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May 21, 2022

घातक वायु प्रदूषण

लैंसेट की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि साल 2019 में दुनिया भर में प्रदूषण से नब्बे लाख मौतें हुई थीं। इनमें से पिचहत्तर फीसदी तो सिर्फ वायु प्रदूषण की वजह से हुई जबकि तेरह लाख से ज्यादा लोग जल प्रदूषण का शिकार हो गए। अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं की खातिर इंसान दिन-ब-दिन प्रकृति का जमकर दोहन कर रहा है। उसने जल, जमीन, वायु और आकाश तत्व का भरपूर दोहन करके इन्हें अत्यधिक विषाक्त कर दिया है। हालत यह हो गई है कि ग्लेशियर व दक्षिण ध्रुव से बर्फ तीव्रता के साथ पिघल रही है। वायु प्रदूषण के हालात यह हैं कि सांस लेना मुहाल है। यह स्थिति बच्चों के लिए और भी अधिक घातक है। इस बारे में सरकार बिल्कुल भी गंभीर नहीं है।

सुभाष बुड़ावनवाला, रतलाम, म.प्र.

भारत जोड़ो उद्देश्य

18 मई के दैनिक ट्रिब्यून में विश्वनाथ सचदेव का ‘मानवीय मूल्यों व आदर्शों का भारत बनाएं’ लेख कांग्रेस के उदयपुर चिंतन शिविर के फैसलों का विश्लेषण करने वाला था। कांग्रेस की हार का मुख्य कारण आम लोगों से दूरी बनाना है। लेकिन कांग्रेस ने अपने लंबे शासन के दौरान जो काम किए उन्हीं के कारण ही भारत अपने वर्तमान स्थान पर है। चिंतन शिविर के बाद कांग्रेस को जनता के बीच जाना चाहिए, भारतीयता की भावना को प्रबल बनाना चाहिए। क्षेत्रीय दलों का सहयोग लेना चाहिए क्योंकि उनमें से कोई भाजपा का विकल्प नहीं बन सकता। कांग्रेस का उद्देश्य ‘भारत जोड़ो’ होना चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

विकास हो मुद्दा

ज्ञानवापी मस्जिद में कथित शिवलिंग के मिलने से अचानक हिंदू और मुस्लिम संप्रदाय जिस तरह से आमने-सामने आ गए हैं वह दुःखदायी है। इसमें राजनीति और गैर धार्मिक तत्वों ने पूरा रसास्वादन लिया है। यदि इसी प्रकार धार्मिक भावनाओं की आड़ में राजनीति होती रही तो देश की एकता खंडित हो जाएगी। जरूरी है राष्ट्रहित और विकास के मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए।

केरा सिंह, नरवाना

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May 20, 2022

सार्थक पहल हो

जब-जब देश पर आक्रांताओं ने हमला किया तो उन्होंने यहां आकर मंदिर तोड़े, महिलाओं से दुर्व्यवहार किया, मारकाट मचाई और धर्म परिवर्तन भी किये। आज भी जबकि देश अंग्रेजों से यह मांग कर रहा है कि जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के लिए हिंदुस्तान से माफी मांगें तो वैसे ही आज उन मुस्लिम विद्वानों, राष्ट्रभक्त इतिहासकारों को चाहिए कि वे स्वयं आगे आएं और मंदिर तोड़कर जहां-जहां भी मस्जिदें बनाई गई हैं, उन्हें स्वयं ही हिंदू समाज को सौंप दें। राष्ट्रहित में हिंदू-मुसलमानों के आपसी रिश्ते मीठे बने रहें, इसके लिए उन्हें स्वयं पहल करनी चाहिए।

लक्ष्मीकांता चावला, अमृतसर

सच काे स्वीकारें

बात चाहे काशी विश्वनाथ की हो, श्रीकृष्ण जन्मभूमि की या अन्य हिंदू तीर्थों में स्थित चर्चित मस्जिदों की, मूल रूप से वहां मंदिर ही हुआ करते थे। सच चाहे कितना ही छुपा लिया जाये लेकिन पराजित नहीं होता। भारत के मुस्लिम समाज को भी सच को स्वीकारना चाहिए। यह ठीक है कि उनके पूर्वजों ने अत्याचार से बचने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे हमलावरों के वंशज हो गए। उपासना पद्धति बदल जाने से न तो किसी के पूर्वज बदलते हैं और न ही संस्कृति।

विभूति बुपक्या, आष्टा, म.प्र.

सचेतक प्रयास

उन्नीस मई के दैनिक ट्रिब्यून अंक में मुकुल व्यास का ‘ग्लोबल वार्मिंग से नये वायरसों का खतरा’ लेख भविष्य में आने वाली महामारियों के कारणों के प्रति सचेत करने वाला रहा। कोरोना महामारी की भयावह त्रासदी से अभी पूरी तरह निजात नहीं मिल पायी है कि नये वायरसों के उद्गम स्रोतों का पटाक्षेप हो गया है। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों को नयी वैक्सीन खोज निकालनी होगी। प्रत्येक नागरिक को भी जागरूकता के साथ सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क इत्यादि दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

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May 19, 2022

आतंकियों में बौखलाहट

घाटी में सुरक्षा बलों की सख्ती और आतंकियों के हो रहे सफाए से उनमें बौखलाहट नजर आती है। कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी रोकने के लिए उन्हें निशाना बनाकर भय पैदा किया जा रहा है। सरकार के आश्वासन पर विश्वास करके पंडित राज्य में वापस तो जा रहे हैं मगर पूर्ण सुरक्षा के अभाव में हो रही हिंसक घटनाएं वापसी करने वालों के हौसले पस्त कर सकती हैं। उन्हें आतंक से मुक्त माहौल दिए जाने की जरूरत है ताकि पर्यटन, उद्योग जैसी संभावनाओं से राज्य के विकास का नया मॉडल विकसित किया जा सके।

अमृतलाल मारू, दसई, धार, म.प्र.

