आपकी राय

स्वागतयोग्य फैसला

May 07, 2021

निजी स्कूलों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती के लिए अब एसएलसी की अनिवार्यता नहीं रहेगी। यह हरियाणा सरकार का स्वागतयोग्य फैसला है। गरीब व असमर्थ वर्ग के बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश तो दिला देते हैं किन्तु भारी-भरकम फीस न चुका पाने के कारण बच्चे का स्कूल जाना बंद हो जाता था। अब इस आदेश से गरीबों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने का अवसर मिलेगा।

भगवती प्रसाद गेहलोत, मंदसौर, म.प्र.


इंतजाम अपर्याप्त

देशभर के अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति समय पर नहीं होने के कारण कोरोना संक्रमण रोगियों की हालत गंभीर होते देखी जा सकती है। ऑक्सीजन के अभाव में मरीजों की दम तोड़ने की खबरें आ रही हैं। अभी तक राजधानी दिल्ली समेत देशभर के अन्य राज्यों में ऑक्सीजन की आपूर्ति सामान्य नहीं हो पाई है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी तादाद में मरीज जाएंगे कहां? क्या सरकार मूकदर्शक बन देखती रहेगी।

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी


भाजपा मंथन करे

पश्चिम बंगाल में टीएमसी की शानदार जीत से भाजपा को जोर का झटका लगा है। वर्ष 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए जरूरी है कि भाजपा अपनी हार का मंथन करे। ममता बनर्जी ने इस बार के विधानसभा चुनाव में खेला होबे का नारा दिया था। वहां के चुनाव नतीजों को देखकर यही लग रहा है कि खेला हो ही गया। कांग्रेस को विभिन्न राज्यों में मिल रही हार का मंथन कर लेना चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


चिंता की बात

पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हुए संघर्ष में दर्जनभर लोगों की मौत हो चुकी है। हम सभी लोग एक शिक्षित समाज में रहते हैं और ऐसी घटनाएं होना देश के हित में नहीं है।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

आपकी राय

May 06, 2021

जय-पराजय और सवाल

तीन मई के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘इस जय-पराजय के सवाल और सबक’ लेख में पांच राज्यों के चुनाव के अलावा समाज व राजनीति का बोलता चित्र उभरा है। भाजपा के लिये यह माया मिली न राम वाली कहावत सच करने जैसा ही है। एक तो चुनाव अभियान की वजह से कोरोना संकट से समय रहते न निपटने का आरोप केंद्र सरकार पर लगा तो दूसरी ओर बंगाल का किला भी हाथ से चला गया। इतनी ज्यादा रैलियां करने और पार्टी का राज्य में कोई चुनावी चेहरा न होने के कारण सफलता और असफलता का श्रेय तो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को ही लेना होगा। चुनाव के बाद बवाल-हिंसा और नंदीग्राम परिणाम का विवाद इसी कड़ी का हिस्सा है।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार


कल के संकट

चार मई के ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में प्रकाशित ‘दीर्घकालीन संकट के मद्देनजर बने नीति’ लेख ने विशेष आकर्षित किया। भारत की अर्थव्यवस्था में जो वृद्धि होने की संभावना थी अब वह वृद्धि नहीं हो पायेगी। उसका कारण कोरोना की दूसरी लहर चरम बिन्दु पर पहुंचती जा रही है। वर्ष 2021-22 में आर्थिक स्थिति की दर बढ़ने की संभावना थी जो अब नहीं हो पायेगी। रोजगार ठप हो जायेंगे। अब लाभ को संतुलन में बदलने के लिए बहुत समय लगेगा। सभी जगह लोग भयभीत हो रहे हैं। निश्चित ही इसका प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। 

