आपकी राय

नशे की दलदल में बॉलीवुड Other

Sep 28, 2020

जन संसद की राय है कि बॉलीवुड के नामचीन सितारों का नशे की दलदल में डूबना घातक है क्योंकि बड़ा तबका उन्हें अपना नायक मानता रहा है। जांच एजेंसियों को इस काले कारोबार की जड़ों तक पहुंचना चाहिए। यह जांच और कार्रवाई निर्बाध रूप से जारी रहनी चाहिए।

सख्त हो मुहिम

अभिनेता सुशांत की मौत की जांच करते-करते नशे की अंधेरी गर्त भी उजागर हो गयी। तमाम नामचीन सितारों के नाम भी इस दलदल में उजागर हो रहे हैं। यह बड़ी चौंकाने वाली बात है। युवा लड़के और लड़कियां इन सितारों को अपना रोल मॉडल मानते हैं और उनके नक्शे कदम पर चलने की कोशिश करते हैं। देश का नारकोटिक्स विभाग ताबड़तोड़ छापे मार कर नशे का सामान बरामद कर रहा है। विभाग को चाहिए कि जो मुहिम उन्होंने अब छेड़ी है, इस समस्या को जड़ से खत्म करके ही छोड़े। आरोपियों को भी सख्त से सख्त सजा दी जाए।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

मुक्ति की उम्मीद

बॉलीवुड सदैव ही नशे की दलदल में रहा है। पहले यह नशा शराब तक सीमित था। कालांतर में जब से बॉलीवुड पर अंडरवर्ल्ड का वर्चस्व बढ़ा तबसे मादक द्रव्यों का बोलबाला हो गया। अन्य आपराधिक कुकृत्यों के साथ-साथ मुंबई अंडरवर्ल्ड नशीली दवाओं की काली कमाई पर फलता-फूलता है। सुशांत एवं दिशा की हत्या इन्हीं नशीली दवाओं के बॉलीवुड पर शिकंजे का दुष्परिणाम हैं। भ्रष्ट राजनेता एवं पुलिस तंत्र इस काले कारोबार के परिपालक हैं। उम्मीद है सुशांत एवं दिशा का बलिदान बॉलीवुड को इस अभिशाप से मुक्त करवाने में सफल होगा।

अनिल कुमार शर्मा, चंडीगढ़

कड़ी हो निगरानी

मनोरंजन जगत की नगरी बॉलीवुड नशे की भेंट चढ़ रही है, यह सोचना अटपटा लगता है। धन ऐश्वर्य-संपन्नता की वसूली नशे के माध्यम से करते हुए फिल्में, धारावाहिक, मनोरंजन का घालमेल समाज में परोसा जा रहा है। दूसरों को टेंशन मुक्त करता बॉलीवुड आज स्वयंऺ टेंशन का शिकार है। दुनिया को हंसाने-रुलाने का बीड़ा उठा खुद की जिंदगी से खिलवाड़ करने का अवसर जुटा रहा है। प्रशासन व शासन सख्त कानून बना नशे में लिप्त फिल्मी व्यवसायियों पर कड़ी निगरानी बनाए। कानून की अवहेलना करने वालों पर शिकंजा कसना होगा।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

जड़ों पर प्रहार

बालीवुड के सितारों के नशे के गोरखधंधे में शामिल होने के आरोप उजागर हो रहे हैं। आज यहां फिल्मों के साथ-साथ नशे का कारोबार भी खूब फलफूल रहा है। मायानगरी में पैसों के साथ नशे के बड़े रैकेट से जुड़े होने में कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। अगर ईमानदारी से जांच होती है तो कई सफेदपोश भी नंगे हो सकते हैं। जांच एजेंसियों को फिल्मी दुनिया में नशे के कारोबार से जुड़े लोगों की जड़ तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए और इस धंधे में संलिप्त लोगों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई नशे का शिकार होकर अपना जीवन बर्बाद न करे।

जगदीश श्योराण, हिसार

सफाई का वक्त

सुशांत की संदिग्ध मौत ने फिल्मी जगत में नशे के भयावह रूप को उजागर कर दिया है। बॉलीवुड और ड्रग तस्करों का गठजोड़ आज सबके सामने है। मायानगरी में लोग नाम, शोहरत और पैसा कमाने आते हैं, विडंबना देखिये कि वे कामयाबी हासिल करने के बाद ड्रग्स के खेल में संलिप्त हो जाते हैं। फिर चाहकर भी वे बाहर नहीं निकल पाते। कई बार अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने से भी नहीं चूकते। बॉलीवुड में ड्रग्स का खेल समाज और देश के लिए खतरनाक है। बॉलीवुड में ड्रग्स की गंदगी को साफ करने का समय आ गया है।

रवि नागरा, नौशहरा, साढौरा

समाज पर असर

व्यक्ति के नशा करने का प्रभाव घरों तक ही सीमित रहता है या थोड़ा बहुत समाज में पड़ता है। लेकिन बॉलीवुड में काम करने वाले लोग विशेषकर नायक-नायिकाएं किसी भी प्रकार के नशे का सेवन करते हैं तो समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। नौजवान तबका तो पूरी तरह से इनकी नकल करता है। गरीब व नौजवान जब इसके आदी हो जाते हैं तो उनके पास आत्महत्या के सिवा कोई चारा नहीं रहता। आज ड्रग्स के तमाम मामले उजागर हो रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि बॉलीवुड में नशीली दवाओं का उपयोग किया जाता है। देश की जनता विशेषकर युवा वर्ग को क्या सन्देश जायेगा। उम्मीद करते हैं कि बॉलीवुड में जल्द सुधार आएगा।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजडू, मंडी, हि.प्र.

पुरस्कृत पत्र

बॉलीवुड बेनकाब

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या ने बॉलीवुड के कई भ्रमों को खत्म कर दिया है। प्रतीत होता है कि फिल्म इंडस्ट्री में न केवल भाई-भतीजावाद, पक्षपात और शारीरिक शोषण होता है, बल्कि ड्रग्स का भी जोर रहता है। क्या इससे पहले एनसीबी सोया हुआ था? अब इतनी राजनीति क्यों हो रही है? आजकल जितनी गंदगी बॉलीवुड में है, उसे देखकर लगता है कि इन लोगों का अभिनय से कोई मतलब नहीं रह गया है। एक-आध फिल्म हिट होने के बाद दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ने लगता है और फिर मादक पदार्थों का सेवन शुरू हो जाता है।

शामलाल कौशल, रोहतक

आपकी राय Other

Sep 26, 2020

आचरण पर सवाल

23 सितम्बर दैनिक ट्रिब्यून का सम्पादकीय ‘अनुचित आचरण’ संसद में विपक्षी सांसदों के अभद्र, अनीतिपूर्ण हंगामे तथा कृषि से सम्बन्धित विधेयकों के बारे में सटीक विश्लेषण प्रस्तुत करने वाला था। सत्तापक्ष का भी यह दायित्व बनता है कि मर्यादा अनुसार अपने कर्त्तव्य का वहन करे। विपक्ष को हर समय हर मुद्दे पर विरोध जताने की बजाय उचित फैसलों पर सरकार का साथ भी देना चाहिए। असहमति होने की परिस्थिति में मर्यादित, अनुशासित तथा शान्तिपूर्वक व्यवहार का प्रदर्शन करना चाहिए।

एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र

नासमझी की दलील

केंद्र और राज्य सरकारें लोगों को कोरोना से बचने के लिए मास्क पहनने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का कहना है कि वह मास्क नहीं पहनते हैं इससे क्या होता है। प्रदेश के मंत्री का यह कहना बहुत शर्मनाक है। वैश्विक महामारी कोरोना का संक्रमण बढ़ ही इसलिए रहा है कि लोग मास्क नहीं पहन रहे हैं। देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातर बढ़ती जा रही है। आज इस महामारी का इलाज सिर्फ जागरूकता है। बाद में मंत्री ने अपनी बात पर खेद जताया है।

प्रदीप कुमार दुबे, देवास, म.प्र.

