करने का जो फैसला लिया है वह सराहनीय है, इस फैसले को केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति के साथ भी जोड़कर देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री भी संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए बहुत गंभीर दिखते हैं। समय के साथ शिक्षा क्षेत्र में भी बदलाव जरूर होना चाहिए। प्रदेश में संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए सभी प्राइवेट स्कूलों को भी अमल में लाना चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

आपकी राय Other

Sep 16, 2021

स्वतंत्रता का दोगलापन

14 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का लेख ‘पश्चिमी हितों की संरक्षक वैयक्तिक आजादी’ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दोगलेपन का पर्दाफाश करने वाला था। तालिबानियों द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने के फलस्वरूप वहां पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नियंत्रण करने के कारण सारी दुनिया हाय तौबा मचा रही है, जिनमें पश्चिमी देश सबसे आगे हैं। पूछा जा सकता है कि अमेरिका जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र प्रधान देश में अभी भी रंगभेद नीति क्यों जारी है? पेटेंट अधिकारों को लेकर दूसरे देश के लोगों को वह सब चीजें बनाने की अनुमति क्यों नहीं दी जाती? चीन, उत्तरी कोरिया आदि देशों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन के बावजूद वहां के लोग अमेरिका आदि देशों के मुकाबले ज्यादा खुश तथा सुखी हैं। 

शाम लाल कौशल,रोहतक

कोरोना का डर

बिहार में जब से पंचायत चुनाव का बिगुल बजा है, तब से जो भी उम्मीदवार अपने पद के लिए नॉमिनेशन कराने आ रहे हैं, उनके साथ में समर्थक भी आ रहे हैं और वही लोग कोरोना के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ा रहे हैं। प्रशासन भी इस दौरान लापरवाह नजर आ रहा हैै। यही हालात बने रहे तो कोरोना की तीसरी लहर को आने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। बिहार सरकार को भी इस बाबत सोचना चाहिए कि अगर हालात चुनाव के कारण खराब हो गए तो फिर राज्य में किस तरह की परिस्थिति होगी। इससे निपटने के लिए निर्वाचन आयोग को जिम्मेदारी लेने की जरूरत है। 

शशांक शेखर, नोएडा

मानवता को खतरा

तालिबान ने लगभग बिना किसी प्रतिरोध के अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। यह तालिबान पूरी तरह से 1996 से 2001 वाला है। इसकी सोच कट्टरपंथी है। तालिबानी अफगानिस्तान की आम जनता पर कहर ढा रहे हैं और विशेष रूप से महिलाओं और बुजुर्गों के लिए कोई दया नहीं है। विश्व समुदाय को उन पर लगाम लगाने के लिए एकजुट होना चाहिए। दुनिया को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह तालिबान आम लोगों के कल्याण के लिए काम करेगा तब धन जारी किया जा सकता है। 

नरेंद्र कुमार शर्मा, मंडी

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

सच्चा उद्देश्य Other

Sep 15, 2021

हिंदी दिवस को राष्ट्र एक संकल्प दिवस के रूप में मनाए, जिसमें हमारी युवा पीढ़ी संकल्प ले कि हिंदी हमारी पहचान है, शान है। उसे अपने जीवन में स्वीकार करे। आज का युवा आधुनिकता की नकल में जी रहा है और हिंदी से परहेज करता है। जिस प्रकार हमारे माता-पिता, हमारा जन्म स्थान, हमारा रंगरूप हमारा अपना है, ठीक उसी प्रकार हिंदी हमारी मातृभाषा है, जिस पर हमें गर्व होना चाहिए। शिक्षक वर्ग का दायित्व है कि बच्चों को इस प्रकार शिक्षित किया जाए कि आने वाले पीढ़ी हिंदी भाषी होने पर गर्व कर सके। हिंदी लेखन, पठन और उच्चारण पर जोर दिया जाए। यही हिंदी दिवस का सच्चा उद्देश्य है।

श्रीमती केरा सिंह, नरवाना

जनहित देखें

किसान आंदोलन आम आदमी को परेशान करने वाला और जिद पर सवार होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाला आंदोलन साबित हो रहा है। प्रदर्शनकारी इस बात पर अड़े हुए हैं कि कृषि कानूनों को वापस लिया जाए जबकि सरकार इन कानूनों को वाजिब मानते हुए आंशिक सुधारों के लिए तैयार है। दीगर बात यह है कि प्रदर्शनकारियों और सरकार के मध्य चल रहे इस अनिर्णीत दंगल का निकट भविष्य में कोई हल भी नहीं दिखाई देता। यही लड़ाई यदि आमजन को तकलीफ में डालकर लड़ी जायेगी तो यह लोकतांत्रिक न होकर राजनीतिक, स्वार्थपरक और हठधर्मिता रूपी स्वार्थ कहा जायेगा।

