आपकी राय

ज़हरीली शराब त्रासदी की जवाबदेही Other

Nov 23, 2020

प्रशासन दोषी

हरियाणा में ज़हरीली शराब पीने से लगभग दो दर्जन लोगों की जान चली गई तो कुछ अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह है कि प्रशासन की अब जाकर नींद खुली है। इसके लिए सीधे तौर पर शासन-प्रशासन जिम्मेदार है जो पहले तो इस ज़हरीले कारोबार को बेझिझक अपनी नाक के नीचे चलने देता है और जब बात उन तक पहुंचती है तो अधिकारी साफ़ निकल जाते हैं। शासन प्रशासन को चाहिए कि इस तरह की अवैध शराब पर कड़ी कार्रवाई करे ताकि एेसा दृश्य दोबारा देखने को न मिले।

ज्योति कमोदा, कुरुक्षेत्र 


लापरवाही उजागर

ज़हरीली शराब के सेवन से हुई मौतों का कारण शासन-प्रशासन की नाक के नीचे फलते-फूलते धंधे भी उत्तरदायी हैं। मीडिया के माध्यम से नशीले पदार्थों के सेवन के दुष्परिणाम से युवाओं को अवगत कराया जाना समय की मांग है। सरकार द्वारा नशामुक्ति केंद्र स्थापित कर नशे के शिकार लोगों का नि:शुल्क उपचार-निदान की जरूरत है। सस्ते में और सहजता से प्राप्त होने के कारण शराब के आदी लोग इस जहर को पीकर काल के गाल में समा जाते हैं। शराब का अवैध कारोबार अधिकारियों की मिलीभगत के बिना नामुमकिन है। ऐसे फलते-फूलते धंधे सरकार और आबकारी विभाग की लापरवाही को उजागर करते हैं।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


कोताही न हो

प्रतीत होता है कि हरियाणा में शराब माफिया आबकारी कराधान विभाग द्वारा बनाए गए समस्त कायदे कानूनों को ताक पर रखते हुए गोरखधंधे को बढ़ाने में लगा हुआ है। सरकार को गुप्तचर विभाग द्वारा जानकारी लेकर जहरीली शराब बनाने और क्रय-विक्रय करने वालों के खिलाफ समय रहते जांच करनी चाहिए। यह सब मिलीभगत के चलते ही शराब माफिया अपने गोरखधंधे को अंजाम दे रहा है। सरकार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर शराब घोटालों व शराब माफिया पर लगाम लगाने में कोताही न बरते।

युगल किशोर शर्मा, फरीदाबाद


मिलीभगत की देन

केंद्र सरकार की सख्ती से पूरा देश चलता है, सरकार अगर चाहे तो नशे के सौदागर देश में पर भी नहीं मार सकते। एक समय घोषणा हुई थी कि हाइवे के पास कोई शराब ठेका नहीं होगा और देश के हर गांव, शहर में खुर्दा नहीं खुलेगा। अब हालात देश के सामने हैं कि जहरीली शराब की वजह से 40 से अधिक लोगों की मौत हो गई और एेसा पहली बार नहीं हुआ है। बिना मिलीभगत के अवैध शराब की बिक्री नहीं हो सकती। सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त ठेके से ही शराब खरीदने की अनुमति हो और अन्य पर प्रतिबंध लगाया जाए ताकि जहरीली शराब के कारण किसी की जान न जाए।

सतपाल सिंह, करनाल

जागरूकता जरूरी

जहरीली शराब पीने से मौत होने की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। हाल ही में हरियाणा में शराब के कारण 40 से भी अधिक लोगों की मौत के जिम्मेदार नशे के सौदागर तो हैं ही, उनके अलावा ऐसी घटनाओं के लिए शराब का सेवन करने वाले वे लोग भी जिम्मेदार हैं जो बिना कोई जांच किए केवल अपने नश्ो की इच्छापूर्ति के लिए शराब पीते हैं। ऐसी बेहद दुःखद घटनाओं को रोकने के लिए कानून की सख्ताई के साथ-साथ समाज में नशे के कारण होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता लाने की भी जरूरत है।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल


साझे प्रयास हों

जहरीली शराब के उत्पादन और बिक्री को रोकने में पुलिस और आबकारी विभाग की नाकामी शर्मनाक है। यह ठीक है कि शराब का कारोबार करने वाले तस्करों को पकड़ने के लिए सरकार व प्रशासन द्वारा छापामारी की जानी चाहिए, लेकिन आमजन को भी स्वयं जागरूक होने की जरूरत है। ज़हरीली शराब से मौतों के लिए सरकार, प्रशासन व नशा माफियाओं की बजाय लोग स्वयं अधिक जिम्मेदार हैं। सरकार व प्रशासन आमजन की भागीदारी सुनिश्चित किये बिना नशा माफियाओं पर अकेले ही नजर नहीं रख सकते हैं। साझे प्रयास से ही इस कारोबार पर नकेल कस सकता है।

धार्विक नमन, पटियाला, पंजाब


पुरस्कृत पत्र

शासन की जवाबदेही

देश के अलग-अलग राज्यों में जहरीली शराब के सेवन से मौतों का अंतहीन सिलसिला निरंतर जारी है। पुलिस और आबकारी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और मिलीभगत के बिना अवैध शराब का उत्पादन और बिक्री सम्भव नहीं। अनेक मामलों में उच्च स्तर पर सरकारी संरक्षण उजागर हुआ है। कानून की अनुपालना में विफलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव जहरीली शराब के काले धंधे का पोषक तत्व है। आबकारी कर से धन अर्जित करने वाली सरकार का दायित्व है कि उपभोक्ता को गुणवत्तापूर्ण शराब उपलब्ध कराये।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

आपकी राय Other

Nov 21, 2020

सस्ती राजनीति

दिल्ली में कोरोना के आंकड़े फिर बढ़ते जा रहे हैं। यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली की सरकार छठ मैया का पर्व घर पर ही मनाने का आह्वान कर रही हैं| इस पर भी विरोधी दलों द्वारा गंदी सियासत की जा रही है। दिल्ली सरकार के फैसले पर उंगली उठाई जा रही है। जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ -साफ शब्दों में कहा है कि ‘जिंदा है, तो अगली बार पर्व मना लेंगे...’ । भले ही कोरोना से लोग मरें, उचित इलाज मिले या न मिले, लेकिन उनका वोट बैंक नहीं बिगड़ना चाहिए।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.