अशोक कुमार ठाकुर, दरभंगा, बिहार


इनसानियत का पाठ

आज कोरोना महामारी ने समाज में जाति-धर्म के भेदभाव को मिटा दिया है। सभी धर्मों के लोग एकजुट होकर महामारी के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ रहे हैं। सभी ने इंसानियत के धर्म को अपना लिया है। कोई ऑक्सीजन सिलेंडर तो कोई खाने का प्रबंध, लंगर, बेड मुहैया करवा रहा है। वहीं कुछ प्लाज्मा दान कर व अन्य कार्यों से देश के प्रति अपनी-अपनी सेवाएं दे रहा है। कोरोना हम सभी को इंसानियत का पाठ भी सीखा कर जाएगा।

विकास बिश्नोई, हिसार

जय-पराजय के बीच

May 05, 2021

तीन मई के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘इस जय-पराजय के सवाल और सबक’ लेख में लेखक ने दोटूक कह दिया है कि कोरोना के इस भीषण संकट में चुनाव नहीं कराये जाने चाहिए थे। यह घोषणाओं और भविष्यवाणियों का समय नहीं, बल्कि कोरोना के अबाध संक्रमण को रोकने के गहरे आकलन और उपायों का समय था। चुनाव और कोरोना के असंतुलन के बीच यह भी सही कहा गया है कि कोरोना के केस और मौत के आंकड़ों में हमने विश्व रिकॉर्ड तक बना लिया। हमारी चिकित्सा-व्यवस्था तक चरमरा गयी। अनगिनत सवाल और जवाब नदारद। सत्तारूढ़ दल कोरोना से प्रजा को बचाने के बजाय जीतने की जद्दोजहद में ही मशगूल रहे। लेखक ने पांचों राज्यों का ब्योरेवार विश्लेषण भी पटल पर रखा। दलों की अंतर्कलह भी सामने आयी, परन्तु मीडिया और चुनाव-प्रचार में पश्चिम बंगाल का मुद्दा मोदी और ममता ही बनकर छाया रहा, जिसकी जड़ में हिंसा, असंसदीय भाषा और नैतिकता की धज्जियां उड़ गयीं। खेला तो अन्ततः मतदाता के साथ ही हुआ।

मीरा गौतम, जीरकपुर


सावधानी हटी

पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के रुझानों ने टीएमसी को बहुमत मिलता दिखाया तो उसके समर्थक मतगणना कक्षों के बाहर इकट्ठा होने लगे और देखते ही देखते कई जगहों पर भीड़ लग गई। उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा सुझाए गए सभी नियमों का उल्लंघन किया। यह सही है कि विजय जुलूस निकालने का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है। लेकिन कोरोना काल में ऐसी घटनाएं हमारी समस्याओं को और बढ़ाएंगी।

नरेंद्र के. शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

परिणामों के निष्कर्ष

May 04, 2021

तीन मई के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का ‘इस जय- पराजय के सवाल और सबक’ लेख चार राज्यों आैर एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव करवाने के औचित्य पर सवालिया निशान लगाने वाला था। इसके लिए केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी से चूके हैं। इस चुनाव ने वामपंथ तथा कांग्रेस की कमजोर स्थिति को दर्शाया तथा डीएमके के सत्ता प्राप्त करने का बिगुल बजाया है। होना तो यह चाहिए था कि जब तक कोरोना का प्रकोप नियंत्रित नहीं होता, किसी प्रकार के चुनाव न कराये जाते।

शामलाल कौशल, रोहतक


दमखम की जीत

चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के चुनावों में सबसे ज्यादा फोकस पश्चिम बंगाल पर था। लेकिन तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी की तारीफ करनी होगी कि एक अकेली महिला भले ही खुद हार गई लेकिन अपने 214 साथियों को जिता दिया। ममता बनर्जी ने अपने दम पर किला फतह कर देश की सभी महिलाओं को अपनी शक्ति का अहसास करा दिया है कि महिला भी किसी से कम नहीं है।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.


आक्सीजन के स्रोत जंगल

May 03, 2021

स्थानीय भागीदारी

वन-संपदा मानवीय जीवन की अमूल्य धरोहर होती है। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग से पर्यावरण को भारी नुक़सान हुआ है। कोरोना-काल में आक्सीजन की भारी कमी महसूस की जा रही है। वनों से ही मिलने वाली आक्सीजन से हमारा वातावरण सुधरता है। जंगलों में आग का लगना शासन-प्रशासन की घोर लापरवाही को दर्शाता है। स्थानीय लोग अगर अपनी कुछ जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों को जलाते हैं तो प्रशासन को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। स्थानीय लोगों की भागीदारी द्वारा प्रोत्साहन देकर जंगलों को बचाया जाना चाहिए।

सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा, गुरुग्राम


पौधारोपण को बढ़ावा

मार्च, 2020 में जब लॉकडाउन लगाया गया तो ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और नदी नालों का प्रदूषण भी न्यूनतम स्तर पर आ गया था। वातावरण को ऑक्सीजन देने वाले पेड़-पौधों की कटाई न्यूनतम होगी तो वातावरण में ऑक्सीजन ज्यादा उत्सर्जित होगी। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग से पुराने वृक्ष जो कि ऑक्सीजन के बड़े स्रोत नष्ट माने जाते थे, अग्निकांड में भस्म हो गए। वातावरण में ऑक्सीजन उत्सर्जन करने वाले पेड़-पौधों की रक्षा करके ही पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है। इसलिए मानसून सीजन में अधिकाधिक पौधारोपण को बढ़ावा दिया जाए।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद

स्वच्छ पर्यावरण हेतु

हमारे वातावरण में प्राणवायु अशुद्ध होने के कारण प्रकृति प्रदत्त सौगात पेड़ों, जंगलों का अग्नि की भेंट चढ़ना मनुष्य के स्वार्थ का ही परिणाम है। विकास की दौड़ में पेड़ों का अवैध कटान वातावरण प्रदूषण बढ़ाने में पर्याप्त है। वहीं दूसरी ओर, वृक्ष ऑक्सीजन मुहैया करवाने के नि:शुल्क कारखाने हैं। वृक्षों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। अधिक से अधिक पेड़ लगाकर उन्हें उचित संरक्षण प्रदान कर वन महोत्सव की सार्थकता सिद्ध करनी होगी। वातावरण की शुद्धता के लिए वनस्पतियों का महत्व महामारी काल के दौरान रामबाण साबित हो सकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


सेहत की शर्त

उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग लोगों की लापरवाही का कारण है। वन न केवल अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, बल्कि जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन देकर हमें कृतार्थ करते हैं। आज कोरोना महामारी के दूसरे दौर में जिस तरह से संक्रमित लोग ऑक्सीजन के न मिलने से बेमौत मारे जा रहे हैं, उससे हम ऑक्सीजन के महत्व को अच्छी तरह समझ सकते हैं। हमें न केवल वनों की अंधाधुंध कटाई रोकनी चाहिए, बल्कि जलने से भी बचाना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा पौधारोपण करना चाहिए। हमारी संस्कृति में वनों का विशेष महत्व है।

शामलाल कौशल, रोहतक


सामूहिक जिम्मेदारी

वातावरण में दूषित हवा से लाखों जिंदगियां मौत के मुंह में चली जाती हैं। पेड़-पौधे ऑक्सीजन का मुख्य स्रोत हैं। देश में बढ़ रही बेहिसाब आबादी का दबाव वन संपदा पर भी पड़ा है। वन विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष पौधारोपण के जो आंकड़े प्रकाशित किए जाते हैं वे आंकड़े वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं। देखरेख के अभाव में अधिकांश पौधे सूख जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों अथवा अन्य मार्गों पर जिस तरह की हरियाली होनी चाहिए वह अभी तक नहीं है। व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को वृक्षों के महत्व को समझाना होगा।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम


प्राणवायु की रक्षा

उत्तराखंड का हिमालयी जंगल अपने हरे-भरे पेड़-पौधों, दुर्लभ वनस्पतियों के लिए पूरे विश्व में विशेष महत्व रखता है। इस मौसम में वन क्षेत्र की आग अनियंत्रित होना स्थानीय लोगों की जंगल के प्रति बेरुखी और प्रशासन की उदासीनता को ही उजागर करता है। जीवन के लिए एक सिलेंडर भर आक्सीजन कितनी कीमती होती है, कोरोना संकट काल ने एक बार फिर इसका अहसास करा दिया है। पेड़ों को बचाने के लिए सरकार द्वारा इस मद में वित्तीय आवंटन बढ़ाकर स्थानीय लोगों की भागीदारी से वन क्षेत्र के पोषण की जरूरत है।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद


पुरस्कृत पत्र

संरक्षण से संतुलन

कोरोना की बढ़ती और बेकाबू होती रफ्तार ने सरकार और आमजन को आक्सीजन की कीमत का अहसास करा दिया है। कभी इस बात को गंभीरता से लिया ही नहीं गया कि आक्सीजन पैदा होने के स्रोत क्या हैं। मान लिया जाता है कि पेड़-पौधों का काम ही मानव जाति के लिए आक्सीजन तैयार करना है। अब जब आक्सीजन की कमी हो रही है तो उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग की तरफ ध्यान गया है। प्राकृतिक रूप से मिलने वाली सरल, सुलभ आक्सीजन को प्राप्त करने की चाबी हमारे हाथ में है। बस उसे प्रयोग करने का तरीका बदलने की जरूरत है। पर्यावरण का संतुलन पेड़ बनाते हैं और पेड़ों को मनुष्य लगाते हैं तो फिर दूसरे-तीसरे की तरफ देखने की आवश्यकता ही नहीं है।

जगदीश श्योराण, हिसार

लचीला दृष्टिकोण

May 01, 2021

वायरस को रोकने के लिए लॉकडाउन एक समाधान नहीं है। कोरोना को रोकने के लिए एकमात्र समाधान नियमों का कठोरता से पालन करना है। देश में धारा-144 को लागू किया जाना चाहिए। वायरस को नियंत्रित करने के लिए सावधानियां बरतना और धारा-144 ही सबसे अच्छा विकल्प है। यदि ऐसा करते हैं तो हमारी अर्थव्यवस्था भी प्रभावित नहीं होगी और वायरस को नियंत्रित करने में सक्षम होंगे। हमें लचीला दृष्टिकोण नहीं अपनाना होगा।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदरनगर


मिलकर काम करें

वैश्विक महामारी कोरोना की दूसरी लहर ने हा-हाकार मचाया है। इस मुश्किल की घड़ी में भी नेता एक-दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। यह समय किसी के भी गुण-दोष निकालने का नहीं है, बल्कि एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने का है। महामारी से कैसे बाहर निकलें, इस पर फोकस किए जाने की जरूरत है। इस वक्त सभी राजनीतिक, सामाजिक संगठन एकसाथ मिलकर काम करें तो बेहतर होगा।

प्रदीप कुमार दुबे, देवास


कोरोना काल में जुआ

क्रिकेट के नाम पर जुआ ख्ोलने की बात सुनकर कहीं न कहीं हमको सोचने को मजबूर कर दिया है कि समाज में क्रिकेट भी अब जुए में परिवर्तन हो गए हैं। आईपीएल को लेकर देश में कई जगह पर जुआ चल रहे हैं। प्रशासन को आईपीएल के नाम पर चल रहे जुए को बंद करने और इससे जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम


महामारी में कालाबाजारी

देश में कोरोना की भयावह स्थिति के बीच ऑक्सीजन और आवश्यक दवाओं की ब्लैक मार्केटिंग जोरों पर है। मरीजों के परिजन भारी कीमतों पर ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदने को मजबूर हैं। सरकार और प्रशासन सिर्फ बयान देकर पल्ला झाड़ लेती है। सरकार को ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

जफ़र अहमद, मधेपुरा, बिहार