चंद्र प्रकाश शर्मा, दिल्ली

भयमुक्त हों बेटियां

दैनिक ट्रिब्यून में 14 सितंबर को प्रकाशित संपादकीय ‘एक और निर्भया’ मानवीय दरिंदों की करतूतों पर कड़ा प्रहार लगा। देश में कड़े कानून लागू होने के बाद भी बेटियां न गांव और न ही शहरों में सुरक्षित हैं। एक निर्भया की मौत के बाद जब दरिंदों को फांसी की सजा दी गई थी तब ऐसा लगने लगा था कि शायद इस तरह की घटनाएं अब समाज में सामने नहीं आएंगी। हाल ही में पीड़िता के साथ जिस तरह का घिनौना व्यवहार किया गया है, उसके लिए मौत की सजा भी कम है।

अमृतलाल मारू 'रवि', धार म.प्र.

पैरा खिलाड़ियों के लिए खेल तंत्र Other

Sep 13, 2021

खेल सुविधाएं दें

देश का कोई खिलाड़ी जब किसी भी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करता है तब उस पर पुरस्कारों की बौछार की जाती है। लेकिन उससे पहले या बाद में खिलाड़ियों को कोई नहीं पूछता। ऐसा पैरा खिलाड़ियों के साथ भी हो रहा है। इससे सरकार का खिलाड़ियों के प्रति ढुलमुल रवैये का ही पता चलता है। पैरा खिलाड़ियों के लिए अनुकूल खेल तंत्र तभी विकसित हो सकता है जब समाज, परिवार, शिक्षक इनकी दिव्यांगता को इनकी कमजोरी न समझें। सरकारें इन्हें खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। हर जिला मुख्यालयों में इनके लिए खेल एकडेमी स्थापित करें।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

मोहताज न रहें

टोक्यो में पैरालंपिक में भारतीय खिलाड़ियों की सफलता नि:संदेह प्रेरणादायक है। उनका प्रदर्शन सामान्य व्यक्ति के लिए भी प्रेरणा की मिसाल है। यह प्रदर्शन इस तथ्य को सार्थक करता है कि जज्बा हो तो जीवन में कुछ भी हासिल किया जा सकता है।  दरअसल, देश में दिव्यांगों के जीवन के अनुकूल परिस्थितियां विकसित नहीं की जा सकी हैं। खेल के लिए अनुकूल वातावरण तो दूर की बात है। ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ियों को खेल संबंधी सारी सुविधाएं दी जाएं और सरकारी नौकरियां भी दी जाए ताकि वे किसी के मोहताज न रहे।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

मान-सम्मान मिले

टोक्यो पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीतकर राष्ट्र के गौरव को चार चांद लगाए। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि दिव्यांगता व्यक्ति के लिये अभिशाप नहीं है। सरकारों को उनके उत्साहवर्धन हेतु मानसिक-शारीरिक रुचियों के मद्देनजर अलग से खेल प्रकोष्ठ की स्थापना करनी चाहिये। नि:शुल्क खेल प्रशिक्षण केंद्रों में आदर्श कोच नियुक्त करने चाहिए। उच्च सरकारी पदों पर नियुक्ति से समाज में उनका खोया मान-सम्मान प्राप्त हो सकेगा‌। 

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

तंत्र को सुधारें

देश के सरकारी खेल तंत्र की उदासीनता ने हमेशा खेल प्रेमियों को निराश किया है। नतीजतन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों से भरा यह देश दुनिया के खिलाड़ियों के सामने बौना दिखता है। देश के खेल तंत्र पर राजनीतिक प्रभाव ने पैरा खिलाड़ियों की उम्मीदों को व्यक्तिगत संसाधनों के भरोसे छोड़ दिया है। हाल के पैरालंपिक्स में खिलाड़ियों में छिपी अद‍्भुत प्रतिभा दुनिया के सामने उभर कर आयी हैं। खिलाड़ियों का प्रदर्शन खेल तंत्र के सामने चुनौती बन कर खड़ा हो गया है। बेहतर नतीजों के लिए खेल तंत्र को पैरा खिलाड़ियों के अनुकूल बनाना होगा। शारीरिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों की प्रतिभाओं को तराशने के लिए खेल तंत्रों की मजबूती जरूरी है।

एमके मिश्रा, रांची, झारखंड

नीति बनाएं

टोक्यो में संपन्न हुए पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने पांच सोने के मेडल समेत 19 मेडल जीतकर न केवल इतिहास रचा बल्कि दुनिया को यह भी दिखा दिया कि हम किसी से कम नहीं। सरकार को दिव्यांगों के लिए एक अलग खेल नीति बनानी चाहिए तथा खेल विभाग में दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए एक अलग प्रकोष्ठ बनाना चाहिए। समाज के लोगों को इन्हें सम्मान की दृष्टि से देखकर प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि ये लोग पैरालंपिक खेलों में अपनी प्रतिभा दिखाकर और ज्यादा पदक जीतकर देश का नाम रौशन कर सकें।