विसंगतियों की शिक्षा

19 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में अविजीत पाठक का ‘अंधी दौड़ में दम तोड़ती प्रतिभाएं’ लेख अंतर्व्यथा प्रकट करने वाला रहा। आर्थिक मंदी के चलते मध्य वर्गीय परिवार के लिए मोबाइल-कंप्यूटर खरीद पाना बस की बात नहीं है। शिक्षा नीति योजना के संभावित परिणामों पर विचार किये बिना ही लागू कर दी गयी। घर बैठे ऑनलाइन शिक्षा ने लाभ की अपेक्षा अधिकतर विद्यार्थियों को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक रूप से कमजोर अवश्य कर दिया है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सतर्क रहें

चंडीगढ़ में कोरोना संक्रमण अपनी रफ्तार पकड़ रहा है। यदि इस महामारी के प्रति लापरवाही बरतते हैं तो तीसरी लहर का खतरा काफी हद तक बढ़ सकता है। आम जनता का भी यह फर्ज बनता है कि सरकार द्वारा दिये गये दिशा-निर्देश का सख्ती से पालन करे। वरन‍ा इसके परिणाम खतरनाक साबित हो सकते हैं।

संदीप कुमार वत्स, चंडीगढ़

लापरवाही की हद

दिल्ली में कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं। अब ऐसा क्या हुआ कि हालात नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं। यह दिल्ली सरकार की लापरवाही है, जिस कारण न्यायालय को भी फटकार लगानी पड़ी। लोगों को किसी भी बीमारी से लड़ने के लिए जागरूक करना सरकार का कर्तव्य है।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, मंडी

आपकी राय Other

Nov 20, 2020

मुश्किल दौर

देश में कोरोना वायरस महामारी की वजह से आम लोगों की जिंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ ही अब खाने-पीने के सामानों की कीमतें भी दिनोंदिन तेजी से बढ़ती जा रही हैं। सरकार गरीबों को मुफ्त में चावल तो दे रही है लेकिन बढ़ती आलू, प्याज और सब्जी की कीमतों के कारण आम आदमी को घर का चूल्हा चलाने में दिक्कतें आ रही हैं। कोरोना वायरस महामारी के चलते लॉकडाउन के बाद लोगों के रोजगार चले गये हैं तो कई लोग शहरों से अपने-अपने गांव में आकर छोटा-मोटा काम तो करते हैं लेकिन जिंदगी का गुजारा नहीं हो पा रहा है। आज मध्य और गरीब वर्ग सबसे ज्यादा मुश्किल दौर से गुजर रहा है।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

सस्ती राजनीति

दिल्ली में कोरोना के आंकड़े फिर से बढ़ते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली की सरकार छठ मैया का पर्व घर पर ही मनाने का आह्वान कर रही है | इस पर भी विरोधी दलों द्वारा गंदी सियासत की जा रही है। दिल्ली सरकार के फैसले पर उंगली उठाई जा रही है। जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि ‘जिंदा हैं तो अगली बार पर्व मना लेंगे...।’ भले ही कोरोना से लोग मरें, उचित इलाज मिले या न मिले, लेकिन विरोधी दलो का वोट बैंक नहीं बिगड़ना चाहिए।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, म.प्र.

पुनर्विचार करें

19 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में छपी एक खबर ‘स्कूलों में संक्रमण से हड़कंप’ चेतावनी देने वाली थी। स्कूलों तथा अन्य शिक्षा संस्थाओं को खोलने बारे हरियाणा सरकार का फैसला बढ़ते कोरोना महामारी के मामलों के मद्देनजर ठीक नहीं है। प्रदेश में खोले गए स्कूलों में जहां भी कोरोना टेस्ट हुए हैं, उन सभी जगह पर पॉजिटिव मामले सामने आए हैं, जो कि खतरे की घंटी है। सरकार से यह अनुरोध है कि शिक्षा संस्थाओं को खोलने के निर्णय पर पुनर्विचार करे।

शामलाल कौशल, रोहतक

खामोशी की जीत Other

Nov 19, 2020

16 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में क्षमा शर्मा का लेख ‘खामोशी से बदली महिलाओं ने तस्वीर’ बिहार में हुए चुनाव परिणामों का खुलासा करने वाला रहा। बिहार में मतदान प्रक्रिया में महिला वोटरों ने सशक्तीकरण की मिसाल कायम कर दी। चौथी बार नीतीश कुमार का पुनः मुख्यमंत्री पद संभालना बड़े गर्व की बात है। नीतीश विगत कार्यकाल में राज्य की महिलाओं की आशाओं पर खरे उतरे हैं। महिला वर्ग की मौन भागीदारी उनकी जीत का इजहार कर रही थी।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सामंजस्य से प्रगति

लोकतांत्रिक देश में शिक्षा, रोजगार, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व के क्षेत्र में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं। लैंगिक असमानता महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती है। महिलाओं के साथ सम्मान के साथ सही व्यवहार किया जाना चाहिए। पुरुष वर्ग को इसके लिए अपनी संकीर्ण सोच से बाहर निकलने की जरूरत है। वास्तव में स्त्री और पुरुष दोनों समाज के सिक्के के दो पहलू हैं। इनके आपसी सामंजस्य से ही समाज प्रगति करता है।

नेहा जमाल, मोहाली, पंजाब

अनुचित आरोप

वायु प्रदूषण को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को कोसा। वह अमेरिका में प्रदूषण न होना बता कर हर बार जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत, चीन और रूस पर आरोप लगाते आये हैं। वायु प्रदूषण के अलावा अमेरिका में ध्वनि प्रदूषण भी ज्यादा है। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए सभी देशों की समान जिम्मेदारी है। यह किसी एक देश के लिए चुनौती नहीं है। अमेरिका पहले स्वयं वायु एवं ध्वनि प्रदूषण को कम करे, फिर दूसरे देशों पर आरोप लगाए।

संजय वर्मा ‘दृष्टि’, मनावर, धार

महिला जागरूकता Other

Nov 18, 2020

हाल ही में बिहार चुनाव में महिलाओं ने सजगता का परिचय देते हुए पूरे विधानसभा चुनावों का परिदृश्य बदल डाला। आज बिहार ही नहीं, पूरे भारत की महिलाएं जागरूक हो रही हैं। बिहार चुनावों में साइलेंट वोटर बनकर महिलाओं ने देश-दुनिया को यह दिखा दिया कि लोकतंत्र में उनकी कितनी अहम व महत्वपूर्ण भूमिका है। कोरोना काल में मोदी सरकार की गरीबों, पिछड़ों, दलितों के साथ ही आमजन के लिए विभिन्न नीतियों के साथ ही नीतीश सरकार की नीतियों के मद्देनजर भी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर मतदान में हिस्सा लिया।

सुनील कुमार महला, पटियाला

थाइलैंड में अशांति

आमतौर पर शांतिप्रिय देश थाईलैंड पिछले कुछ समय से कठिन दौर से गुजर रहा है। विरोध करती जनता सड़कों पर है। प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट सत्ता से चिपकी और यथार्थ से दूर बैठी है। विरोध प्रदर्शनों पर राजा की चुप्पी जनता को अखर रही है। विरोध की सबसे बड़ी वजह देश के प्रधानमंत्री और पूर्व थलसेना अध्यक्ष के प्रशासन से लोगों की नाराजगी है। प्रयुथ पिछले छह सालों से सत्ता पर काबिज हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि संविधान में संशोधन कर इसे लोकतांत्रिक बनाया जाए।