जल संकट की आहट

चेन्नई नगर का भूजल स्तर 2000 फुट से भी नीचे चले जाने शहर के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है। ये सब अंधाधुंध शहरीकरण और औद्योगीकरण की अदूरंदेशी योजनाओं का परिणाम है। चेन्नई जैसी स्थिति आधुनिक नगर गुरुग्राम की भी होने वाली है। प्रदेश सरकारों और केंद्र सरकार को भविष्य की आसन्न विभीषिका को भांपकर संयुक्त प्रयास करके वर्षा जल संचयन की दूरगामी योजनाएं बनाकर दृढ़ इच्छा शक्ति से उनका समुचित कार्यन्वयन करना होगा।

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

नफरत की राजनीति

हाल ही में अकबरुद्दीन ओवैसी ने औरंगजेब की कब्र पर फूल चढ़ाकर समरसता में जहर घोलने का काम किया। ऐसा करके वे क्या संदेश देना चाहते हैं? देश में कुछ नेता ऐसी हरकतें आखिर किस मकसद से करते हैं। दरअसल वे ऐसा कर विरोधियों को एक-दूसरे पर हमला करने के निरर्थक मुद्दे थमा देते हैं, जिनकी देश को जरूरत नहीं है। लगता है इनका वजूद इसी प्रकार की नफरत पर टिका हुआ है।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

चिंतन से हासिल

उदयपुर में कांग्रेस पार्टी के तीन दिन के चिंतन शिविर में भले ही कुछ खास हासिल न हुआ हो मगर फिर भी पार्टी बहुत कुछ कर सकती है। माना कि भाजपा का हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुद्दा बड़ा भारी है। इसलिए कांग्रेस को अपने असल मुद्दों पर ही रहते हुए धर्मनिरपेक्षता के साथ ही असल ज्वलंत समस्या बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और जनसंख्या पर केंद्रित करना होगा।

वेद मामूरपुर, नरेला

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May 18, 2022

पारदर्शिता जरूरी

सोलह मई के दैनिक ट्रिब्यून में सुरेश सेठ का ‘विकास की दौड़ में आम आदमी पीछे न छूटे’ लेख राष्ट्र के विकास हेतु बनती योजनाओं का लाभ आम आदमी तक कैसे-कब पहुंचे, इस बारे में सुझावों का विश्लेषण रहा। सरकारों की विकास योजनाओं में आमजन का लाभ कम अपना स्वार्थ अधिक होता है। गरीब योजना का लाभ उठाने के लिए बारी का इंतजार करता है जब तक उसकी बारी आती है तब तक लाभ समाप्त हो चुका होता है‌। महंगाई ने आमजन की जिंदगी को अधिक पेचीदा बना दिया है। योजनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए ईमानदार कर्मियों की नियुक्ति करने की आवश्यकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सहिष्णुता का लोकतंत्र

आलोचना, विरोध जताना आदि अच्छे लोकतंत्र के गुण हैं लेकिन हाल ही में विपक्ष की मुखर आवाजों को दबाने की प्रवृत्ति सत्तापक्ष में बढ़ी है और कोई भी दल इससे अछूता नहीं है। हाल ही के दिनों में राजनीतिक दुराग्रह में मुखर आवाजों के दमन के शर्मसार करने वाले प्रसंग सामने आए हैं। कुछ दलों ने मर्यादा व असहिष्णुता की तमाम सीमाएं लांघ दी हैं यह बात लोकतंत्र के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है सहिष्णुता में ही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

पूनम कश्यप, नयी दिल्ली

सबक लें

चीन की उपनिवेशवाद की नीति ने श्रीलंका को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है। आज जिन हालातों में वहां के लोग हैं उससे दुनिया के उन देशों को सबक लेना चाहिए जो चीन के सहयोग को उसकी मदद समझ रहे हैं। श्रीलंका की कंगाली का आलम ये हो गया कि उसके पास रसोई गैस, कच्चा तेल, दूध और दवाइयां तक खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा नहीं बची है। भारत ने सही समय पर चीन से दूरी बनाकर समझदारी का परिचय दिया है। हिंसा, आगजनी, कर्फ्यू और गोली मारने के आदेश श्रीलंका के हालात समझने के लिए काफी हैं।

अमृतलाल मारू, दसई, धार, म.प्र.

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May 17, 2022

सराहनीय अपील

तेरह मई के दैनिक ट्रिब्यून में एक ख़बर के अनुसार पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने गायक कलाकारों को बंदूक़ और नशा संस्कृति प्रमोट न करने का आह्वान किया है। गायकों को आज की युवा पीढ़ी अपना रोल मॉडल मानती है। मान ने उन्हें पंजाब की संस्कृति को प्रमोट करने की अपील की। भगवंत मान ने कहा कि यदि ऐसा न किया गया तो सरकार सख़्ती भी करेगी। मुख्यमंत्री ने ऐसी अपील पुलिस अधिकारियों से मिले फ़ीडबैक के आधार पर की है। उसका मानना है कि भड़काऊ गीतों की वजह से पंजाब में हथियारों और नशे का चलन बढ़ रहा है।

हरि कृष्ण मायर, लुधियाना, पंजाब

न्यायिक समाधान

आजकल बनारस ज्ञानवापी मंदिर-मस्जिद चर्चा का विषय बना हुआ है। न्यायालय ने भी इस संदर्भ में वीडियोग्राफी द्वारा सर्वे करवाने का निर्णय किया है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसमें सभी धर्मों के लोग एक समान है। अगर कभी विवाद हो जाए तो उसका समाधान न्यायालय ही है। लेकिन इस समय देश में धार्मिक आस्थाओं के मुद्दे पर दोनों संप्रदायों को भड़काया जा रहा है, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता।

शामलाल कौशल, रोहतक

बिजली संकट समाधान Other

May 16, 2022

नीतियों में खोट

कटौती के कारण छोटे से लेकर बड़े उद्योग-धन्धों पर बिजली की कमी का असर हो रहा है। गर्मी के मौसम में बिजली की खपत बढ़ जाती है। सच्चाई तो यह है कि सरकारों द्वारा बिजली के नये संयंत्र नहीं लगाये जा रहे हैं। इसके अलावा जो यूनिट खराब हो गई हैं, उसको ठीक करवाने के स्थान पर प्राइवेट सेक्टर से बिजली खरीदने को बढ़ावा दिया गया। आज कोयले की कमी का बहाना बनाया जा रहा है जबकि पहले सरकार ने कोयला उत्पादन के संयंत्र प्राइवेट लोगों को बेच दिए। वर्तमान का बिजली संकट इसी का परिणाम है कि प्राइवेट कम्पनियां अपनी मर्जी से अपनी शर्तों पर बिजली सप्लाई कर रही हैं। लोगों को सौर ऊर्जा प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