शामलाल कौशल, रोहतक

अनुकूल वातावरण बने

टोक्यो ओलम्पिक में देश के पैरा खिलाड़ियों ने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन से देश का गौरव बहुत ऊंचा किया है। इन खिलाड़ियों ने अपने जुनून व जज्बे पर सवार होकर पदक जीते हैं। बहुत बार दिव्यांगजनों को सामाजिक भेदभाव अथवा कष्ट से गुजरना पड़ता है। यह बहुत दु:खद है। देश में ऐसे खिलाड़ियों के लिए एक सम्माननीय सोच, सम्माननीय माहौल देने का दृढ़ संकल्प लें। इसके साथ ही पैरा खिलाड़ियों के लिए ब्लॉक स्तर पर ही मजबूत खेल तंत्र का निर्माण किया जाएं। इससे अनेक स्वर्ण व रजत पदक जीतने वाले निकल कर सामने आयेंगे।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, गुरुग्राम

प्रतिभाओं को संबल दें

टोक्यो पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन ने देश का गौरव बढ़ाया है। जिन हालात में अधिकांश लोग निराशा व असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो जाते हैं, इन्होंने उन हालात को अवसर में तब्दील कर दिया। सामान्य मानव जीवन के लिए यह अत्यधिक प्रेरणादायक है। हमारे खेल नीति निर्धारकों का दायित्व बनता है कि इन्हें समानता, स्नेह व सम्मानजनक जीवनयापन करने के अवसर उपलब्ध करवाए जाएं। खेलतंत्र भी इनकी आवश्यकताओं व सुविधाओं को ध्यान में रखकर ही नीति निर्धारण करे। किसी भी राष्ट्र का मूलभूत ढांचा उस राष्ट्र की प्रतिभा ही होती है।

विनोद सिल्ला, टोहाना, फतेहाबाद

आपकी राय Other

Sep 11, 2021

समाधान निकालें

मुजफ्फरनगर में हुई किसान महापंचायत एवं करनाल में मिनी सचिवालय पर हुए किसानों के विरोध प्रदर्शन से तीन तथाकथित विवादास्पद कृषि कानूनों का मुद्दा फिर से जाग्रत हो जाने के पीछे मंशा भाजपा सरकारों की निंदा करना ज्यादा एवं कृषक वर्ग का हित साधना कम प्रतीत हो रहा है। सपा, बसपा और कांग्रेस द्वारा सोशल मीडिया में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पूर्व भाजपा सरकार के विरुद्ध वातावरण राजनीतिक शत्रुता के लिए बनाया जा रहा है। कृषि कानून के मुद्दे को सुलझाया जाना समय की मांग है।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद

शिक्षा के लक्ष्य

नयी शिक्षा नीति को सुदृढ़ करने के लिए भारत सरकार के माध्यम से हि.प्र. के लिए स्टार प्रोजेक्ट मंजूर हुआ है। इसके तहत 12 जिलों में नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर कार्यशालाएं हो रही हैं। यह नीति तभी सफल होगी जब शिक्षक, अभिभावक और समाज इस नीति को लागू करने के लिए समर्पित होंगे।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, मंडी

अंधेरे की कैद

पांच सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में नासिरा शर्मा का लेख ‘अफगानिस्तान अंधेरे की कैद में उजाले’ तालिबान तानाशाही हुकूमत का शिकार हुए अफगानिस्तान के नागरिकों की लाचारी का खुलासा करने वाला था। रूढ़िवादी प्रथा, अज्ञानता, अशिक्षा सामाजिक विकास में बाधक है। जोर जुल्म का शासन भले ही अफगानिस्तान को गुलाम बना ले पर मानसिक रूप से असंभव है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सरकार में आतंकी

तालिबान की नयी कैबिनेट में आतंकवाद के ऐसे चेहरे हैं, जिन पर करोड़ों के इनाम हैं। अब देखना है कि कितने देश उसे अब मान्यता देंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अपराधी-आतंकी अब अफगानिस्तान में सरकार चलाएंगे तब इसका नाम आतंकीस्थान रखना एक बड़ी मजबूरी होगी।