चौ. भूपेंद्र सिंह रंगा, पानीपत

अंकुश लगे

इन दिनों देश में बढ़ती आपराधिक गतिविधियां चिंता का विषय हैं। नियंत्रण के अभाव में न केवल अपराधी बढ़ रहे हैं वरन देश की युवा शक्ति भी पथभ्रष्ट हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक सन‍् 2019 में प्रतिदिन हत्या की औसतन 79 घटनाएं हुई हैं। सन‍् 2018 के मुकाबले हालांकि इसमें 0.3 फीसदी की कमी अवश्य आई है मगर फिर भी चिंता बरकरार है। सरकार द्वारा कानूनी सख्ती के साथ ही कठोर दंड प्रक्रिया का निर्धारण जरूरी है तभी अपराधों पर नियंत्रण हो सकेगा।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, मध्य प्रदेश

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

तार्किक विश्लेषण Other

Nov 17, 2020

13 नवंबर को प्रकाशित राजकुमार सिंह के ‘बिहार में हार-जीत...’ लेख ने बताया कि विदेशी तर्ज पर किये गये सर्वे सच साबित नहीं हुए। एक बड़ा दल महाराष्ट्र की तरह विपक्ष में बैठने वाला है। अब, भाजपा नीतीश के लिए दिल खोलकर बैठ गयी है। यह कमिटमेंट है और नीतीश के दोनों हाथों में लड्डू और घी-शक्कर है। आश्चर्यजनक यह है कि एनडीए ने बाज़ी ही पलट दी। बेहद कमज़ोर स्थिति में भी कांग्रेस का एग्रेसिव बने रहना जनता को रास नहीं आया। देशहित के सही कामों को सही कहने का बड़ा मन भी होना ज़रूरी है। अब चुनाव किसी प्रांत भर के नहीं रह गये हैं। इनमें पूरे देश की धमक को सुना जा सकता है। अब रही बात चिराग़ पासवान की तो राजनीति के पहले पाठ में ही वह सार्थक राजनीति के पन्नों पर स्वयं स्याही पोतते नज़र आये।

मीरा गौतम, जीरकपुर

बेअसर राहत

देश की अर्थव्यवस्था दिनोंदिन गिरती जा रही है। सरकार ने लाखों-करोड़ों रुपये के राहत पैकेज की तो घोषणा की थी लेकिन अभी तक किन लोगों को आर्थिक पैकेज की सुविधा प्राप्त हुई है, वह अभी तक कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। मीडिया वाले भी अब चुप हैं।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

पराली संकट के व्यावहारिक विकल्प Other

Nov 16, 2020

कारगर हो समाधान

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण में पराली जलाने का अहम योगदान है। कोरोना संकट काल में किसानों और केंद्र-राज्य सरकारों द्वारा इस पर काबू पाने की सख्त जरूरत थी। लेकिन सभी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते नजर आ रहे हैं। ऐसे में कोरोना महामारी की रफ़्तार भी बढ़ना तय है। पराली जलाने से धुंध की समस्या भी विकराल रूप धारण कर सामान्य जन-जीवन को प्रभावित कर देती है। सरकारों द्वारा एक दीर्घकालिक योजना के तहत धान के भूसे को व्यावसायिक रूप से निपटाने की किफायती प्रक्रियाएं विकसित करने से ही कारगर समाधान हो सकेगा।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद

साझी जिम्मेदारी

अक्तूबर के अंत और नवम्बर के प्रारंभ में प्रदूषण की स्थिति भयानक होती है। सरकारें समय रहते इस समस्या का समाधान क्यों नहीं करतीं। गेहूं की बिजाई के कारण इस समय किसान के पास समय बहुत कम होता है। इसलिए पराली जलाना किसान की मजबूरी है। लेकिन यदि सरकार पराली न जलाने का कोई विकल्प तैयार करे तो निस्संदेह किसान उसका फायदा जरूर उठाएंगे। सरकार को पराली से संबंधित कोई उद्योग स्थापित करना चाहिए। वैसे किसान का भी नैतिक कर्तव्य बनता है कि वह धान के अवशेष व पराली में आग न लगाए बल्कि इसका खाद के रूप में प्रयोग करे।

सोहन लाल गौड़, कैथल

गंभीरता से सोचें

यह बात साबित हो गई है कि पराली जलाने की प्रदूषण में चालीस प्रतिशत भूमिका होती है तो ऐसे में पराली का जलाया जाना बिल्कुल बंद होना चाहिए। किसान पराली जलाने के साथ दूसरों के जीवन से खिलवाड़ कैसे कर सकते हैं? उन्हें इसके विकल्प के बारे में गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए। सरकारें भी राजनीति करना छोड़ें और किसानों की सहायता के लिए आगे आएं। ऐसी योजना बनाएं, जिससे पराली का निष्पादन कम खर्च पर खेत पर ही हो जाए। इससे खेत की उत्पादकता भी बढ़ेगी तथा पराली से होने वाले प्रदूषण से भी मुक्ति मिल सकेगी।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, गुरुग्राम

बहुआयामी विकल्प

एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार, समाज के साथ किसान काे भी संकल्पित होना ही चाहिए। सरकार धान को नहरी इलाकों तक, श्रमसाध्य, समयबद्धता में दृढ़ता से सीमित कर व भूजल स्तर को नीचे जाने से रोक सकती है। धान उत्पादक क्षेत्रों में खुंभी बैड, गत्ते, कागज आदि बनाने को बढ़ावा दिया जाये। किसानों को पराली को खाद तैयार करने की दवाइयां, छोटे टुकड़े बनाने वाली मशीनें व सीधी बिजाई की मशीनें सस्ते में दी जाएं। पराली ढेर को गलाने तक पड़ा रखा जाये या बिजली बनाने में प्रयोग किया जाये।

आचार्य रामतीर्थ, रेवाड़ी

प्रशिक्षित करें

वायु प्रदूषण में 40 फ़ीसदी योगदान पराली जलाने का है। कोरोना काल में स्थिति और भी भयभीत करने वाली है। सरकार नियम तो बना देती है, मगर इन नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं करती। वहीं पराली से निजात पाने के वैकल्पिक तरीकों की भी जानकारी किसानों को देनी चाहिए। सरकार द्वारा किसानों को सही प्रशिक्षण, सहायता और कारगर रसायन से पराली को खाद में परिवर्तित करने का सही विकल्प देना होगा। पराली को काटकर पशु चारे के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। सरकार को इन विकल्पों के बारे में किसान को जागरूक करना होगा।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

लाभकारी खेती का विकल्प

पराली राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। पराली को खाद में परिवर्तन होने में समय लगता है, इसीलिये उनको मजबूरन पराली को जलाना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर यातायात, फैक्टरियों से निकला धुआं और अन्य हानिकारक गैसें वायु प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। किसान गेहूं, धान को नहीं छोड़ सकता चूंकि इतनी बचत किसी अन्य फसल में नहीं है। जब तक सरकार सब फसलों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य को प्रभावी और लाभकारी नहीं बनाती तब तक किसान के लिए धान छोड़ने का फैसला बहुत ही मुश्किल है। किसानों को बलि का बकरा बनाने की बजाय सरकार को इसका कोई स्थाई समाधान निकालना चाहिए।

संदीप कुमार, चंडीगढ़

जीवन रक्षा हेतु पहल

पराली निपटान के सुरक्षित विकल्प मुख्यतः दो हैं; एक रासायनिक प्रक्रिया से खेत में ही खाद बनाना और दूसरा है पराली को खेत से निकाल कर उसका अन्यत्र प्रयोग करना। चूंकि खेत में खाद बनाने में ज्यादा समय लगेगा, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में दूसरा विकल्प बेहतर है। इससे खेत जल्दी खाली होगा और पराली का उपयोग कागज़, स्ट्रॉ बोर्ड जैसे उत्पादों को बनाने या फिर ताप बिजली संयंत्रों में किया जा सकेगा। हालांकि दूसरे विकल्प में खर्च ज्यादा दिखता है लेकिन पर्यावरण नियंत्रण पर होने वाले खर्च और मानव जीवन को होने वाले नुकसान के मुक़ाबले यह बहुत कम है।

बृजेश माथुर, गाज़ियाबाद

आपकी राय Other

Nov 14, 2020

जनादेश के निहितार्थ

13 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का ‘बिहार में हार-जीत के निहितार्थ’ लेख इस चुनाव की असली तस्वीर दिखाने वाला था। इस बार बड़े-बड़े दिग्गज और चुनाव परिणामों के भविष्यवक्ता मुंह की खाते नज़र आए। सारी चुनाव पूर्व घोषणाएं धरी की धरी रह गईं। चुनावों के परिणामों की विसंगति देखिए, सबसे बड़ा दल विपक्ष में बैठेगा। तीसरे नंबर का दल राज करेगा। सबसे विचित्र यह, सारे चुनाव का सूत्रधार दल सरकार चलवाने में सहयोगी की भूमिका निभाएगा। वाकई बिहार के चुनाव और उसके परिणामों ने सबको चौंकाया है। हकीकत की तस्वीर उभारने के लिए लेखक को साधुवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार, उत्तराखंड

विज्ञान की अनदेखी

देश में ‘विश्व विज्ञान दिवस’ मनाने का समाचार नदारद होना ‘आत्मनिर्भर भारत-निर्माण’ की पोल खोलने के लिए काफी है। विश्व विज्ञान दिवस की अनदेखी इक्कीसवीं सदी के आत्मनिर्भर भारत पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। देश के वैज्ञानिक शोध एवं अनुसंधान पर खर्च सबसे कम होना यह बताने के लिए काफी है कि हम विश्व विज्ञान दिवस क्यों भूल गए? आज यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस आदि देश आत्मनिर्भरता के मामले में हमसे बहुत आगे हैं।

राजकुमार, राजौंद

छंटेगा अंधेरा

8 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में क्षमा शर्मा का लेख ‘जलाओ दीये कि छंटेगा अंधेरा’ पढ़कर कोरोना महामारी का असर दिवाली की खुशियों पर होता प्रतीत हुआ। आमजन के हिस्से की खुशियां महंगाई छीन ले गयी। मिठाई की खुश्ाबू जेब तक सिमट कर रह गयी। आपसी भेदभाव, ईर्ष्या-द्वेष, अमीरी-गरीबी भुलाकर प्रेम सौहार्द के दीये जलाने से नयी उमंग के साथ दीपावली कोरोना पर हावी रह सकती है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

आपकी राय Other

Nov 13, 2020

जनता नकारे

11 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में विश्वनाथ सचदेव का ‘सांस्कृतिक चेतना कुंद होने से उपजी हिंसा’ लेख राजनेताओं द्वारा मतदाताओं को आकर्षित करने तथा अपने विरोधियों को पटकनी देने के लिए हिंसक भाषा प्रयोग करने पर व्यथा प्रकट करने वाला था। राजनेताओं द्वारा प्रयोग की गई भाषा वैचारिक हिंसा को जन्म देती है यह बात हम पश्चिमी बंगाल तथा केरल में देख चुके हैं। ऐसी स्थिति में मतदाताओं की जिम्मेदारी बनती कि संकीर्ण मानसिकता वाले नेताओं को चुनाव के समय नकार देना चाहिए। चुनाव आयोग को भी ऐसी भाषा बोलने वाले राजनेताओं पर चुनाव लड़ने को लेकर पाबंदी लगा देनी चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

विकल्प भी तलाशें

विडम्बना ही है कि इस पावन अवसर पर पटाखे जलाने पर रोक लगा दी गई। यह भी हकीकत है कि पटाखों से वायु प्रदूषण में काफी इजाफा हो जाता है जो स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक है। लेकिन यदि सरकार पर्यावरण के प्रति इतनी चिंतित है तो फिर फैक्टरियों, वाहनों, एसी आदि पर भी रोक लगानी चाहिए क्योंकि इनमें से भी अन्य हानिकारक गैसों का रिसाव होता है। समय रहते हुये वायु प्रदूषण को दूर करने के उपाय ढूंढ़ने चाहिए। वायु प्रदूषण को दूर करने के लिए समय-समय पर हमें पौधरोपण करना चाहिए।

संदीप कुमार, चंडीगढ़

बाल कल्याण का यथार्थ

भारत में जहां एक तरफ बाल कल्याण का राग अलापा जाता है, तो वहीं दूसरी ओर छोटे बच्चे गरीबी के कारण मजदूरी करने को विवश हैं। आज भारत की बच्चों के कुपोषण के मामले में स्थिति भी ठीक नहीं है। बाल दिवस मनाने का औचित्य तभी सार्थक होगा जब गरीब बच्चा भी अपनी पढ़ाई की उम्र में किसी काम पर या थैला उठाकर कूड़े के ढेर के पास नहीं जाएगा, बल्कि किताबों से भरा बैग लेकर स्कूल जाने लगेगा।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

जीत के मायने Other

Nov 12, 2020

बिहार चुनाव में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है। यह प्रधानमंत्री का प्रभाव है कि भाजपा ने जद (यू) से ज्यादा सीटें जीती हैं। उन्होंने पुन: अपनी लोकप्रियता सिद्ध की है। दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने अपने बलबूते पर इतनी अधिक सीटें जीतीं। वहीं सारे चुनाव प्रचार के दौरान चिराग पासवान नकारात्मक बोलते रहे। उसकी पार्टी ने केवल एक सीट जीती। अब नीतीश कुमार चौथी बार भाजपा की मदद से अपनी सरकार बनाने जा रहे हैं।