कानून से असुरक्षा

हाल ही में श्रम कानून के सुधार में नया कानून बनाया गया है, जिसके तहत तीन सौ से कम काम करने वाले कर्मचारियों को कोई कम्पनी बिना सरकार की मंजूरी लिए कभी भी निकाल सकती है। ऐसे में हर कोई कम्पनी अब अपनी मनमानी करेगी, जहां गरीब आदमी का जरूरत से ज्यादा शोषण होगा तो हर समय नौकरी जाने का डर, कही न कहीं उसकी सामाजिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। सरकार पुनः विचार करें।

रमन कुमार कुकरेजा, मोहाली

सच का सामना Other

Sep 25, 2020

पंजाब, हरियाणा में कृषि सुधार को लेकर किसानों के विरोध को मद्देनजर रखते हुए कुछ बातें सोचने लायक हैं। सरकार द्वारा लिए गए फैसले किसानों के हित में हैं तो क्यों किसानों के सामने कृषि सुधार को बेहतर तरीके से नहीं रखा गया। केंद्र दावा करता है कि ये देश के किसानों को फायदा पहुंचायेंगे तो क्यों किसानों को नहीं समझाया गया कि कैसे फायदा होगा। क्यों राज्यसभा कि कार्यवाही के मध्य कैमरे और माइक बंद कर दिए गए। क्या किसानों को उनके लिए लिये गए फैसले को जानने का हक नहीं है।

गीता ठाकुर, शिमला

कोरोना से जंग

इस समय कोरोना महामारी के खिलाफ पूरी दुनिया एकजुट हो गई है। बहरहाल, डब्ल्यूएचओ की पहल पर दुनिया के 156 देशों ने वैक्सीन बनाने के लिए हाथ मिला लिया है। आश्चर्य की बात है कि अमेरिका और चीन, दोनों ने डब्ल्यूएचओ की इस मुहिम में साथ देने से इनकार कर दिया। उम्मीद है कि जल्द ही वैक्सीन दुनिया को मिल जाएगी ताकि अन्य लोगों की जान बच सके।

निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

शाही अंदाज

20 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में पुष्परंजन का लेख ‘आसमान में राजमहल’ हैरतअंगेज करने वाला रहा। यह देश-विदेश के आला नुमाइंदों के महंगे विमानों में ऐश्वर्य- संपन्नता, विलासित साज-सज्जा की ओर संकेत कर रहा था। दूसरे राष्ट्रों से आपसी मैत्री संबंधों में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती लाने की परिपाटी का अनुकरण है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

बारिश से बदहाल

मुंबई में भारी बारिश से जिंदगी थम जाती है वहीं इस बारिश से बीएमसी के चेहरे भी बेपर्दा हो गए। उसके दावे खोखले साबित हुए हैं। अलर्ट जारी करने के बाद भी बारिश में आर्थिक राजधानी इतनी बुरी स्थिति में होती है तो देश के अन्य शहरों का क्या हाल होगा। उम्मीद है कि फिर बारिश के कारण कोई हादसा नहीं होगा।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजडू, मंडी, हि.प्र.

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

निजीकरण की राह Other

Sep 24, 2020

केंद्र सरकार ने सरकारी स्वामित्व वाली, जैसे बीमा, बैंकिंग, उर्वरक, रक्षा उपकरण, इस्पात, पेट्रोलियम और अन्य क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, जो जनहित में भी बहुत आवश्यक है। सरकार के इस कदम का कुछ संगठनों ने विरोध करना भी शुरू कर दिया है, जो अनुचित है। विरोध करने वालों से ये पूछा जाना चाहिए कि क्या वे लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में नहीं भेजते हैं? और निजी अस्पतालों में अपना इलाज नहीं करवाते हैं? अगर यह सही है तो फिर निजीकरण का विरोध क्यों?

राम मूरत ‘राही’, सूर्यदेव नगर, इंदौर

नियमन जरूरी

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। प्रिंट मीडिया तो अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है लेकिन इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का गिरता स्तर देश के लिए बहुत ही चिंता का विषय है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। कारण साफ है टेलीविजन पर भयावह तरीके से समाचार पेश करना और बेकार के मुद्दों पर डिबेट करवाकर आपसी खींचतान करवाना, ऐसा लगता है कि टीवी का एंकर अभी गोली चला देगा। बहस के दौरान एक-दूसरे पर चिल्लाकर सभी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस कानून बने।

सुनील सहारण, फ़तेहाबाद

सोच बदलें

आज 21वीं सदी में भी दुनिया में लैंगिक असमानता है। देश भी इससे अछूता नहीं है। देश की लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। वहीं दूसरी तरफ अभी भी भारत के कुछेक रूढ़िवादी विचारधाराओं और धर्म के ठेकेदार लड़कियों के प्रति संकीर्ण सोच रखे हुए हैं। भारत का सशक्तीकरण तब तक नहीं हो सकता, जब तक हर वर्ग के शत प्रतिशत लोग लड़का-लड़की के बीच भेदभाव की संकीर्ण मानसिकता नहीं त्याग देते।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

आपकी राय Other

Sep 23, 2020

रोजगार मिले

22 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का लेख ‘रोजगार बढ़ने से सुधरेगी आर्थिकी’ विचार प्रकट करने वाला था। अब धीरे-धीरे सरकार ने अनलॉक की पॉलिसी लागू की है, जिसमें कुछ शर्तों के साथ आर्थिक क्रियाओं को धीरे-धीरे फिर से शुरू करने की मंजूरी दी है। देश में लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाकर ही रोजगार बढ़ाया जा सकता है। करों में यथासंभव कमी करनी चाहिए, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करना चाहिए। अधूरी सरकारी योजनाओं को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए, मनरेगा के तहत ग्रामीण तथा शहरी लोगों को रोजगार देना चाहिए। छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में खाली पदों को भरना चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

असंसदीय व्यवहार

कृषि सुधार बिलों के विरोध में जिस प्रकार विपक्षी दलों के सदस्यों ने राज्यसभा में आचरण की समस्त मर्यादाएं भंग की हैं, इसके लिए उनकी कड़ी से कड़ी भर्त्सना की जानी चाहिए। लोकतंत्र में सरकार का विरोध करने का अधिकार न केवल लोकतंत्र की खूबसूरती है अपितु इससे सरकार की मनमानी अथवा तानाशाही पर भी अंकुश लगता है। विरोध का तात्पर्य यह कतई नहीं हो सकता कि संसदीय आचरण अथवा मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा दी जाएं। यह संसदीय इतिहास की सबसे क्षोभजनक घटना है।

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

किसान की सुध

देश की आजादी के बाद कई सरकारें आईं लेकिन किसान की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। यह शासन और सरकार की कमजोरी को ही दर्शाता है। देखना यह है कि मोदी सरकार भी किसान-मजदूरों के लिए क्या कुछ करती है। ताजा कृषि सम्बन्धी दो बिलों के बाद अब धरतीपुत्र अन्नदाता बेचारे किसान की क्या हालत होगी, यह तो समय ही बताएगा।

वेद मामूरपुर, नरेला

आपकी राय Other

Sep 22, 2020

सुधार के सवाल

केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा देकर हरसिमरत कौर बादल ने मौके पर चौका मार दिया। केंद्र सरकार द्वारा लाये गए तीन कृषि  सुधार बिलों के विरोध में हरियाणा और पंजाब के किसान कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। अब तक इसे विपक्षी दलों की चाल बताकर अपना पल्ला झाड़ने वाली केंद्र सरकार को इस इस्तीफे से झटका जरूर लगा है। हरियाणा में भी किसानों पर हुए लाठीचार्ज और इन अध्यादेशों का विरोध झेल रहे उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के पास खुद को किसान नेता साबित करने का ये सुनहरा अवसर है। 

सुनील सहारण, फ़तेहाबाद 


तार्किक बयान

राज्यसभा में जया बच्चन ने जो बयान दिया, वह सही है। चंद गलत लोगों की खातिर सभी को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता। जो ड्रग्स में लिप्त हैं, उन्हें बेनकाब कर दंडित किया जाना चाहिए। पूरे फिल्म उद्योग को बदनाम करना सही नहीं है।

 हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.