राज शाजापुरी ‘राज’, शाजापुर

आपकी राय Other

Sep 10, 2021

जवाबदेही तय हो

इस बार बरसात में जलभराव के कारण दिल्ली की हालत बहुत भयावह रही है। न तो दिल्ली नगर निगम या नगरपालिका और न ही दिल्ली जलबोर्ड ने पिछली गलतियों से कोई सबक सीखा। दिल्ली के ग्रामीण और पॉश इलाके की सड़कें और कालोनियां जलमग्न रहीं। भिन्न-भिन्न निकाय जलभराव के लिए एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ते रहे। दिल्ली की सीवरेज प्रणाली पुरानी अवश्य हो गयी है, लेकिन इनके जाम होने की मुख्य वजह इनकी समय पर सफाई नहीं होना है। दिखावे के लिए मामूली सफाई करके इतिश्री समझ ली जाती है।

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

मुश्किल राहें

अफगानिस्तान में जब से तालिबानी राज कायम हुआ है, तब से सभी देशों के लिए मुश्किलों का नया दौर शुरू हो गया। सभी देशों ने आनन-फानन में अपने-अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी को लेकर काम करना शुरू कर दिया। अब तो अफगानिस्तान में तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार का भी गठन कर लिया है। हालात इस कदर हो गए हैं कि वहां का राजकाज तालिबान और पाकिस्तान के इशारों पर ही चल रहा है, जिससे भारत की राहें और अधिक मुश्किल हो गई हैं। पाकिस्तान का दबदबा अब और अधिक बढ़ गया है, साथ में चीन की चालबाजी भी।

शशांक शेखर, नोएडा

अमल करें

लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव और हर चुनाव में आमजन की भागीदारी भी जरूरी है। दरअसल, कुछ स्वार्थी लोगों के राजनीति में आ जाने से पार्टी के राजनेताओं और राजनीति से विश्वास उठ चुका है। देश की राजनीति के लिए स्वच्छता अभियान चलाने के उद्देश्य से बेशक सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की ओर से दागी उम्मीदवारों की जानकारी वेबसाइट व अखबारों में इश्तिहार देकर सार्वजनिक करने की हिदायत दी हो, लेकिन इस पर अमल कौन करेगा?

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

आपकी राय Other

Sep 09, 2021

राजनीति की करवट

चार सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘चुनावी आहट से करवट लेती राजनीति’ लेख में उत्तराखंड, पंजाब और उत्तर प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनावों के साथ ही विपक्ष की धमाचौकड़ी भी उसी द्रुतगति से जारी है। लेखक का मानना है कि उत्तराखंड में कार्यकाल के अधबीच में मुख्यमंत्रियों के बदलाव की कूटनीति क्या गुल खिलाएगी यह समय के अप्रत्याशित फैसले पर निर्भर करेगा। इधर, कांग्रेस आलाकमान के फैसलों का ओर छोर न मिलने से भाजपा संभवतः घाटे में तो नहीं ही रहेगी। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोतसिंह सिद्धू की चढ़ी आस्तीनें भी गुल खिलाने को तैयार हैं। लेखक का मानना है कि पंजाब को लेकर आलाकमान बड़े असमंजस में दिखाई दे रहा है। लेखक का निष्कर्ष है कि आगामी चुनाव इतने आसान भी नहीं हैं क्योंकि, किसानों की राड़ और कोरोना दोनों गले में फांस की तरह अटके हुए हैं, जिससे हाशिये पर पड़े विपक्ष को ऑक्सीजन मिल गयी है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

न्याय की राह

देश में जितने भी लॉ कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं, वहां से लॉ की डिग्री लेने वाले विद्यार्थी उसी प्रकार इंटर्नशिप करें, जैसे मेडिकल कॉलेज के डाक्टर बनकर करते हैं। देश की सभी जेलों को लॉ कॉलेजों के साथ जोड़ा जाए और जेलों में वर्षों से बिना केस चलाये सड़ रहे लाखों लोगों की अदालतों तक वे अपील दलील लेकर जायें। ताकि जेल में बंद कैदियों का समय पर न्याय हो सके। लॉ की डिग्री लेने वालों के लिए इंटर्नशिप भारत सरकार जरूरी करे।

लक्ष्मीकांता चावला, अमृतसर

बेलगाम निर्माण

देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तेजी से निर्माण कार्य हो रहे हैं, उतने ही सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे भी बढ़ते जा रहे हैं। वहीं बिना किसी नियम-कानून के बिल्डर ऊंची इमारतें खड़ी कर देते हैं। लेकिन स्थानीय प्रशासन को खबर तक नहीं लग पाती? जब कोई हादसा होता है तब प्रशासन की नींद खुलती है और ताबड़तोड़ कार्यवाही करके अवैध निर्माण तोड़ दिये जाते हैं।

अमृतलाल मारू, धार म.प्र.