नरेंद्र कुमार शर्मा, जोगिंदर नगर


उजाले की कामना

उत्सव मनाने और उससे मिलने वाली खुशी को बांटने के पीछे एक अलग ही मनोविज्ञान काम करता है। भारतीयों के इस उत्सवी पर्व पर मनोवैज्ञानिक अध्ययनों का निष्कर्ष है कि भारतीय लोग बहुत संवेदनशील और संजीदा होते हैं। वे हर पल को नये पल की तरह जीना चाहते हैं। दीपावली का त्योहार कई खूबियों से भरा त्योहार है, मानव सदैव से उजाले की कामना करता रहा है।

प्रदीप कुमार दुबे, राजाराम नगर, देवास


पुनर्विचार हो

कृषि अध्यादेश पर देशभर में बवाल मचा हुआ है। किसान व मजदूर आशंकित हैं। वे धरने-प्रदर्शनों के जरिये निरंतर सरकारों को चेताने का प्रयास कर रहे हैं। हरसिमरन कौर बादल का इस्तीफा केंद्रीय मंत्रिमंडल को चेताने की ओर मील का पत्थर है। समय रहते केंद्र सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

महावीर सिंह ढुल, कैथल


हार की हताशा

बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों के बीच कांटे का मुकाबला था, मगर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला राजग गठबंधन बाजी मार गया। प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो ईवीएम पर ही सवाल उठा दिये। लगता है यह सिलसिला शायद आगे भी ऐसे ही जारी रहेगा।

वेद मामूरपुर, नरेला

सरकार सुध ले Other

Nov 11, 2020

कोरोना ने आजीविका के साधनों को बहुत नुकसान पहुंचाया है। प्रधानमंत्री ने प्रत्येक क्षेत्र को करोड़ों के आर्थिक पैकेज देकर कुछ सहारा दिया परन्तु टूर-ट्रैवलिंग का कारोबार तो जनवरी, 2020 से ही बन्द पड़ा है। इस क्षेत्र में लगे व्यवसायियों, निजी, प्राइवेट व पब्लिक कम्पनियों को कोई सहायता नहीं दी गई। अब इनसे जुड़े परिवारों के सामने भी रोजी-रोटी की गम्भीर समस्या चल रही है। सरकार को इनकी आर्थिक सहायता करनी चाहिए।

एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र

सेहत पर भारी

चौक-चौराहों पर खाने-पीने की दुकानों में अक्सर चीजें अखबार के कागज पर परोसी जाती हैं। अखबार की स्याही शरीर में जाने से कई गंभीर रोग जन्म ले सकते हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने भी कहा था कि दुकानदारों को खाद्य सामग्री अखबारी कागजों में नहीं परोसनी चाहिए। इसकी रोकथाम के लिए सख्त नियम बनाये जायेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग भलीभांति इसका अनुसरण करेंगे।

भूपेंद्र सिंह रंगा, पानीपत, हरियाणा

बेहतर रिश्ते

बाइडेन के नये अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद भारत को कूटनीतिक नीतियों पर अपनी सार्वभौमिक संप्रभुता पर दृढ़ विचार बनाए रखने चाहिए ताकि बाइडेन पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण मित्रवत‍् एवं अति विश्वसनीय सहयोगी देश के रूप में भारत को मान्यता दें। उपराष्ट्रपति के रूप में भारतीय मूल की कमला हैरिस का आना हमारे लिए बहुत सुखद है।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद

स्याह सच

सुशांत सिंह राजपूत केस में मुंबई पुलिस ‘आत्महत्या’ तक ही सीमित रही, मगर सीबीआई की त्वरित और निष्पक्ष जांच में नयी बातें ही सामने नहीं आ रही हैं बल्कि फिल्मी दुनिया में ड्रग्स के सेवन का भी पर्दाफाश हो रहा है। सुशांत प्रकरण ने फिल्मी दुनिया के काले सच को एक बार फिर से पर्दे पर ला दिया है। उम्मीद है कि इस घटना से फिल्मी दुनिया के शुद्धीकरण का मार्ग प्रशस्त होगा।

अक्षित तिलक राज गुप्ता, रादौर

आपकी राय Other

Nov 10, 2020

संवेदनशील बने किसान

4 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून के सम्पादकीय पृष्ठ पर ‘पर्यावरण के साथ किसान का भी नुकसान’ लेख में राजेन्द्र चौधरी ने बारीकी से विश्लेषण किया है। स्वयं के लाभ के साथ किसान काे पर्यावरण व समाज के प्रति संवेदनशील बनना होगा। सरकार भी पूरा सहयोग दे, तभी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

आचार्य रामतीर्थ, रेवाड़ी

बाइडेन की जीत

9 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘अमेरिका में बाइडेन’ अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति बनने पर अपने विचार प्रकट करने वाला था। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतवासियों को अमेरिका में बसने तथा जाने में पहले से ज्यादा सहूलियत मिलेगी। चुनाव जीतने से पहले ही बाइडेन ने कहा था कि भारत और अमेरिका प्राकृतिक साझेदार हैं। भारत-अमेरिका संबंधों में सुधार की और प्रबल संभावना है।

शामलाल कौशल, रोहतक

हर भारतीय को मुफ्त वैक्सीन Other

Nov 09, 2020

संवैधानिक जिम्मेदारी

एक समय था जब देश के राजनेता अपने आप को जनता का सेवक समझते थे, परन्तु आज भ्रष्टाचार, स्वार्थवाद, मुफ्त सुविधा ने राजनेताओं को सत्तालोलुप बना दिया है। ये चुनावों में बहुमत प्राप्त करने के लिए जनता से झूठे वादे, लालच तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रलोभन देते हैं ताकि सरकार बन जाए। बिहार के चुनावों में कोरोना की मुफ्त वैक्सीन बांटने का वादा करना भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। कोरोना एक विश्वव्यापी महामारी है। अत: प्रत्येक भारतीय को इसकी वैक्सीन मुफ्त में बांटने की संवैधानिक जिम्मेदारी सरकार की ही बनती है।

एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र


अनुचित वादा

एक ओर पूरी दुनिया वैक्सीन के अभाव में भय के साय में जिंदगी काट रही है। दूसरी ओर बिहार चुनाव में जीत के लिए इसकी मार्केटिंग करना राजनीति का ओछापन झलकता है। जिंदा रहने के लिए वैक्सीन तो चाहिए ही, इसलिए वैक्सीन मुफ्त लेने के लिए वोट लाचारी में दिया जा सकता है। ऐसी राजनीतिक भाषा से समाज सुधारक, बुद्धिजीवी सभी प्रभावित होंगे। चुनाव आयोग, नीति आयोग और सलाहकारों को सचेत होना पड़ेगा। महामारी के इस काल में पूरे देश ने थाली-ताली बजाई, दीप जलाये ताे अब क्या वोट भी देना पड़ेगा? अन्यथा वैक्सीन नहीं मिलेगी?

एस.सी. राम राजभर, चंडीगढ़


भ्रमित न करें

भाजपा यह कहते नहीं थकती कि वह स्वच्छ राजनीति और स्वच्छ शासन देती है। बिहार में चुनाव पूर्व भाजपा का यह कहना कि कोरोना वैक्सीन आने पर बिहार के लोगोें को मुफ्त दी जायेगी, क्या यह राजनीति नहीं है? क्या केन्द्र सरकार का दायित्व पूरे भारत में वैक्सीन को उपलब्ध कराना नहीं है? सिर्फ बिहार ही क्यों? लोग सब समझते हैं। यह चुनाव जीतने के हथकंडे हैं। पूरे देश में लोग कोरोना संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में वैक्सीन आने पर एक कार्यक्रम के तहत पूरे देश में वैक्सीन की उपलब्घता मुफ्त हो। केन्द्र सरकार आम लोगों को भ्रमित न करे तो बेहतर है।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, गुरुग्राम


न्यायसंगत वितरण

बिहार में कोरोना महामारी के इलाज के लिए मुफ्त में वैक्सीन उपलब्ध कराई जाएगी, यह राजनीति से प्रेरित बयान है। केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह वैक्सीन उपलब्ध होने के तुरंत बाद महामारी से बचाने के लिए यथासंभव सभी लोगों को मुफ्त में उपलब्ध करवाए। इसके साथ ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकेगा। वैसे वैक्सीन की कीमत तो धनी वर्ग आसानी से दे सकता है लेकिन जो लोग कोरोना के चलते एवं मंदी के कारण बेरोजगार हो गये हैं, उन्हें मुफ्त में वैक्सीन उपलब्ध कराना और भी जरूरी हो जाता है।

शामलाल कौशल, रोहतक


सबको मिले

आज विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है। वहीं देश की जनता केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गए नियमों का पालन कर रही है। ऐसी स्थिति में नेताओं की ओर से बिहार चुनाव में मुफ्त कोरोना वैक्सीन की घोषणा होना सिर्फ इस बात की ओर संकेत करता है कि नेताओं को सिर्फ वोट की जरूरत है, उन्हें देश और देश के लोगों की परवाह नहीं है। क्या वैक्सीन ही बची थी जो राजनीति शुरू हो गई? नेताओं की घोषणा का मतलब सिर्फ बिहार के लोगों को ही बचाना है, बाकी राज्य के लोगों में प्राण नहीं हैं क्या? कोरोना पर राजनीति करना बिल्कुल गलत है। कोरोना वैक्सीन जब भी आयेगी, सभी के लिए मुफ्त होगी, न कि अकेले बिहार के लिए।

सतपाल सिंह, करनाल


सबका हो विश्वास

‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ सरकार का मंत्र होना चाहिए। सरकार अपने नागरिकों को सबल बनाने के लिए गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा को मिटाने के लिए हरसंभव प्रयास करे। बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को मुफ्त में वैक्सीन उपलब्ध करवाना सरकार की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। चुनाव के मद्देनजर महज वोट प्राप्त करने के लिए मुफ्त कोरोना वैक्सीन की घोषणा को अनुचित ही कहा जा सकता है। एक अच्छी सरकार क्या होती है, इस बात का पता इससे चलता है कि सरकार ने नागरिकों व देश को सुदृढ़ बनाने के लिए अपने शासनकाल में कितना व कैसा काम किया है।

सुनील कुमार महला, पटियाला, पंजाब


पुरस्कृत पत्र

सस्ती लोकप्रियता का हथकंडा

भाजपा ने बिहार चुनाव में लोगों का जनसमर्थन प्राप्त करने के लिए कोरोना की दवा मुफ्त उपलब्ध करवाने का वादा किया है। यह सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का एक नारा ही है। कोरोना की वैक्सीन अभी बनी नहीं है तो उसे नकद या उधार देने की बात ही बेमानी है। यह घोषणा बेरोजगारी और कोरोना संकट से जूझते लोगों के लिए सुखदायक नहीं कही जा सकती। इससे पहले भी टीबी, हैजा और पोलियो आदि का टीकाकरण मुफ्त ही होता रहा है। ऐसी महामारियों के इलाज पर खर्च की गई सरकारी धनराशि को वोट प्राप्त करने का माध्यम नहीं बनाया गया। राजनीतिक पार्टियों को ऐसी बेतुकी घोषणाओं से परहेज करना चाहिए।

जगदीश श्योराण, हिसार

निर्णय व्यावहारिक नहीं Other

Nov 07, 2020

6 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में छपी एक खबर के अनुसार ‘75 प्रतिशत प्राइवेट नौकरियां हरियाणा वासियों को’ पढ़कर बहुत हैरानी हुई। सरकार द्वारा लिए गये एक निर्णय के अनुसार जिन कंपनियों में 19 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं, उनमें 75 प्रतिशत हरियाणवी लोगों को लगाना सरकार द्वारा निजी क्षेत्र में हस्तक्षेप है, जो कि उचित नहीं। सरकारी क्षेत्र में बहुत सारे पद खाली पड़े हैं, अच्छा तो यही होगा कि सरकार पहले अपने घर को संभाले और नियतिम भर्तियों करे। निजी क्षेत्र में लोगों ने अपना पैसा लगा रखा होता है। वे कार्यकुशलता और अनुभव के आधार पर किसी भी प्रदेश के व्यक्ति को अपने यहां नौकरी पर रख सकते हैं। सरकार निजी क्षेत्र के उद्योगों या कंपनियों को किसी प्रकार से बाध्य नहीं कर सकती।

शामलाल कौशल, रोहतक

रिश्तों पर घात

टेक्नोलॉजी की दुनिया में इंटरनेट ने मानव के हर प्रकार के कार्यों को सुलभ बनाने में मदद की है। वहीं युवा पीढ़ी ने मोबाइल के अंधाधुंध प्रयोग और फेसबुक के अनावश्यक प्रयोग से अपनी सोच को संकीर्ण बना दिया है। रिश्ते-नाते मानो गौण हो गये हैं। जीवन का लक्ष्य केवल मोबाइल तक सीमित रह गया है। उसे इस आभासी दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान से रूबरू होना होगा। अन्यथा टेक्नोलॉजी लाभ की जगह हमें आसपास के वातावरण और अपनों से दूर करती चली जायेगी।

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी

कानून का मामला

हाल ही में एक चैनल के एंकर और संपादक अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर निरर्थक हो-हल्ला मचाया जा रहा है, जो ठीक नहीं है। इसकी तुलना इमरजेंसी से की जा रही है। न्याय का काम न्यायालय का है। अर्णब गोस्वामी को भी एक आम आदमी की तरह कानून का सम्मान करना चाहिए। अपने आप को बेकसूर साबित करना चाहिए।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

मिलावट और त्योहार Other

Nov 06, 2020

त्योहारों के मौसम में खाद्य पदार्थों में मिलावट का कारोबार, खासतौर पर मिठाइयों में, ज्यादा जोर पकड़ता है। इसके लिए आम लोगों को जागरूक होना चाहिए। खाद्य पदार्थों में मिलावट के मुख्य कारण एक तो आमजन सरकार द्वारा बनाए गए उपभोक्ता संरक्षण के कानून के प्रति जागरूक नहीं है। दूसरा सरकार और प्रशासन मिलावट रोकने के लिए गंभीरता नहीं दिखाता और तीसरा सरकारी तंत्र में फैला भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार के कारण ही खाद्य पदार्थों की जांच समय-समय पर नहीं होती।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


महंगाई की चुभन

देश में बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से लोगों के हालात दयनीय होते जा रहे हैं। दाल, चावल, आटा से लेकर सब्जी तक बाजार में सभी चीजों की महंगाई से आम जनता त्रस्त है। देश में कई ऐसे भी व्यापारी हैं जो लॉकडाउन का फायदा उठाकर आम जनता से दुगने पैसे ले रहे हैं। केंद्र सरकार देश में बढ़ती महंगाई पर रोक लगाने के लिए उचित कदम उठाए।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम


अनुचित कदम

अर्णब गोस्वामी को महाराष्ट्र पुलिस ने किसी पुराने मामले में गिरफ्तार किया है। समाचार के अनुसार पुलिस ने अर्णब, उनकी पत्नी, बेटे और सास-ससुर के साथ जिस प्रकार हाथापाई की, उन तरीकों पर सवालिया निशान उठना लाजिमी है। निश्चय ही राज्य सरकार के इशारे के बाद पुलिस ने यह सब किया है। इसकी जितनी भर्त्सना की जाये, कम है।

प्रदीप कुमार दुबे, राजाराम नगर, देवास


मुश्किलों का अंबार

आज किसानों की समस्या, बढ़ती बेरोज़गारी, अनियंत्रित जनसंख्या, जुर्म और अराजकता ही जनता के सामने प्रमुख मुद्दे हैं। मगर विपक्ष का बिखराव, इसकी कमजोरी के चलते खास सफलता मिलती नहीं दिखती। पार्टियों को पारदर्शिता के साथ काम करने की जरूरत है।


जीएसटी की विसंगति Other

Nov 05, 2020

3 नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का लेख ‘स्वायत्तता मिले राज्यों को जीएसटी में’ केंद्र सरकार की जीएसटी नीति की विसंगतियों को उजागर करने वाला रहा। केंद्र सरकार राज्यों को स्वतंत्रता देकर उन्हें वित्तीय स्वायत्तता क्यों नहीं देना चाहती? और वैसे भी यह देखा गया है कि जब से केंद्र सरकार ने जीएसटी व्यवस्था लागू की है तब से न केवल राजस्व में कमी आई है बल्कि आर्थिक क्रियाओं के ऊपर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है। अलग-अलग राज्य अपने ढंग से जीएसटी को लागू करके दूसरे राज्यों से अपने राज्य में व्यापार तथा उद्योग को बढ़ावा दे सकते हैं।

शामलाल कौशल, रोहतक

जीवंत झांकी

एक नवंबर के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में पुष्पेश पंत का लेख ‘अयोध्या में झलकेगी अवध की विरासत’ राम जन्मभूमि अयोध्या के ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव का खुलासा करने वाला था। बाबरी विवाद हिंदू-मुस्लिम एकता में राजनीतिक स्वार्थ के कारण लगभग रोड़ा बना हुआ था। केंद्र की मोदी सरकार ने सूझबूझ से इसका समाधान कर अमन-चैन कर नये आयाम दिये। श्रीराम मंदिर निर्माण कार्य निर्विघ्न संपन्न होने से एक सुखद अनुभूति की तृप्ति होगी। आद्यंत लेखन शैली का वाक्य विन्यास सचित्र ज्ञानवर्धक रहा।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सकारात्मक हो सोच

बिहार के चुनाव को लेकर जो सोशल मीडिया में दिख रहा है, अगर वास्तव में ऐसा घटित हो जाता है तो देश के लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी घटना होगी। कुछ हद तक जाति, धर्म व संप्रदाय की राजनीति से निजात मिलेगी। लोकतंत्र की परिपक्वता को बल मिलेगा। बिहार में जिस राजनीतिक दल पर कभी एमवाई व जातिवादी होने का आरोप लगता रहा है, उसके नेता के मुंह से सभी वर्गों के कल्याण की बात करना और सुनना बहुत अच्छा लग रहा है।

एचएल धीमान, कथोली, नगरोटा सूरियां

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

हरियाणा की विकास यात्रा Other

Nov 04, 2020

एक नवंबर को दैनिक ट्रिब्यून के ‘लहरें’ परिशिष्ट में राजकुमार सिंह का ‘हरियाणवियों के संकल्प का समय’ लेख हरियाणा के जन्म से 54 साल तक की सफलता के सोपानों से साक्षात्कार कराने वाला रहा। इसमें दो राय नहीं, तीन तरफ से देश की राजधानी की चारदीवारी बने हरियाणा के हिस्से में विकास की रोशनी खूब चमकी। यही वजह है कि ‘गीता के संदेश’ की धरती आज विकास का संदेश दे रही है। यहां की खेल प्रतिभाओं ने हर खेल में धूम मचा रखी है। हालांकि, राजनीतिक विसंगतियों की वजह से विकास की गति धीमी रही, फिर भी हरियाणा की कामयाबी काबिले तारीफ है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

संवेदनशील बने पुलिस

हाथरस, होशियारपुर से लेकर बल्लभगढ़ तक बेटियों के साथ क्रूरता की हदें पार करती घटनाओं ने पूरे देश के अंतर्मन को हिला कर रख दिया है। बल्लभगढ़ में छात्रा के अपहरण की असफल कोशिश के बाद दिनदहाड़े हुई हत्या कानून व्यवस्था के प्रति अपराधियों के बेखौफ होने को दर्शाती है। पुलिस की कार्यशैली भी संदेह के घेरे में है। शिक्षण संस्थाओं के बाहर सुरक्षा इंतजाम होने ही चाहिए। सवाल समाज में पनप रही आपराधिक मनोवृत्ति का भी है। पुलिस को संवेदनशील व जवाबदेही बनना होगा।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

चिंता की बात

हाल ही में राजस्थान में पुजारी की पेट्रोल छिड़ककर जला देने की घटना की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अब एक सेल्समैन को जलाकर मार डालने की वीभत्स घटना सामने आई है। इस तरह की घटनाओं से समाज में विद्वेष और प्रदेश में कानून व्यवस्था में खलल पैदा होना स्वाभाविक ही है। सरकार जल्द ही इस तरह की घटनाओं को रोकने के पुख्ता इंतजाम करे अन्यथा उत्तर प्रदेश की राह पकड़ता राजस्थान चिंता का विषय होगा।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, म.प्र.

कश्मीर की राह Other

Nov 03, 2020

जम्मू-कश्मीर को लेकर पिछले सवा साल के दौरान केंद्र सरकार ने जो महत्वपूर्ण फैसले किए हैं, वे प्रदेश के स्थायित्व और विकास को नई दिशा देने वाले साबित होंगे। केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर के भूमि कानून भी बदल डाले हैं। कश्मीर में बसने के लिए वहां का स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र होने की अनिवार्यता भी खत्म कर दी गई है। इससे उद्योगपति राज्य में निवेश करने को प्रेरित होंगे आर्थिक गतिविधियों को बल मिलेगा और रोजगार के अवसर भी बनेंगे। जम्मू-कश्मीर को लेकर सरकार के दृढ़ संकल्प ने यह संदेश दिया है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।

खुशबू वेद, आलोट, म.प्र.

जरूरी कार्रवाई

उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगीनाथ द्वारा लव जिहाद रोकने के लिए कानून लाने और अपराधियों के साथ सख्ती से निपटने का फैसला वर्तमान परिवेश में जरूरी है। हरियाणा सरकार भी लव जिहाद के विरुद्ध कानून बनाने की बात कर रही है। सरकार आरोपियों को विशेष कोर्ट के माध्यम से दण्डित करे। शासन-प्रशासन सत्य, तकनीकी एवं वैज्ञानिक दृष्टि से सत्यापित प्रमाण उपलब्ध कराकर आरोपियों दंडित करे।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी फरीदाबाद

त्योहारों में कोरोना से बचाव Other

Nov 02, 2020

सावधानी जरूरी

देश में कोरोना वायरस के मामलों की संख्या कम हो रही है लेकिन केरल-कर्नाटक में वायरस मामले में तेजी से वापसी हुई है। त्योहारी मौसम भी निकट भविष्य में आरम्भ होने जा रहा है। इसलिए अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है। त्योहारी मौसम में सामाजिक सक्रियता बढ़ जाती है और जगह-जगह जनता की संख्या अधिक होती है । ऐसे में मास्क लगाना और सामाजिक नियमों का पालन करना आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो असावधानी से पूर्व प्रयास-सफलताएं विफल हो जाएं।

रमेश चन्द्र पुहाल, पानीपत

दवाई तक ढिलाई नहीं

कोरोना से बचाव के लिए देश की जनता ने बेहतर संयम दिखाया परन्तु त्योहार के दिनों में हमें और अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। हमारी लापरवाही से बड़ी कठिनाई से नियंत्रण में आई यह बीमारी फिर से अनियंत्रित हो सकती है। इस बीमारी से बचने के लिए बनाए गए नियमों का हमें स्वतः ही पालन करना होगा। त्योहारी मौसम में बाजारों में दुकानों पर भीड़ बढ़ जाती है। अतः हमें इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि जब तक कोरोना की दवाई नहीं आती तब तक किसी भी तरह की कोई ढिलाई नहीं बरती जाए।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

बचाव में ही बचाव

त्योहारों के मौसम में लोग बाजारों में खरीदारी के लिए अवश्य जायेंगे। ऐसे में सावधानी बरतते हुए बाजारों में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ मास्क भी लगाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि सभी दुकानदारों का कोरोना टेस्ट कराए ताकि कोरोना बचाव से पहल की जा सके। वहीं लोगों को स्वयं भी बुखार, खांसी, ज़ुकाम का ध्यान रखना होगा। स्वयं को सेनिटाइज करें या साबुन से हाथ धोएं। कोई भी कार्य धैर्य और संयम से करें। आने वाले सर्द दिनों में कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए बचाव में ही बचाव है।

शामलाल कौशल, रोहतक

अनुशासन जरूरी

नवरात्र की शुरुआत से ही त्योहारों का मौसम शुरू हो गया है। अब यह उत्साह बाजार में भीड़ पैदा करेगा। हमें जश्न और महामारी के बीच संतुलन बनाना होगा। ऐसे में सामान्य दूरी, सेनिटाइजर और मास्क का प्रयोग जरूरी है। हमने अभी तक इस वायरस का साहसपूर्वक और बड़ी समझदारी के साथ सामना किया है। इसलिए हमारी मृत्यु दर अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। दुकानदारों को भी अपनी दुकानों में अनुशासन बनाए रखना चाहिए। दुकानदारों को लोगों को समझाना चाहिए कि उचित दूरी बनाकर ही खरीददारी करें। प्रशासन को भी भीड़ तथा स्वच्छता पर नजर रखनी होगी।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

लापरवाही पड़ेगी महंगी

त्योहार मनाना जीवन का एक सुखद कार्य है लेकिन जीवन जीने के लिए शरीर का स्वस्थ रहना भी उतना ही जरूरी है। अब हमें ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। त्योहारों को मास्क लगाकर एवं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मनाना है। एक छोटी-सी लापरवाही महंगी साबित हो सकती है। आगामी महीने में ठंड भी बढ़ने वाली है और ठंड बढ़ने के साथ ही संक्रमण की दर भी बढ़ेगी। ऐसे में बुजुर्गों एवं बच्चों का खास ध्यान रखना होगा। सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन बहुत जरूरी है।

विजय महाजन प्रेमी, वृंदावन, मथुरा

खतरा बरकरार

त्योहारों के मौसम में कोरोना संक्रमण से बचाव हेतु जितना हो सके घरों में ही पर्व मनाना चाहिए। घर से बाहर निकलने पर सुरक्षा मानकों का दृढ़तापूर्वक पालन होना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना होगा कि कोरोना महामारी अभी कायम है, और खतरा टला नहीं है। आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी के लिए ऑनलाइन खरीदारी को अपनाना बेहतर होगा। विशेषज्ञों की राय के अनुसार सर्दियों के मौसम में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल सकता है। सरकार को ऐसी प्रणाली सुनिश्चित करने के प्रयास करना चाहिए जिसमें हर खास और आम व्यक्ति कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने और बचाने के लिए सुरक्षा मानकों का दृढ़ता पूर्वक पालन करें।

ललित महालकरी, इंदौर

पुरस्कृत पत्र

सकारात्मकता का संबल

मानव हमेशा से उत्सवधर्मी रहा है। कारण, उत्सव रोज़मर्रा की बंधी-बंधाई लीक से परे ले जाकर नवल ऊर्जा-उमंग का संचार करते हैं। फ़िलवक्त, कोरोना वायरस के कारण, हम दमघोटू वातावरण में जी रहे हैं। माना कि खतरा कुछ कम हुआ है परन्तु टला नहीं है। ऐसे में हमें उजास की, नन्ही ही सही, किरण तलाशनी है। यानी सावधानी के पायदान पर, चंद बंधनों की ईमानदार अनुपालना करते हुए, सकारात्मकता का सम्बल लेकर बढ़ना है ताकि त्योहारी साख और मानुषी उत्साहशीलता बरकरार रह सके तथा हताशा-निराशा का अंधियारा दूर हो सके।

कृष्णलता यादव, गुरुग्राम