जमीन से जुड़ा हो नेतृत्व Other

Sep 21, 2020

जन संसद का मानना है कि कांग्रेस पार्टी का संकट इसके संगठनात्मक ढांचे में व्याप्त खामियों का नतीजा है। जब तक पार्टी को परिवारवाद से मुक्त करके जमीन से जुड़े जुझारू नेता का नेतृत्व नहीं मिलता, पार्टी की दशा-दिशा में सुधार नहीं हो सकता। पार्टी को इस दिशा में आत्ममंथन करने की जरूरत है।

कांग्रेस पार्टी लम्बे समय से नेतृत्व संकट से जूझ रही है। सोनिया के नेतृत्व में लोगों को आशा थी कि देश की राजनीति को कुछ नया मिलेगा। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। राहुल भी कोई करिश्मा नहीं कर सके। अब पार्टी में रोज नये सुर सुनाई देते हैं। पार्टी का आम कार्यकर्ता हताश है। कार्यकर्ता में जोश भरने वाला, एक नयी दिशा देने वाला कोई नेता चाहिए। कांग्रेेस पार्टी को परिवारवाद की परम्परा को तोड़कर योग्य व कर्मठ और जमीन से जुड़े नेता को कमान सौंपी जा सकती है। चाटुकारिता की राजनीति छोड़कर पार्टी हित में सही निर्णय लेने होंगे।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, गुरुग्राम

आत्ममंथन करें

आजादी से लेकर आज तक कांग्रेस नेहरू गांधी परिवार की बपौती रही है। एक-दो बार छोड़कर कोई राजनेता इसको चैलेंज नहीं कर सका; यदि किसी ने हिम्मत भी की तो कांग्रेस का ही विभाजन हो गया, परन्तु फिर भी यह गांधी परिवार की ही सम्पदा बनी रही। अबकी बार फिर कोशिश हुई परन्तु उन्हीं के पर काट दिए गए। अब तो एक ही रास्ता है कि राहुल गांधी को सर्वेसर्वा बनाकर आजाद छोड़ दिया जाए। सोनिया तथा उसके समर्थक शान्ति से बैठ जाएं। वैसे कांग्रेस पार्टी को आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है।

एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र

पार्टी में लोकतंत्र हो

कांग्रेस देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल है। पिछले काफी समय से यह पार्टी नेतृत्व के संकट से गुजर रही है। एक अच्छा नेतृत्व नहीं होने व परिवारवाद के कारण पार्टी को लगभग लगभग हरेक चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ रहा है। नौबत यहां तक आ पहुंची है कि विपक्ष में बैठने के लिए भी इसके पास पर्याप्त बहुमत तक नहीं रहा है। कांग्रेस को चाहिए कि वह नेतृत्व के मामले में परिवारवाद से बाहर निकले और लोकतांत्रिक ढंग से नेतृत्व का चुनाव करे।

एस.के. महला, पटियाला, पंजाब

संगठन मजबूत करें

अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करवाने की मंशा वातानुकूलित कक्ष में बैठकर पूरी नहीं हो सकती। सोशल मीडिया पर ट्वीट रूपी दुखड़ा रोने की आदत छोड़कर राहुल पार्टी संभाले। कांग्रेसी शासित राज्यों में मौजूद नेतागण अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में जमीनी स्तर पर जनता के लिए कार्य करें। वे गली-कूचों में घूमकर समस्याओं का निवारण करेंगे तो शायद पार्टी की स्थिति सुधरे। संगठन उस बूढ़े बैल की तरह है जो कागजों में दौड़ता है हकीकत से कोसो दूर है। इसके इलाज के लिए कांग्रेस को नेतृत्व क्षमता, विकास करना होगा।

राजेश कुमार कनौजिया, नयी दिल्ली

मजबूत विपक्ष जरूरी

कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के संकट को लेकर उपजा असंतोष लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसका मुख्य कारण है—पार्टी का पूर्णकालिक अध्यक्ष का न होना। लगातार सिमटती जा रही कांग्रेस को यदि अपना अस्तित्व बचाना है तो जरूरी है कि पार्टी लोकतांत्रिक ढंग से अपना अध्यक्ष चुने क्योंकि अब परिवारवाद के विरुद्ध भी पार्टी में आवाज उठने लगी है। कांग्रेस का संकट यदि बढ़ता है तो यह लोकतंत्र के लिए अहितकार ही होगा। किसी भी निर्वाचित सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए विपक्ष का मजबूत होना भी जरूरी है।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

नया नेतृत्व मिले

देश में कितनी ही पार्टियां हैं जो आगे आना चाहती हैं, लेकिन आगे न आने का एक ही कारण है, पार्टी में जुझारू और ईमानदार नेताओं की कमी। कांग्रेस पार्टी एक ऐसी पार्टी है, जिसने देश में सबसे ज्यादा राज किया है और आज पिछड़ती जा रही है। कांग्रेस में परिवारवाद की समस्या है। कांग्रेस अगर सत्ता में वापस आना चाहती है तो कांग्रेस को गांधी परिवार नेतृत्व की लालसा छोड़नी होगी। पार्टी को केन्द्र, राज्य और जिला स्तर पर ईमानदार टिकाऊ और जुझारू नेताओं का चुनाव करना होगा। सोनिया, राहुल, प्रियंका के सहारे पार्टी को शायद और नुकसान हो सकता है। पार्टी को बचाने के लिए कांग्रेस को कुछ तो करना पड़ेगा।

सतपाल सिंह, करनाल

पुरस्कृत पत्र

परिवारवाद से मुक्त हो

कांग्रेस पार्टी का संकट वंशवाद और परिवारवाद है। पिछले दशकों का इतिहास बताता है कि वह गांधी नेहरू परिवार के सदस्य या उनके प्रतिनिधि को ही स्थायित्व मिल पाता है। यद्यपि परिवार के सहमति बिना भी कई प्रभावशाली लोग अध्यक्ष बने किंतु वे टिक नहीं पाए। कांग्रेस पार्टी का सविंधान ही ऐसा है कि उसे चलाने के लिए जरूरी सभी शक्तियां कांग्रेस अध्यक्ष में निहित हैं। जिस पार्टी की बुनियाद परिवारवाद पर टिकी हो उस पार्टी का नेतृत्व लोकतांत्रिक रूप से गठन करना मुश्किल है। कांग्रेस संकट का एक ही समाधान है कि गैर नेहरू-गांधी परिवार में से पार्टी का अध्यक्ष बनया जाये।

दिव्येश चोवटिया, गुजरात  

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Sep 19, 2020

घेराबंदी करें

18 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में जी. पार्थसारथी का ‘चीन के खिलाफ वैश्विक एकजुटता का वक्त’ भारत तथा अन्य देशों के साथ गुस्ताखियों का मुकाबला करने के लिए सुझाव देने वाला था। चीन अपनी आर्थिक तथा सैनिक शक्ति के बलबूते पर भारत के साथ सीमा विवाद का बहाना बनाकर, पाकिस्तान तथा नेपाल को हमारे खिलाफ उकसाता रहता है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर देशों को कर्जा देखकर उनके प्राकृतिक साधनों का शोषण करता है। सभी देश इसके इस रवैये से परेशान हैं। वक्त आ गया है कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान वियतनाम आदि देशों के साथ मिलकर इसकी घेराबंदी करे।

शामलाल कौशल, रोहतक

सैनिकों के साथ देश

देश की संसद से सीमा पर तैनात सैनिकों का जोश बढ़ाया गया। एकमत से सांसदों ने सरकार के साथ खड़े होने की बात कही तो प्रधानमंत्री ने पूरे देश के सैनिकों के साथ होने का विश्वास दिलाया। निश्चय ही इससे सैनिकों के हौसले बुलंद होंगे जो जान पर खेलकर देश की रक्षा कर रहे हैं। हाल में देश के नामी लोगों की चीन द्वारा जासूसी का मामला उजागर हुआ है जो चिंता की बात है।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, म.प्र.

सार्थक प्रतिरोध

पाकिस्तान द्वारा रूस में हुए शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में गलत नक्शा दर्शाने पर रूस ने कड़ी फटकार लगाते हुए चेतावनी दी है। भारत के एनएसए अजीत डोभाल ने कड़ा एतराज जताते हुए बैठक छोड़ दी। पाकिस्तान की इस घटिया और तुच्छ हरकत के लिए रूस ने पाकिस्तान को बाहर का रास्ता दिखा कर सही नसीहत दी।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.