नाकामियों पर पर्दा Other

Sep 08, 2021

चार सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘चुनावी आहट से करवट लेती राजनीति’ चुनाव आते देख राजनीतिक दलों की घबराहट बताने वाला था। पहली बात तो यह है कि राजनेताओं को भ्रम है कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है और नेतृत्व परिवर्तन करने से वह पार्टी की विफलताओं को भूल जायेगी। वास्तव में राज्यों में स्थानीय मुद्दों का जोर होता है और जनता इतनी आसानी से कुशासन व नाकामियों को नहीं भूलती है। यही वजह है केंद्र सरकार ने पिछले कुछ समय में उत्तराखंड में तीन मुख्यमंत्री बदल दिये। चुनाव सिर पर हैं और नये मुख्यमंत्री से यह उम्मीद रखना कि वह पिछले चार साल की पार्टी शासन की नाकामियों से पार्टी की सरकार को उबार देगा, सिर्फ भ्रम ही है। महत्वपूर्ण लेख के लिये साधुवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, उत्तराखंड

रोक लगे

हाल ही में चीन ने ऑनलाइन गेमिंग के नियम और कड़े करने का फैसला लिया है। दरअसल, बच्चे अपना ज्यादातर समय ऑनलाइन गेम्स पर ही गंवा देते हैं, जिससे बच्चों के स्वभाव और व्यवहार में बदलाव दिखने लगे थे। गेम्स की बढ़ती लत उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर गंभीर असर डाल रही थी। अब बच्चे वीकेंड में गेम्स पर एक घण्टे से ज्यादा समय व्यतीत नहीं कर पाएगे। चीनी सरकार द्वारा उठाया यह सख्त कदम अवश्य ही परिवर्तन लाएगा।

सुकृति सैनी, डेराबस्सी, पंजाब

विडंबना

हाल ही में उच्चतम न्यायालय में तीन महिला न्यायाधीशों ने शपथ ली थी और उसी दिन एक महिला, जिसका भारतीय कानून व्यवस्था से विश्वास उठ चुका था उसने निराश होकर उच्चतम न्यायालय के सामने आत्मदाह कर लिया। इससे बड़ी विडंबना की बात और क्या हो सकती है।

कवरीन कौर, लुधियाना

कठोर कदम उठाएं Other

Sep 07, 2021

2 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में जी. पार्थसारथी का लेख ‘अमेरिकी पलायन से भारत के लिए पैदा खतरे’ के अनुसार तालिबानियों के दबाव में अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से दुम दबाकर भागने का भारत पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। अफगानिस्तान अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का केंद्र बन जाएगा। लश्करे तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन जम्मू-कश्मीर में अशांति पैदा कर सकते हैं। अफगानिस्तान से चीन और पाकिस्तान भारत के खिलाफ समस्या पैदा कर सकते हैं। हमें अपने बचाव के लिए पहले से भी ज्यादा पुख्ता प्रबंध करने पड़ेंगे।

शाम लाल कौशल, रोहतक

नियमों का पालन करें

पिछले दो महीने में कोरोना के मामलों में लगातार गिरावट के बाद सब कुछ पटरी पर आता दिखाई दे रहा था। लेकिन दो महीनों बाद फिर से कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। पिछले कुछ दिनों में ही बड़ी संख्या में कोरोना के नये मामले सामने आए हैं, जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि कोरोना की तीसरी लहर कभी भी दस्तक दे सकती है। ज्यादातर लोग अब न मास्क पहनते हैं और न ही सामाजिक दूरी की परवाह करते हैं। कोरोना को रोकने के लिए हमें कोरोना गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करना चाहिए।

लवनीत वशिष्ठ, मोरिंडा

जातीय जनगणना का औचित्य Other

Sep 06, 2021

सुधार की उम्मीद नहीं

जाति आधारित जनसंख्या का विचार पुरातनपंथी लगता है। वहीं सरकार जाति आधारित आरक्षण को बढ़ावा दे रही है। पढ़ाई, दाखिला, नौकरी और फिर पदोन्नति में भी आरक्षण दिया जाना कहां तक उचित है। खुद केन्द्र सरकार पिछड़ा वर्ग का दायरा बढ़ाने का विधेयक पास करवाती है, नयी जातियों को इसमें जोड़ने का रास्ता साफ कर रही है। देश से जातिवाद और वर्गवाद को खत्म करना है तो सबसे पहले वोट बटोरने का मोह छोड़ना पड़ेगा। चाहे शिक्षा का कितना भी प्रचार-प्रसार हो जाए परन्तु पहचान और रोजगार जाति से मिलेगा तो बहुत ज्यादा सुधार की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।

जगदीश श्योराण, हिसार

स्वार्थपूर्ण राजनीति

जातीय जनगणना जातिविहीन समाज की परिकल्पना और सामाजिक सद‍्भाव के प्रयास को कमजोर करती है। फिर भी अगर जातीय जनगणना होती है तो इसका प्रयोजन सकारात्मक हो, जिससे सभी वर्गों का विकास हो। इसके साथ ही जरूरतमंदों को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मदद मिले। इस बात का ध्यान रहे कि जातीयता सोच की आशंकाएं फिर से न उभरने पाएं। आज पूरा समाज जातियों के कारण बंटा हुआ है तो सद‍्भावना के प्रयास विफल होेते नजर आ रहे हैं। राजनेता सिर्फ वोट की राजनीति कर रहे हैं।