जगदीश श्योराण, हिसार

नागरिकों का फर्ज

हर साल गर्मी का मौसम आते ही तकरीबन हर राज्य में बिजली कटौती होने लगती है। इस समय पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के संकट से जूझ रही हैं। एक तो महानगरों में कंक्रीट के जंगलों के विस्तार व वन क्षेत्रों के सिमटने से साल-दर-साल तापमान में वृद्धि होती जा रही है, दूसरा जरूरत के साथ-साथ प्रतिष्ठा व विलासिता का घटक भी जुड़ा है। समृद्धि के साथ-साथ एसी व कूलर जरूरी हो गए हैं। नि:संदेह भारत जैसे विकासशील देश में संसाधन सीमित हों तो हर नागरिक का फर्ज बनता है कि बिजली का उपयोग संयम व सामंजस्य से करें।

पूनम कश्यप, नयी दिल्ली

परमाणु ऊर्जा का विकल्प

देश में जब भी कोई कमी पड़ती है प्रायः जनता कभी भी संयम नहीं दिखाती। लोगों में जागरूकता का अभाव है। वैसे आजादी के बाद से आज तक सरकारी तौर पर भी बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। थर्मल और हाइड्रो बिजली प्लांट लगाए गये। आज ‘एटॉमिक पॉवर प्लांट्स’ का ज़माना है लेकिन सरकार इस ओर धीमी चाल से चल रही है जबकि यह कार्य द्रुत गति से होना चाहिए। इस समस्या का यही एकमात्र समाधान है। तभी बिजली संकट दूर होगा।

एमएल शर्मा, कुरुक्षेत्र

समीक्षा की जरूरत

गर्मियों में बिजली की मांग बढ़ने का अंदाजा केंद्र व राज्यों के बिजली प्रबंधकों को पहले से ही रहता है। इसके लिए प्लांटों की मरम्मत के साथ-साथ तेल व कोयले का पर्याप्त भंडारण भी जरूरी है। यदि समय रहते जिम्मेदार लोगों द्वारा जरूरी कदम उठाए गए होते तो बिजली संकट से रूबरू न होना पड़ता। विद्युत उत्पादन से मांग अधिक होने पर पॉवरकट लगाना तकनीकी रूप से जरूरी हो जाता है। ऐसे में हुक्मरानों द्वारा हरियाणा समेत देशभर की बिजली उत्पादन व वितरण नीति की तुरंत समीक्षा करने की जरूरत है ताकि भविष्य में बिजली संकट न उभरे।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद

समय से कदम उठायें

हर बार की तरह इस बार भी हरियाणा व देश के कई भागों में बिजली संकट गंभीर रूप धारण कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ वातानुकूलित जीवन शैली के कारण भी बिजली का संकट गहराता जा रहा है। बिजली संकट के स्थायी समाधान के लिए जरूरी है कि हमारे नीति-नियंता समय रहते कदम उठाएं। इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि जनता बिजली की फिजूल खर्ची को रोके तथा सरकार का सहयोग करे। सुविधाओं से युक्त जीवनशैली के कारण भी बिजली संकट बढ़ा है। अतः इस ओर भी ध्यान दिया जाए।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

राजनीति न हो

बिजली उत्पादन के प्रमुख घटक एनटीपीसी ने कोयले की कमी को परोक्ष रूप से नकार दिया है। कोयला कंपनियों के पास कोयला भंडार पर्याप्त मात्रा में होना, किंतु मांग-आपूर्ति के बीच संतुलन नहीं बनना, कुप्रबंधन एवं ओछी राजनीति सामने आ रही है। बिजली की मांग-आपूर्ति के अनुरूप संतुलन बनाये रखने एवं प्रबंधन स्तर पर बेहतरीन सामंजस्य बिठाने के साथ साथ ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों- सोलर एनर्जी, न्यूक्लियर एनर्जी के आविष्कार, अनुसंधान एवं विकास पर भी समानांतर ध्यान रखना होगा। तभी हम बिजली समस्या का स्थाई समाधान खोजने में सफल होंगे।

युगल किशोर शर्मा, फरीदाबाद

पुरस्कृत पत्र

दूरदृष्टि की कमी

भारत में 70 प्रतिशत बिजली का उत्पादन कोयले पर आधारित संयंत्रों से होता है। इस समय ज्यादातर संयंत्र कोयले की कमी के कारण अपनी पूर्ण क्षमता के अनुरूप बिजली का उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। रेलवे के पास पर्याप्त संख्या में वैगन उपलब्ध नहीं हैं, रेलवे ट्रैक खाली नहीं हैं। हमारे नीति-नियंता वक्त रहते इन का प्रबंध कर सकते हैं। लेकिन उनके पास या तो विजन की कमी है या जनता की कठिनाइयों के प्रति संवेदना की। आग लगने पर कुआं खोदने की प्रवृत्ति तभी रुकेगी जब नीति-नियंता अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे। वातानुकूलित जीवन-शैली भी एक बाधा है। मुफ्त बिजली देने जैसी लोक-लुभावन नीतियों पर भी संयम बरतने की आवश्यकता है।

शेर सिंह, हिसार

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May 14, 2022

तार्किक विवेचन

तेरह मई के दैनिक ट्रिब्यून में संपादकीय ‘रुपये की कसक’ रुपये का डॉलर के मुकाबले लुढ़कने के विषय की समीक्षा करने वाला था। देश का आयात निर्यात के मुकाबले अधिक है। भारत भारी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसके कारण पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ेंगे और आने वाले समय में महंगाई में भी बढ़ोतरी होगी। असंगठित क्षेत्र को मजबूत बनाने, विकास दर को बढ़ाने के लिए, मांग व आपूर्ति का सन्तुलन बनाने जैसे जो सुझाव सम्पादकीय में दिये गये हैं, वे सराहनीय हैं।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

भयावह स्थिति

यूक्रेन-रूस युद्ध के हालात दिनों दिन बिगड़ते जा रहे हैं। खबरों से विदित है कि यूक्रेन द्वारा अब लैंडमाइन बिछा दी गई हैं, जो चिंतनीय है। युद्ध की स्थिति में यूक्रेन को कोई देश मदद देने की स्थिति में नहीं हैं। युद्ध से शेयर बाजार, कच्चे तेल के दाम आदि भी बेहाल हुए, जिसका असर बढ़ते दाम के रूप में अन्य देशों को भुगतना पड़ेगा। इस समय युद्ध को रोका जाना ही मानव जाति के लिए उचित होगा। अंतर्राष्ट्रीय संधियां निरर्थक होती दिखाई दे रही हैं।

संजय वर्मा, मनावर, धार, म.प्र.

गुणवत्ता को प्राथमिकता

संपादकीय ‘राम भरोसे स्कूल’ में उल्लेख है कि शासन ने स्कूल तो खोल दिए किंतु अच्छे और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के रहते ये स्कूल कम उपयोगी माने जाते हैं। स्कूल में अध्यापन कार्य सुव्यवस्थित रूप में होने पर ही पालक और छात्र का स्कूल के प्रति भरोसा पैदा होगा। प्राथमिकता शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ायी जाये।

बीएल शर्मा, तराना, उज्जैन

रोक उचित

बारह मई के दैनिक ट्रिब्यून में संपादकीय ‘राजद्रोह का खतरा’ को पढ़कर कानून की आड़ में हो रहे खेल को समझा जा सकता है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद बड़ा बदलाव देश में हुआ है। राजद्रोह कानून को लेकर पहले भी सवाल उठे हैं लेकिन उसका माकूल जवाब नहीं मिलने से अब तक यह उपयोग में आता रहा है। शीर्ष अदालत ने अगली सुनवाई तक इसके क्रियान्वयन पर जो रोक लगाई है वह उचित है।

अमृतलाल मारू, दसई, धार, म.प्र.

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May 13, 2022

पाक पर निर्भर

बारह मई के दैनिक ट्रिब्यून में जी. पार्थसारथी का लेख ‘अब रिश्तों की बहाली पाक पर निर्भर’ पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति, तथा भारत के साथ अरब देशों के सुधरते रिश्तों के साथ-साथ दोनों देशों के भविष्य में संबंधों को लेकर विश्लेषण करने वाला था। कश्मीर मुद्दे के बिना पाकिस्तान का कोई भी शासक वहां टिक नहीं सकता। पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर भारत विरोधी गतिविधियां छोड़ नहीं सकता। ऐसे में सार्क के पुनर्जीवित करने तथा दोनों देशों में व्यापारिक संबंध फिर से बहाल करना इस बात पर निर्भर करता है क्या वह भारत विरोधी अपनी नीति तथा कश्मीर पर अपने विचारों में परिवर्तन कर सकता है?

शामलाल कौशल, रोहतक

महंगाई का विकल्प

आठ मई के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में आलोक पुराणिक का ‘धमाकों से सुलगी महंगाई की आग’ लेख रूस-यूक्रेन युद्ध की निरंतरता से प्रभावित भारतीय जनजीवन के कारणों का विश्लेषण करने वाला था। अंतर्राष्ट्रीय तेल मूल्यों में वृद्धि के कारण देश में महंगाई दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। खाद्यान्न, गैस-तेल के बढ़ते दाम गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हो रहे हैं। ऐसे में राज्य सरकारों को कर घटाकर आमजन की सुख सुविधा को ध्यान में रखकर महंगाई कम करने का विकल्प अपनाना चाहिए।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

अदालत की नसीहत

दिल्ली के शाहीन बाग में अवैध अतिक्रमण को लेकर जो हो-हल्ला हुआ, दुर्भाग्यपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने भी तल्ख शब्दों में कहा है कि अदालत को सियासत का मंच मत बनाइए! बात-बात पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना नौटंकी बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अच्छी नसीहत दी है कि अवैध अतिक्रमण है तो उसको हटाया जाना चाहिए। अगर जायज के साथ अन्याय होता है तो कोर्ट जरूर हस्तक्षेप करेगा।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

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May 12, 2022

मारक ड्रोन

रूस-यूक्रेन युद्ध में भी देखा गया कि रूसी सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए यूक्रेन शक्तिशाली ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें उसे कामयबी भी मिल रही है। पाकिस्तान भी सीमा पर ड्रोन के जरिए लगातार नज़र रखने के साथ-साथ, अपने खतरनाक मंसूबों की आवाजाही करता है। दरअसल तमाम हथियारों के बावजूद यूक्रेन के लिए ड्रोन इस युद्ध में अहम साबित हो रहा है। गौरतलब है कि युद्ध के मैदान में ड्रोन के बढ़ते उपयोग से सवाल पैदा हो रहा है कि क्या ड्रोन युद्ध का भविष्य तय कर सकता है।

निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद


सजगता जरूरी

आतंकी संगठन फिर से आतंकवाद का बुरा दौर शुरू करना चाहते हैं। जिस तरह आतंकियों की इन दिनों दहशत व्याप्त है ऐसे में राष्ट्रविरोधी ताकतों को जड़मूल से नेस्तनाबूद करना जरूरी हो गया है। पंजाब पुलिस को सतर्कता बरतनी होगी। दरअसल, पंजाब में भी पाकिस्तान गड़बड़ फैलाने लग गया है। ड्रोन से हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी से यह सत्य साबित होता है कि पाकिस्तान कुछ बड़ा कर सकता है। आतंकवाद का घिनौना चेहरा पंजाब से कोसों दूर रहे, इसके लिए सजगता जरूरी है।

कांतिलाल मांडोत, सूरत


स्कूलों की दुर्दशा

ग्यारह मई दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘राम भरोसे स्कूल’ हरियाणा राज्य के सरकारी स्कूलों की दुर्दशा बखूबी दर्शाता है। दुर्भाग्य की बात है कि एक गेस्ट टीचर सैकड़ों बच्चों को पढ़ा रहा है। स्पष्ट है कि इन स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं, अफ़सरों और अमीरों के नहीं। वहीं स्कूलों में ढांचागत सुविधाओं की कमी के साथ ही इंटरनेट नहीं है, शिक्षकों को प्रशिक्षण का भी अभाव है। सरकार को अधिकारियों व मंत्रियों के बच्चों के लिये सरकारी स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य कर देना चाहिए। इससे स्कूलों की दशा में यक़ीनन सुधार आयेगा।

हरि कृष्ण मायर, लुधियाना, पंजाब

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May 11, 2022

आंकड़ों की बाजीगरी

सात मई के दैनिक ट्रिब्यून में ‘तथ्य और सत्य’ संपादकीय में तथ्यों और सटीक तर्कों की दलील दी गई है। वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की भारत में कोरोना के आंकड़ों की रिपोर्ट के प्रति विश्वास और अविश्वास दोनों साझा करती है। याद करें कोरोना की दूसरी लहर में, जब अस्पतालों, छोटे-छोटे दवाखानों और डॉक्टरों के यहां कतारें लगी थीं। लोग ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ रहे थे। श्मशान घाट और कब्रिस्तान पर अंतिम संस्कार के लिए लोग इंतजार कर रहे थे। ऐसे में आंकड़ों में हेरफेर निश्चित रूप से संशय पैदा करता है। वैसे कोरोना महामारी का मुकाबला भारत ने बेहतर ढंग से किया है।

अमृतलाल मारू, दसई, धार, म.प्र.


सफल यात्रा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस की तीन दिवसीय यात्रा कई मायनों में सफल रही है। यात्रा में अपने समकक्षों के साथ वार्ता व समझौते आने वाले वर्षों में भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि साबित हुई है। जर्मनी ने 2030 तक 10 बिलियन यूरो की अतिरिक्त विकास सहायता से भारत की हरित विकास योजना का समर्थन करने का निर्णय लिया है। यह संबंध यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक विकास को बढ़ावा देंगे और भविष्य में वैश्विक साझेदारी बनाएंगे।

अविरल शर्मा, पंचकूला


जागरूकता जरूरी

देश में कोविड-19 के मामलों की संख्या में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन की बढ़ती मांग ने चिंता को और बढ़ा दिया है। सरकार को फिर से लगाए गए प्रतिबंधों के साथ और सख्त होने की जरूरत है। भारत में स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय खुल चुके हैं, लेकिन मास्क पहनना, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया जा रहा है। कोविड के बढ़ते मामलों को देखते हुए लोगों को जागरूक होना होगा।

दीपांशी, पटियाला

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

आपकी राय Other

May 10, 2022

मजदूरों की बदहाली

एक मई के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में शंभू नाथ शुक्ल का 'कुंद होती धार मंद होते नारे' लेख मजदूर दिवस पर मजदूरों की व्यथा का विश्लेषण करने वाला था। देश के विकास व नवनिर्माण में मजदूरों की मेहनत ऊंची इमारतों, अट्टालिकाओं के माध्यम से झलकती है। आजीविका के लिए अपनों का बिछोह, घर से बेघर, मीलों दूर का सफर करती भूखी प्यासी जिंदगियों का दर-दर ठोकरें खाना बदहाली की तसवीर पेश करता है। आज भी बढ़ती महंगाई, रोटी की चिंता में खुले आकाश तले, सर्दी-गर्मी सहने को मजबूर है मजदूर।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

संपर्क की भाषा

पांच मई के दैनिक ट्रिब्यून में विश्वनाथ सचदेव का ‘संवाद से जोड़ने की ईमानदार कोशिश हो’ लेख राजभाषा हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं को विकसित करने की आवश्यकता पर बल देने वाला था। भाषा विवाद को लेकर हमारे राजनेता राजनीति करने से बाज नहीं आते। जब हम हिंदी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा कहते हैं तो उसका मतलब हिंदी को गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों पर थोपने की बात नहीं होती। असल में हिंदी देश की राजभाषा के तौर पर संपर्क भाषा है न कि अंग्रेजी।

शामलाल कौशल, रोहतक

लाउडस्पीकर का कानूनी समाधान Other

May 09, 2022

आपसी सहमति हो

हिंदू-मुस्लिम समुदायों में लाउडस्पीकर संबंधी विवादों से उत्पन्न वैचारिक वैमनस्य को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनुपालना के मद्देनजर आपसी सौहार्द-शांतिपूर्ण माहौल में सुलझा लेना चाहिए। प्रबुद्ध नागरिकों को दोनों संप्रदायों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले भाषणों को अनसुना करते हुए आपसी सहमति की एक नयी मिसाल कायम करनी चाहिए। वहीं ध्वनि प्रदूषण से विद्यार्थी वर्ग के शिक्षण-प्रशिक्षण में आते व्यवधान, बीमार बुजुर्गों की तकलीफों आदि के समाधान हेतु सजगता जरूरी है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


कानून से समाधान

देश में वर्षों से मंदिर में आरती, मस्जिद में अजान, गुरुद्वारा में गुरबाणी और गिरजाघर में प्रार्थना सभा के दौरान ध्वनि यंत्रों का उपयोग हो रहा है। अतीत में किसी वर्ग को इस पर आपत्ति नहीं थी। हालांकि ध्वनि यंत्रों का प्रयोग विद्यार्थियों, बीमारों और बुजुर्गों के लिए असुविधाजनक अवश्य था। कालांतर में संकीर्ण हितों की प्रतिपूर्ति के लिये राजनीतिक दलों के उकसावे पर ध्वनि यंत्रों का प्रयोग एक-दूसरे वर्ग को नीचा दिखाने के लिए करने लगे। राष्ट्र में ध्वनि नियंत्रण के कठोर कानून और सभी वर्गों द्वारा कानून की कठोरता से अनुपालना ही विवाद का समाधान है।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम


धीमी हो ध्वनि

हाल ही के दिनों में देश में लाउडस्पीकर विवाद ने जोर पकड़ा है। आज के समय में कोई भी व्यक्ति किसी की अच्छी सलाह मानने को तैयार नहीं है। इसी तरह का विवाद झगड़े का रूप धारण कर लेता है। अब हमारे देश के धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर सुबह 4 बजे से चला दिया जाता है, जिससे काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसे चलाया जाए परंतु धीमी ध्वनि में। क्योंकि तेज ध्वनि से सुबह पढ़ने वाले बच्चों का समय बर्बाद और घर में बूढ़े बीमार बुजुर्गों को परेशानी होती है। अतः लाउडस्पीकर विवाद का कानूनी समाधान आवश्यक है।

सतपाल सिंह, करनाल


सख्ती से पालन हो

आजकल देश में लाउडस्पीकर युद्ध चला हुआ है, जिससे दोनों संप्रदायों में उत्तेजक भाषणों का आदान-प्रदान हो रहा है। वैसे लाउडस्पीकर प्रयोग से विद्यार्थियों के अध्ययन कार्य में व्यवधान पड़ता है, वहीं वृद्ध बीमार लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक सीमा तक आवाज सीमित रखने की अनुमति दी है। संबंधित सरकारों को इस नियम को कड़ाई से लागू करना चाहिए। सभी को अपने अपने धर्म पर चलने की अनुमति तो है लेकिन धर्म के नाम पर ऐसी कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जिससे विवाद खड़ा हो।

शामलाल कौशल, रोहतक


राजनीतिक दांवपेच

लाउडस्पीकर विवाद के जरिए यह साफ महसूस होने लगा है कि सामाजिक हित के लिए उठाये जाने वाले सभी कदम क्यों विवादित होकर रह जाते हैं। क्यों खुद को सामाज के ठेकेदार मानने वाले राजनीतिक दल राजनीतिक दांवपेच खेलने लगते हैं। सब आम इंसान हैं और उनके हित में जो भी उचित है, न्यायालय उस पर सख्त कानून बनाए। साथ ही उल्लंघन करने वाले के लिए कठोर दंड तय हो। कानून किसी धर्म, जात व किसी राजनीतिक दल विशेष का गुलाम नहीं है। यह प्रजातांत्रिक देश है जहां सबको समान अधिकार मिलता है।

ऋतु गुप्ता, फरीदाबाद


प्रतिष्ठा का मुद्दा

आज धार्मिक गतिविधियों का लाउडस्पीकर से प्रसारण धर्मावलंबियों के बीच प्रतिष्ठा का मुद्दा बनकर विवाद के गलियारों में गूंज रहा है। लाउडस्पीकर परंपरा वर्षों से बनी हुई है। पहले कभी विवाद नहीं होने से सरकार ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब आमजन की सुख-शांति को ध्यान में रख नए प्रभावी नियम बनाना चाहिए। यदि कभी किसी संप्रदाय से जुड़े लोगों को कोई विशेष समारोह आयोजित करना हो तो प्रशासन से अनुमति लेकर लाउडस्पीकर का उपयोग किया जा सकता है।

दिनेश विजयवर्गीय, बूंदी, राजस्थान


पुरस्कृत पत्र

जिम्मेदारी तय हो

आज के दौर में लाउडस्पीकर धार्मिक प्रचार-प्रसार का साधन तो बन गया है लेकिन इस पर नियंत्रण नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नियमों का उल्लंघन होता है। यद्यपि ज्ञात हो कि विभिन्न प्रकार के ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारण, परिवहन और निर्माण भी हैं, जिससे जीव बुरी तरह प्रभावित होते हैं। लेकिन बीते कुछ दिनों से लाउडस्पीकर पर राजनीति ने इसे विवादास्पद मुद्दा बना दिया है। हरेक पार्टी सियासी रोट सेंकने में लगी है। कानूनी तौर पर ध्वनि प्रदूषण के मानक-मापकों के उल्लंघन के लिए तय जुर्माने के साथ कार्यान्वयन की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन को देनी चाहिए ताकि आपसी सौहार्द बना रहे।

मनकेश्वर कुमार, मधेपुरा, बिहार

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May 07, 2022

हिसाब मांगें

पांच मई के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘पानी की कहानी’ हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक पीने के पानी की समस्या को लेकर सत्ताधीशों के वादों की पोल खोलने वाला था। इसे सत्ताधीशों की संवेदनहीनता की कहा जाएगा कि वर्ष 2004 में ‘राजीव गांधी जल संवर्धन योजना’ की आधारशिला रखी गई तथा यह योजना सिरे नहीं चढ़ी। इसके अतिरिक्त ‘हर घर नल से जल’ का नारा भी सार्थक साबित नहीं हुआ। संपादकीय में उचित ही कहा गया है कि सत्ताधीशों द्वारा जनहित में की गई घोषणाओं के क्रियान्वयन को लेकर जनता अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने की एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत करे।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

आंकड़ों पर सवाल

भारत में कोरोना से हुई मौतों को लेकर डब्ल्यूएचओ ने जो रिपोर्ट दी है, उसे केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में जनवरी, 2020 से लेकर दिसंबर, 2021 के बीच कोरोना से करीब 47 लाख लोगों की मौत का अनुमान लगाया है। यह आधिकारिक आंकड़े से करीब 10 गुना ज्यादा हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि डब्ल्यूएचओ का डाटा इकट्ठा करने का सिस्टम ठीक नहीं है और वैज्ञानिक रूप से इस पर सवाल उठते हैं। डब्ल्यूएचओ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था को किसी भी देश की अंदरूनी स्थिति के बारे में गलत जानकारियां प्रसारित नहीं करना चाहिए।

सुभाष बुड़ावनवाला, रतलाम, म.प्र.

जीवंत रहें नदियां

उन्नीस हजार करोड़ रुपये के बजट से देश की 13 प्रमुख नदियों को पुनर्जीवित करने की महत्वाकांक्षी योजना पर संयुक्त राष्ट्र ने सकारात्मक प्रतिसाद दिया है। नदियों को पुनर्जीवित करना भारत की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता है। लेकिन दक्षिण पंजाब की कई नदियां मरुस्थल बनने की कगार पर हैं। नदियां देश की भाग्यरेखाएं हैं, इसका रखरखाव बहुत जरूरी है। यह केंद्रीय परियोजना ग्लोबल वार्मिंग से निपटने की कुंजी भी है।

नैन्सी गर्ग, मानसा

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May 06, 2022

बढ़ती बेरोजगारी

देश में बेरोजगारी दर मार्च में 7.6 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल में 7.83 प्रतिशत होना चिंता का विषय है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर कथित तौर पर गिर गई है, शहरी बेरोजगारी दर मार्च में 8.28 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल में 9.22 प्रतिशत हो गई, जो संतोषजनक आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाती है। यह समय सरकार के लिए उद्योग क्षेत्र से बातचीत करने का है, और इस बात पर विशेष जोर देने के लिए कि निजी क्षेत्र अधिक रोजगार प्रदान करने में कैसे मदद कर सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को भी विभिन्न सरकारी विभागों में रिपोर्ट की गई रिक्तियों को भरने के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है।

दीपांशी, पटियाला

मजबूत विपक्ष जरूरी

देश के दूसरी बार भारी बहुमत से बने प्रधानमंत्री की कार्य कुशलता का लंबे समय से आकलन नहीं हो पा रहा है। उसका कारण है मजबूत विपक्षी नेता का न होना। कोई भीड़ सड़कों पर दिखाई नहीं दे रही है। सत्तापक्ष उच्चतम न्यायालय के निष्पक्ष राम मंदिर के फैसले को अपनी सफलता बता कर लोगों में धर्म की खाई को चौड़ा कर रहा है। यह सत्तापक्ष की कम कार्य कुशलता की निशानी है। मतदाता को कोई आशा नहीं है कि भविष्य में भी कोई आंतरिक संगठन वाली लोकतांत्रिक पार्टी अस्तित्व में आयेगी। कोई लोकमंच आगे आये तो देश का प्रजातंत्र मजबूत हो सकता है।

वेदपाल राठी, रोहतक

ऊर्जा के स्रोत

कोयले की अत्यधिक कमी के साथ, पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में बिजली कटौती पहले से कहीं अधिक है। समय के साथ जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता बढ़ रही है जो अंततः हमें भविष्य में कहीं नहीं ले जाएगी। इसी तरह बिजली ही नहीं पेट्रोल-डीजल के दाम भी आसमान छू रहे हैं। लोगों को धीरे-धीरे ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा की ओर अग्रसर होना चाहिए जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। हालांकि बिजली के मामले में भारत केवल कोयले पर निर्भर रहने के बजाय सूर्य, हवा, ज्वार और पानी जैसे साधनों से ऊर्जा का उपयोग करने के विकल्प चुन सकता है।

इशिता कुकरेजा, जीरकपुर

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May 05, 2022

हक का राशन

आज भी कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा कुछ ही हाथों में सीमित होने से देश की एक बड़ी आबादी खाद्य असुरक्षा से जूझ रही है। इन्हीं परिस्थितियों से निपटने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के जीवन स्तर को सुधारने हेतु कम कीमतों पर अनाजों का वितरण किया जा रहा है। लेकिन यह योजना जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए चलाई गई थी उससे अभी भी मीलों दूर है। इस योजना के तहत लाखों ऐसे लोग पंजीकृत हैं जो पात्र नहीं हैं। इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण सरकारी कर्मचारी से लेकर बड़े-बड़े भूस्वामी गरीबों के हक का राशन खा रहे हैं। सरकार को ऐसे लोगों के नाम सूची से हटवाकर रिकवरी करनी चाहिए।

शिवेन्द्र यादव, कुशीनगर, उ.प्र.

एजेंसियों की नाकामी

तीस अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित एक खबर ‘दो समूहों में पथराव हवाई फायरिंग, कर्फ्यू’ पंजाब में स्थापित शान्ति को फिर से पृथकतावाद की चिंगारी से सावधान करने वाली थी। पंजाब में आम आदमी पार्टी की नई सरकार बनी है, कुछ निराश राजनीतिक दल इसके लिए परेशानियां पैदा करना चाहते हैं। वहीं इसका मुख्य कारण गुप्तचर तथा सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी है। अगर ये एजेंसियां मुस्तैद होतीं तो उपर्युक्त संघर्ष को रोका जा सकता था। पंजाब सरकार को चाहिए कि सारे पंजाब में सुरक्षा तथा गुप्तचर एजेंसियों को सक्रिय कर दे। पंजाब के अमन-चैन को किसी को बिगाड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

प्रशासन सोचे

चंडीगढ़ की दो कॉलोनियों के निवासियों को तय समयावधि में जमीन खाली करने को कहा गया है। स्लम कॉलोनियों को हटाना एक अच्छी कार्रवाई है लेकिन लोगों को असहाय स्थिति में छोड़ना सही नहीं है। प्रशासन को लोगों के भविष्य पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सोच-विचार कर निर्णय लेने चाहिए।

निष्ठा, यमुनानगर

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May 04, 2022

संकट की हकीकत

देश में बिजली संकट को लेकर इन दिनों फिर सियासी मौसम में गर्माहट है। देश के 15 से ज्यादा राज्यों में बिजली की कटौती जोरों पर है, जिसको लेकर हाहाकार मचा हुआ है। ज्यादातर कटौती ग्रामीण क्षेत्रों में की जा रही है। अब इस कटौती को लेकर राजनीति भी शुरू हो गयी है। विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर होते हुए उसे इस भीषण बिजली संकट के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष इसे पूर्व की सरकारों की नाकामी बता रहा है। जब बिजली संकट से हाहाकार मचा है तब आनन-फानन में कई पैसेंजर ट्रेनों को रद्द कर बिजली आपूर्ति केंद्रों तक कोयला पहुंचाने का काम युद्ध स्तर पर हो रहा है। 

गौरव दीक्षित, नोएडा, उ.प्र.

तारीख पर तारीख

सत्ताईस अप्रैल का दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘बोझ तले न्याय’ देश के विभिन्न न्यायालयों से न्याय में देरी के कारण-समस्याओं का विश्लेषण करने वाला था। सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान चीफ जस्टिस समेत कई मुख्य न्यायाधीशों ने सरकार को नयी अदालतें स्थापित करने तथा जजों की संख्या में जरूरी वृद्धि करने की अनुमति के साथ-साथ आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की गुहार लगायी थी, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। परिणामतः अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज न्याय के बदले में तारीख पर तारीख के सिवा उनके हाथ कुछ नहीं लगता। 

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

सकारात्मक संबंध 

भारत के प्रधानमंत्री इन दिनों जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। यह इस साल होने वाली उनकी पहली विदेश यात्रा है। यह यात्रा राष्ट्र के विकास और विदेशों के साथ बढ़ते संबंधों पर प्रकाश डालती है। मैत्रीपूर्ण व्यापारिक संबंध संकट के समय में भारत की मदद कर सकते हैं। सकारात्मक संबंध विकसित करना केंद्र की मौजूदा भाजपा सरकार का सर्वोत्तम गुण है। यह देश के नागरिकों के लिए गर्व का क्षण है।

भव्या विग, अम्बाला शहर

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

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May 03, 2022

मानवीय हो नजरिया

चंडीगढ़ में कॉलोनी नंबर 4 के अंतर्गत स्लम एरिया में धारा 144 लगाकर वहां रहने वाले दो-तीन हजार लोगों को सड़क पर बेघर कर दिया गया है जबकि अन्य क्षेत्रों में केवल 290 लोगों को ही आवास आवंटित किया गया। बाकी लोगों का बायोमेट्रिक टेस्ट हुआ, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। सरकार को वहां रहने वाले लोगों की सुविधा को ध्यान में रखकर ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही लोगों को उजाड़ने से पहले उन्हें घर उपलब्ध कराना प्रशासन की मुख्य प्राथमिकता होनी चाहिए, बजाय इसके कि लोगों को सड़क पर छोड़ दिया जाए।

निष्ठा, यमुनानगर

जीवन भी बदले

देश में जीएसटी संग्रह हर महीने बढ़ रहा है यह अच्छी उपलब्धि है। लेकिन अभी तक लोगों के कल्याण के लिए बेहतर बदलाव नहीं देखा गया है। बिजली नहीं है क्योंकि देश कोयले की कमी का सामना कर रहा है। ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं जो कल्याण में कमी का संकेत दे रही हैं। सरकार को लोगों के कल्याण व विकास पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जीएसटी संग्रह भी बढ़ रहा है। उसी प्रकार की सुविधा भी लोगों को मिलनी चाहिए।

अदिति बरनवाल, चंडीगढ़

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फसल चक्र में बदलाव से सुरक्षा Other

May 02, 2022

विमर्श से समाधान

कृषि मंत्रालय बड़ी सक्रियता से प्रयत्नशील है कि किसानों को प्राकृतिक खेती तथा कृषि चक्र में बदलाव लाकर विश्वस्तरीय वार्मिंग का मुकाबला करना चाहिए। लेकिन इन सरकारी नीतियों को किसानों की ओर से कोई विशेष सहयोग नहीं मिल रहा। उल्लेखनीय है कि जब साठी धान की खेती होती थी तो उसके लिए पानी की बहुत जरूरत होती थी, सरकार के समझाने पर भी किसान नहीं मानते थे, जब उसकी खरीद बन्द हुई तब से वह चक्र बन्द हुआ। साफ जाहिर है कि मौजूदा समस्या का समाधान भी आपसी विचार-विमर्श से ही निकलेगा।

एमएल शर्मा, कुरुक्षेत्र

कम पानी की फसलें

ग्लोबल वार्मिंग पृथ्वी के वातावरण के समग्र तापमान में क्रमिक वृद्धि को संदर्भित करता है। पृथ्वी को सही मायनों में हरा-भरा बनाना होगा। किसानों को परिवर्तित मौसम के अनुसार खेती करनी चाहिए। मौसम में हो रहे परिवर्तन से कृषि उत्पादन बाधित हो रहा है। किसानों को चाहिए कि वे कम अवधि वाले धान की खेती करें। फसल चक्र में बदलाव से उर्वरा शक्ति बढ़ेगी और फसलों में बीमारियों का संक्रमण भी घटेगा। लगातार एक जैसी फसल लेने से उत्पादकता प्रभावित होती है। अधिक पानी वाली फसल के बाद कम पानी वाली फसल उगानी चाहिए।

पूनम कश्यप, न्यू मुल्तान नगर, दिल्ली

जागने का वक्त

इस बार अप्रत्याशित गर्मी पड़ रही है, जिसका असर गेहूं की फसल पर भी पड़ा है। एक अनुमान के अनुसार इस बार 15 प्रतिशत की कमी होने की सम्भावना है। जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग का संकट असर दिखा रहा है। वनों का अंधाधुंध कटाव, कूड़ा-कर्कट में वृद्धि, फॉसिल ईंधनों का बढ़ता प्रयोग, औद्योगिक विकास, वाहनों का बढ़ता प्रयोग तथा रूस-यूक्रेन का युद्ध इस संकट को और बढ़ायेगा। परिणामस्वरूप धरती के औसत तापमान में वृद्धि और बारिश में कमी होगी। ऐसी स्थिति में किसान को अपनी फसलों के नये पैटर्न पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए ताकि कम बारिश और अधिक तापमान में उत्पादकता में गिरावट न आये और हमारी खाद्य शृंखला सुरक्षित रहे।

शेर सिंह, हिसार

सरकार पहल करे

आज ग्लोबल वार्मिंग गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह सब मानव द्वारा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का लेखा-जोखा है। इस बार ज्यादा गर्मी पड़ने से गेहूं की उत्पादकता कम हुई है। आम किसान अपनी फसलों के नए पैटर्न के बारे में क्या सोचेगा? उसे ऐसा सोचने की फुर्सत ही कहां है? वह बमुश्किल ही कहीं से जुगाड़ कर अपनी परम्परागत फसल उगाता है और परिवार का पालन-पोषण करता है। मौसम की विभीषिका को देखते हुए नए पैटर्न के बारे में सरकारी स्तर पर ऐसा किया जाना चाहिए। अर्थात‍् किसी भी प्रकार के जोख़िम की स्थिति में सरकार द्वारा किसानों को पूरा संरक्षण दिया जाना चाहिए।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, गुरुग्राम

जमीनी बदलाव हो

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पशु-पक्षियों के साथ-साथ धरती पर भी हो रहा है। यह ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रभाव है कि इस बार गेहूं की पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत की कमी आ रही है। इसको गम्भीरता से नहीं लिया गया तो देश में फिर से अन्न संकट पैदा हो सकता है। इसके लिए केवल किसानों को ही नहीं, सरकार को भी काम करना पड़ेगा। जहां तक फसल चक्र में बदलाव की बात है, कहने में तो आसान लगता है परन्तु जमीनी स्तर पर काफी मुश्किले हैं। गेहूं केवल सर्दी में ही पैदा होती है और चावल को बरसात का मौसम चाहिए। इस चक्र को बदलने का जोखिम किसान कैसे ले सकता है? यह तो सरकार और कृषि वैज्ञानिक ही कर सकते हैं कि वे ऐसे बीज तैयार करें जो हर मौसम और हर जलवायु में पैदावार दे सकें।

जगदीश श्योराण, हिसार

जागरूक करें

ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप इस बार अप्रत्याशित गर्मी पड़ रही है। इस बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं की उत्पादकता में कमी आई है। अतः जरूरी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कुप्रभाव से बचने के लिए किसान फसल चक्र में बदलाव करे। किसान को ऐसे पैटर्न पर विचार करने की जरूरत है, जिससे कम बारिश होने पर तथा तापमान अधिक होने पर भी फसलों की उत्पादकता में कमी न आए। इस संबंध में किसानों को जागरूक भी किया जाए। ऐसा करने से हमारी खाद्य सुरक्षा भी मजबूत होगी।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

पुरस्कृत पत्र

और राहें भी हैं

ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव के कारण मार्च महीने से ही तापमान बढ़ा हुआ रहा। मौसम के इस परिवर्तन से किसानों को अपनी फसल को बचाने के लिए काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी। विशेषकर जिन फसलों में पानी की मात्रा ज्यादा लगती है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय को अल्प पानी एवं बढ़ते तापमान से अप्रभावित रहने वाली फसलों को बढ़ावा देने के लिए देश भर में संचार माध्यमों द्वारा अभियान चलाना चाहिए ताकि किसानों में नवाचार को बढ़ावा मिले और वे भविष्य में मौसम के अनुकूल फसलें उगा कर होने वाली क्षति से बच सकें। ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति को अपनाकर भी कृषक पानी की बचत कर के नकद फसल लगा सकते हैं।

ललित महालकरी, इंदौर, म.प्र.