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Sep 18, 2020

विकल्प भी हो

जानकारी के अनुसार एसबीआई एटीएम से पैसे निकासी के लिए रजिस्टर्ड मोबाइल का साथ रखना जरूरी हो गया है, जिस पर ओटीपी आएगा और वही ओटीपी डालने से निकासी संभव हो सकेगी। बैंकिंग फ्रॉड से बचने के लिए एसबीआई ने यह उपाय निकाला है जो ग्राहकों के लिए सुरक्षित है। लेकिन मोबाइल नेटवर्क की समस्या कई जगह बहुत अधिक रहती है, जिसके कारण मैसेज आने में काफी विलंब होता है, यहां तक कि कभी-कभी मैसेज आता भी नहीं है। इस परिस्थिति में ग्राहकों को निकासी के समय दिक्कतें भी आ सकती हैं। अगर हर एटीएम में फिंगर प्रिंट्स सिस्टम लागू कर दिया जाता तो कोई दिक्कत नहीं होगी। पैसे निकाले में भी सुविधा रहेगी।

ज़फर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा


साइबर सुरक्षा

16 सितम्बर के अंक में संपादकीय ‘सुरक्षा में सेंध’ पढ़ा। चीन ने बड़ी चालाकी से भारत को एक पारम्परिक युद्ध की संभावना एवं शांति वार्ता में उलझाये रखा और गुपचुप हाइब्रिड वारफेयर के लिए अतिविशिष्ट भारतीयों की सम्बंधित जानकारियां चुराता रहा। इसे सरकार की नादानी कहें या नाकामी। सरकार की किसी भी जांच एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। अब परंपरागत सुरक्षा के साथ-साथ मज़बूत साइबर सुरक्षा की भी ज़रूरत है। चीन के डिजिटल हमले का मुहतोड़ जवाब हमें डिजिटल रूप में देना होगा। 

बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उ.प्र.


कर्तव्यनिष्ठा जरूरी

13 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में चंद्र त्रिखा का लेख  ‘तकनीकी व्यवधान न रोके हिंदी की उड़ान’ सारगर्भित रहा। अंग्रेजीयत रंगे देश की रहनुमाई करने वाले हिंदी के प्रचार-प्रसार में कर्तव्यनिष्ठ नहीं हैं। राष्ट्र की उन्नति हिंदी की तकनीकी शिक्षण-प्रशिक्षण की उपयोगिता में निहित है। राजभाषा हिंदी को राज कार्य में सुचारु रूप से करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक है। 

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

आपकी राय Other

Sep 17, 2020

तानाशाही और लोकतंत्र

15 सितंबर की दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का ‘तानाशाही और शोषण मुक्त लोकतंत्र’ लेख विषय पर चर्चा करने वाला था। लेखक ने प्राचीन समय में यूनान तथा रोम में लोकतंत्र की सफलता का मुख्य कारण दूसरे देशों को लूटमार करके बताया है। उसके बाद इंग्लैंड तथा अमेरिका में भी लोकतंत्र की सफलता का मुख्य कारण दूसरे देशों को लूट कर अपने देश में लोगों को सुविधाएं देकर वोट हासिल करके लोकतंत्र को सफल बनाने का हवाला देने वाला है। इसके विपरीत जिन देशों में, तानाशाही होती है वहां पर शासक लोग अपने ही लोगों का शोषण करते हैं और तरक्की होती है। नि:संदेह लोकतंत्र तानाशाही से बेहतर है।

शामलाल कौशल, रोहतक

हिंदी का आकाश

दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित ‘सबकी भाषा’ संपादकीय पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा। स्कूल एवं कॉलेज में हिंदी दिवस मनाया जाता था। किन्तु कोरोना वायरस के कारण बच्चों ने आनॅलाइन कक्षा के माध्यम से हिंदी दिवस मनाया। आजकल हिंदी भाषा का विस्तर काफी बढ़ गया है। आधुनिक तकनीक में भी हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो बहुत ही सराहनीय है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि विदेशों में भी हिंदी भाषा का डंका बजता है। हमें हिंदी भाषा का अस्तित्व बनाये रखना चाहिए।

संदीप कुमार, चंडीगढ़

वैक्सीन का इंतजार

कोविड-19 अपना विकराल रूप धारण करता जा रहा है। देश में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या में रोजाना तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। अब वैक्सीन का इंतजार है। केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने आश्वासन दिया है कि सरकार वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल में पूरी तरह से सावधानी बरत रही है और वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है। बहरहाल, वैक्सीन का इंतजार है ताकि लोगों की जिंदगी फिर से पटरी पर आ सके।

निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

आपकी राय Other

Sep 16, 2020

वक्त की जरूरत

उ.प्र. सरकार शासकीय सेवाओं के लिए नए नियमों का मसौदा तैयार कर रही है, जिसमें संविदा के आधार पर कार्य करवाया जाएगा। छह महीने में कार्य समीक्षा के बाद ही उन्हें आगे प्रमोट किया जाएगा तथा इस अवधि में उन्हें निर्धारित वेतन के अलावा अन्य कोई लाभ नहीं दिया जाएगा। सरकार का यह नियम सरकारी खर्चों में कटौती करेगा, साथ ही विभाग में कार्यकुशलता बढ़ेगी। वहीं भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। सरकारी नौकरियों में भी प्राइवेट सेक्टर की तरह नौकरी के सख्त नियम और कठोर परीक्षाओं का प्रावधान होना चाहिए।

सुभाष बुड़ावन वाला, रतलाम, म.प्र.

जीएसटी का सरलीकरण

जीएसटी प्रारंभ से ही विवादित टैक्स रहा है। इससे बचने के लिए व्यापारियों ने बिना बिल के व्यापार किया है। लोगों ने भी पैसे की बचत के लिए इसमें सहभागिता निभाई है। लोगों और व्यापारियों की इस मिलीभगत से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा है। राजकोषीय घाटा कर चोरी से बढ़ता है। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए करों का व्यवस्थित रूप से संग्रहण आवश्यक है। जीएसटी का सरलीकरण होना चाहिए।

ललित महालकरी, इंदौर

संवेदनशीलता जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे ट्रैक के किनारे झुग्गी बस्तियों को हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली में 140 किलोमीटर तक रेलवे ट्रैक के किनारे झुग्गी बस्तियां हैं, जिन्हें हटाया जाए। अब इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के सामने रहने व रोजी-रोटी का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। लेकिन फिल्मी अदाकारा कंगना रनौत के तोड़े गए ऑफिस की पीड़ा को देख सारा देश एकजुट हो गया। यही पीड़ा और मदद झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के पुनर्वास में होती तो सबसे बड़ा मानव कल्याण का काम होता।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.

संकट और शिक्षा Other

Sep 15, 2020

10 सितंबर के सम्पादकीय ‘सतर्कता संग शिक्षा’ पढ़कर वर्तमान में शिक्षा की दशा और दिशा ने ध्यान आकर्षित किया। देश में यदि कोरोना केस लाखों में है तो अभिभावक की नजर से सरकार के इस फैसले का स्वागत नहीं किया जा सकता। देश में कोरोना के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसमें स्वैच्छिक विकल्प और अनुमति का प्रश्न ही नहीं उठता। बेशक लॉकडाउन ने शिक्षा के अधिकार के दायरे को संकुचित कर दिया है। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि बच्चे और स्कूल, नियमों के पालन में लापरवाही नहीं करेंगे?

मनोज बत्तरा, राजपुरा, पंजाब

नशे की दलदल

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद फिल्म उद्योग में भूकंप आ गया है। जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। ड्रग्स के मामले भी उजागर हो रहे हैं, जिसमें कई सितारों के नाम भी सामने आ रहे हैं। यह बहुत आश्चर्यजनक है कि बड़े पैमाने पर बॉलीवुड में नशीली दवाओं का उपयोग किया जाता है। देश की जनता विशेषकर युवा वर्ग को क्या संदेश जाएगा।

नरेंद्र कुमार शर्मा, मंडी, हि.प्र.

बाढ़-मुक्ति के स्थायी समाधान Other

Sep 14, 2020

दीर्घकालीन उपाय

नेपाल से निकलने वाली गंडक नदी भारत में बिहार की सीमा से बहती हुई आगे जाती है। भारी बारिश के चलते नेपाल को मज़बूरन नदी पर बने बैराज खोलने पड़ते हैं, जिस कारण बिहार में हर साल बाढ़ जैसी समस्या उत्पन्न हो जाती है। सरकार भी इस नदी पर एक-दो बैराज या बांध बनाए ताकि आपातकालीन स्थिति में नेपाल द्वारा छोड़े गये पानी को रोकने में सक्षम हो। दूसरा उपाय है बारहमासी नदियों से नहर का एक जाल बिछाना चाहिए। गंगा और मुख्य बारहमासी नदियों से नहर निकाल कर सूखाग्रस्त जिलों तक पहुंचाना चाहिए। इससे गंगा नदी में आये अत्यधिक पानी का भी सही उपयोग हो सकेगा, साथ ही बाढ़ से भी मुक्ति मिलेगी।

नेहा जमाल, मोहाली, पंजाब

समय से हो सफाई

हर साल बाढ़ की वजह से न जाने कितने लोग प्रभावित होते हैं और जान-माल की हानि होती है। दरअसल बाढ़ का मुख्य कारण नदियों, नालों, रजबाहों की समय से पहले सफाई न होना है क्योंकि नदियों-नालों में सफाई न होने की वजह से गाद से पानी निकासी में रुकावट पैदा हो जाती है जो बाढ़ का मुख्य कारण बनती है। इन सभी कारणों के चलते कहीं पर जान-माल की हानि होना और मुआवजा देना ठोस समाधान नहीं है। इसका स्थाई समाधान सिर्फ समय पर नदियों, नालों और रजबाहों की सफाई है। इसी से बाढ़ के खतरे को टाला जा सकता है।

सतपाल सिंह, करनाल

नियोजन पर बल

बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए पर्यावरण, नदी विज्ञान और नगर नियोजन में ड्रेनेज निकास का सही प्रबंधन करना होगा। मसलन नदी में जल के प्रवाह को नदी के किनारों पर ऊंचे बांध/पुस्ते बनाकर बीच में बनाए रखना होगा ताकि नदी का पानी दूर तक न फैले। नालों की जल निकास क्षमता को बीच में गहराई करके बढ़ाना होगा। घुमावदार नदियों के कटाव को सीधा करना होगा ताकि आसपास की भूमि को कटान से सुरक्षित कर खेतीबाड़ी हेतु बचाया जा सके। नदियों के ऊपरी भाग में जलाशय की संरचना बनाकर पानी के बहाव की तीव्रता को कम करके बाढ़ पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

राजेश कुमार कनौजिया, नयी दिल्ली

नदियों को जोड़िये

बाढ़ से मुक्ति का स्थायी समाधान है पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के समय शुरू की गई ‘नदी जोड़ो’ परियोजना पर सरकार तेज गति से अमल करे। देश की सभी नदियों को जोड़ने के साथ-साथ ही इनकी साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान देना होगा और नहरें भी बनाई जानी चाहिए। इससे हर साल बाढ़ से होने वाले जानमाल के नुक़सान को तो रोका जा सकेगा, साथ ही उन इलाकों की मानसून पर निर्भरता भी खत्म होगी, जहां सूखा पड़ता है। किसानों को खेती के लिए समुचित सिंचाई का लाभ भी मिलेगा।

राम मूरत ‘राही’, इंदौर, म.प्र.

नयी सोच बने

बाढ़ से प्रति वर्ष देश में जान-माल की बड़ी क्षति होती है। इसका कारण बढ़ती जनसंख्या से प्राकृतिक असंतुलन है, जिसके लिए पेड़-पौधों, नदी, नहरों, नालों और तालाबों आदि के उचित प्रबंधन की जरूरत है। वर्तमान में इनकी सफाई नहीं हो पा रही है। वहीं लोगों द्वारा अतिक्रमण होने के साथ ये गंदगी, गाद और मिट्टी से बुरी तरह अटी पड़ी हैं। नेपाल से पानी आने से बिहार में काफी बाढ़ आती है। ऐसे अथाह जल के उचित प्रबंधन और संरक्षण की भी जरूरत है। उदाहरणार्थ दिल्ली जैसे महानगर में रिंग यमुना भी बनाई जा सकती है।

वेद मामूरपुर, नरेला

कारगर विकल्प तलाशें

देखने में आ रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन, समय पर नहरों की साफ सफाई न होना एक मुख्य कारण है। वहीं नदियों के बहाव में रुकावटें खड़ी करके बांध आदि बनाना तथा जल ग्रहण क्षेत्रों में नई आबादी का निवास होना भी भयावह रूप को बढ़ाने के कारण हैं। बड़े बांध बनाकर पानी एकत्रित करने की बजाय छोटे जल स्रोतों का ही प्रयोग करना चाहिए। नदियों को आपस में जोड़ने की पुरानी योजना ‘मेखला नहर’ या गारलैण्ड पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। इससे बाढ़ और अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं का स्थाई समाधान होगा। नदियों को आपस में जोड़ने से ही प्राकृतिक आपदा का स्थाई समाधान हो सकता है।

जगदीश श्योराण, हिसार

पुरस्कृत पत्र

जल संचयन हो

बेतरतीब विकास के कारण बाढ़ से पूर्ण मुक्ति तो फिलहाल असंभव है किन्तु इसकी विभीषिका कम की जा सकती है। उसके लिए, नदियों एवं जलाशयों को अतिक्रमण तथा कचरे से मुक्त करना, नये जलाशय बनाना, शहरों और कस्बों में वर्षा जल संचयन अनिवार्य करना जैसे कदम उठाने होंगे। इसके साथ ही पर्यावरण और परिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए नदियों को जोड़ना, नहरों का जाल बिछाना, बरसाती नदियों में चेक डैम बनाना, वन्य क्षेत्र बढ़ाना आदि पर भी ध्यान देना आवश्यक है। बारिश के पानी को न बाढ़ बनने देना है, न समुद्र में बहाना है, उसका तो संचयन करना है।

बृजेश माथुर, बृज विहार, गाजियाबाद, उ.प्र.

आपकी राय Other

Sep 12, 2020

जन धन का दुरुपयोग

अम्बाला शहर में बरसाती पानी की निकासी के नाम पर स्थान-स्थान पर जो नाले बनाये जा रहे हैं, वे उचित निगरानी की अनुपस्थिति में मात्र सरकारी धन का दुरुपयोग मात्र ही है। नालों की दीवारें बना कर उनमें से मलबा निकाले बिना ही उन पर लैंटर डाल दिया जाता है। तदोपरांत उस मलबे को कभी निकाला नहीं जाता। अब उस नाले को बनाना या न बनाना अर्थहीन है। आशा है सम्बंधित विभाग इस ओर ध्यान देकर जनता द्वारा दिये गए कर से जमा सरकारी धन का सदुपयोग करेंगे।

श्रीकृष्ण सैनी, अम्बाला

सतर्क रहें हम

देश में कोरोना का कहर अभी कम नहीं हुआ है। सरकार का दावा है कि ठीक होने वालों का आंकड़ा संतोषजनक है। इसी कड़ी में केन्द्र और राज्य सरकारों ने कोरोना की टेस्टिंग आम लोगों के बीच भी बढ़ा दी है, ताकि अगर किसी को कोरोना का थोड़ा-बहुत भी लक्षण है तो उसका उचित समय पर इलाज हो सके। देश के हरेक नागरिक को सतर्कता और सावधानी बरतनी होगी।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

हकीकत बताएं

सुशांत राजपूत की मौत का मामला नित नए घटनाक्रमों से जुड़ता जा रहा है। पहले महाराष्ट्र व बिहार पुलिस में तकरार, फिर सीबीआई को जांच की जवाबदारी सौंपने से इसकी परतें खुलने लगी है। ड्रग डीलर की गिरफ्तारी नए राज खोलेगी कि फिल्मी दुनिया में क्या-क्या चल रहा है। सीबीआई दाऊद के कनेक्शन की भी जांच करे, जिससे फिल्मी हस्तियों के वास्तविक चरित्र का पता लग सके।

अमृतलाल मारू, दसई धार, म.प्र.

बेलगाम सूचनाएं

बेलगाम सोशल मीडिया का योगदान अफवाहों को फैलाने तक सीमित रह गया है। इसका ताज़ा उदहारण पंजाब का है जहां भैंस के दूध से लेकर मास्क न पहनने तक अनेक अफवाहें पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया से फैल चुकी हैं। सरकार तो अपने स्तर पर काम कर रही है लेकिन हर नागरिक का भी कर्तव्य है कि वे ऐसी अफवाहों को नज़रअंदाज़ करें।

बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उ.प्र.

आपकी राय Other

Sep 11, 2020

चकाचौंध का अंधेरा

नौ सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित राजकुमार सिंह का ‘सिनेमाई चकाचौंध का डरावना अंधेरा’ लेख बालीवुड की हकीकत बताने वाला था। वास्तव में लेख ने इस तिलिस्मी नगरी का कच्चा-चिट्ठा खोल कर रख दिया। देश के नागरिकों को पता था कि इस चकाचौंध के पीछे घना अंधेरा है, मगर सुशांत की मौत ने उस पर मोहर लगाई है। इस कांड ने देश की राजनीति, पुलिस, नायक-नायिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कलई खोल कर रख दी है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

संकट और शिक्षा

दस सितंबर के सम्पादकीय ‘सतर्कता संग शिक्षा’ पढ़कर वर्तमान में शिक्षा की दशा और दिशा ने ध्यान आकर्षित किया। देश में यदि कोरोना केस लाखों में है तो अभिभावक की नजर से सरकार के इस फैसले का स्वागत नहीं किया जा सकता। इसमें स्वैच्छिक विकल्प और अनुमति का प्रश्न ही नहीं उठता। बेशक लॉकडाउन ने शिक्षा के अधिकार के दायरे को संकुचित कर दिया है। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि बच्चे और स्कूल, नियमों के पालन में लापरवाही नहीं करेंगे?

मनोज बत्तरा, राजपुरा, पंजाब

हादसों की सड़क

सड़क हादसों के लिए अधिकतर वाहन चालकों को दोषी ठहराया जाता है, जो कुछ हद तक उचित भी है। परन्तु यह भी सत्य है की टूटी हुई सड़कें एवं गहरे गड्ढे भी इन हादसों के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं। लोक निर्माण विभाग द्वारा किये गये एक निरीक्षण में राजधानी दिल्ली की सड़कों पर गत वर्ष दो हजार से भी अधिक गड्ढे मिले थे, जो काफी चिंताजनक है।

तुषार आनंद, वेस्ट बेली रोड, पटना

कोरोना से लड़ें

ऐसी खबर है कि विपक्षी पार्टियां संसद में एकजुट होकर आक्रामक रुख अपनाएंगी। सभी विपक्षी पार्टियां वैश्विक महामारी कोरोना से लड़ने में भी एकजुटता दिखाएं। अगर ऐसा होता है तो वह मानवता, देशहित व लोक कल्याण के लिए बहुत बड़ी बात होगी।

प्रदीप कुमार दुबे, देवास, म.प्र.

आपकी राय Other

Sep 10, 2020

स्याह सच का अनावरण

नौ सितंबर को राजकुमार सिंह के ‘सिनेमाई...’ लेख में सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की पड़ताल का निष्कर्ष है कि उसकी हत्या, आत्महत्या या आत्महत्या के लिये उकसाने का प्रश्न उलझता जा रहा है, जिससे मूल मुद्दा दब न जाए। बहरहाल, ग्लैमर का सपना लिये मुम्बई आने वाले युवाओं के लिए सबक है कि जिन्हें वे हीरो समझते हैं, वे अभिनय का छलावा मात्र है। अब बॉलीवुड का जो काला सच सामने आया है, उसका पर्दाफ़ाश होना चाहिए। केस राजनीति, कानून, पुलिस, ड्रग का खेल, प्रेम और फ़िल्मी दुनिया के काले अन्धेरों का पेचीदा थ्रिलर है। गहन विश्लेषण के लिए धन्यवाद।

मीरा गौतम, जीरकपुर

संकुचित नजरिया

महाराष्ट्र में शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना दोनों ही पार्टियां सिर्फ दिखावे के लिए राष्ट्रवादी बातें करती हैं, हकीकत में इन पार्टियों की बुनियाद क्षेत्रवाद पर ही टिकी हुई है। मुंबई में दोनों पार्टियां गैर-मुंबई वासियों को दोयम दर्जे के नागरिक मानती हैं। इनका विरोध करने वालों को हिंसा का सामना करना पड़ता है। मुंबई में रहकर पुलिस, प्रशासन अथवा राज्य सरकार की आलोचना करना एक तरह का अपराध माना जाने लगा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश शिव सेना की कार्यशैली रही है। भारतीय गणराज्य में महाराष्ट्र एक राज्य तक तो ठीक है, पर एक राष्ट्र में महाराष्ट्र नहीं पनपना चाहिए।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम

विस्तार मिले

हिन्दी एकमात्र ऐसी भाषा है जो संपूर्ण देश को एक सूत्र में जोड़ने का काम कर सकती है। हिंदी एक भाषा ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की आत्मा एवं संस्कारों का प्रतिबिंब तथा राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। हिंदी को अधिक शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है। हिंदी को साहित्य, संस्कार एवं संस्कृति के अतिरिक्त शोध, अनुसंधान, ज्ञान-विज्ञान, जनसंचार, प्रौद्योगिकी तथा रोजगार से भी जोड़ने की आवश्यकता है।

शमशेर शर्मा, गालव, करनाल

वैक्सीन की आस Other

Sep 09, 2020

भारत समेत दुनिया के कई देशों में कोरोना वैक्सीन बनाने का काम तेजी से चल रहा है और कई देशों में वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल जल्द पूरा होने की भी उम्मीद है। इसी बीच अमेरिका ने दावा किया है कि चीनी हैकर्स कोरोना वैक्सीन से जुड़े रिसर्च डेटा चुराने की कोशिश कर रहे हैं जो बेहद शर्मनाक हरक़त है। अमेरिका का कहना है कि अब वह चीनी हैकिंग को लेकर एक चेतावनी भी जारी करने पर विचार कर रहे हैं। भारत भी कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर रूस से लगातार संपर्क में है। उसने भारत के साथ कुछ प्रारंभिक जानकारियां भी साझा की हैं। ऐसे में जो भी देश सबसे पहले वैक्सीन बनाने और उसे बाजार में लाने में कामयाब हो जाएगा, वह देश यकीनन ही आर्थिक के अलावा राजनीतिक तौर पर भी काफी अहम हो जाएगा।

निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

तबाही की राह

सात सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘राजनीतिक विकल्प’ भारत तथा चीन में लद्दाख तथा पैंगोंग झील के आसपास चीनी घुसपैठ को लेकर तार्किक विचार व्यक्त करने वाला था। दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर संघर्ष से पहले की स्थिति कायम करने को लेकर समझौता भी हो गया था लेकिन इस पर अमल करने के बजाय चीन ने भारत के अन्य क्षेत्रों में घुसपैठ करने की असफल कोशिश की। हम बातचीत का रास्ता अपनाकर संकट टाल सकते हैं।

शामलाल कौशल, रोहतक

जुर्माना मकसद नहीं

हाल ही में ट्रैफ़िक पुलिस ने 68 कर्मियों को कम चालान काटने पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पुलिस का काम लोगों की सहायता करना तथा नियमों की पालना करवाना है, न कि चालान काटना। नियमों को लेकर लोग पहले से ज्यादा सतर्क हैं। ज़्यादातर लोग नियमों की पालना करते हैं पर ऐसे में केवल कम चालान काटने पर नोटिस जारी करना कहीं न कहीं ग़लत है। पुलिस कर्मियों को चालान काटने के लिए मजबूर करना शर्म की बात है।

रमन कुमार कुकरेजा, मोहाली

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

आपकी राय Other

Sep 08, 2020

डब्ल्यूएचओ की भूमिका

विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग से हाथ खींच लेने का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का निर्णय निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। कोरोना वायरस के चीन से निकल कर पूरे विश्व में फैल जाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की निष्िक्रयता जिम्मेदार है। उसने चीन की तरफदारी ही की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह मिलीभगत निंदनीय है। इसलिए भारत को भी अमेरिका की तरह संगठन की फंडिंग तुरंत बंद करनी चाहिए।

तिलक राज गुप्ता, रादौर, यमुनानगर

चिंताजनक स्थिति

कोरोना महामारी ने जनजीवन को बहुत प्रभावित किया है, वहीं दूसरी ओर डॉक्टर एवं वैज्ञानिक इस महामारी से निजात दिलाने के लिए दिन-रात वैक्सीन परीक्षण में लगे हुए हैं। इस महामारी से देश की जनता मानसिक तनाव में है। आये दिन आंकड़ों का बढ़ना भी चिंता का विषय है।

संदीप कुमार, चंडीगढ़

एक देश, एक परीक्षा Other

Sep 07, 2020

पुरस्कृत पत्र

अनमोल उपहार

हाल ही में केंद्रीय सरकार ने राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी का गठन कर नौकरी तलाशते युवाओं को एक बड़ी राहत दी है। तीन सालों तक नौकरी पाने की उम्मीद के साथ समान पात्रता परीक्षा का आयोजन देश के करोड़ों नौजवानों के लिए एक वरदान है। इसी तर्ज़ पर देश में आयोजित होने वाली शिक्षा सम्बंधित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी एकरूपता बनाये जाने की आवश्यकता है। निश्चित रूप से यह पहल अच्छी शिक्षा की तलाश में भागते देश के स्कूली बच्चों के लिए किसी अनमोल उपहार से कम नहीं होगा। केंद्र और राज्य सरकारों को मिल-जुलकर विद्यार्थियों के हितार्थ एक देश एक परीक्षा नीति पर काम करने की जरूरत है।

एमके मिश्रा, रांची, झारखंड


पारदर्शी व्यवस्था

नि:संदेह सरकार के नये फैसले से बेरोजगार युवाओं को अलग-अलग ग्रुप में नौकरी के लिए अलग आवेदन करने व परीक्षा देने हेतु दूरस्थ केंद्रों पर जाने से होने वाली धन-समय की बर्बादी से राहत मिलेगी। प्रधानमंत्री मोदी का देश के बेरोजगार युवाओं को एक ही बार परीक्षा देकर रोजगार मुहैया करवाने का फैसला काबिलेतारीफ है। पात्रता परीक्षा में उत्तीर्ण उम्मीदवारों को न्याय हेतु जरूरी है कि सिफारिश-रिश्वत पर भी नकेल लगे। परीक्षा परिणाम भी शीघ्र घोषित हों। साक्षात्कार के समय पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। योग्यता के आधार पर नियुक्ति पत्र जारी हों। 

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


राहतकारी कदम

अब उम्मीदवारों को  केवल एक बार ही राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी द्वारा आयोजित परीक्षाओं में पास होने के बाद 3 साल तक नौकरी के लिए योग्य समझा जाएगा, जो स्वागतयोग्य फैसला है। इससे नौकरी पाने वाले उम्मीदवारों को बार-बार परीक्षा के लिए फीस के पैसे तथा समय की बचत में राहत मिलेगी। ऐसी साझा पात्रता परीक्षा पास करने से केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय जैसे नगर निगम आदि तथा निजी क्षेत्र में नौकरी पाना आसान हो जाना चाहिए। इस प्रकार की परीक्षा एक देश, एक परीक्षा की जरूरत के अनुरूप है। 

शामलाल कौशल, रोहतक


तनाव से मुक्ति

युवाओं को सरकारी नौकरी प्राप्त करने में काफी दिक्कतों  का सामना करना पड़ता है किंतु अब केंद्र सरकार ने  इस ओर सराहनीय कदम उठाया है। बेरोजगार युवाओं के लिये बहुत बड़ी राहत है और यह समय की मांग भी थी। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी पर अपनी मोहर लगा दी है।  इस फैसले से युवाओं का काफी समय बचेगा क्योंकि ज्यादातर समय बैंकों में अलग-अलग परीक्षाओं के लिये भुगतान करने में ही निकल जाता था और युवाओं को हर परीक्षा के लिए अलग से तैयारी करनी पड़ती थी। इस  कदम से युवाओं के मानसिक तनाव में काफी कमी आयेगी। 

संदीप कुमार, चंडीगढ़ 


भटकन खत्म होगी

नौकरियों के लिए केंद्र सरकार ने एनआरए के गठन को मंजूरी देकर देश के युवा बेरोजगारों को बड़ी राहत प्रदान की है। इसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। कॉमन एलिजिबल टेस्ट से परीक्षा में देशव्यापी एकरूपता आएगी और युवा वर्ग की भटकन भी समाप्त होगी। उनके समय और पैसे की भी बचत होगी। एक ही परीक्षा देकर प्रतिभागी विभिन्न विभागों के रिक्त पदों हेतु क्वालीफाई कर सकेगा। तीन वर्ष तक सिलेक्शन लिस्ट वैध रखने का निर्णय भी उल्लेखनीय है। राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी की निष्पक्षता और पारदर्शिता ही इसे युवा जेनरेशन के हित में  कारगर बनाएगी।

ललित महालकरी, इंदौर, म.प्र.


ऐतिहासिक सुधार

केंद्र सरकार ने नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी के गठन को मंजूरी दी है। यह एजेंसी सरकारी क्षेत्र के समूह  सी और डी पदों के लिए उम्मीदवारों की ट्रेनिंग व शॉर्टलिस्ट करने हेतु साझा पात्रता परीक्षा लेगी। युवाओं की वर्षों से यह मांग थी। इससे देश के युवाओं का पैसा और समय दोनों बचेगा। सीईटी की मेरिट 3 साल तक मान्य होगी। इस दौरान उम्मीदवार अपनी योग्यता और पसंद के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियों के लिए आवेदन कर सकेंगे। साल में दो बार टेस्ट होंगे। जिले में एक सेंटर के साथ 12 भाषाओं में टेस्ट होगा। यह निर्णय ऐतिहासिक सुधारों में से एक है।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़ 


उत्साहवर्धक विकल्प

केंद्र सरकार द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु अलग-अलग परीक्षाओं की बजाय एक ही परीक्षा के जरिए नौकरी हेतु एनआरए को मंजूरी देना काबिलेतारीफ और शिक्षा के इतिहास में एक शानदार कदम है। सरकार के इस कदम से जहां एक ओर परीक्षार्थियों का अनावश्यक खर्च बच सकेगा, वहीं दूसरी ओर उन्हें मनमाफिक विभागों को चुनने का भी अवसर प्राप्त होगा। नौकरी पाने के लिए परीक्षार्थी अलग-अलग स्थानों पर अनगिनत परीक्षाएं देते हैं, इससे उनका समय और धन दोनों ही बर्बाद होते हैं। एक देश, एक परीक्षा का विकल्प वाकई बहुत ही जोरदार कदम है। 

सुनील कुमार महला, पटियाला, पंजाब

आपकी राय Other

Sep 05, 2020

अब डेंगू-मलेरिया

कोरोना वायरस के जानलेवा प्रकोप के मध्य पटना शहर के निवासियों को अब डेंगू एवं मलेरिया का भय सता रहा है। राजधानी के जिस इलाके खाजपुरा में पहले कोरोना फैला, वहां अब डेंगू अपना पैर पसारने लगा है। स्थिति यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और कर्मचारी कोरोना से बचाव में जुटे हैं। वर्षा के कारण शहर के कई मोहल्लों और गलियों की सड़कों पर बने गड्ढों में जलभराव हो चुका है जो कि बीमारी फैलाने वाले मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल है। हालांकि, नगर नगम ने फॉगिंग एवं एंटी लारवा कीटनाशक का छिड़काव शुरू किया है, परन्तु यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि छिड़काव की प्रक्रिया शहर के हर गली और मोहल्ले में हो।

तुषार आनंद, पटना

कुदरत का रौद्र रूप

30 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में अभिषेक कुमार सिंह का लेख ‘कांपती धरती हांफते संसाधन’ भटकी मानवता को सचेत करने वाला रहा। प्रकृति से खिलवाड़ करना मनुष्य के शरारती दिमाग की उपज है। विकास की होड़ में वह भूल जाता है कि कुदरत का दंड उसे चैन से बैठने नहीं देगा। भूकंप-बाढ़ आपदा नियंत्रण विभाग की सभी योजनाएं कुदरत की शक्तियों के आगे निरर्थक हैं। विनम्रता, शालीनता के सहारे कुदरत के क्रोधी स्वभाव को शांत किया जा सकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सोचने का वक्त

2 सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून के सम्पादकीय पृष्ठ पर राजकुमार सिंह का लेख ‘अपने संकट को अवसर में बदले कांग्रेस’ दिल को छू गया। लेख सटीक, प्रगतिवादी और सकारात्मक सोच वाला लगा। मजबूत विपक्ष लोकतांत्रिक ढांचे की सर्वथा मांग है। कांग्रेस को चाहिए कि पार्टी में उभर रहे असंतोष और असहमतियों के स्वरों को प्रमुखता दे। वर्तमान परिस्थितियों में योग्य और अनुभवी व्यक्ति को अपना नेतृत्व सौंपे।

मनोज बत्रा, राजपुरा, पंजाब

प्रेरक पहल Other

Sep 04, 2020

उत्तराखंड के फैगुल गांव में लॉकडाउन के दौरान लौटे प्रवासियों ने साढ़े तीन लाख वर्ग फुट पहाड़ की अनुपयोगी भूमि को अपने परिश्रम से सब्जी और नकदी फसलों की पौध से भरकर प्रधानमंत्री मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के नारे को सार्थक किया है। यह न सिर्फ काबिलेतारीफ है, बल्कि देश के अन्य ग्रामीण प्रवासियों के लिए एक सबक भी है। देश के युवाओं को भी नौकरी के भरोसे न बैठकर आत्मनिर्भर बनने हेतु प्रयास करना चाहिए, जिससे बेरोजगारी दूर होगी और देश आत्मनिर्भर बनेगा।

राम मूरत, सूर्यदेव नगर, इंदौर

कांग्रेस को नसीहत

दो सितंबर के ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में प्रकशित राजकुमार सिंह के लेख ‘अपने संकट को अवसर में बदले कांग्रेस’, कांग्रेस पार्टी के लिए आंख खोलने वाला है। मुश्किल वक्त में खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही कांग्रेस क्या अब जागेगी? या तब जागेगी जब भारतीय जनता पार्टी की मंशा के मुताबिक देश कांग्रेस मुक्त हो जाएगा? अभी भी वक़्त है कांग्रेस अपनी गलतियों से सबक लेकर नये सिरे से पार्टी संगठन को मजबूत करे और असहमति के सुरों को तरजीह दे।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

स्वच्छता से सेहत

महात्मा गांधी ने देश, समाज को स्वच्छ बनाने का जो सपना देखा था, उसी राह चलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाकर देश को स्वच्छ बनाने का सपना देखा है। भारत में प्रति व्‍यक्ति औसतन लगभग 6500 रुपये बीमारियों पर ही बर्बाद होता है। मोदी का स्वच्छ भारत अभियान देश के आमजन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है और गरीब लोगों के खून-पसीने की कमाई इलाज में बर्बाद होने से कुछ हद तक बच सकती है। इसके लिए हम सबको जागरूक होकर अपने आसपास स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना होगा।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

तार्किक विवेचन Other

Sep 03, 2020

दो सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘अपने संकट को अवसर में बदले कांग्रेस’ लेख में बिल्कुल सही कहा गया है कि कांग्रेस में पहली बार उठे असहमति के स्वर को सुना ही जाना चाहिए। तय था कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में घूमघाम कर राजमाता अपने माथे पर ही तिलक लगा लेंगी और जो ख़िलाफ़ जायेंगे, उन्हें सज़ा भी देंगी। पत्र-प्रकरण से जुड़े तेईस वरिष्ठ और युवा सदस्यों ने साहस किया। सिब्बल और आज़ाद जैसे नेताओं ने संसद और कोर्ट में कांग्रेस की जड़ों को उखड़ने नहीं दिया और उन्हें विद्रोही का सिला दिया गया। इस निःसंगता से किसी का भी मोह भंग हो सकता है। लगता है कांग्रेस में वंशवाद का ज़माना ही लदने वाला है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

अनूठे प्रणब दा

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपना करिअर कॉलेज प्राध्यापक के रूप में और बाद में एक पत्रकार के रूप में शुरू किया था। सन‍् 1984 में, युरोमनी पत्रिका ने उनका विश्व के सबसे अच्छे वित्तमंत्री के रूप में मूल्यांकन किया। उन्हें रक्षा, वित्त, विदेश, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री होने का गौरव भी हासिल है। सन‍् 2007 में उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया तो 26 जनवरी, 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। अपने जीवनकाल के अंतिम दिनों में भी वे सामाजिक कार्यों में क्रियाशील रहे।

दिवाकर तिवारी, खंडवा

सोच बदलें

आज़ादी के सात दशक बाद भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। आज भी महिलाएं अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। कभी वह यौन शोषण का तो कभी लोगों की संकीर्ण मानसिकता का शिकार होती हैं। जरूरी है समाज में महिलाओं के प्रति सकारात्मक सोच बने तभी सही मायनो में आधी आबादी को उसका हक मिलेगा।

सिमरन, कैथल

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सावधानी बरतें Other

Sep 02, 2020

मेट्रो रेल को खोलने का केंद्र सरकार का निर्णय जोखिमों से भरा हुआ है। सोशल डिस्टेंसिंग से संबंधित प्रतिबंधों का पालन करना बहुत मुश्किल है क्योंकि मेट्रो स्टेशन पहले से ही भारी भीड़ से भरा हुआ स्थान होता है। यात्रियों द्वारा दूरी बनाना, मास्क लगाना जैसे नियमों की पालना करना बहुत मुश्किल काम होगा। बढ़ते कोरोना कहर के चलते फिलहाल सिनेमा, मनोरंजन पार्क, थियेटर, पार्टी हॉल, तरण-ताल आदि अभी बंद ही रहने दें तो ज्यादा बेहतर होगा।

नेहा, चंडीगढ़

गरीबों का हक

देश में बहुत से लोगों पर स्वार्थ और लालच इस हद तक हावी हो चुका है कि यह गरीबों और दूसरों के हक को भी हड़पने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। समय-समय पर गरीबों की योजनाओं पर समृद्ध लोगों द्वारा कुंडली मारने की खबरें सामने आती रहती हैं। योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि गरीबों को योजनाओं के मिलने वाले लाभ की समय-समय पर जांच भी पारदर्शिता से होनी चाहिए ताकि गरीबों की योजनाओं का लाभ समृद्ध लोग हड़प न सकें और सरकारों को आर्थिक चूना न लग सके।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

सार्थक पहल

रोजगार हेतु उम्मीदवारों को हर क्षेत्र के लिए अलग-अलग पाठ्यक्रम पढ़ना पड़ता है और इन परीक्षाओं के केन्द्र भी अलग-अलग बनाये जाते हैं। इन सब समस्याओं से निदान दिलाने के लिए केन्द्र सरकार ने एकल परीक्षा प्रणाली को शुरू करने का फैसला लिया है जो सराहनीय है। इससे अभ्यर्थियों के मानसिक तनाव में कमी आयेगी। वहीं बार-बार के परीक्षा शुल्क से भी छुटकारा मिलेगा। सवाल यह है कि क्या इस प्रणाली से नौकरियों में पारदर्शिता आयेगी और क्या दलालों पर भी रोक लगेगी।

संदीप कुमार, चंडीगढ़

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आपकी राय Other

Sep 01, 2020

सतर्क रहें

31 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘बात बात में घात’ सांबा सेक्टर में 150 फुट लंबी सुरंग के पता चलने से भारतीय सैनिकों की सजगता तथा मुस्तैदी के बारे में बताने वाला था। विगत 8 साल में पाकिस्तान ऐसी 8 सुरंगें बनाकर आतंकवादियों को घुसपैठ कराने की कोशिश कर चुका है। भारत को इसका माकूल जवाब देना चाहिए, जिससे वह पाक अपनी नापाक हरकतों से बाज आए।

शामलाल कौशल, रोहतक

सार्थक सृजन

30 अगस्त के दैनिक ट्रिब्यून अध्ययन कक्ष अंक में कहानी ‘सहयात्री’ शिक्षाप्रद रही। कथा नायिका कनिका से पूरब का मिलन संयोगवश ही हुआ। धन-दौलत के नशे में चूर मानव ऊंच-नीच, छोटे-बड़े का भेद करता है। इंसानियत के नाते पूरब को खून देकर बचाना कनिका का आंतरिक पक्ष, हमला करवाने की घटना बाह्यपक्ष पर हावी होकर कहानी को अत्यंत प्रभावशाली बनाने में कामयाब रहा।

अनिल कौशिक, क्योड़क कैथल