रवि नागरा, नौशहरा, साढौरा

पीछे धकेलेगी

इस बार की जातिगत जनगणना राजनीति से प्रेरित लगती है। हालांकि, जातिगत जनगणना के बिना देश की आबादी का ठीक से अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अगर जातिगत जनगणना होती है तो वह एक ठोस आधार होगा, आरक्षण प्रतिशत तय करने के लिए। लेकिन जातिगत जनगणना के बाद ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी’ के नारे के असर को संभाल पाना सरकार के लिए मुश्िकल होगा। आरक्षण का नया मुद्दा खड़ा हो जायेगा। जातिगत जनगणना से भेदभाव और विभाजन की खाई और चौड़ी होगी। यह हमें आगे नहीं, पीछे के पायदान की ओर धकेल देगी।

एससी राम राजभर, चंडीगढ़

सत्तालोलुपता का उपक्रम

सरकार तथा राजनेताओं की सत्तालोलुपता और दुर्बल मानसिकता के कारण स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी जातिवाद ने भारत से पलायन नहीं किया बल्कि समाज में जातीयता को ही बढ़ावा दे रहा है। अब यह पक्का हो गया है कि देश इससे कभी भी मुक्त नहीं हो सकता। अतः 21वीं सदी में जनगणना, जाति ही नहीं अपितु उपजातियों एवं गोत्र के आधार पर की जानी चाहिए क्योंकि जो जाति आरक्षण का लाभ ले रही है, उसमें उन अल्पसंख्यकों को भी लाभ मिल सके जो हमेशा से उपेक्षित रहते हैं।

एमएल शर्मा, कुरुक्षेत्र

वोट बैंक का साधन

जातीय जनगणना की मांग और उसका औचित्य संदेहास्पद है। बाहर से देखने में तो यह जनगणना उचित लगती है परंतु विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी मौसम में इसका प्रयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए किया जाएगा। डॉ. अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था का प्रावधान सामाजिक समरसता के लिए रखा था। कालांतर में आरक्षण एक मजबूत वोट बैंक बन गया। इस जनगणना में सभी जातियों की आर्थिक स्थिति का पूरा ब्योरा तैयार किया जाए ताकि हर जरूरतमंद वर्ग को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।

श्रीमती केरा सिंह, नरवाना

राजनीतिक संकीर्णता

सामाजिक समरसता कायम रखने के लिए आज़ादी के बाद अनुसूचित जातियों और जनजातियों को छोड़ कर किसी अन्य जाति की गणना नहीं हुई। आधुनिक शिक्षा, समाज और वैज्ञानिक प्रगति के साथ जात-पात के भेदभाव मिटने चाहिए थे, मगर ऐसा नहीं हुआ। नेता प्रगति का पहिया उलटा घुमाकर 18वीं सदी में जाना चाहते हैं ताकि समाज में फूट डालकर राज कर सकें। यह देश के लिए दुःखद है कि जनता से जुड़े मुद्दों यथा महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, विकास आदि के बजाय जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के नाम पर चुनाव लड़े जा रहे हैं।

बृजेश माथुर, गाज़ियाबाद

पुरस्कृत पत्र

समरसता के लिए घातक

जातिगत समीकरणों के आधार पर जनगणना संविधान की प्रस्तावना के विरुद्ध एवं समानता के मौलिक अधिकार से खिलवाड़ है। यह सामाजिक सरोकारों पर प्रहार करके वोट हथियाने का मूलमंत्र है। जातीयता की परिधि में रहने से सामाजिक रिश्तों में तो दरार आती ही है, साथ ही प्रजातांत्रिक मूल्यों पर भी कुठाराघात होता है। जब तक जातिगत निर्णय से ऊपर उठकर जनगणना का पारदर्शी आकलन नहीं होगा तब तक न तो सामाजिक समरसता उत्पन्न होगी और न ही जातिगत जहर फैलने से राष्ट्रीय अस्मिता बच पायेगी।

