आपकी राय

आपकी राय Other

Nov 30, 2021

वाकई राहुल का विकल्प

27 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘मोदी से पहले राहुल का विकल्प बनेगी ममता’ हालिया ममता बनर्जी की राजनीतिक सक्रियता की हकीकत बताने वाला था। लेखक ने सही अर्थों में ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षा की हकीकत को ही बयां किया जो देश में कमजोर विपक्ष की वजह से विपक्ष का नेतृत्व करना चाहती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि पहली गाज कांग्रेस पर ही गिरेगी। कई दिग्गज असंतुष्ट कांग्रेसी नेता व कई विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। जाहिर है मोदी का विकल्प बनने से पहले ममता राहुल गांधी का विकल्प बनेगी। सच बात है कि ममता की महत्वकांक्षा की पहली कीमत कांग्रेस चुकाएगी।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, उत्तराखंड

सावधानी जरूरी

दुनियाभर में फैले नये वेरिएंट ओमीक्रॉन के बाद लगभग सभी देश दक्षिण अफ्रीका से आने-जाने वाली उड़ानों को रोकने का फैसला कर रहे हैं। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार को इस वेरिएंट को देखते हुए और उड़ानों पर प्रतिबंध व आंशिक लॉकडाउन लगाने की आवश्यकता है। सुरक्षा के तौर पर सावधानी पहले जरूरी है।

आयुशी उपाध्याय, चंडीगढ़

टी-20 विश्व कप में भारत Other

Nov 29, 2021

जन संसद की राय है कि टी-20 विश्वकप में हमारी पराजय चयन में चूक, कोरोना काल तथा वैकल्पिक नीति के अभाव के चलते हुई। वहीं खिलाड़ियों में जीत का जज्बा भी नजर नहीं आया। मानसिक तौर पर भारतीय खिलाड़ी मजबूत नजर नहीं आये।

वैकल्पिक योजना न होना

भारतीय टीम के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। वास्तव में, टी-20 विश्व कप से भारतीय टीम के जल्दी बाहर होने के मुख्य कारण वैकल्पिक योजना का अभाव और चयन से जुड़े मुद्दे रहे हैं। भारतीय टीम के शीर्ष क्रम में बहुत अच्छे बल्लेबाज मौजूद होने के कारण उनके मध्यक्रम बल्लेबाजों को बहुत अधिक मौका नहीं मिलता और अचानक टीम को वैकल्पिक योजना की जरूरत पड़ती है जो कि वहां नहीं होती है। हार्दिक पंड्या को केवल बल्लेबाज के रूप में उतारने से टीम का संतुलन प्रभावित हुआ। न्यूजीलैंड के खिलाफ रोहित और राहुल से पारी का आगाज नहीं करवाना सही फैसला नहीं था।

सुनील कुमार महला, पटियाला, पंजाब

जुझारूपन की कमी

टी-20 विश्व कप में भारतीय टीम ने क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया है। इसका महत्वपूर्ण कारण कोरोनाकाल भी हो सकता है कि खिलाड़ी काफी समय तक असमंजस में रहे। टीम में एक अच्छे ऑलराउंडर की कमी खली है। विश्व कप के लिहाज से खिलाडि़यों में जो जुनून, जोश व उत्साह होना चाहिए वह तो बिल्कुल नहीं था। टीम में जुझारू खिलाडि़यों की कमी थी। लंबे समय से टीम ने टैस्ट मैच नहीं खेले, जाहिर-सी बात है कि बल्लेबाज पिच पर समय बिताने के आदी नहीं बन पाए। यही वजह है कि भारतीय टीम अच्छा स्कोर नहीं खड़ा कर पाई।

सोहन लाल गौड़, कैथल

चयनकर्ताओं पर सवाल

विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में टीमों के लिए टॉस जीतना काफी अहम साबित हुआ। फाइनल मैच में न्यूजीलैंड पर आस्ट्रेलिया की जीत भी किसी हद तक टॉस का बॉस वाली कहावत को ही चरितार्थ करती नजर आ रही है। भारतीय टीम का प्रदर्शन अपने चिरप्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ-साथ अन्य समकक्ष टीमों के सामने भी लचर ही रहा। हमारी बल्लेबाजी से लेकर गेंदबाजी तक सब बेअसर साबित हुई। आईपीएल खेलने का लाभ न उठा पाने से टीम चयनकर्ताओं पर भी सवाल खड़े होते हैं। भारतीय खिलाड़ियों में कप जीतने वाला जज्बा नदारद था।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद

आत्मविश्वास की कमी

दुखद ही है कि भारत टी-20 में अपनी पुरानी शान कायम नहीं रख सका। टी-20 विश्वकप और आईपीएल के बीच खिलाड़ियों का ब्रेक नहीं मिलना एक बहुत बड़ा कारण है। प्रदर्शन स्थल की परिस्थितियाें ने भी खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को कम किया। टीम में स्पष्टत: दृष्टि और आत्मविश्वास की कमी नजर आई। कोच व कप्तान के बीच बढ़ती दूरियाें ने भी प्रदर्शन को प्रभावित किया। कोच, प्रबंधक, कप्तान एवं खिलाड़ियों की एकजुटता ही सफल प्रदर्शन को निखार देता है, टीम में इसका अभाव दिखा।

अशोक, पटना

जज्बा नदारद

टी-20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम का भौंडा प्रदर्शन ही रहा। जाहिर है कि खिलाड़ियों में न तो जीत का जज्बा था और न ही जोश एवं स्फूर्ति से खेलने की भावना। खिलाड़ी थके हुए हैं, आराम की जरूरत है या समय नहीं मिल पाया, इस तरह की क्षीणकाय जवाबदेही खेल प्रशिक्षकों की रुग्ण मानसिकता एवं बीमार प्रशिक्षण का परिचायक है। वास्तव में सिफारिश खिलाड़ियों को शरण देना एवं टीम का मानसिक दबाव में आकर खेलना नाकामी का मूल कारण रहा है। यदि स्वस्थ प्रशिक्षण दिया होता तो कुछ और बात होती।

सतपाल मलिक, सींक, पानीपत

सामूहिक चूक

भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच में शर्मनाक हार से टी-20 विश्व कप भारत के हाथों से निकल गया। इस निराशा-जनक प्रदर्शन का कारण रवि शास्त्री का मुख्य कोच से, विराट कोहली का टी-20 कप्तानी से संन्यास लेना है। भारतीय खिलाड़ियों में खेल-भावना का अभाव, चयन कमेटी की कर्तव्यनिष्ठा में कमी दिखना है। खिलाड़ियों को मैदान में जाने से पूर्व सख्त अभ्यास करने की जरूरत है। प्रत्येक खिलाड़ी पर मानसिक दबाव ने उन्हें विश्वकप से बाहर का रास्ता दिखाया। जिम्मेदार प्रबंधन, आयोजक, कोचों को इस हार से सबक लेना चाहिए।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

पुरस्कृत पत्र

हार की कई वजहें

शानदार प्रदर्शन के लिए अच्छी सोची-समझी योजना और उपयुक्त टीम का गठन आवश्यक होता है। टीम में खिलाड़ियों का चयन सही नहीं हुआ। बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों मोर्चों पर हमारा प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं हुआ। खिलाड़ियों का खेलने का क्रम भी सोच-समझ कर तैयार नहीं किया गया, जिसके कारण आरम्भ से ही टीम में निराशा छाने लगी। आईपीएल के अनुभव का लाभ इसलिए नहीं मिल सका क्योंकि खिलाड़ियों का चयन प्रदर्शन के आधार पर न कर रुतबे के आधार पर किया गया। लगातार आईपीएल खेलने के कारण पर्याप्त आराम न मिलना भी एक कारण रहा। वहीं पाकिस्तान को दोपहर पश्चात दुबई की ओस का लाभ उनके बेहतर प्रदर्शन का एक बड़ा कारण रहा।

शेर सिंह, हिसार

आपकी राय Other

Nov 27, 2021

लोकतंत्र की विडंबना

पिछले एक साल से देश में तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन चल रहा है। सत्ता पक्ष इन कानूनों के लाभ किसानों को नहीं समझा पाया और विपक्ष ने इन कानूनों की हानियां किसानों को अच्छी तरह से समझा दी। हालांकि साल भर में विपक्ष व किसान संगठन इन कानूनों को काला साबित नहीं कर पाए। फिर भी गुरुपर्व के दिन प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेकर देश को चौंका दिया। इस फैसले ने यह भी साबित कर दिया कि लोकतंत्र में कानून बनाना व लागू करना बहुत मुश्किल होता है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि उन राजनीतिक दलों ने भी सड़कों पर कृषि कानूनों का विरोध किया जो कानून पारित करने के समय संसद में मौजूद थे। यह देश हित में नहीं कि संसद द्वारा पारित कानून सड़क पर बैठे लोगों की वजह से वापस हो रहे हैं।

सोहन लाल गौड़, कैथल

न हो लापरवाही

देश के कई राज्यों से कोरोना के आंकड़े पुनः बढ़ने के समाचार आ रहे हैं। दूसरी तरफ कोरोना से बचाव के लिए सशक्त टीकाकरण का कार्य प्राथमिकता के साथ भी चल रहा है। अभी भी कई लोग दूसरी डोज से वंचित है। टीकाकरण टीम द्वारा घर-घर की दस्तक देने के बाद भी लोग दूसरी डोज लेने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। सरकार व सरकारी टीम द्वारा इतने प्रयास करने के बाद भी लोग स्वयं के प्रति जागरूक ही नहीं है।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

हठ छोड़ें

मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस ले लिया है। कई संगठन इन कानूनों के पक्ष में थे। अब प्रधानमंत्री ने इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा की और किसानों से अपना आंदोलन खत्म करने की अपील की। ​किसानों का कहना है कि उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक इन बिलों को संसद में खारिज नहीं किया जाएगा। किसानों को प्रधानमंत्री की बातों पर विश्वास करना चाहिए।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, मंडी

आपकी राय Other

Nov 26, 2021

अड़ियल रवैया

प्रधानमंत्री द्वारा कृषि कानूनों को वापस लिये जाने की प्रक्रिया को किसान नेताओं ने उनकी उदारता को कमजोरी समझ लिया है। अब उनकी मांगें बढ़ती जा रही हैं और वे अपने आंदोलन को वापस लेने के मूड में नहीं लग रहे। हालांकि विपक्ष और किसान नेताओं ने सरकार को उनके ऊपर बल प्रयोग करने के लिए पूरी तरह से उकसाया लेकिन सरकार ने संयम का परिचय दिया। सरकार पर निरंकुश और अड़ियल शासक का तमगा लगाने वाले अब चुप क्यों हैं।

चंद्र प्रकाश शर्मा, दिल्ली

आगे बढ़ने का वक्त

बीस नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का ‘तंत्र पर लोक की जीत की घड़ी’ लेख धरतीपुत्रों के चेहरों की लौटी रौनक का खुलासा करने वाला और दिल की गहराइयों को छूने वाला रहा। प्रधानमंत्री ने कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। अब शेष बची भ्रांतियां केंद्र सरकार संसद में बिल पारित कर दूर करने की पहल करे। बीती हुई बातों को भुला उत्कर्ष की डगर थामने का समय है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

उपभोक्ताओं के हित

कुछ टेलीकॉम कंपनियों को एक कंपनी के मुफ्त आकर्षक प्लान के कारण अपना कारोबार बंद करना पड़ा। लेकिन फिर कंपनी ने मुफ्त की सेवा बंदकर किफायती दरों के पैकेज शुरू कर दिये। लेकिन अब उन पैकेजों को भी महंगा करना शुरू कर दिया। अब एक बार फिर दूसरी टेलीकॉम कंपनियों ने भी अपने उपभोक्ताओं को महंगे टैरिफ प्लान का झटका दिया है। ट्राई और सरकार को इस पर नजर रखनी होगी कि कहीं ये बिना वजह ही अपने उपभोक्ताओं को महंगे टैरिफ प्लान का झटका न दें।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

सामंजस्य जरूरी

इस साल भी पराली जलने के मामलों में तेज़ी देखी गई। जहां केंद्र सरकार बढ़ते प्रदूषण के लिए किसानों को दोषी ठहराती रहती है, वहीं अनुचित सरकारी नीतियों के कारण किसानों के लिए भी कोई विकल्प नहीं बचा है। प्रदूषण को देखते हुए सरकार और किसानों को आपसी सामंजस्य बनाकर काम करना चाहिए।

दीपांशी, पटियाला

आपकी राय Other

Nov 25, 2021

अनिश्चितता का समय

बीस नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘तंत्र पर लोक की जीत की घड़ी’ लेख में दोटूक कहा गया है कि कृषि क़ानूनों की घोषणा के बावजूद किसान संसद से इन्हें विधिवत सही कराये बिना आंदोलन वापस नहीं लेंगे। लागू करने से पहले इन पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए थी। विपक्ष की रणनीति में कोरोना और किसान आंदोलन जैसे दो ही मूल मुद्दे थे। अब कोरोना क्षीणप्रायः है और किसान आंदोलन का रुख भांपना इतना आसान नहीं है कि कोई निश्चित राय बनायी जा सके। आसन्न चुनावों के लिए हड़बड़ी में विपक्ष नये मुद्दे कैसे गढ़ेगा, यह विचारणीय प्रश्न है। कृषि क़ानूनों की वापसी ने देश में नयी बहस छेड़ दी है। यह राजनीति की नयी संक्रांति में अनिश्चितता का समय है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

आयुर्वेद से अन्याय

दुखद है कि पंजाब लोकसेवा आयोग द्वारा चुने गए आयुर्वेदिक डाक्टरों को इस समय केवल लगभग दस हजार रुपये वेतन मिलता है, जिसमें से भी कुछ कटौती करके उन्हें 9300 रुपया मासिक वेतन मिलता है। एमबीबीएस और बीडीएस डाक्टरों को पूरा वेतन दिया जा रहा है तो आयुर्वेद वालों के साथ यह अन्याय क्यों? नियमानुसार डाक्टर सभी बराबर हैं। किसी भी पैथी से संबंध रखें। आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी और दांतों के डाक्टरों की चयन प्रक्रिया एक ही है और जब पंजाब लोकसेवा आयोग उन्हें सेलेक्ट करता है, उनके सर्विस नियम एक जैसे हैं तो फिर वेतन में इतना अंतर क्यों। यह शिक्षित जवानी का शोषण है और आयुर्वेद के विरुद्ध सरकारी अभियान ही इसे कहा जा सकता है।

लक्ष्मीकांता चावला, अमृतसर

नियमों का पालन

कोरोना संक्रमण पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ। शासन, प्रशासन और आम जनता वैक्सीन लगवाने के प्रति जागरूक अवश्य हुई है, किंतु आम जनता में कुछ लोग बिना मास्क, भीड़ में जाने लगे हैं, सैनेटाइज प्रक्रिया का पालन करना भूलते जा रहे हैं। कोरोना को दूर भगाना है तो नियमों का पालन करना ही पड़ेगा।

संजय वर्मा, मनावर, धार, म.प्र.

आपकी राय Other

Nov 24, 2021

आंदोलन के मायने

बीस नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘तंत्र पर लोक की जीत की घड़ी’ जहां लोक आंदोलन की सफलता को दर्शाता है, वहीं चुनाव आते देख सत्ता की किसान आंदोलन लेकर चिंता बताने वाला था। वहीं एक पक्ष यह भी है कि किसान आंदोलन के बहाने जमकर राजनीति हो रही थी, जिसका मकसद उत्तर प्रदेश, पंजाब व उत्तराखंड के आसन्न चुनावों पर प्रभाव डालना है। प्रधानमंत्री का यह कथन तार्किक लगता है कि सरकार कृषि सुधारों की हकीकत को किसानों को समझाने में विफल रही है। यही वजह है कि सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद किसान आंदोलन खत्म करने को तैयार नहीं हैं। वे इस आंदोलन के जरिये राजनीतिक लक्ष्य साधने की कोशिश में नजर आते हैं।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, उत्तराखंड

सहयोग करें

संपादकीय ‘देर से ही सही’ में उल्लेखित है कि प्रधानमंत्री ने किसानों की मांग को सम्मान देते हुए यदि क्षमाशीलता व्यक्त की है तो किसान संगठनों को भी आंंदोलन को शीघ्र ही बिना शर्त स्थगित या वापस लेने की घोषणा करनी चाहिए। भाजपा के चुनींदा नेताओं ने भी चल रहे आंदोलन पर नाराजगी अवश्य व्यक्त की किंतु पीएम से कृषि बिल वापस लेने का आग्रह भी किया। किसान अब एमएसपी गारंटी कानून के लिए सरकार को सत्रावसान तक का समय दें।

बीएल शर्मा, तराना, उज्जैन

सार्थक उपलब्धि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिन भोपाल में कमलापति रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया। यह भारत का प्रथम विश्वस्तरीय रेलवे स्टेशन है, जो कई सुविधाओं से लैस है। यह देश के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। जैसे आधुनिक अस्पताल, पार्क, रेलवे बर्थ तक पहुंच, सीसीटीवी कैमरे और 700 सौ यात्रियों के लिए प्रतीक्षा क्षेत्र। विकसित देशों के समक्ष खड़ा होने के लिए ऐसी प्रगतिशील उपलब्धियां अावश्यक हैं।

नरेंद्र शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

सिद्धू का पाक-प्रेम Other

Nov 23, 2021

नवजोत सिंह सिद्धू का पाकिस्तान प्रेम और इमरान खान से रिश्ता एक बार फिर पूरी दुनिया ने देख-सुन लिया। जब वह इमरान के शपथग्रहण समारोह में गए थे तब भी उन्होंने इमरान इनका दिलदार और शान कहकर इमरान को खुश किया था या चापलूसी की थी, पता नहीं। अब श्री करतारपुर गुरुद्वारा में पहुंचते ही सिद्धू फिर इमरान मेरा बड़ा भाई कहकर अपनी खुशी जाहिर करने लगे। नवजोत सिंह सिद्धू भूल गये कि जो हमारे देश का दुश्मन है, वह इनका बड़ा भाई कैसे हो सकता है। अफसोस यह कि कांग्रेस नेतृत्व भी इस पर खामोश है। कांग्रेस लीडरशिप को तय करना पड़ेगा कि सिद्धू कांग्रेस में रहने के योग्य हैं या नहीं।

लक्ष्मीकांता चावला, अमृतसर

ऐतिहासिक कदम

तीनों कृषि कानूनों की वापसी के लिए प्रधानमंत्री मोदी का ऐलान ऐतिहासिक कदम है। सरकार जल्द संसद में इसे तुरंत रद्द कर एमएसपी बारे कानून पास करे जो सर्वहित में है क्योंकि पहले ही सभी की बड़ी हानि हो चुकी है।

वेद मामूरपुर, नरेला

कोवैक्सीन को मान्यता से राष्ट्रीय गौरव Other

Nov 22, 2021

जन संसद

जन संसद की राय है कि कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ की मान्यता भारतीय वैज्ञानिकों के समर्पण व मेधा की वैश्विक स्वीकार्यता है। कोरोना काल में देश का आत्मविश्वास बढ़ाने में हमारे वैज्ञानिकों और चिकित्सा बिरादरी का योगदान प्रेरक है।

वाकई गौरव

देश सदियों से गणित, आयुर्वेद, खगोल, जीव, तथा रसायन विज्ञान जैसे अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विश्व विख्यात रहा है। परन्तु गुलामी की अंधेरी छाया ने सब कुछ ढक दिया था। आजादी के बाद हमारे वैज्ञानिकों भाभा, रमण, वसु, खुराना तथा कलाम जैसे दिग्गजों ने उस अंधेरे को हटाकर नये आयाम तथा मूल्य स्थापित किए, जिनके मार्गदर्शन पर चलकर देश के वैज्ञानिक अपनी क्षमताओं, योग्यताओं का सफल प्रदर्शन कर रहे हैं। कोवैक्सीन इतने कम समय में देश-विदेश को दी गई महत्वपूर्ण सौगात है जो सचमुच राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाती है।

एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र

देश का सम्मान

यह एक वैश्विक उपलब्धि है कि भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन को आपातकालीन उपयोग सूची में मान्यता दी गयी है। एक तरफ तो डब्ल्यूएचओ ने चार सप्ताह में एस्ट्राजेनेका द्वारा निर्मित कोविशील्ड वैक्सीन को मंजूरी प्रदान कर दी थी किन्तु कोवैक्सीन को स्वीकृति देने में 20 सप्ताह से अधिक का समय लग गया| आशा है कि भारत बायोटेक कंपनी कोवैक्सीन की देश-विदेश में की जाने वाली आपूर्ति में सुधार करने के लिए युद्धस्तर पर काम करेगी। फिलवक्त कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ से अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलना स्वाभिमान की बात है।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद

आत्मनिर्भरता परिलक्षित

स्वदेशी कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ की मान्यता से राष्ट्र का गौरव एवं साख बढ़ी है। इसका श्रेय वैज्ञानिकों एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की अभिनव प्रतिभा को ही जाता है। यह उपलब्धि उन देशों के लिए भी चुनौती है, जिनसे आपातकाल में स्वीकार्यता हेतु कोई प्रतिसाद नहीं मिला। यह उन लोगों के लिए भी राहतपूर्ण है, जिन्हें विदेश जाने पर मजबूर होकर पृथकवास में रहना पड़ता था। यह कोरोनारोधी टीका कम आय वाले देशों के लिए भी सुलभ है। वास्तव में इस उपलब्धि से देश की आत्मनिर्भरता ही परिलक्षित हुई है।

सतपाल मलिक, सींक, पानीपत

बड़ी उपलब्धि

भारत में निर्मित पहली कोरोना रोधक कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ की मान्यता मिलना राष्ट्रीय गौरव का विषय है। इसके लिए देश के वैज्ञानिक, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और इस मिशन से जुड़े सभी लोग बधाई के पात्र हैं। यह सफलता दर्शाती है कि हमारे देश के वैज्ञानिकों व स्वास्थ्य विशेषज्ञों की क्षमता को विश्व स्तर पर स्वीकार्यता मिली है। कोरोना महामारी के बाद बहुत ही कम समय में देश ने इस उपलब्धि को हासिल किया है। अब इससे विदेश जाने वाले भारतीयों को विशेष रूप से लाभ होगा।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

क्षमताओं से परिपूर्ण

आज भारत की प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया मानती है। ऐसा कौन-सा क्षेत्र बचा है जहां भारत के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों ने अपनी मेधा का परचम नहीं लहराया हो। चाहे स्पेस का क्षेत्र हो, मेडिकल का क्षेत्र हो, भारत दुनिया में कहीं भी पीछे नहीं है। अब कोरोना महामारी में भारत के विशेषज्ञों ने बहुत कम समय में स्वदेशी कोवैक्सीन का निर्माण कर पूरे विश्व में भारत का गौरव बढ़ाया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे स्वीकार कर लिया है। अब माना जाने लगा है कि भारत के वैज्ञानिक क्षमताओं से परिपूर्ण हैं।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, खलीलपुर

गर्व की बात

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भारत की कोरोना वैक्सीन को मान्यता दिया जाना विश्वव्यापी गौरव की बात है। विकसित देशों को पीछे छोड़ते हुए वैज्ञानिकों ने भारत को एक विशेष उपलब्धि दिलायी है। भारत अपनी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति, योग शक्ति और आध्यात्मिक शक्ति की दिशा में आरंभ से ही अग्रणी रहा है। उसी क्रम में भारत की यह उपलब्धि न केवल देश के नागरिकों के लिए प्राणरक्षक साबित होगी बल्कि अन्य देशों में भी इसका प्रचार-प्रसार होगा। यह सफलता देश के लिए गर्व की बात है।

श्रीमती केरा सिंह, नरवाना

पुरस्कृत पत्र

जय विज्ञान

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण परमाणु परीक्षण के समय ‘जय जवान, जय किसान’ नारे में ‘जय विज्ञान’ को जो जोड़ा था, वह समय के साथ-साथ अपनी सार्थकता को सिद्ध कर रहा है। देश के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित कोवैक्सीन इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मान्यता देकर मोहर लगा दी है। हमारी भावी पीढ़ी न केवल विज्ञान को उत्साह से अपना रही है बल्कि इसमें बेहतर प्रदर्शन भी कर रही है। यह रुचि नि:संदेह भारत के गौरवमय भविष्य की ओर इंगित कर रही है।

सुरेंद्रपाल वरी, गोहाना, सोनीपत

इनसानियत की राह Other

Nov 20, 2021

गुरु नानक देव जी ने सभी धर्मों, जातियों और वर्गों को एक समान समझने की शिक्षा दी थी। उनकी शिक्षाएं मात्र सिख धर्म के लिए ही आदर्श नहीं, बल्कि हर धर्म के लिए हैं। उन्होंने हर किसी को कुरीतियों, आडम्बरों, रूढ़िवादी परंपराओं के दलदल से बाहर निकलने की शिक्षाएं दीं। इन शिक्षाओं का अनुसरण करना ही गुरुओं और संतों की सच्ची भक्ति है।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

असली मुद्दे

देश में सभी अपनी ढपली पर अलग-अलग बेसुरा राग अलाप रहे हैं। कोई हिंदू, हिंदुत्व पर अपनी किताब में टिप्पणी कर विवाद पैदा कर रहा है तो कोई अन्य मुद्दों पर। इन सब विवादों में अगर नुकसान हो रहा है तो देश व जनता का। असल मुद्दों पर कोई भी बात करने को तैयार नहीं है। चाहे महंगाई का मुद्दा हो, बेरोजगारी का, भ्रष्टाचार का, रिश्वतखोरी का या स्वास्थ्य तंत्र में मरीजों से लूटपाट का। सवाल तो यह है कि इन बेतुके मुद्दों के कारण देश कहां पर है।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

स्वागतयोग्य पहल

गुरु नानक देव जी की जयंती पर प्रधानमंत्री द्वारा तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करना, देशवासियों से क्षमा-याचना करना तथा हड़ताली किसानों को अपने-अपने घरों को वापस जाने की प्रार्थना करना स्वागतयोग्य है। अब इस घोषणा के बाद किसानों को अपना आंदोलन समाप्त कर देना चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

चीन से सचेत

19 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में पुष्परंजन का ‘चीनी सैन्य तैयारी को गंभीरता से ले भारत’ लेख भारतीय गृह सुरक्षा सैन्य बल का राष्ट्र सुरक्षा के प्रति सजग करने वाला रहा। देश की पहाड़ी सीमा से सटे चीनी सैन्य बल का जमावड़ा भविष्य में युद्ध की तैयारी के मंसूबों का स्पष्ट संकेत जाहिर कर रहा था। फिर भी चीनी सैन्य बल के प्रति सचेत रहने की जरूरत है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

आपकी राय Other

Nov 19, 2021

तार्किक दृष्टिकोण

17 नवंबर को दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित बीएसएफ पर गुरबचन जगत का लेख दिलचस्प और तार्किक लगा। खासतौर पर भारत जैसे संघीय ढांचे में सुरक्षा के मामले में सोचने के दृष्टिकोण से। तार्किक ढांचे में यह महत्वपूर्ण नीतिगत मामला भी है कि निर्यात के जरिये पंजाब के राजस्व संसाधनों को बढ़ाया जाए। पंजाब में निर्यात और निर्यात राजस्व बढ़ाने के रास्ते तलाशने की क्षमता पंजाब के निकटवर्ती पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ और शांतिपूर्ण संबंधों से संबंधित है। मौजूदा संघीय ढांचे में, केंद्र में विदेश नीति को आकार देने में राज्यों की कोई भूमिका नहीं है, जबकि सीमावर्ती राज्यों की गैर-सीमावर्ती राज्यों की तुलना में एक तरह की नीति में पूरी तरह से अलग हिस्सेदारी है। पंजाब को अन्य उन सीमावर्ती राज्यों के साथ तालमेल बनाने की आवश्यकता होगी जो पड़ोसी देशों के साथ सैन्य संघर्षों से समान रूप से प्रभावित हैं। यदि संघ में विभिन्न राज्यों के बीच हितों की विविधता को प्रतिबिंबित करने के लिए संवैधानिक परिवर्तनों की आवश्यकता है तो उन परिवर्तनों को व्यवस्थित रूप से सामने लाया जाना चाहिए ताकि विदेशी और रक्षा नीतियों को तैयार करने के लिए जरूरी जटिलताओं की गहरी समझ विकसित हो सके।

प्रीतम सिंह, प्रोफेसर एमेरिटस ऑक्सफोर्ड ब्रूक्स बिजनेस स्कूल, लंदन

कुदरत का गुस्सा

प्रकृति ने इंसान को भरपूर मात्रा में हर चीज दी है। प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ का परिणाम मनुष्य को सदैव भुगतना ही पड़ता है। आज विश्वभर में दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा अप्रत्याशित घटनाओं का ग्राफ इसी का नतीजा है। जलवायु परिवर्तन के इस प्रभाव से भारत भी नहीं बच सका है। आज तमिलनाडु में जहां अतिवृष्टि से तबाही के हालात हैं, तो वहीं प्रशांत महासागर में बसा देश तुवालु डूबने की कगार पर है। आज मानव को जरूरत है कि वह प्रकृति की चेतावनी को समझे और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चले।

विकास बिश्नोई, हिसार

आपकी राय Other

Nov 18, 2021

वोट केंद्रित नीति

दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार पराली को खाद बनाकर खत्म करने की तथाकथित तकनीक विकसित करने का दावा किया था। केजरीवाल इस तकनीक को पंजाब में ले जाकर चुनावी गढ़ जीतने को आतुर थे। इस मुहिम में उन्होंने इसे प्रचारित करने के लिये लगभग 80 करोड़ रुपये फूंक दिए, लेकिन नतीजा क्या निकला, ढाक के वही तीन पात। बिना किसी पुख्ता आकलन के जनता के करोड़ों रुपये अपनी राजनीतिक लालसा के लिये स्वाहा करने का कौन उत्तरदायी है? आम आदमी पार्टी को पता है कि पराली से खाद बनाने की तकनीक सिर्फ एक शिगूफा है, लेकिन इससे मतदाताओं को बरगलाकर वोट तो हथियाये ही जा सकते हैं।

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

आरोपों की राजनीति

उ.प्र. विधानसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, प्रदेश की सियासत भी उतनी ही अधिक गरमाने लगी है। आलम यह है कि सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर जमकर निशाना साध रहे हैं। प्रदेश के चुनाव में बीजेपी जहां हिंदुत्व के सहारे आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक के साथ अपनी नैया खेने में लगी हैं। इतना ही नहीं, आरोप-प्रत्यारोप के इस सियासी खेल में माहौल इतना अधिक गरम हो गया है कि नेता लोग देवी-देवताओं को भी नहीं बख्श रहे हैं। क्या आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति सही है?

शशांक शेखर, नोएडा

सख्ती जरूरी

मणिपुर में हिंसा का घातक रूप देखने में आया है। उग्रवादियों ने कर्नल के परिवार समेत अर्धसैनिक बल के 4 जवानों को निशाना बनाया है। इस हिंसा से सरकार की चिंता बढ़नी स्वाभाविक ही है। समय रहते इसे सख्ती से दबाए जाने की जरूरत है ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इस घटना से सजग होकर सरकार को बड़ा ऑपरेशन चलाना चाहिए, जिससे सुरक्षा बलों की हिम्मत के साथ ही राज्य के नागरिकों का आत्मविश्वास भी बना रहे।

अमृतलाल मारू, धार, म.प्र.

आपकी राय Other

Nov 17, 2021

नेताओं को सबक

तेरह नवंबर को दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित राजकुमार सिंह का ‘जनादेश से उपजे परिदृश्य के निष्कर्ष’ लेख एक बड़ी नसीहत के रूप में सामने आया है कि अब मतदाता अपना भला-बुरा स्वयं ही समझने लगे हैं। उपचुनावों के परिणाम तो यही कह रहे हैं कि अब, राजनीतिक दल मतदाताओं को मनमाने ढंग से बरगला नहीं पायेंगे। चुनाव परिणाम इतने अप्रत्याशित हैं कि कोई भी दल अपनी जीत का निश्चित दावा नहीं कर सकता। हरियाणा में तीन कृषि कानूनों के समर्थक इनेलो के अभय चौटाला बाज़ी मार ले गये। हिमाचल में एक लोकसभा और तीन विधानसभाओं में कांग्रेस की जीत भाजपा के लिए चिंता बढ़ाने वाली है। मतदाताओं ने बता दिया कि दलों के दावों के बावजूद जीत-हार का फैसला उसी के हाथ में है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

 

संकट की आहट

वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी प्राकृतिक आपदाएं घट रही हैं, जिनका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। पहाड़ों में भूस्खलन तो समुद्री इलाकों में अनियंत्रित बारिश की वजह से आम जन को बहुत हानि पहुंच रही है। इसके साथ ही कई ऐसे समुद्री राष्ट्र हैं, जिनके डूबने जैसे हालात पैदा हो गए हैं। वर्तमान में ग्लासगो सम्मेलन यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण लगाने की कितनी अावश्यकता है। यह सम्मेलन सभी देशों के लिए एक ऐसे खतरे की सूचना है कि जिस पर अगर अभी से ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में कई प्राकृतिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

शुभम बिष्ट, देहरादून

आपकी राय Other

Nov 16, 2021

जनादेश के निष्कर्ष

तेरह नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘जनादेश से उपजे परिदृश्य के निष्कर्ष’ हालिया तीन लोकसभा व 29 विधानसभा के उपचुनावों परिणामों से राजनीतिक दलों की जमीन बताने वाला था। पहली बात तो यह है कि राजनेताओं का भ्रम है कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है और वह तमाम आक्रामक प्रचार व लोकलुभावने वादों के चलते अपनी ज्वलंत समस्याएं भूल जायेगी। वास्तव में राज्यों में स्थानीय मुद्दों का जोर होता है और जनता इतना आसानी से कुशासन व नाकामियों को नहीं भूलती है। यही वजह है हि.प्र. में लोकसभा व विधानसभा के सारे चुनाव परिणाम सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ आये। ऐसे में यह उम्मीद रखना कि जनता महंगाई की मार तथा घोषित नीतियों के धरातल पर न उतरने को भूलकर किसी राजनीतिक दल को वोट देगी, सिर्फ राजनीतिक दलों भ्रम ही है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, उत्तराखंड

अनुकरणीय नेतृत्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो सम्मेलन में वन ग्रिड, वन सन और वन वर्ल्ड की वकालत करते हुए जलवायु परिवर्तन की बात को सहजता से दुनिया के सामने रखा। विदेश की धरती से मोदी ने जलवायु परिवर्तन का शंखनाद किया। सम्मेलन में मोदी ने तीन मन्त्र का हवाला दिया उसका सभी ने स्वागत किया है। मोदी के नेतृत्व में भारत सम्मानित हुआ।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

पटाखों पर रोक की तार्किकता Other

Nov 15, 2021

तार्किकता मिले

पटाखें उमंग, उल्लास के प्रतीक है। कोरोना के बाद आम व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हुई है, ऐसे में प्रदूषण उन्हें सांस की तकलीफ तथा अस्थमा, दमा ग्रस्त व्यक्तियों को इससे बहुत परेशानी होती है। अतः पटाखें जलाना हो तो ग्रीन पटाखें जलाना चाहिए, जिसमें प्रदूषण नियंत्रित करने के सरकारी मानकों का पालन किया जाता है। सिर्फ प्रदूषण के लिए पटाखों को जलाने से रोकना एक वर्ग की भावनाओं के साथ खिलवाड़ रहेगा, वैसे तो अनेक अनफिट वाहन भी सड़कों पर प्रदूषण फैला रहे हैं, उनके बारे में कोई नहीं सोचता।

भगवानदास छारिया, इंदौर, म.प्र.

दायित्व बोध हो

देश में उत्सव व खुशी के मौकों पर पटाखे जलाने की परंपरा है, मगर दिवाली के आसपास सर्दी बढ़ने और हवा के कम प्रभाव के कारण घातक प्रदूषण के कण हमारे आसपास ही रह जाते हैं जो कि घातक सिद्ध होते हैं। आईक्यूआर की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की सबसे खराब वायु गुणवत्ता वाले देशों की सूची में भारत तीसरे नंबर पर था। पर्यावरण की बारीकियों को समझने वाले विद्वान कहते हैं कि पटाखों से बहुत कम समय में बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलता है। क्षणिक सुख के लिए तमाम अपीलों, कोर्ट के आदेश व नियम-कानूनों को ताक पर रखकर देश के नागरिक पटाखे बजाते हैं जो कि तर्कसंगत नहीं है। नियमों को ताक पर रखकर पटाखे जलाना सामाजिक दायित्व बोध या धार्मिक अस्मिता का परिचायक नहीं हो सकता।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

बदलाव स्वीकारें

दिवाली खुशियों का त्योहार है। हमें इसे पर्यावरण को ध्यान में रखकर मनाना चाहिए। जरूरी नहीं कि ज्यादा पटाखे फोड़ने से ही त्योहारों का आनंद बढ़ता है। पटाखों से प्रदूषण के अलावा भी अन्य बहुत से नुकसान है। पटाखों का पक्षियों, बुजुर्गों पर बहुत बुरा असर होता है। बड़े, बुजुर्गों को दमे जैसी भयंकर बीमारियों का सामना करना पड़ता है। सबसे ज्यादा पैसे की बर्बादी होती है। कुछ लोग जो इसे धार्मिक अस्मिता का प्रश्न बना रहे हैं जो सही नहीं है। परिस्थिति के अनुसार देश बदल रहा है और प्रगति कर रहा है। इसीलिए हर देशवासी को बदलते देश के साथ खुद में बदलाव जरूरी समझना चाहिए।

सतपाल सिंह, करनाल

सेहत पर भारी

त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं का अहम हिस्सा है, लेकिन उत्सव के नाम पर पटाखें फोड़कर हम दूसरों के स्वास्थ्य की कीमत पर उत्सव नहीं मना सकते हैं। पिछले दो सालों में मानव जाति ने कोरोना महामारी जैसा बड़ा संकट झेला,अब भी झेल रही है। इसी बीच पर्यावरण प्रदूषण मानव के लिए चुनौती बना हुआ है। ऐसे में उत्सव-खुशी के मौकों को आपसी समन्वय, सौहार्द व भाईचारे की भावना से ओतप्रोत होकर पटाखों के स्थान पर मिठाई बांटकर मनाएं। हम सभी की खुशी एक-दूसरे की खुशियों में ही निहित है।

सुनील कुमार महला, पटियाला, पंजाब

सख्ती जरूरी

दिवाली पर जब पटाखे चलते हैं तो देश के बहुत से राज्य भारी प्रदूषण की चपेट में आ जाते हैं। लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। दिवाली पर जलाए जाने वाले पटाखें वायु प्रदूषण ही नहीं फैलाते, बल्कि बहुत ज्यादा ध्वनि प्रदूषण भी करते हैं। इस कारण नयी बीमारियों का जन्म भी होता है। इसलिए दिवाली पटाखे न चलाकर ग्रीन दिवाली मनाई जाए। लेकिन यह भी जरूरी नहीं है कि प्रदूषण मात्र पटाखों से ही फैलता है, प्रदूषण फैलाने वाले दूसरे कारणों पर भी इतनी सख्ती सरकारों, न्यायलयों और प्रशासन को दिखानी चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

अन्य कारण भी

देश में पूरे वर्ष किसी न किसी आयोजन एवं शादी समारोह आदि में पटाखों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। निश्चय ही पटाखे चलाने से पर्यावरण प्रदूषित होता है। लेकिन वहीं हमारे किसान स्वयं पराली भी जलाते हैं उससे सारा वातावरण जहरीला हो जाता है। महानगरों में चलने वाले कल-कारखानों से निकलते विषैले धुएं को हम क्यों भूल जाते हैं। केवल दीपावली के पटाखों से प्रदूषण बढ़ता है यह कहना उचित नहीं है। अभी देश में ग्रीन पटाखे अधिक चलन में नहीं है। इनका उत्पादन भी अधिक मात्रा में नहीं हो रहा है। जब इसका उत्पादन अधिक होगा तब ही उसका महत्व भी देखा जा सकता है।

मनमोहन राजावत, शाजापुर, म.प्र.

भलाई हो मकसद

दिवाली दीयों का त्योहार है, न कि पटाखे फोड़कर प्रदूषण फैलाने का। ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण न केवल मानव जीवन को अपितु पशु-पक्षियों और अन्य जीवों के जीवन को भी प्रभावित करते हैं। भगवान श्रीरामचन्द्र जी के जीवन का तो सार ही मर्यादा से पूर्ण था। जीवों के कल्याण के लिए, पिता के वचन की लाज के लिए वन-वन भटके, लेकिन कभी किसी को पीड़ा नहीं पहुंचाई। हम कैसे कह सकते हैं कि इस ख़ुशी के दिन पटाखे फोड़कर अन्य लोगों के लिए संकट खड़ा करें। हां, जितने पैसे हम पटाखों में व्यय करते हैं, उतने धन से किसी जरूरतमंद को वस्त्र, पुस्तकें, भोजन आदि देकर श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी को हम सार्थक कर सकते हैं।

अशोक कुमार वर्मा, करनाल

आपकी राय Other

Nov 13, 2021

सार्थक पहल

अफगानिस्तान के मौजूदा हालात बेहद चिंताजनक हैं। हाल ही में आठ देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक को भारत में आयोजित किया जाना अच्छा कदम माना जा रहा है। इस बैठक में भारत के साथ अफगानिस्तान की सीमाओं से सटे सभी देश शामिल थे। इस आयोजन से न सिर्फ अफगानिस्तान और उसके पड़ोसी देशों को, बल्कि तमाम राष्ट्र के अध्यक्षों को अहम सूचना जाएगी। सभी देशों को आगे आकर उन अफगानियों की मदद करने की जरूरत है। बहरहाल, नयी दिल्ली में दो दिन चले इस बैठक के क्या नतीजे आते हैं, यह तो अब समय ही बताएगा।

शशांक शेखर, नोएडा

अतार्किक तुलना

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद की हालिया किताब ने पूरे देश में विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने अपनी किताब में आधुनिक हिंदुत्ववादियों की तुलना आईएसआईएस और बोको हराम से की है। सलमान खुर्शीद का यह विचार विभाजनकारी है। लेकिन अब इस देश के लोग कांग्रेस की नीति से परिचित हो गए हैं। यह आने वाले चुनावों में कांग्रेस पार्टी के लिए समस्या पैदा करेगा। सलमान खुर्शीद को इसके लिए देश से माफी मांगनी चाहिए।

नरेंद्र शर्मा, जोगिंदर नगर, मंडी

चिंता की बात

हमारे देश में महिलाओं के प्रति अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 371,503 मामले महिलाओं पर अत्याचार के सामने आए हैं। दुष्कर्म के सबसे अधिक 5310 मामले राजस्थान में सामने आए। इसके बाद दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश (2769), तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र (2061) और चौथे नंबर पर असम (1657) रहायह सब कानून की लचर व्यवस्था का ही परिणाम है, जिसमें महिलाओं के साथ दुष्कर्म और दहेज के लिए उकसाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उपरोक्त तथ्य चिंता का विषय है।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

चालबाज चीन Other

Nov 12, 2021

चीन की चालबाजी कभी कम नहीं होती। हर बार वह नया खेल खेलता है। अब वह भारतीय सुरक्षा बलों को वहां जाने से भी रोक रहा है जहां वे पहले गश्त करते रहे हैं। हो सकता है भविष्य में वह यह भी कह सकता है कि अब जो भी बात होगी, चीन द्वारा कब्जाए गए इलाके को छोड़ कर ही होगी। अब तो पूरे विवादित इलाके में पहले की तरह गश्त लगाने का हिसाब ठीक करना होगा। भारतीय सेना जिस भी इलाके में गश्त नहीं करेगी चीन भविष्य में वहां भी पक्के निर्माण कर सकता है। हमें उसके एक्शन को देखकर रिएक्शन करने की बजाय अपनी तैयारी जारी रखनी चाहिए। असल में वह सिर्फ भारत में दब्बू सरकार के आने का इन्तजार कर रहा है। तब तक वह अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा है।

चंद्र प्रकाश शर्मा, दिल्ली

अब जीका

उ.प्र. के कानपुर में जीका वायरस का नया खतरा सामने आया है। बताया जा रहा कि जो मच्छर डेंगू, मलेरिया के लिए जाने जाते थे, अब जीका के नये नाम, नये रूप से भी जाने जाएंगे। ऐसे में, सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने आसपास के वातावरण को साफ़-सुथरा रखें। योगी सरकार को भी इस वायरस के पनपने और फैलने से रोकने के लिए प्रशासनिक तैयारी तेज करनी होगी। स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी को हल्के में न लेकर घातक हो सकता है।

अमन जायसवाल, दिल्ली

सच सामने आये

लखीमपुर कांड मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है, लेकिन मामले की तह तक जाना बेहद जरूरी है। अगर यह मामला सीबीआई को सौंपा जाता है तो इसका परिणाम जल्द ही सामने आ सकता है और दोषियों को सजा मिल सकती है। केवल जांच को सेवानिवृत्त जजों को बदलने और मामले पर चर्चा करने से कुछ नहीं होगा जब तक कि इस पर कुछ ठोस कदम नहीं उठाए जाते।

जैसमीन कौर, चंडीगढ़

आपकी राय Other

Nov 11, 2021

किसान का हक

10 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में देविंदर शर्मा का ‘दौलत उगाते किसान को भी समृद्ध कीजिए’ लेख धरतीपुत्र की पीड़ा का विश्लेषण कर शासनाधीशों का ध्यान आकृष्ट करने वाला रहा। शांतिपूर्ण चल रहे किसान आंदोलन काे लगभग एक वर्ष पूरा होने वाला है। देश की अर्थव्यवस्था को कोरोना काल में मजबूती देने वाले किसान की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन केंद्र सरकार की तानाशाही नीतियों के चलते सोना उगाने वाले किसान की समस्याओं के निवारण हेतु समाधान की आवश्यकता है। लेखक के अनुसार किसान के खून-पसीने का हक देकर भविष्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सर्जरी जरूरी

9 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का ‘चीन की तर्ज पर आर्थिकी सर्जरी के सबक लें’ लेख भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए चीन से अनुभव लेने की सलाह देने वाला था। लेखक के अनुसार देश के बैंकों को केवल उन्हीं कंपनियों को उधार देना चाहिए, जिनकी संपत्ति ऋण से ज्यादा हो और वे ऋण को समय पर वापस भी कर सकें। इसके अलावा हमें बिजली उत्पादन के लिए प्रदूषण फैलाने वाले संयंत्रों के बदले पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाले वैकल्पिक स्रोत ढूंढ़ने चाहिए। चीन की तर्ज पर भारत को भी अपनी आर्थिकी की सर्जरी करने की जरूरत है।

शामलाल कौशल, रोहतक

विरासत का संरक्षण

हि.प्र. के एक खास मोजे और चंबा चप्पल को जीआई टैग मिला है, जिससे इन दोनों प्रोडक्टों को एक खास पहचान मिल गई है। ‘चंबा की चप्पल’ को जीआई टैग मिलना सरकार की एक बड़ी पहल है। इससे इसकी सस्ती नकल पर रोक लगेगी। चंबा जैसे छोटे शहरों को पूरे देश में पहचान मिलेगी और स्थानीय लोगों के मानकों को ऊपर उठाने वाले चप्पल खरीदने वाले पर्यटकों के कारण शहर के लोगों को इसका लाभ मिलेगा।

हर्षिता सागर, यमुना नगर

आपकी राय Other

Nov 10, 2021

हार-जीत के मायने

केंद्र और हि.प्र. में एक ही राजनीतिक दल भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है। इसके बावजूद यहां भाजपा का उपचुनाव की सभी सीटों पर हारना, शायद जयराम सरकार को चिंता में डालने वाला काम है। हि.प्र. के सभी उपचुनाव में कांग्रेस को मिली जीत पर सभी के अपने-अपने विचार हैं, जहां एक तरफ इस चुनाव में मिली हार के बाद भाजपा अपनी हार के कारणों का मंथन कर रही है, वहीं कांग्रेस इस जीत से फूली नहीं समा रही है। लेकिन उपचुनाव से किसी भी राजनीतिक दल का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। हर चुनाव में मतदाता अलग नजरिया और सोच रखता है।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

उम्र घटाता प्रदूषण

एक रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते प्रदूषण ने मानव जीवन और उसके स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाला है। प्रदूषण बीमारियों को निमंत्रण देने के साथ-साथ मानव की उम्र भी घटा रहा है। प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए कई सालों से कितनी सारी योजनाएं तो चलाई जा रही हैं पर कार्ययोजना जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं दे रही है। हालांकि आज पूरी दुनिया प्रदूषण जैसी बड़ी समस्या पर एकजुट होकर काम कर रही है। ग्लासगो में पर्यावरण को बचाने के उपाय पर हुई बहस से उम्मीद है कि इसका कोई हल निकल जाए।

गीता कुमारी, सरहिंद, फतेहगढ़ साहब

समाधान निकालें

नौ नवम्बर के दैनिक ट्रिब्यून में संपादकीय ‘सांस की फांस’ हर साल पैदा होने वाली पराली जलाने की समस्या पर प्रकाश डालने वाला था। इस संबंध में सरकार द्वारा किए गए प्रयासों से अभी तक इस समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं निकल पाया है। संपादकीय में उचित ही कहा गया है कि इस समस्या का समाधान केवल दोषारोपण से नहीं निकलेगा बल्कि इसका हल तभी निकल पाएगा जब सरकार किसानों के अनुकूल समाधान निकालेगी।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

जागने का वक्त Other

Nov 09, 2021

यदि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई तो आने वाले बीस वर्षों में पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री से अधिक हो जाएगा। सम्पूर्ण विश्व में निरंतर बढ़ रहे ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है। इसके संकेत तो अभी से मिल रहे हैं। हर रोज दुनिया के किसी न किसी हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं के कारण मानवीय क्षति हो रही है। वैसे तो जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया में बैठकें होती रहती हैं। लेकिन दुर्भाग्य कि यह फोटो सेशन तक सिमट कर रह जाती हैं। कॉप 26 अपने लक्ष्यों को पाने में कितना सफल होगा, यह तो वक़्त बताएगा।

शिवेन्द्र यादव, कुशीनगर, उ.प्र.

चिंता की बात

देश में महिलाओं के प्रति अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 371,503 मामले महिलाओं पर अत्याचार के सामने आए हैं। इसमें 34553 मामले केवल राजस्थान के हैं, जिसमें हर रोज 95 महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है। यह सब कानून की लचर व्यवस्था का ही परिणाम है, जिसमें महिलाओं के साथ दुष्कर्म और दहेज के लिए उकसाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। ये उपरोक्त तथ्य चिंता का विषय हैं।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

मनोहर सरकार के सात साल Other

Nov 08, 2021

जन संसद की राय है कि मनोहर लाल सरकार की पहली पारी में चुनौतियों के बावजूद कुछ बेहतर काम भी हुए। लेकिन कोरोना संकट व किसान आंदोलन के दौरान कई तरह की विसंगतियां भी सामने आईं। दूसरे कार्यकाल में गठबंधन सरकार की अपनी सीमाएं भी रहीं। लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।

सर्वांगीण विकास

मनाेहर लाल सरकार का पिछले 7 वर्ष का कार्यकाल सफल कहा जा सकता है। उनके शासनकाल में भाई-भतीजावाद एवं भ्रष्टाचार में कमी आई है। साथ ही उन्होंने पुरानी कॉलोनियों में निवासरत लोगों को बिजली कनेक्शन जारी करना, नये साइबर थानों की स्थापना, पुलिस कर्मियों की चिकित्सा जांच, पंचायत संरक्षक योजना, खिलाड़ियों के लिए श्रेष्ठ प्रोत्साहन नीति एवं सरकारी विभागों की समस्त योजनाएं एक ही परिवार पहचान-पत्र के आधार पर मुहैया करवाने संबंधी कल्याणकारी योजनाएं लागू कर प्रदेश का सर्वांगीण विकास करने की पहल की है।

ललित महालकरी, इंदौर, म.प्र.

सवाल बाकी

विगत 55 वर्ष से जल वितरण पर चल रहे अन्याय और सतलुज यमुना लिंक नहर निर्माण पर हरियाणा के पक्ष में उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट आदेश के पश्चात भी केंद्र सरकार द्वारा आदेश की अनुपालना नहीं करवा पाना प्रदेश के हितों पर कुठाराघात है। सरकार का प्रथम कार्यकाल जाट आरक्षण, रामपाल आश्रम प्रकरण और राम रहीम सज़ा प्रकरण में हुए दंगों, मानव जीवन की क्षति और कानून व्यवस्था में निरंतर विफलताओं के लिए याद किया जाएगा। गठबंधन सरकार के दो साल के कार्यकाल में कोरोना लॉकडाउन में शराब, रजिस्ट्री घोटाला और पेपर लीक घोटाले सरकार की कार्यप्रणाली पर गम्भीर प्रश्नचिन्ह हैं।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां गुरुग्राम

वक्त बताएगा

लोकतंत्र में किसी भी सरकार की सफलता या असफलता को मापने का सबसे सटीक पैमाना है चुनाव। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनावों में 8 मंत्रियों सहित 21 विधायकों का चुनाव हारना और भाजपा की सीटें घटना दर्शाता है कि खट्टर सरकार के पहले पांच सालों के काम जनता को बहुत ज्यादा पसंद नहीं आये। बाद के दो सालों में गठबंधन धर्म की मजबूरी और किसान आंदोलन से जूझती खट्टर सरकार कितनी कार्यकुशल है, राज्य का आम आदमी जनता है। यह अलग बात है कि जानकारी अगले विधानसभा चुनाव में ही उजागर होगी।

बृजेश माथुर, गाज़ियाबाद

खरे नहीं उतरे

मुख्यमंत्री मनोहर लाल सरकार के सात साल के विकास कार्यों का मूल्यांकन किसान आंदोलन, कोरोना महामारी के कारण अपनों से बिछुड़ने का गम, आसमान छूती महंगाई से त्रस्त आम आदमी, असुरक्षित मातृशक्ति, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी आदि समस्याएं दूर करने में असमर्थ सरकार की क्रिया शैली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। पेट्रोल-डीजल, गैस के दामों में वृद्धि, यातायात नियमों के उल्लंघन की आड़ में पुलिस द्वारा भारी-भरकम चालानों से सरकार अपना खजाना भरने में जुटी है। जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

मुश्किल वक्त

मनोहर लाल सरकार के शासन काल का अगर मूल्यांकन करें तो उन्होंने प्रदेश के हित में बहुत सारे काम किए, लेकिन चुनावी वादे पूरे करने में असफल रही है। किसानों की समस्याएं, कोरोना काल में अकाल मृत्यु, उसे कौन भूल सकता है, प्रदेश में भ्रष्टाचार किसी न किसी रूप में कायम है, कई उद्योग और काम धंधे बंद हो गए हैं, महिलाओं के प्रति अपराध कम नहीं हुए, प्रदेश में सरकार पेट्रोल और डीजल पर कर से अपना खजाना भर रही है। महंगाई के मारे लोग दो जून की रोटी जुटाने में भी कठिनाई महसूस कर रहे हैं।

शामलाल कौशल, रोहतक

फैसला अगले चुनाव में

मनोहर लाल सरकार के पहली पारी में जनसाधारण ने महसूस किया कि सिर्फ सत्ता ही नहीं व्यवस्था भी बदली है। वंचित रहे क्षेत्र और युवाओं को सरकारी नौकरियां मिलीं तो संदेशा स्वाभाविक ही मेरिट और पारदर्शिता का गया। जाट आंदोलन और डेरा सच्चा सौदा समर्थकों की वजह से थोड़ा कानून व्यवस्था चरमराई जरूर, मगर स्थिति संभाल ली गई। वर्ष 2020 और 2021 को अकल्पनीय चुनौतियों से भरपूर बनाने में कोरोना ने खलनायक की भूमिका निभाई। किसान आंदोलन की गाज भी सबसे ज्यादा हरियाणा पर ही पड़ी है। जनता का फैसला तो अगले विधानसभा चुनाव में ही पता चलेगा।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

पुरस्कृत पत्र

चुनौतियां भी बड़ी

पहली बार हरियाणा में भाजपा की सरकार 2014 में बनी और इस का 7 साल तक निर्विघ्न रूप से चलना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। सरकार के पहले 2 साल बहुत प्रभावी नहीं रहे क्योंकि लगभग पूरा मंत्रिमंडल पहली बार पद संभाल रहा था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 10 सीटों पर भाजपा की जीत ने सरकार की सफलता पर मोहर लगाई। इस अवधि में चुनौतियां भी कम नहीं मिलीं। जाट आरक्षण आंदोलन और डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों की हिंसा ने कानून-व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिया। सरकारी भर्तियों की परीक्षाओं के पेपर बार-बार लीक होना भी आयोजकों की नीति और नीयत दोनों पर ही सवालिया निशान लगा देता है। कोरोना की दूसरी लहर का प्रभावी ढंग से मुकाबला न कर पाने से भी सरकार की छवि धूमिल हुई है।

शेर सिंह, हिसार

राजनीतिक दांव Other

Nov 06, 2021

पिछले कुछ समय से जहां लोग पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों से परेशान थे, वहीं अचानक से पेट्रोल और डीजल की कीमतें घट गई। हैरानी की बात तो यह है कि दाम सिर्फ बीजेपी शासित राज्यों में कम हुए। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी आगामी चुनावों के लिए जनता को अपने पक्ष में रखने की हरसंभव कोशिश कर रही है। इस वक्त उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और ऐसे में जनता को नाराज करना हार का कारण भी बन सकता है। हालांकि फैसला तो जनता ही करेगी कि वह भाजपा के कितने पक्ष में है।

नंदनी जांगिड़, पंचकूला

अतार्किक तुलना

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने महात्मा गांधी व जवाहरलाल नेहरू के साथ मोहम्मद अली जिन्ना की तुलना करते हुए, मोहम्मद अली जिन्ना को नायक बताया है। इसमें कोई शक नहीं कि विभाजन के पहले सभी लोगों ने त्याग, बलिदान व संघर्ष किया था। लेकिन अखंड भारत के दो टुकड़े कराने के असली खलनायक तो जिन्ना ही थे। जिन्ना ने अपनी जिद व महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अंग्रेजों के पिट्ठू के रूप में भी कार्य किया। लेकिन सत्ता व वोट की राजनीति के लिए हमारे देश के नेता और कितना नीचे गिरेंगे?

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरौद उज्जैन

आत्ममंथन करें

एक नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मनोहर लाल का लेख ‘व्यवस्था परिवर्तन से हासिल विकास के लक्ष्य’ सत्तारूढ़ प्रदेश सरकार के योजनाबद्ध विकास कार्यों का विश्लेषण करने वाला था। कोरोना काल के चलते स्वास्थ्य सेवाओं में आए व्यवधान, अकाल मृत्य, लॉकडाउन से प्रभावित जीवन, भूख, महंगाई, घर से बेघर हुई जिंदगी संकटकाल को कैसे भूल पाएगी। यह सियासतदानों के आमजन की आशाओं के अनुरूप कसौटी पर खरा नहीं उतरने का प्रमाण है। सत्ता पक्ष को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

भाजपा के लिए चेतावनी Other

Nov 04, 2021

देश के विभिन्न राज्यों में हुए 3 लोकसभा और 29 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के आए परिणामों ने सत्तारूढ़ पार्टी की चिंताए बढ़ा दी हैं। खास तौर पर हिमाचल प्रदेश और बंगाल के नतीजों ने तो और भी चौंकाया है। 2022 के अगले पूर्वार्द्ध में हिमाचल प्रदेश सहित उससे सटे कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं उत्तराखण्ड में चुनाव होने हैं। इससे पूर्व बीजेपी के लिए इस तरह का परिणाम आना बेहद चिंताजनक है। कांग्रेस के बदलते समीकरण ने उसे जीवनदान देने की कोशिश की है। एक बार फिर से कांग्रेस की गाड़ी पटरी पर लौटने की संकेत मिल रहे हैं। हि.प्र. के मुख्यमंत्री ने इस बड़ी हार की वजह महंगाई को बताया है। बीजेपी पर इस उपचुनाव से भले ही उतना गहरा असर न पड़े, लेकिन समीकरण इसी को सोच-विचार कर बनेंगे।

शशांक शेखर, नोएडा

चुनौती बाकी

1 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में मनोहर लाल का ‘व्यवस्था परिवर्तन से हासिल विकास के लक्ष्य’ लेख अपने शासनकाल के 7 सालों को लेकर सरकार के राज्य हित में किए जाने वाले कार्यों का वर्णन करने वाला था। मुख्यमंत्री ने प्रदेश के विकास, कल्याण तथा भ्रष्टाचार रोकने के लिए यथासंभव प्रयत्न किए हैं, बेशक उनके प्रशासन से पहले की सरकारों द्वारा किए गए कार्यों का भी उन्होंने मूल्यांकन किया है। प्रदेश में बढ़ती बेकारी, किसानों की समस्याएं, महंगाई, उद्योग धंधों का बंद होना, लोगों की क्रय शक्ति का कम होना सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है।

शामलाल कौशल, रोहतक

प्रदूषण मुक्त पर्व

प्राचीन काल में दिवाली का त्योहार घी और तेल के दीयों को जलाकर मनाया जाता था, वहीं आधुनिक युग में यह पर्व पटाखों के साथ मनाया जाने लगा है। इन सब से न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि पर्यावरण में प्रदूषण की मात्रा भी बढ़ जाती है। इसलिए हमें प्रदूषण मुक्त दिवाली मनानी चाहिए। ऐसा करने से हम आर्थिक नुकसान के साथ-साथ प्रदूषण से भी प्रभावित नहीं होंगे।

राजबीर सिंह, शाहकोटी

मानसिक अवसाद Other

Nov 03, 2021

भारत में मानसिक रोग तेजी से लोगों को अपना शिकार बना रहा है। देश में हर एक दूसरा व्यक्ति इसका शिकार है। रिपोर्ट के मुताबिक 47 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी मानसिक रोग की चपेट में हैं। मानसिक रोग को लेकर भारतीय चिकित्सा परिषद ने 2017 में पहली बार व्यापक अध्ययन किया था, जिससे पता चला कि 4.57 करोड़ लोग अवसाद व अन्य विकार और 4.49 करोड़ लोग बेचैनी से पीड़ित हैं। आंकड़े चिंताजनक हैं। मानसिक रोग से छुटकारा पाने के लिए परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों का साथ होना बहुत जरूरी है।

गीता कुमारी, सरहिंद, फतेहगढ़ साहब

घातक मंसूबे

अफगानिस्तान की तथाकथित सरकार ने अमेरिका समेत दुनिया के देशों को धमकी दी है कि वे उनकी सरकार को मान्यता दें अन्यथा गम्भीर परिणाम भुगतने को तैयार रहें। ज्ञात रहे कि अभी तक किसी भी देश ने उनकी सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। यदि ऐसी धमकी से किसी सरकार को मान्यता मिलती है तो यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इसकी देखादेखी अन्य आतंकी समूह भी बंदूक की नोंक पर किसी देश या सरकार को बंधक बनाकर मान्यता प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

असली दिवाली

दीपावली में लोग तरह-तरह के घरेलू सामान, पूजा सामग्री इत्यादि खरीदते हैं, लेकिन सामान लेते वक्त यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें देश में निर्मित चीजें ही खरीदनी हैं। कोरोना के चलते लोग आर्थिक तंगी से गुजरे हैं और व्यापारियों के साथ-साथ देश के गरीब वर्ग को भी बहुत नुकसान हुआ है। अगर देश में निर्मित चीजें खरीदते हैं तो सबसे ज्यादा फायदा आर्थिक रूप से गरीब वर्ग को होगा। ऐसा करने से वे लोग भी खुशी से दीपावली मना पाएंगे।

शुभम बिष्ट, देहरादून

साख से ही भला Other

Nov 02, 2021

30 अक्तूबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का ‘वैचारिक विश्वसनीयता से ही बढ़ेगी साख’ लेख उ.प्र. के आसन्न विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस की खोई जमीन हासिल करने की कोशिशों को ही बताता है। नि:संदेह आज भी देश की राजनीति कैसे शिगूफों और जुमलों से चलायी जा रही है। चेहरे, चाल और चरित्र बदलने का दावा करने वाले राजनीतिक दल कैसे आजादी के सात दशक बाद भी जनता को भरमाने के लिये शिगूफे छोड़ रहे हैं। जहां कांग्रेस की वापसी की उम्मीदें न के बराबर हैं, वहां तो महिलाओं को चालीस फीसदी सीटें देने की बात हो रही, लेकिन उत्तराखंड और पंजाब में जहां पार्टी जीतने की स्थिति में है, वहां महिलाओं को चालीस फीसदी टिकट देने की बात क्यों नहीं हो रही है? विपक्ष में रहते तो चांद-तारे जमीन पर लाने के वादे राजनीतिक दल करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका बौनापन सामने आ ही जाता है। लेख राजनीति का स्याह चेहरा दिखाने में कामयाब रहा है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

नापाक हरकतें

पूर्वी क्षेत्र के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनोज पांडे ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश क्षेत्र के सामने अपने अंदरूनी इलाकों में तैनाती और सैन्य अभ्यास बढ़ा दिया है, यह बहुत चिंताजनक है। हालांकि भारतीय सेना हर चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह से चाक-चौबंद है।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

नशे की दलदल में युवा पीढ़ी Other

Nov 01, 2021

जन संसद की राय है कि निस्संदेह देश के युवाओं को चपेट में लेता नशा आसन्न खतरे की चेतावनी है जो सिर्फ कानून से दूर की जाने वाली समस्या नहीं है। अभिभावकों व शिक्षकों को सतर्कता से जिम्मेदारी निभानी होगी और समाज में व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।

जागरूकता जरूरी

आज का युवा समाज, मित्र-संगत और चलचित्र अभिनेताओं के अभिनय को देखकर प्रभावित होकर नशा सीख रहा है। इसके अतिरिक्त बेरोजगारी, अवसाद, घरेलू कलह, गरीबी, असफलता, अशिक्षा, जागरूकता की कमी भी इसके कारण हैं। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए जागरूकता और शिक्षा सबसे बड़ा और सबसे उपयोगी शस्त्र सिद्ध हो सकता है। नशे की दलदल में फंसने वाले युवाओं को नशे के दुष्परिणामों का ज्ञान ही नहीं होता है। आरम्भ में वे नशे का सेवन मौज-मस्ती के लिए करते हैं लेकिन ड्रग्स का नशा तो ऐसा है जिसे यदि एक बार ले लिया जाए तो छोड़ना असंभव हो जाता है।

अशोक कुमार वर्मा, करनाल

गहराती दलदल

पिछले वर्ष एक मशहूर सिनेमा हस्ती की मौत ने नशे की अंधेरी दुनिया में हलचल मचा दी थी। परतें खुलती घटनाओं से यह साफ़ है कि आज की पीढ़ी नशे की अथाह दलदल में डूबी है। आधुनिकता और पश्चिमी रहन-सहन से प्रभावित कम उम्र के युवा आसानी से नशे के शिकार बनाये जा रहे हैं। इसके लिए सिनेमा जगत भी कम दोषी नहीं है। युवाओं को इस दलदल में धकेलने में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नशा कारोबारियों की रहस्यमयी दुनिया का बड़ा हाथ है। वक्त रहते दुनिया भर में फैले इस नेटवर्क को तोड़ना होगा वरना अगली पीढ़ी नशेड़ियों की धरोहर बन जायेगी।

एमके मिश्रा, रांची, झारखंड

रचनात्मकता बढ़ाएं

वास्तव में नयी पीढ़ी में लुप्त होते मूल्य एवं पश्चिमी अपसंस्कृति का अंधानुकरण ही इसका मूल कारण है। मौजूदा हालात में नशीले एवं मादक पदार्थों के उत्पादन, प्रयोग, जमाखोरी, बरामदगी, तस्करी, खरीद-फरोख्त पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। इसके साथ सख्त कानून जरूरी है। जब तक युवा नशे से दूर रहकर अपने ध्यान एवं सृजनात्मक शक्तियों से सकारात्मक एवं रचनात्मक कार्यों का निष्पादन नहीं करेगा तब तक न तो स्वस्थ जीवन मूल्यों की उन्नत खेती हो सकती है और न ही नशे की रोकथाम।

सतपाल मलिक, सींक, पानीपत

अभियान चले

फिल्मी हस्तियों में बढ़ता हुआ नशे का प्रचलन दुखदाई है। युवा उन्हें ही अपना गॉडफादर मानते हैं। आज ड्रग्स और शराब के प्रति एक नई सोच ने जन्म लिया है। पहले नशा दोष माना जाता था आज शानो-शौकत का प्रतीक माना जाता है। नशे में संलिप्त वर्ग की सार्वजनिक निंदा होनी चाहिए। सरकार भी कठोर कार्रवाई करे। नशा मुक्ति केंद्र बढ़ाए जाएं। स्वयंसेवी संगठन भी आगे आएं। स्कूल और कॉलेज में जन जागरण अभियान चलाए जाएं। स्कूल-कॉलेज में शिक्षकों को संदेश देना चाहिए कि भावी पीढ़ी नशा मुक्त बने।

श्रीमती केरा सिंह, नरवाना

अभिभावकों की जवाबदेही

पहले भी नशीले पदार्थों की बरामदगी और रेव पार्टियों से युवाओं को पकड़ा जा चुका है। नशे की ओर युवा पीढ़ी बढ़ रही है इसके कुछ कारण है। माता-पिता का अपने बच्चों पर नियंत्रण न होना, नशे का अंधाधुंध कारोबार या मानसिक बीमारी। अगर देश में नशा है तो युवा पीढ़ी नशा करने से परहेज नहीं करेगी। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है माता-पिता का अपने बच्चों पर नियंत्रण। प्रत्येक माता-पिता को पता होता है कि उसका बच्चा कहां जाता है और क्या करता है। माता-पिता जब अपने बच्चे को डांटेगा या प्यार से समझाएगा नहीं तब तक कुछ भी नहीं हो सकता।

सतपाल सिंह, करनाल

गंभीर प्रयास हों

युवा पीढ़ी राष्ट्र का भविष्य-नींव दोनों ही होती है। नशा केवल नशा करने वाले को ही नहीं बल्कि पूरे परिवार, समाज व देश को भी खोखला कर देता है। हर जुर्म की तह तक जाकर देखें तो कारण नशा ही होता है। यहां तक कि आतंकियों का भी यही सबसे बड़ा हथियार है। इसी नशे व पैसे का लालच देकर वो युवाओं को गुमराह करते हैं। युवा पीढ़ी शिक्षित होने के बावजूद नशे की गर्त में जा रही है। इसे रोकने के लिए सख्त कानून ही काफी नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग व हर देशवासी के गंभीर प्रयास व बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान व चेतावनी शिविर लगाने की आवश्यकता है।

मुकेश विग, सोलन, हि.प्र.

पुरस्कृत पत्र

छुटकारा संभव

मन को मजबूत रखकर नशे की लत से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, नशे की लत से निजात पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं को व्यस्त रखने की आवश्यकता होती है। नशा छोड़ने के लिए अपने पारिवारिक सदस्यों के बारे में विचार करें, उनके बारे में सोचें कि आप परिवार के लिए और परिवार आपके लिए कितनी अहमियत रखता है। साथ ही दोस्तों के साथ समय व्यतीत करें। फैमिली, खासकर छोटे बच्चों हों तो उनके साथ अधिकाधिक समय व्यतीत करनें का प्रयास करें। ऐसा करने से कोई भी नशे के दलदल से आसानी से बाहर निकलने में कामयाब हो सकता है।

सुनील कुमार महला, पटियाला, पंजाब