सतपाल मलिक, महावटी, पानीपत

आपकी राय Other

Sep 04, 2021

डराती बेरोजगारी

देश में बेरोजगारी इस कदर बढ़ी है कि कई लोग अच्छी-खासी डिग्रियां पाकर भी घर पर बैठे हैं और मजदूरी करने को मजबूर हैं। कई बेरोजगार अपने अच्छे भविष्य के लिए विदेश की ओर पलायन करना बेहतर समझ रहे हैं। सरकार का यह दावा कि हर साल करोड़ों लोगों को रोजगार दिलाया है, खोखला नजर आता है। पिछले 5 सालों में नौजवानों को रोजगार मिल सके, इसके लिए मोदी सरकार कई योजनाएं भी लेकर आई। लेकिन 130 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले हिन्दुस्तान में सिर्फ हजारों और लाखों के रोजगार से काम नहीं चलेगा, क्योंकि देश में हर साल एक करोड़ बेरोजगारों की फौज खड़ी हो जाती है।

गीता कुमारी, सरहिंद, फतेहगढ़ साहब

तकनीकी खामी का खमियाजा

चंडीगढ़ प्रशासन ने यातायात को नियंत्रित करने और नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने के लिए कई क्रासिंग्स पर लाखों के कई कैमरे नये ट्रैफिक सिग्नल लगाए हैं। नगर के बहुत से चौराहों, टी-प्वांइट्स पर सिग्नल्स पर डिजिटल क्लॉक्स या तो आरंभ नहीं की गई या खराब हैं। वाहन चालक को इस बात का अनुमान ही नहीं हो पाता कि कब लाइट हरी से लाल हो जाएगी और वह जेब्रा क्रासिंग पार कर जाएगा और चालान करवा लेगा। ऐसे कई क्रॉसिंग हैं जहां घड़ियां नहीं चल रहीं। संबंधित अधिकारियों को इस विषय पर अविलंब ध्यान देना चाहिए।

मदन गुप्ता सपाटू, चंडीगढ़

मानवीय संकट

29 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में पुष्परंजन का लेख ‘क्या से क्या हो गया अफगानिस्तान’ वहां के निवासियों की अंतर्व्यथा का मार्मिक खुलासा करने वाला था। एक ओर साझे पारंपरिक उत्सवों का मनोहारी दृश्य चित्ताकर्षक व लुभावनी छटा बिखेरता हुआ धर्मनिरपेक्षता की मिसाल कायम कर रहा था, वहीं दूसरी ओर तालिबान का अत्याचार भरा तानाशाही वातावरण दिल दहलाने वाला बदस्तूर जारी है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

आपकी राय Other

Sep 03, 2021

खतरनाक संकेत

पंजाब में आए दिन पुलिस आतंकी गतिविधियों का पर्दाफाश कर रही है। हाल ही में तरनतारन में एक कट्टरवादी को घातक हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया । पिछले कुछ दिनों में सरहद पार से भी देश विरोधी ताकतों को हथियारों की सप्लाई के मामले तेजी से बढ़े हैं। यह बेहद चिंता का विषय है क्योंकि पंजाब पहले ही आर्थिक संकट, बेरोजगारी और महंगी बिजली जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। अब राज्य में बढ़ती आतंकी गतिविधियां राज्य के आपसी सौहार्द को भी चुनौती दे रही है। विदेशों में बैठे आतंक के आका वहां ऐशोआराम की जिंदगी व्यतीत करते हैं और पंजाब के युवाओं के अंदर नफरत के बीज बो रहे हैं। सरकार को ऐसे लोगों के विरुद्ध सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

पुलकित जैन, बनूड़

महंगाई की मार

देश में आज खाद्य पदार्थों से लेकर डीजल-पेट्रोल एवं रसोई गैसों के बढ़ते दामों ने लोगों की जेब ढीली कर दी है। इतना ही नहीं, घरेलू रसोई गैस की कीमत ने तो भारी-भरकम बोझ ही बढ़ा दिया है। ऐसी स्थिति में कम आमदनी वाले परिवार को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होगा। सरकार जरूर दलील दे रही है कि महंगाई कम होगी, लेकिन कब होगी? देश में पहले से ही बेरोजगारी और गरीबी जैसे तमाम मुद्दे हैं। सरकार कोरोना का सहारा लेकर महंगाई जैसे ज्वलंत मुद्दों से बच रही है।

शशांक शेखर, नोएडा

समाधान निकालें

हाल ही में करनाल में चल रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान हरियाणा पुलिस ने किसानों की पिटाई की। किसानों की समस्याओं का समाधान न करके किसानों पर लाठीचार्ज करना दुर्भाग्यपूर्ण है। किसान अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्वक तरीके से विरोध कर रहे थे। किसान देश की रीढ़ है क्योंकि किसान ही देश का पेट पालता है। सरकार को किसानों की मांगों का समाधान निकालना चाहिए।

परनीत कौर, जींद

आपकी राय Other

Sep 02, 2021

एकजुटता जरूरी

28 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘विपक्ष से पहले कांग्रेस में एकता जरूरी’ लेख में कांग्रेस पर कई सवाल उठाए गए हैं कि पहले कांग्रेस अपना ढहता घर तो संभाल ले। फिर सोचे कि 2024 का चुनाव जीतने के लिए विपक्ष को कैसे एकजुट करेगी? जी-23 के बगावती सुर और युवा नेताओं का दल छोड़-छोड़कर चले जाना भी उसे समझ आ जाता तो भी स्थिति संभल सकती थी। जहां उसकी सरकारें हैं वहां भी उसके अप्रत्याशित फैसले उसके लिए मुश्किलें ही खड़े कर रहे हैं। छत्तीसगढ़, पंजाब, केरल और राजस्थान की धमक क्या कह रही है-इसे समझने की फुर्सत किसी को नहीं है। कांग्रेस को चाहिए कि पहले अपनी वस्तुस्थिति को संभाले। निष्कर्ष है कि कांग्रेस आलाकमान को अपनी खंड-खंड होती पार्टी में समन्वय स्थापित करना ज़रूरी है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

सुधार जरूरी

31 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला वाला का लेख ‘जन कल्याण में बाधा ना बनें सरकारी नौकरियां’ इस विषय प्रकाश डालने वाला था। लेखक के इस सुझाव से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कटौती करके उसी धन से ज्यादा लोगों को नौकरियां दी जाएं। सुझाव है कि सरकारी कर्मचारियों को अपने उच्च वेतन के अनुरूप अपनी कार्यकुशलता, उत्पादकता तथा अनुशासनशीलता प्रदर्शित करनी चाहिए। अपना काम समय सीमा में समाप्त करना चाहिए। भ्रष्ट तथा निकम्मे कर्मचारी को निकाल देना चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

जानकारी का दुरुपयोग

आज के समय में सोशल मीडिया हमारे मनोरंजन का पहला माध्यम बन गया है। लेकिन हम अपनी निजता खोते जा रहे हैं। हम कब कहां हैं और क्या कर रहे हैं, इसकी जानकारी हम खुद अपडेट करते हैं, जिसका दुरुपयोग असामाजिक तत्व कर रहे हैं। इन सब को रोकने के लिए जरूरी है कि हम सोशल मीडिया पर अपनी व्यक्तिगत जानकारी को साझा करने से बचें।

गीता कुमारी, सरहिंद,फतेहगढ़ साहिब

पहले कांग्रेस तो एकजुट हो Other

Sep 01, 2021

28 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘विपक्ष से पहले कांग्रेस में एकता जरूरी’ विपक्षी एकता के नारों के बीच जनाकांक्षाओं की वास्तविकता बताने वाला था। सही अर्थों में लेख विपक्ष की घोषणाओं और हकीकत का चित्र दर्शाता है। जो राजनेता मंचों से घोषणाएं करते हैं, वे नरेंद्र मोदी का विकल्प एकजुट विपक्ष के रूप में देंगे, वे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को ही एकजुट कैसे करेंगे। ऐसा हर आम चुनाव से पहले होता है। इस बार शोर जल्दी शुरू हो गया है। एकजुटता की कोशिशें पूरी होती ही कहां हैं। जनता देख रही है कि कांग्रेस के क्षत्रपों की सत्ता की भूख चौराहे पर आ गई है। पंजाब की राजनीति में तूफान मचा है। कल के नेता नवजोत सिंह सिद्धू दिग्गज नेता कैप्टन अमरेंदर सिंह को ललकार रहे हैं। राजस्थान में तूफान से पहले की शांति है। छत्तीसगढ़ में भी टकराव है। युवा पीढ़ी पार्टी छोड़-छोड़ कर जा रही है। लेख विपक्षी राजनीति की हकीकत बताने में कामयाब रहा है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

नकारा तालिबान को

अफगानिस्तान के पहाड़ी प्रांत पंचशेर में अमरुल्ला सालेह के लड़ाकों ने अपने क्षेत्र से तालिबानियों को खदेड़ दिया है। बगलान प्रांत पर सेना ने पुनः कब्जा कायम कर लिया है। यहां पर जनता का भी समर्थन मिल रहा है। जनता तालिबान का पूर्व का शासन जो की शरीयत कानून पर चलता है पसंद नहीं करती हैं। अब तालिबान का एक बार फिर से विरोध शुरू हो गया है। निश्चय ही जनता शांति से रहना पसंद करती है।

राज शाजापुरी, शाजापुर, म.प्र.

मानवता पर प्रश्न

‘काबुल हमला... अमेरिका का बदला।’ आखिर मारामारी की यह आग कब बुझेगी? यह मध्ययुगीन विकृत सोच कब खत्म होगी? यह विडंबना ही है कि विश्व में इतनी तरक्की होने के बाद भी मध्ययुगीन बर्बरता कट्टरता के साथ कायम है, जो हमारे मानव होने पर प्रश्न चिन्ह है। फिर चाहे वे तालिबानी हों या आतंकवादी या अन्य!

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन