आपकी राय

खतरनाक खेल

Mar 31, 2021

छब्बीस मार्च को दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित राजकुमार सिंह के ‘सत्ता नहीं व्यवस्था पर भी सवाल’ लेख में सत्ता और व्यवस्था दोनों पर कटाक्ष किये गये हैं। सत्ता और पुलिस की मिलीभगत का खेल कोई नया नहीं है। उद्योगपति मुकेश अंबानी की सुरक्षा में चूक के बहाने पूरे देश के तंत्र की सुरक्षा खामियां सामने आयी हैं। मुम्बई धन और अपराधों के बीच सत्ता तंत्र की बाज़ीगरी का अड्डा बन चुकी है। परमवीर, सचिन बाजे और अनिल देशमुख जैस नेताओं की भ्रष्टाचार में संलिप्तता के यही मायने हैं। एक ओर आज़ादी का बड़ा जश्न और दूसरी ओर आज़ादी की अवधारणा पर ही प्रहार किये जा रहे हैं। परमवीर सिंह के आरोपों मे कितना दम है समय बताएगा। हर जगह पैसे का खिलंदड़ापन जारी है। ऐसे खेल बिना राजनीतिक शह के संभव ही नहीं हैं। लेखक ने बड़ी बारीकी से हर मुद्दे पर अपना मत रखा है।

मीरा गाौतम, जीरकपुर

पड़ोस नीति

प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा हमारी पहली पड़ोस नीति को दर्शाती है। संबंधों को बदला जा सकता है लेकिन पड़ोसी देशों को नहीं बदला जा सकता है। मोदी ने इंदिरा गांधी के योगदान को भी याद किया। ये सभी चीजें वसुधैव कुटुम्बकम की हमारी नीति को दर्शाती हैं।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

 

नयी चुनौती और बचाव Other

Mar 29, 2021

सबको टीका

भारत में कोरोना संक्रमण फिर बढ़ने लगा है। महाराष्ट्र सहित देश के अन्य राज्यों में भी हालात बेकाबू हो रहे हैं। इस स्थिति के लिए आम आदमी जिम्मेदार है। पहले जैसे हालात बनने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अब लाॅकडाउन जैसा कदम समाधान नहीं है। इस संक्रमण को रोकने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को नये सिरे से कमर कसनी होगी। आम आदमी को भी समझना होगा कि कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है। टीकाकरण अभियान को विस्तार देना होगा। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति कहीं भी, कभी भी टीका लगवा सके।

सोहन लाल गौड़, कैथल

लापरवाही का नतीजा

कोरोना वैक्सीन आने के बाद लोग लापरवाह होते जा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि कोराेना कुछ नहीं होता। असली दर्द उनसे पूछो, जिन्होंने कोरोना के कारण अपनों को खोया है। इसलिए जरूरी है कि सरकार द्वारा जारी समय-समय पर दिशा-निर्देशों का पालन किया जाये। नियमों का सही तरीके से पालन ही हमें कोरोना जैसी महामारी से बचा सकता है। इसके बचाव के लिए मंत्र है—'मास्क का करो सही उपयोग, पास न आएगा कोरोना रोग। बार-बार हाथों को धोएं, कीटाणुओं से मुक्त हो जाएं। सामाजिक दूरी का भी रखें ध्यान, फिर न कोरोना कर पाएगा परेशान।'

हरविंदर कौर, जंगपुरा, मोहाली

बचाव में ही बचाव

कोरोना महामारी दोबारा से देश में पैर पसार रही है। दोबारा महामारी का आना चिंता का विषय है। इससे बचने का एकमात्र उपाय है खुद की सुरक्षा और केंद्र सरकार की तरफ से टीकाकरण अभियान में तेजी। टीकाकरण अभियान में तेजी, खुद की सुरक्षा और केंद्र सरकार की सख्ती से ही कोरोना पर काबू पाया जा सकता है। जो लोग कोरोना वैक्सीन लगवाने से कतरा रहे हैं, वे बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। इस समय बचाव में ही बचाव है तथा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना जरूरी है।

सतपाल सिंह, करनाल

जागरूकता बचाएगी

देश में एक तरफ कोरोना वैक्सीन का टीकाकरण चल रहा है, वहीं दूसरी ओर कई राज्यों में बढ़ते मामलों ने चिंताओं को बढ़ा दिया है। साल की शुरुआत में टीकाकरण के साथ ही कोरोना बचाव के सारे नियम ढीले पड़ गए। सामाजिक दूरी, मास्क को लोग बीते दिन की बात कहने लगे। इसी लापरवाही की वजह से लोग फिर कोरोना पॉजिटिव पाए जा रहे हैं। लोग लापरवाह होते जा रहे हैं। बाजारों में व समारोहों में वे मास्क नहीं पहन रहे हैं वहीं दूसरी ओर वे सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर रहे। टीकाकरण के दौर में भी हमें जागरूकता ही कोरोना संक्रमण से बचाएगी।

प्रदीप कुमार दुबे, देवास

कोरोना संग जीना

कोरोना ने फिर दस्तक दी है, जिसके कारण लोगों की चिंता बढ़ी है। महामारी के दोबारा फैलाव के कारण देश के कई हिस्सों में नाइट कर्फ्यू व लाॅकडाउन की घोषणा भी करनी पड़ी है। इस महामारी ने हमारे सामने एक नयी चुनौती पैदा कर दी है। कोरोना की इस नयी चुनौती से निपटने के लिए हमें फिलहाल कोरोना के साथ ही जीना पड़ेगा। इसके बचाव के लिए जरूरी तीन उपाय मास्क, सुरक्षित दूरी व सैनिटाइजर को अपनाना होगा, वैक्सीन लगवाना होगा तथा बचाव में ही बचाव है, इस नीति पर चलना पड़ेगा।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

जीवनशैली बदलें

कोरोना विषाणु के बदलते हुए स्वरूप से मानव जीवन को गम्भीर खतरा और नयी चुनौती पैदा हुई है। विश्व और राष्ट्र में विषाणु के बदलते हुए स्वरूप से बचाव के लिए अनेक उपाय किये जा रहे हैं। कोरोना के विरुद्ध रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने वाला अंतर्राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान जारी है। हालांकि भारत की प्राचीन योग विद्या व्यक्ति के महामारी से बचाव, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समाप्त या सीमित करने में सक्षम है। कोरोना काल के भयावह दौर का मुकाबला सकारात्मकता से करते हुए जीवनशैली में अपेक्षित परिवर्तन हुआ है। राष्ट्र में कोविड-19 सुरक्षा नियमों की अनुपालना में शिथिलता अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

प्राकृतिक जीवन

कोरोना प्रतिदिन अपना रूप बदल रहा है। आने वाले समय में हमें और भी नये खतरनाक विषाणुओं का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में हमें यह चाहिए कि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा जागरूक व संवेदनशील रहे। हमें विषाणुओं से बचने के लिए प्रकृति से तालमेल, सामंजस्य बिठाना पड़ेगा, क्योंकि प्रकृति है तो जीव व जीवन का अस्तित्व है। वर्तमान में कोरोना के संदर्भ में हमें कोरोना वैक्सीन के साथ ही मॉस्क, सैनिटाइजर व सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखना होगा। सजगता और सतर्कता के साथ ही हमें प्रकृति से छेड़छाड़ को समय रहते बंद करना होगा। प्रकृति के साथ तालमेल, सामंजस्य के साथ एहतियात बरतने में ही असली बचाव है।

सुनील कुमार महला, पटियाला

समरसता का पर्व

Mar 27, 2021

मानवीय जीवन में हर्षोल्लास एवं उमंग का प्रतीक उत्सव है होली। इस खास रंग भरे उत्सव में लोग पुराने द्वेष, क्लेश को त्याग कर एक-दूसरे पर रंग-गुलाल डालते हैं और गले मिलकर जीवन में आनंद का उत्सव मनाते हैं। वहीं वृंदावन, मथुरा में फूलों वाली होली होती है, उसकी अप्रतिम छटा ही कुछ अलग होती है मानो साक्षात‍् राधा-कृष्ण की प्रेम लीला रंगोत्सव में सारा वृंदावन सराबोर हो उठता है। हम जीवन में हर्ष का गुण गाएं, सबको खुशियां मिले, यही संदेश जन-जन तक पहुंचाएं।

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी


बेनकाब तंत्र

26 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकशित ‘सत्ता नहीं, व्यवस्था पर भी सवाल’ लेख में लेखक श्री राजकुमार सिंह ने महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ पार्टी और पुलिस के नापाक गठजोड़ का सच बताया है। इससे पता चलता है कि देश की राजनीति किस हद तक गिर गई है। यह भी कि सत्ता दोनों हाथों से लूट खसोट के लिए कहां तक जा सकती है। मार्गदर्शक लेख के लिए साधुवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार


गौरैया पर संकट

बदलती जीवनशैली से गौरैया हमारे जीवन से विलुप्त होती जा रही है। कुछ साल पहले तक घर आंगन में गौरैया की चहचहाहट से समझ में आ जाता था सूर्यदेव ने चहूं ओर प्रकाश फैलाना शुरू कर दिया है। घरों में खेतों में दिखने वाली गौरैया अब लगभग विलुप्त ही हो गई है, जिसका कारण हमारी बदलती जीवनशैली ही है। यदि संरक्षण की दिशा में जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो ये पक्षी किस्से-कहानियों में ही सिमट कर रह जाएंगे।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़


बढ़ते अपराध

चोरी, लूट, आये दिन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार आदि अपराध प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। वहीं पुलिस भी राजनीतिक दबाव के चलते पारदर्शी ढंग से जांच नहीं कर पाती। ऐसा लगता है सभी अपनी स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे हैं तो राजनीतिज्ञ अपने वोट बैंक के चक्कर में लोगों को गुमराह करने में लगे हुए हैं। यही हाल रहा तो एक दिन आम जनता को विवश होकर सड़कों पर उतरना पड़ेगा।

प्रकाश हेमावत, टाटा नगर, रतलाम

अनर्गल बयानबाजी

Mar 26, 2021

राजनीति की परिभाषा वर्तमान दौर में दम तोड़ती नजर आती है। राजनेता अपनी कुर्सी मोह में अनर्गल बयानबाजी के तरकश से तीर निकालकर एक-दूसरे को प्रहार करने में अपनी शान समझते है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा ही घमासान बयानबाजी की हदें पार करता नजर आता है। ममता बनर्जी ने भाजपा को अशांत औऱ राक्षसों की पार्टी करार दिया। इस तरह की पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता जनता जनार्दन के बीच क्या सिद्ध करना चाहती है?

योगेश जोशी, बड़वाह, म.प्र.


सतर्क रहें

पंजाब में कोरोना वायरस के बढ़ते केस गंभीर चिंता का विषय है। वहीं कोरोना संक्रमण से मौतों के आंकड़ों में कोई गिरावट नहीं आ रही है। इस बीमारी से बचने के लिए दूरी अथवा मास्क पहनना आवश्यक है। वैसे तो पंजाब सरकार कड़ा रुख अपना रही है लेकिन इसके साथ ही वैक्सीनेशन कार्यक्रम में और तेजी लाने की आवश्यकता है। वहीं त्योहार के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग की भी आवश्यकता है।

अनन्या राणा, कालका


सचेतक लेख

24 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून में आर. कुमार का 'वायरस के रूपांतरण से उपजी चुनौतियां' लेख सारगर्भित, चेताने वाला तथा कोरोना के बदलाव का विस्तार सहित खुलासा करने वाला रहा। टीकाकरण मुहिम चल रही है। लेकिन फिर भी सावधानी बरतने की जरूरत है। वहीं चिकित्सकों को इस वायरस के बदले स्वरूप के लिए नई वैक्सीन खोज करनी होगी।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


शहीदों का स्मरण

दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित शहीदों को नमन लेख पढ़कर आजादी के पुराने लम्हे ताजा हो गए। नौजवान पीढ़ी के लिए उनका बलिदान एक मिसाल है। हम इनकी शहादत को कभी भी मिटने नहीं देगे। कोरोना वायरस के कारण स्कूल में शहीदी दिवस नहीं मना सके, लेकिन उनके बनाये रास्ते पर चलकर याद कर सकते हैं।

संदीप कुमार वत्स, चंडीगढ़

नया खतरा

Mar 25, 2021

देश के कुछ राज्यों में कोरोना का कहर फिर से शुरू हो गया है। अगर देश में दोबारा लॉकडाउन लगता है तो क्या भारत सरकार लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था संभाल पायेगी? ऐसे में लोगों ने अपना रोज़गार खोया, शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि पंजाब में वैक्सीनेशन के काम में तेज़ी लायी जाये, क्योंकि यहां पर नया वायरस लोगों में पाया गया है। केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि राज्यों में लॉकडाउन नहीं लग सकता। जहां ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं, वहां सख्ती होगी। क्या लॉकडाउन असरदार होगा?

राघव जैन, जालंधर


असली मुद्दे

यह कितनी हास्यास्पद बात है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रावत का ध्यान महिलाओं की फटी हुई जींस पर गया और विरोध होने पर क्षमा भी मांग ली। लेकिन देश में बढ़ती महंगाई, घटते रोजगार, बढ़ती बेरोजगारी, गिरती शिक्षा व बदहाल स्वास्थ्य सुविधाएं और बढ़ते अपराधों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। आज जनप्रतिनिधियों को जिस तरफ सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, उस पर से जनता का ध्यान हटा कर वे अनर्गल बातें कर रहे हैं।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन


वसूली का कलंक

मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटकों से भरी स्कॉर्पियो के मामले ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त ने होटलों से पैसे के की बड़ी वसूली का आरोप लगाकर सरकार को भी कठघरे में ला खड़ा कर दिया है। गरमाती राजनीति के बीच सरकार को पारदर्शिता से काम लेकर अपना पक्ष रखना होगा। वसूली का कलंक महाराष्ट्र सरकार के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

अमृतलाल मारू 'रवि', धार म.प्र.

निजीकरण के खतरे

Mar 24, 2021

केंद्र सरकार राजस्व जुटाने के लिए रेलवे का निजीकरण करने की कोशिश में है। रेलवे के निजीकरण से रोजगार पर असर पड़ेगा। सरकारी कर्मचारियों को घर बैठना पड़ सकता है। वहीं निजी कम्पनियां रियायती दरों में यात्रियों को यात्रा नहीं करने देंगी। केंद्र सरकार रेलवे के रेस्तरां और केटरिंग को पहले ही निजी हाथों में दे चुकी है। उसका हाल भी आम यात्री पहले ही देख चुका है। निजीकरण करने से रेलवे ऐसी क्या विशेष सुविधाएं देगी जो सरकारी विभागों के पास नहीं हैं। निजीकरण से यात्रियों को अच्छी सुविधाएं मिले यह जरूरी नहीं है। निजीकरण से मनमानी बढ़ेगी।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

याद करें कुर्बानी

देशभक्तों के जन्मदिन या शहीदी दिन पर सबको उनकी कुर्बानियों को याद करते हुए यह प्रण लेना चाहिए कि कभी कोई ऐसा काम नही करेंगे, जो देशहित के लिए उचित न हो। नशे और फैशन को अपनी जिंदगी का मकसद न बनायें, बल्कि राष्ट्रहित के लिए हमेशा तत्पर रहना मकसद होना चाहिए। राजनेताओं और सत्ताधारियों को भी महान देशभक्तों की कुर्बानियों को याद करते हुए घटिया राजनीति से परहेज करना चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

सराहनीय पहल

हि.प्र. के स्वास्थ्य मंत्री ने कोरोना महामारी की अवधि में डॉक्टरों, पैरा-मेडिकल स्टाफ, सफाई-कर्मचारियों और अन्य स्वयंसेवकों को सम्मानित करने का निर्णय लिया है। स्वास्थ्य मंत्री का यह निर्णय प्रशंसा के योग्य है। कोरोना काल में अपनी जान की परवाह किये बिना जो आम लोगों की सेवा करते रहे, वे निश्चिय ही सम्मान के हकदार हैं। ऐसा करने से सेवारत व्यक्तियों का हौसला बढ़ेगा। देश के विकास के लिए इनका योगदान महत्वपूर्ण है।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

समझें किसान

Mar 23, 2021

यह काफी आश्चर्यजनक है कि किसान स्वयं टीकाकरण नहीं करवा रहे हैं, भले ही विरोध स्थल पर एक टीका केंद्र स्थापित किया गया हो। इससे गंभीर नतीजे हो सकते हैं क्योंकि विरोध स्थल में एक भी कोविड पॉजिटिव बीमार व्यक्ति सभी को संक्रमित कर सकता है। यह चिंताजनक स्थिति है। वैसे भी लोगों की लापरवाही के कारण देश कोरोना वायरस की एक और लहर का सामना कर रहा है। किसानों को स्थिति की गंभीरता को समझना चाहिए।

पलक बठला, कैथल


चुनावी हथकंडा

असम में विधानसभा चुनाव हेतु सभी राजनीतिक दल के नेताओं के प्रचार अभियान जोरदार तरीके से चल रहे हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति से उपजा हुआ एक विशेष डायलॉग ‘खेला हबे’ द्वारा तृणमूल कांग्रेस के कर्मियों ने अपने-अपने प्रचार अभियान के दौरान बार-बार दोहराया जाता है। वहीं पश्चिम बंगाल से लेकर अब असम में भी कांग्रेस के नेताओं तक ने इस विशेष डायलॉग का प्रचार जबरदस्त तरीके से किया है।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

कोरोना काल में अरबपति

Mar 22, 2021

तंत्र की मिलीभगत

कोरोना महामारी के चलते गिने-चुने लोगों की धन-संपत्ति में तीव्र गति से वृद्धि होना सरकार द्वारा अपनाई गयी नीतियों का परिणाम है। पूंजीपतियों ने देश के व्यापार, कृषि-उद्योग, बैंकिंग सेवाओं पर अपना आधिपत्य जमाया हुआ है। वहीं अरबपति अपने क्षेत्र में सरकार से भारी सब्सिडी लेकर श्रमिक, मजदूरों, किसानों का आजीवन शोषण कर अपने हाथों की कठपुतली बनाना चाहते हैं। इन सबके मद्देनजर सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों में सुधार करने की आवश्यकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल 

तकनीक का असर

ग्लोबल रिच लिस्ट 2020 के मुताबिक देश में धनकुबेरों की संख्या 137 से बढ़कर 177 हो चुकी है। पिछले साल अमीरों की संपत्ति में प्रतिदिन 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी तो गरीब लोगों की 50 प्रतिशत आबादी की संपत्ति में 11 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। ऐसा तकनीक से संचालित उद्योगों के कारण हो रहा है। उच्च तकनीक की मशीनों वाले कारखानों में मानवशक्ति की जरूरत कम से कम होती जा रही है। तकनीक से चलने वाली फैक्टरियों के बढ़ने से अरबपतियों कमाई और ज्यादा बढ़ेगी।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद

आर्थिक असमानता

कोरोना के डर ने उद्यमियों को मुनाफा कमाने का अवसर दिया है। कोरोना की भयावहता का फायदा उठाकर मास्क, सैनिटाइज़र, साबुन, पीपीई किट, हैंड रब, इम्युनिटी बूस्टर जैसे उत्पादों को अधिकाधिक दामों में बेचा। वैसे नये अरबपतियों के आने से देश में नए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है। इसके उलट यदि पूंजी अरबपतियों के खजानों में ऐसे ही समाती रही तो समाज में आर्थिक असमानता की खाई बढ़ने के साथ ही सामाजिक असमानता का संकट भी गहरायेगा।

अनिल कुमार पाण्डेय, पंचकूला

कोरोना काल के करतब

देश में अमीर और गरीब के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। कोरोना काल में जहां मजदूरों की घर वापसी से बेरोजगारी बढ़ी, वहीं अरबपतियों की संख्या में भी वृद्धि हुई। इसका कारण यह हो सकता है कि अरबपतियों ने अपने व्यापार को कोरोना काल में जारी रखा या फिर समय रहते अपने कारोबार को कोरोना से बचाने के लिए समझदारी दिखाई होगी। ऐसे में अपने यहां कर्मचारियों की छंटनी की या फिर वेतन आधे किये। वहीं उन पैकेजोंं का भी भरपूर फायदा लिया होगा जो केंद्र और राज्य सरकारों ने कोरोना से उबरने के लिए दिये थे।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

निजीकरण के खतरे

हैरानी की बात है कि कोरोना के नाजुक दौर में भी 137 उद्यमी अरबपति बन गए। इनका इस तरह आगे बढ़ने का अर्थ किसी के पिछड़ने से भी है। इनका इस कदर आगे बढ़ना तभी सार्थक होगा जब अन्य लोग भी इनसे लाभान्वित हों। यह साफ़ है कि सरकार अपने वास्तविक दायित्व से पल्ला झाड़कर तेजी से निजीकरण की ओर बढ़ रही है जो शुभ संकेत नहीं है। इससे शोषण, असंतोष और बेकारी बढ़ने से अराजकता बढ़ने की भी पूरी आशंका है। इन सभी पर पारदर्शी व ठोस नियंत्रण बहुत जरूरी है। तभी यह कदम कुछ कारगर हो सकता है।

वेद मामूरपुर, नरेला

कुछ गड़बड़ है

कोराेना काल में देश लॉकडाउन में बंद कर दिया गया। वहीं आमजन की समस्याओं और अर्थव्यवस्था की बिगड़ती स्थिति का दोष भी कोरोना के सिर मढ़ दिया गया। इसने लोगों के व्यापार और बाजार चौपट कर दिये, बेरोजगारी में वृद्धि हुई तो दूसरी तरफ रसूखदार लोग कोरोना की आड़ में भी अरबपति बन गये। यह सब सरकारी तंत्र की विफलता ही है। कोरोना काल के बहाने बड़े घरानों को आर्थिक सुविधाएं दी गईं। ऐसे कुछ घरानों को छूट के साथ मनमानी की भी खुली छूट दी गई। वैसे यह जांच का विषय है कि जब देश भूख और बेरोजगारी से जूझ रहा था तो ये उद्यमी अरबपति कैसे बन गए।

जगदीश श्योराण, हिसार

पुरस्कृत पत्र

शुभ संकेत नहीं

भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश मंे अरबपतियों का इजाफा होना सामाजिक ढांचे के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह सरकार की पूंजीवादी नीतियों का परिणाम है कि अमीर अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब अत्याधिक गरीब। बेरोजगारी के मद्देनजर अमीर-गरीब के मध्य यह खाई एक नयी सामाजिक समस्या पैदा कर रही है। सरकारें पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही हैं। तीन नये कृषि कानून भी उसी नीति का हिस्सा हैं। गत एक वर्ष के दौरान विभिन्न सरकारी संस्थान निजी हाथों को सौंपे जा चुके हैं। इससे न सिर्फ रोजगार के अवसर घट रहे हैं बल्कि गरीब का शोषण भी बढ़ा है। सरकारी नीतियां गरीबी और घनी आबादी को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम

आपकी राय Other

Mar 20, 2021

बदलाव की जरूरत

बीते मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने महिलाओं के पहनावे को लेकर टिप्पणी की थी। उनके इस बयान पर अचानक विपक्षी दलों, महिला संगठनों तथा आम लोगों ने भी आपत्ति जतायी। आम लोगों का मानना है कि एक मुख्यमंत्री के मुख से महिलाओं के प्रति इस तरह की टिप्पणी शोभा नहीं देती। इस संदर्भ में कुछ सामाजिक अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि किसी भी राजनेता द्वारा महिलाओं को उसके कपड़ों से आंकना ठीक नहीं है बल्कि हमें स्वयं में बदलाव लाने की जरूरत है।

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी


पाक के इरादे

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत से बात करने की गुहार लगाई है। उसकी नीति और नियति में अचानक बदलाव क्यों आया? यह बदलाव भारत का पाकिस्तान के साथ बातचीत न करने के कारण हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। दूसरी तरफ पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है। वह चीन के हाथों की कठपुतली बन चुका है। पाकिस्तान ने अपने देश को चीन के हाथों में गिरवी रख दिया है। पाकिस्तान ने शर्त रखी है कि वार्तालाप में भारत पहल करे।

नरेंद्र कुमार शर्मा, जोगिंदर नगर, मंडी


जवाबदेही तय हो

‘बाटला हाउस’ एनकाउंटर में आईएम आतंकी आरिज को फांसी की सज़ा’ खबर पढ़ी। न्यायालय ने तो आतंकी आरिज को सज़ा-ए-मौत की सज़ा सुना दी, लेकिन उन लोगों को भी क्या सजा नहीं मिलनी चाहिए, जो अपने राजनीतिक फायदे के लिए आतंकियों को मासूम और एनकाउंटर को फर्जी बता रहे थे? केंद्र सरकार को चाहिए कि एक ऐसा कानून बनाए, जिसमें आतंकियों को बेकसूर और एनकाउंटर को फर्जी बताने वाले नेताओं की जवाबदेही तय हो।

राम मूरत ‘राही’, इंदौर, म.प्र.

बेनकाब राजनीति Other

Mar 19, 2021

17 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून में सम्पादकीय ‘बाटला की हकीकत’ के सन्दर्भ में जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के हत्यारे आतंकी आरिज खान को दिल्ली की साकेत कोर्ट द्वारा मृत्यु दण्ड का फैसला तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक नेताओं की कार्यप्रणाली पर करारा प्रहार है। यह उनकी तुष्टीकरण की राजनीति को बेनकाब करता है। 13 सितंबर, 2008 को राजधानी दिल्ली के विभिन्न इलाकों में बम धमाकों में मारे गए 39 निर्दोष लोगों की मौत का मूल्य इन राजनेताओं की नजर में कोई मायना नहीं रखता था किन्तु बाटला हाउस के एक फ्लैट में छिपे दो संदिग्ध आतंकवादियों का मुठभेड़ में मारा जाना मानवाधिकार का हनन था।

लाजपत राय गर्ग, पंचकूला


निजीकरण के खतरे

केंद्र सरकार द्वारा कुछ बैंकों का निजीकरण किया जा रहा है जो सरासर अनुचित है। इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर एक अभूतपूर्व कदम उठाया था, ताकि राष्ट्र को एक विश्वसनीय माध्यम मिले, इसमें सरकार की गारंटी भी होती है। सरकार को बैंकों का निजीकरण न कर जनता को सरकार द्वारा दी जाने वाली गारंटी बनी रहनी चाहिए। निजी बैंकों का कोई भरोसा नहीं रहेगा। वह अपने तौर-तरीकों से जनता का शोषण करेंगे। अगर निजी बैंक वाले जनता का पैसा डूबाे भी देंगे तो सरकार पल्ला झाड़ लेगी।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.


ज्ञान में वृद्धि

चौदह मार्च के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में अभिषेक कुमार सिंह का ‘मानव की मंगल कामना को लगे पंख’ लेख खगोलीय ज्ञान में वृद्धि करवाने में कामयाब रहा। आकाशीय बुलंदियों को छूते हुए मंगल ग्रह के धरातल से उपलब्ध मिट्टी का निरीक्षण-परीक्षण संचित ज्ञान कोष में वृद्धि करेगा। लोकहित की कामना लिए महान उपलब्धियां विज्ञान क्षेत्र में प्रासंगिक एवं अनुकरणीय साबित होंगी।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

आपकी राय

Mar 18, 2021

विरोध के निहितार्थ

कुछ किसान संगठनों का आंदोलन खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। यह कुछ किसान नेताओं का हठ है। वे किसानों को धोखा दे रहे हैं। ममता बनर्जी की मदद के लिए अब ये नेता पश्चिम बंगाल में हैं। हालांकि, उन्होंने बताया कि उनका आंदोलन विशुद्ध रूप से गैर-राजनीतिक है परन्तु अब वे पश्चिम बंगाल में किसान सम्मान निधि को लागू नहीं करने वाली ममता सरकार को जीताना चाहते हैं। इन नेताओं की खेती में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे केवल अपनी राजनीति और फायदे के लिए काम करना चाहते हैं। 

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर


सावधानी जरूरी

कोरोना के मामले जबरदस्त रूप से बढ़ रहे हैं। इसके कारण पीएम नरेंद्र मोदी ने भी बैठकें करना बंद कर दिया है। पंजाब और महाराष्ट्र जैसे कुछ क्षेत्रों में तालाबंदी की संभावना देखी जा सकती है। महामारी के प्रसार से बचने के कदमों को टीकाकरण के लिए भी प्रेरित किया जाना चाहिए। मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइजर को अत्यधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। राज्यों को महामारी के दूसरे और तीसरे चरण का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए सावधानी बरतनी चाहिए।

 राजबीर सिंह, शाहकोट


बंद किसके खिलाफ? 

कुछ किसान यूनियनों ने 26 मार्च को भारत बंद का आह्वान किया है, जिसमें सड़क और रेल सहित सभी परिवहन सेवाएं और व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहेंगे। सवाल यह है कि देश की आम जनता ने इनका क्या नुकसान किया है? इसकी वजह से अर्थव्यवस्था और लोक सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जो केवल लोगों के संकटों को बढ़ाएगा। किसानों द्वारा भारत बंद विकास की गति को विराम लगायेगा, वहीं आम आदमी इससे परेशान होगा।

बेनिका गैरा, चंडीगढ़

निष्ठा और अविश्वास Other

Mar 17, 2021

12 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के लेख ‘विश्वास-अविश्वास का राजनीतिक सच’ में स्पष्ट हुआ है कि राजनीति में आपसी विश्वास ख़त्म हो चुका है और इसकी जगह दांवपेचों ने ले ली है। सच्चाई यही है कि अब राजनीति व्यक्ति विशेष को केन्द्र में रखकर ही की जा रही है। लेखक का मानना है कि चेहरा बदलकर चुनाव जीतने की गारंटी पक्की हो, ज़रूरी नहीं। बीच सैशन में इस तरह की क़वायद से खलबली तो मचती ही है। अब निष्ठा केवल सत्ता के प्रति रह गयी है। चाको जैसे नेता एक ही दल के भरोसे क्यों बैठ जाते हैं, यह जानते हुए भी कि वहां तो पहले से ही आगे बढ़ने का रास्ता बन्द कर दिया जाता है। तीरथ महज एक साल में, किस चमत्कार से लोगों का दिल जीतेंगे, यह उन्हें अपने संकल्पों और कार्यों से सिद्ध करना है। सार्थक लेख के लिए बधाई।

मीरा गौतम, जीरकपुर

नियंत्रण जरूरी

16 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का ‘निजी क्षेत्र पर सख्त नियंत्रण जरूरी’ लेख सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को निजी क्षेत्र को बेचने के बाद मनमाने ढंग से जनता को लूटने से बचाने पर नियंत्रण करने का सुझाव देने वाला था। देश में अगर सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में सुधार किया जाए तो जहां कुछ सामाजिक उद्देश्य प्राप्त होंगे, कीमतों पर नियंत्रण होगा वहीं निजी क्षेत्र को भी संदेश मिलेगा। मिश्रित अर्थव्यवस्था को अगर ठीक प्रकार से चलाया जाए तो वह आज भी कारगर हो सकती है। असल में राजनेता, अधिकारी और उद्यमी, ये तीनों मिले हुए हैं!

शामलाल कौशल, रोहतक

हकीकत पता चले

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने ऊपर हुए कथित हमले के लिए भाजपा को दोषी माना है। भाजपा का कहना है कि सियासी लाभ उठाने के लिए ममता बनर्जी ड्रामा कर रही है। निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चल सकता है कि दोषी कौन है। वैसे असलियत सामने आनी चाहिए कि ममता नाटक कर रही है या उन पर हमला हुआ है ताकि लोकतंत्र में राजनीति करने वाले इन दलों व नेताओं की असलियत व कुरूप चेहरा तो जनता के सामने आए।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

विश्वास की कसौटी Other

Mar 16, 2021

12 मार्च को ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में प्रकशित राजकुमार सिंह का लेख ‘विश्वास-अविश्वास का राजनीतिक सच’ भारतीय राजनीति की हकीकत बयां करने वाला था। वास्तव में राजनीति जनता के विश्वास से इतना छल कर चुकी है कि जनता उस पर विश्वास ही नहीं करती। फिर भी राजनेता विश्वास-अविश्वास की राजनीति खेलते ही रहते हैं। एक समय आएगा जब राजनेताओं को जनता फिर विश्वास की कसौटी पर कसकर बाहर का रास्ता दिखायेगी।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार


बातचीत शुरू करें

हरियाणा सरकार के खिलाफ विधानसभा में पेश किया गया अविश्वास प्रस्ताव आंकड़ों के हिसाब से बेशक गिर गया लेकिन सरकार को राज्य के हालात समझने की जरूरत है। देहात में किसान आंदोलन के प्रति व्यापक समर्थन और सरकार के खिलाफ जन आक्रोश बहुत बढ़ा है। सत्तारूढ़ दोनों दलों के नेताओं और अधिकारियों के कार्यक्रम नहीं हो पा रहे हैं। कानून व्यवस्था धीरे-धीरे राज्य में ढीली पड़ती जा रही है। केन्द्र व राज्य सरकारें शीघ्र किसानों से बातचीत की प्रक्रिया आरंभ करें।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

टीकाकरण का सरलीकरण Other

Mar 15, 2021

जन संसद की राय है कि देश में जारी टीकाकरण अभियान का सरलीकरण किया जाना चाहिए, जिससे हर आदमी समय रहते टीकाकरण का लाभ उठा सके। इसके लिये चिकित्सा केंद्रों पर पंजीकरण की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए। इसे जनांदोलन की तरह चलाया जाना चाहिए।

तेजी आयेगी

वर्तमान में कोरोना का वैक्सीनेशन कार्य पूरे देश में चल रहा है। कोरोना वारियर्स एवं फ्रंटलाइन वर्कर्स के टीकाकरण के बाद अब सीनियर सिटीजन एवं पैंतालीस से उनसठ वर्ष के बीच के गंभीर बीमारियों से पीड़ित नागरिकों के टीकाकरण का कार्य प्रगति पर है। सरकारी स्तर पर तो यह प्रक्रिया जारी रखी जानी चाहिए। निजी तौर पर भी शुल्क का भुगतान कर टीकाकरण की व्यवस्था है। निजी क्लिनिकों में सभी आयु वर्ग के लोगों का स्वेच्छा से टीकाकरण होना चाहिए। इससे वैक्सीनेशन के कार्य का सरलीकरण होगा एवं टीकाकरण के इच्छुक सभी नागरिक लाभान्वित हो सकेंगे।

ललित महालकरी, इंदौर

सरलीकरण हो

देश में आम लोगों के लिए कोविड टीकाकरण का अभियान शुरू करना सरकार का एक स्वागतयोग्य कदम है। इस चरण में 45 से 59 वर्ष बीच की आयु के गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों का टीका लगाने का प्रावधान है। सरकार ने आनलाइन पंजीकरण का जो कार्यक्रम बनाया है, उसे और सरल करने की ज़रूरत है। टीकाकरण प्रक्रिया का सरलीकरण किये बिना देश के प्रत्येक नागरिक का टीकाकरण संभव नहीं। थोड़ी-सी ढिलाई पूरे देश के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

आम की पहुंच में हो

आमजन को चाहिए कि बिना किसी भय के सरकार के निर्देशानुसार टीका लगवाएं। टीकाकरण अभियान को सरल बनाने के लिए सरकारी अस्पताल के साथ-साथ शहर और गांवों की सरकारी डिस्पेंसरी में भी कोविड वैक्सीन उपलब्ध हो, जिससे टीका दूरदराज वाले लोगों को भी आसानी से लग सके क्योंकि हर नागरिक आनलाइन पंजीकरण नहीं करवा सकता। टीका आम लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार को सरकारी डिस्पेंसरी में टीका उपलब्ध कराना होगा। टीकाकरण प्रक्रिया को सरल बनाने का यही एकमात्र विकल्प है।

सतपाल सिंह, करनाल

प्रक्रिया सहज हो

सरकार ने युद्ध स्तर वैक्सीन के उत्पादन, अनुसंधान, उपलब्धता और अंततः टीका-करण प्रक्रिया के लिए काफी मात्रा में बजट आवंटन किया है। टीकाकरण की प्रक्रिया को सुरक्षित एवं नियमानुसार उपलब्ध कराने के लिए देश के विभिन्न चिकित्सा क्षेत्रों को जोन में बांटा गया है। अभी ज्यादातर लोग कोविन एप के बारे में कम जानते हैं। उनके पास ऑनलाइन के माध्यम उपलब्ध नहीं हैं। सरकार द्वारा प्रचार-प्रसार करके ही टीकाकरण की प्रक्रिया का महत्व बताया जा रहा है। वैक्सीनेशन प्रक्रिया को सरल बनाकर ही टीकों का सुरक्षित प्रयोग जरूरी है।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद

सहजता से सफलता

भारत में 135 करोड़ जनसंख्या का टीकाकरण असंभव नहीं लेकिन एक चुनौती अवश्य है। राष्ट्र में अनेक वर्ग आज भी डिजिटल प्रक्रिया से मरहूम हैं। ऐसे वर्गों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण दूर की कौड़ी है। सभी वर्गों का प्रभावशाली टीकाकरण करने के लिए स्थानीय निकायों के चुने हुए प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। एक भी व्यक्ति बिना टीकाकरण नही बचना चाहिए। ‘एक भी व्यक्ति छूट गया, सुरक्षा तंत्र टूट गया’ की परिकल्पना को ईमानदारी से साकार करना हमारा सयुंक्त दायित्व है। टीकाकरण का सरलीकरण लक्ष्य प्राप्ति में उपयोगी सिद्ध होगा।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

स्वास्थ्य कार्ड बनें

आज विज्ञान व तकनीक का युग है। आम व दूरदराज के लोगों को टीकाकरण के दायरे में लाने के लिए सरकार को जनसंचार माध्यमों का सहारा लेना होगा। साथ ही स्थान स्थान पर मोबाइल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने होंगे। छोटे-छोटे बूथ टीकाकरण के लिए स्थापित करने होंगे। ऑनलाइन पंजीकरण के स्थान पर स्वास्थ्य कार्ड बनाने की व्यवस्था करनी होगी जैसा कि आज भी हमारे देश में प्रसूता महिलाओं के नवजात बच्चों के टीकाकरण के मामले में किया जाता है। वास्तव में तभी हम टीकाकरण अभियान को कामयाब बना सकेंगे।

सुनील महला, पटियाला, पंजाब

पुरस्कृत पत्र

जन आंदोलन बनायें

सरकार ने टीका लगवाने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की बात कही है, जिसके लिए सब लोग सक्षम नहीं हैं। टीकाकरण का काम सरल बनाना चाहिए। लोगों में इसके बारे में भ्रांतियां दूर करनी चाहिए। इसे जन आंदोलन बनाना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में आधार कार्ड या कोई और पहचानपत्र दिखा कर सभी लोगों को मुफ्त में टीका लगाना चाहिए। कर्मचारियों को उनके कार्यस्थल पर टीका लगा देना चाहिए। बेहतर है पोलियो की खुराक घर-घर जाकर बच्चों को पिलाने की तर्ज पर लोगों को घरों में ही जाकर टीका लगाना चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक

नरम हो सरकार

Mar 13, 2021

केंद्र सरकार के नये कृषि विधेयकों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन को अब सौ दिन से ऊपर हो गए हैं। किसान कृषि बिल को रद्द कराने के लिए कभी भारत बंद, कभी ट्रेनों के पहिए रोक चुके हैं तो कभी हाइवे बंद कर चुके हैं। अब तो आंदोलन को और मजबूत करने के लिए अपनी फसल को नष्ट करने की बात कर रहे हैं। किसानों को सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर करने के लिए अपनी फसल को नष्ट नहीं करना चाहिए। बेहतर होगा तैयार फसल को गरीबों में बांट दिया जाये ताकि फसल को तैयार करने के लिए की गई मेहनत बेकार न जाए। सरकार भी नरम रुख अपनाये।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


कोर्ट करे फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को लेकर राज्यों की राय पूछी है। सत्य जानने का यह प्रजातांत्रिक तरीका है लेकिन देश में हर पार्टी वोट की राजनीति कर रही है। हर पार्टी का मकसद होता है कि मतदाताओं को किसी भी तरह आरक्षण या अन्य सुविधाओं का लालच देकर मत प्राप्त किए जाएं। लिहाजा आरक्षण कब तक और किसको कितना हो, के सवाल वोटों की बिसात पर चलने वाली सरकारों से पूछना वाजिब नहीं होगा। संविधान ने अदालतों को स्वतंत्र संस्था बनाया है।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़


राजनीति के रंग

कहना कठिन है कि ममता बनर्जी पर हमला एक साजिश है या आगामी चुनावों के लिए जनता की सहानुभूति बटोरने की रणनीति। इन सबसे भी बड़ा सवाल ये है कि अगर जेड प्लस सुरक्षा होने के बावजूद सुरक्षा कर्मियों को बेवकूफ बनाकर मुख्यमंत्री पर हमला हो सकता है तो आम जनता राज्य में अपनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करे। क्या बंगाल में ममता बनर्जी का सुरक्षा घेरा इतना कमजोर है कि मुख्यमंत्री पर हमला हो जाता है और किसी को खबर भी नहीं लगती।

नंदनी जांगिड़, पंचकूला

सतर्क रहें

Mar 12, 2021

कुछ समय पहले कोरोना वायरस के मामलों में गिरावट दर्ज़ हो रही थी, जिससे आम जन में यह भ्रम फैल रहा है कि अब स्वयं ही सामूहिक रूप से व्यक्तियों में इस महामारी के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है। इसलिए अब इस बीमारी के टीके की आवश्यकता नहीं रह गई है। सच तो यह है कि सामूहिक रूप से रोग प्रतिरोधक क्षमता केवल प्रत्येक व्यक्ति के टीकाकरण से ही संभव है। किसी भी प्रकार की अनदेखी जानलेवा साबित हो सकती है। जरूरी है कि आम आदमी टीकाकरण में सहयोग के साथ ही सरकारी स्वास्थ्य नियमों का भी पालन करे।

गायत्री भान, चंडीगढ़


सकारात्मक पहल

‘गोवंश के संरक्षण के लिए प्रदेश में बनेगी गो कैबिनेट’ की खबर सुर्खियों में आई है। नि:संदेह गो संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक अच्छी पहल है। विदेशों में गाय को गले लगाने का चलन जोरों पर चल रहा है। इसके द्वारा वे स्वयं को तनाव व अवसाद मुक्त होकर स्वस्थ महसूस कर रहे हैं। इस प्रयोग के लिए वे हजारों रुपये खर्च कर रहे है। हमारे यहां प्राचीन काल से ही गो माता के महत्व को जाना जाता रहा। गो माता का ख्याल रखना और उसकी सेवा करना आवश्यक है।

संजय वर्मा, मनावर, धार


आय भी बढ़े

10 मार्च का दैनिक ट्रिब्यून का सम्पादकीय ‘चुनावी बजट’ पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए बजट के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने वाला था। संपादकीय में उचित कहा गया है कि कर्ज माफी किसान की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। लगातार बढ़ते जा रहे वित्तीय संकट के समाधान के लिए जरूरी है कि सरकार ऐसे ठोस उपायों पर विचार करे, जिससे लोगों की आय में वृद्धि हो।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

आपकी राय

Mar 11, 2021

वास्तविक मुद्दे

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में हुए थे। चुनाव में सत्ता पाने हेतु सभी तरह के पापड़ बेले गए। लेकिन तारीफ करना होगी आम आदमी पार्टी व उनके सहयोगियों की, जिन्होंने चुनाव में केवल शिक्षा, स्वास्थ्य, स्कूल, बिजली, पानी के नाम पर ही चुनाव लड़ा। दिल्ली की जनता भी सबसे ज्यादा तारीफ के काबिल है, उसने धर्म जाति की बजाय जनता के बुनियादी हित देखे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जनता जनार्दन को बेसिर-पैर के मुद्दों व धर्म, जाति से हटकर, जनहित के मुद्दों व काम करके दिखाने वाले दलबल को ही अपना आशीर्वाद देना चाहिए।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन


मुफ्त कोचिंग केंद्र

सात मार्च के दैनिक ट्रिब्यून लहरें अंक में प्रतिभा ज्योति का ‘ऐसी उड़ान कि छोटा पड़े आसमान’ लेख अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर चर्चा प्रेरणादायक रही। मातृशक्ति से कोई क्षेत्र अछूता ही नहीं रहा है। महंगी शिक्षा, दूरस्थ कोचिंग केंद्र सोच कर गरीब माता-पिता युवा बेटी को पढ़ाने का विचार कैसे कर सकते हैं। सरकार को चाहिए उच्च शैक्षणिक कोचिंग केंद्र नि:शुल्क खोलकर योग्य आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को प्रवेश देकर उन्हें बुलंदियों को छूने की राह आसान करे।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


सुरक्षा जरूरी

चिंता की बात है कि सिंघु बॉर्डर कथित गोलीबारी हुई। किसान अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए। किसानों ने आरोप लगाया है कि घटनाक्रम विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ उनके ‘शांतिपूर्ण’ विरोध की छवि को खराब करने के लिए ‘सुनियोजित साजिश’ का हिस्सा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पुलिस ऐसे उपद्रवियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने में विफल रहती है तो वे अपना संघर्ष और तेज करेंगे।

निष्ठा, यमुनानगर

बंगाल का समर

Mar 10, 2021

पश्चिम बंगाल से लेकर असम तक के राज्यों में आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर चारों ओर गहमागहमी है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता के दुर्ग में बड़ा झटका देने के उद्देश्य से भाजपा जाल बिछा रही है। हाल ही में बॉलीवुड के दादा मिथुन चक्रवर्ती ने भाजपा में एंट्री करते ही ऐसा भाषण दिया कि सुनने वाले लोगों के होश उड़ गए। मिथुन दा का कहना है कि ‘मैं जो बोलता हूं वह करके दिखाता हूं।’ उम्मीद है कि आने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता दीदी की दुर्ग में भाजपा लोगों के मन को जीत पाए।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम


बीच का रास्ता

आठ मार्च के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘सौ दिन की टीस’ खेती कानूनों के खिलाफ किसानों द्वारा आंदोलन का विश्लेषण करने वाला था। सरकार किसानों को इन खेती कानूनों के लाभों के बारे में आश्वस्त नहीं कर सकी। किसी भी आंदोलन का इतनी देर तक चलना किसी के हित में नहीं है। सरकार को किसानों की उचित मांगें मान लेनी चाहिए और किसानों को भी लचीला रवैया अपनाना चाहिए। नि:संदेह कोरोना काल में सारी अर्थव्यवस्था में मंदी की स्थिति थी केवल कृषि ही ऐसा क्षेत्र था, जहां पर उत्पादन में वृद्धि हुई।

शामलाल कौशल, रोहतक


सजग-सतर्क रहें

कोरोना वैक्सीन लगाना अनिवार्य कर देना जरूरी है। लोगों की मानसिकता यह है कि हम तो अभी ठीक हैं। वैसे अब फिर से कोरोना के नये मामले सामने आने से स्वास्थ्य विभाग हरकत में आ गया है। देश के जिन राज्यों में फिर से कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ रही है, वहां वैक्सीनेशन का कार्य युद्धस्तर पर शुरू कर देना चाहिए।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

सोच बदलें

Mar 09, 2021

राष्ट्रीय एवं वैश्विक रिपोर्ट संकेत देती है कि महिलाओं के अवैतनिक कार्यों का अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है। ऐसा घरेलू एवं कार्यरत दोनों तरह की महिलाएं करती हैं। वहीं दक्षिण भारत की एक क्षेत्रीय पार्टी ने सत्ता में आने पर इसके लिए वेतन देने का वादा भी किया है। यहां यह जानना ज़रूरी है कि ऐसे काम को वेतन के बंधन में नहीं बांधा जा सकता। यह कोई रोजगार अनुबंध नहीं है बल्कि इसमें प्यार और देखभाल की भावना भी जुड़ी होती है। ज़रूरी है रूढ़िवादी सोच त्यागने की कि घर का काम और देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाअों की होती है।

डिंपी भाटिया, नयी दिल्ली


सड़क शीघ्र बनाएं

पिछले एक माह से देवीनगर, अम्बाला छावनी की ओर किंगफिशर टूरिस्ट काम्प्लेक्स तक की सड़क को मरम्मत के लिए उखाड़ दिया है। लेकिन मरम्मत अभी तक शुरू नहीं की गई। ऐसी अवस्था में गुजरने वाले वाहनों के टायरों को क्षति पहुंच रही है। कभी-कभी तो दोपहिया वाहन फिसल भी जाते हैं। संबंधित विभाग से निवेदन है कि सड़क कार्य को शीघ्र बनाने की कृपा करें।

श्रीकृष्ण सैनी, अम्बाला शहर

पेट्रोल के बढ़ते दाम

Mar 08, 2021

महंगाई बढ़ने की वजह

सभी क्षेत्रों में महंगाई तेल की कीमतों से आरंभ होती है। किसी भी माल की ढुलाई का खर्च उसकी कीमतों में ही जुड़ता है। जीवनशैली आज पूर्णतः मशीनी और आधुनिक हो चुकी है। कृषि जो एक समय तक पशुबल पर आधारित थी, अब पूरी तरह यांत्रिक हो चुकी है। डीजल के बढ़े भावों से खेती पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। ट्रक आदि से माल ढुलाई का असर जनता पर पड़ता है। तेल जैसे प्रमुख संसाधनों को कुछ कॉरपोरेट घरानों के हवाले करना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। इन संसाधनों पर हर हाल में सरकारी नियंत्रण रहना आवश्यक है।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’ , महम 


करों की मार

वर्ष 2008 में एक बैरल कच्चा तेल उच्चतम स्तर 147 डॉलर पर था। इस तरह एक बैरल लगभग 6500 रुपए का था और पेट्रोल 45 से 48 रुपये प्रति लिटर के बीच था। आज कच्चा तेल 60 से 65 डॉलर है। यानी एक बैरल की कीमत लगभग 4700 रुपये है। कीमतों में 27 प्रतिशत कमी हुई पर देश में पेट्रोल-डीज़ल के दाम 100 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गए। पेट्रोल-डीज़ल का कच्चे तेल की अंतराष्ट्रीय कीमतों से कोई लेना-देना नहीं है। कीमतों में वृद्धि तो केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले करों से होती है। जब तक सरकारें करों में कमी नहीं करेंगी, आम आदमी को राहत नहीं मिलेगी।

बृजेश माथुर, गाज़ियाबाद


टैक्स की सीमा हो

पेट्रोल और डीजल के दाम उस समय आसमान छू रहे हैं जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत काफी कम है। पेट्रोल और डीजल के दामों से प्रत्यक्ष रूप से आम आदमी प्रभावित होता है। केंद्र व राज्य सरकारों को आरोप-प्रत्यारोप छोड़कर सक्रिय रूप से ठोस नीति बनानी होगी। राज्य सरकार का यह तर्क कतई उचित नहीं कि पेट्रोलियम पदार्थों पर केवल केन्द्र सरकार का हक है। आम जनता पर नाजायज बोझ डालकर राजस्व बढ़ाना भी उचित नहीं है। इसलिए पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स की जरिए राजस्व बढ़ाने का दायरा निश्चित होना चाहिए।

सोहन लाल गौड़, कैथल


सरकार पहल करे

पिछले दिनों कई महानगरों में पेट्रोल की कीमत Rs100 रुपये पहुंच गई, वह भी तब जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत कम है। लॉकडाउन में कच्चे तेल की वैश्विक गिरावट के बाद सरकार ने मार्च, 2020 में राजस्व बढ़ाने के लिए पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पादन कर बढ़ाया था। मगर इसे हटाया नहीं गया। हाल ही में प्रस्तुत आगामी साल के केंद्रीय बजट में पेट्रोलियम पदार्थों पर नया कृषि ढांचा व विकास उपकर लगाया गया है, जिसका प्रभाव उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। सत्तासीन सरकार चाहे जो भी हो, कीमतों के गणित में जनता के प्रति संवेदनशील नहीं होती। कोरोना संकट की छाया में तमाम चुनौतियों से जूझ रही जनता को राहत देने के लिए सरकार की तरफ से संवेदनशील पहल होनी चाहिए।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़


डॉलर का असर

देश में तेल की कीमतों में परिवर्तन 15 दिनों के उत्पादों की औसत कीमत के आधार पर होता है। इसके अलावा, ब्रेंट क्रूड की कीमत 31 डॉलर के स्तर तक गिरी तो क्रूड की भारतीय बास्केट की कीमत 45 डॉलर प्रति बैरल पर अपेक्षाकृत अधिक है। अगर डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में गिरावट आती है तो इसका अर्थ है कि भारतीय तेल कंपनियां डॉलर खरीदने के लिए अधिक भुगतान करेंगी। कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की कमी से भारत का आयात कम होता है। इसी तरह डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में एक रुपये प्रति डॉलर का बदलाव आने से भारत के आयात बिल में अंतर पड़ता है।

नेहा जमाल, मोहाली, पंजाब


तर्कसंगत हों दाम

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम काफी कम होने पर भी सरकार शुरू से ही पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम निरंतर बढ़ाए जा रही है। इससे संयुक्त मांग वाली वस्तुओं के दाम बढ़ना भी लाजिमी है जो बढ़ती गरीबी, महंगाई और बेकारी के इस बहुत नाजुक दौर में आग में घी का ही काम करेगी। ईंधन के लिए गरीब जनता ने पेड़ों तक को काटना शुरू कर दिया है। तेल की कीमतों का बढ़ना यानी महंगाई को गति देना है। इसलिए इनके सही, सुलभ और तर्कसंगत दाम होने बहुत जरूरी हैं, जिससे वांछित विकास सही गति पर हो सके।

वेद मामूरपुर, नरेला


पुरस्कृत पत्र

जीएसटी लगाएं

पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें काफी कम हैं। बढ़ती कीमतों के कारण महंगाई भी बेलगाम हो गई है। सरकार यह कह कर पल्ला झाड़ लेती है कि तेल कम्पनियां सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं। सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए दोष तेल कम्पनियों को देना शुरू कर दिया है। यक्ष प्रश्न यह है कि अगर तेल कम्पनियां सरकारी नियंत्रण में नहीं हैं तो फिर सरकार किसलिये है। सरकार को आम जनता को राहत देने के लिए तेल और गैस आदि को भी जीएसटी के दायरे में शामिल करना चाहिए। राज्यों द्वारा लगाए गए टैक्सों में भी एकरूपता लाकर स्थानीय सरकारों के टैक्स भी कम होने चाहिए।

जगदीश श्योराण, हिसार

असली हरियाली

Mar 06, 2021

‘पेंटिंग द टाउन ग्रीन’ दिल्ली सरकार का एक नया प्रयास है, जिसमें मेट्रो स्टेशनों से संबंधित बसों को हरी रंगत देने के साथ बैटरी चालित बसों और वाहनों को चलन में लाया जा सके। इससे राजधानी में प्रदूषण और बढ़ती गर्मी में सुधार की उम्मीद है। वास्तव में आज बढ़ती जनसंख्या के चलते पेड़-पौधे, जल-जंगल लुप्त हो रहे हैं। इस कारण प्रदूषण में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए असली हरियाली के सामने यह नकली हरियाली कुछ नहीं है। उलटा इसमें व्यर्थ का खर्चा है। सरकार को फ़िज़ूलखर्ची वाली हरियाली के बजाय असली पेड़-पौधों की हरियाली की ओर ध्यान देने की जरूरत है ताकि पर्यावरण में शुद्ध हवा और स्वच्छता नजर आये।

वेद मामूरपुर, नरेला


भूजल संकट

इस बार प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ रेडियो प्रोग्राम की शुरुआत जल संरक्षण से की। उन्होंने कहा कि जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोने में परिवर्तित हो जाता है, वैसे ही पानी का स्पर्श जीवन के लिए जरूरी है। इसलिए पानी के संरक्षण के लिए हमें अभी से ही प्रयास शुरू कर देने चाहिए। भारत में गिरता भूजल स्तर भी काफी चिंता का विषय है, अगर देश में इसी रफ्तार से भूजल स्तर गिरता रहा तो देश में रेगिस्तानों की संख्या भी बढ़ जाएगी। आने वाला समय और भयावह होता जायेगा।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


नैतिकता विहीन राजनीति

राजनीति में बयानबाजी का स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है। चुनाव आते ही कड़वे बोल शुरू हो जाते हैं। अभद्र भाषा राजनीतिक पार्टियों का हिस्सा बनती जा रही है। यह राजनीति और सभ्य समाज के लिए कलंक के समान है। सुर्खियों में रहने के लिए विपक्ष को जमकर कोसा जाता है। राजनीति दिशाहीन हो गई है। इस तरह की भाषा राजनीतिक स्तर को गिराने वाली है। नेताओं को नैतिकता का पाठ पढ़ना चाहिए।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

अमेरिकी कूटनीति

Mar 05, 2021

11 सितंबर, 2001 के आतंकी हमले के बाद संभवतः पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने इसे अच्छे तरीके से व्यक्त किया था या तो दुनिया के देश उनके साथ हैं या उनके खिलाफ हैं। अब यह विचार अप्रचलित हो चला है। आज उसे चीन और अन्य देशों के साथ टकराव की तुलना में सहयोग प्राप्त करने की जरूरत है। अमेरिका में ट्रंप की विदेश नीति को बहुत कम पीछे धकेला गया। उनकी चीन विरोधी नीतियों को लेकर आम सहमति कहीं अधिक थी। ईरान और वेनेजुएला में लगाए प्रतिबंधों के विनाशकारी परिणामों के बावजूद, उसे लेकर प्रतिरोध कम ही थे। उनकी तुलना में बाइडन की विदेश नीति कहीं अधिक मानवीय है।

भूपेंद्र सिंह रंगा, पानीपत


हिंदी का गौरव

‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में विश्व में लोगों के सबसे ज्यादा पसंदीदा 2020 के जनप्रिय शब्द ‘आत्म निर्भर’ को शामिल किया गया। वैसे ‘आत्मनिर्भर’ शब्द का सबसे पहले उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उस समय किया था जब देश में कोरोना वायरस महामारी के चलते लॉकडाउन का नियम सभी लोग पालन कर रहे थे। उसी समय प्रधानमंत्री ने लोगों से आत्मनिर्भर बनने के लिए आग्रह किया था। वर्ष 2019 के ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में हिंदी शब्द ‘संविधान’, 2018 के ‘नारी शक्ति’ और 2017 के ‘आधार’ शामिल किया गया। सभी भारतीय को अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी पर गर्व करना चाहिए।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम


मूल्यवृद्धि की मार

पेट्रोल डीजल की मूल्यवृद्धि हर इंसान की जेब पर मार है, जो इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। यहां बात सिर्फ पेट्रोल डीजल के महंगे होने की ही नहीं है बल्कि इससे सभी जरूरत की चीजें भी स्वतः महंगी हो जाएंगी। जब ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो उन वस्तुओं का महंगा हो जाना भी स्वाभाविक है। देश के लोग लॉकडाउन के समय भारी आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं और अब ईंधन की मूल्यवृद्धि घातक होगी।

विजय महाजन प्रेमी, वृंदावन, मथुरा

मिज़ाज की पड़ताल

Mar 04, 2021

27 फरवरी के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकशित राजकुमार सिंह का लेख 'देश का मिजाज भी बताएंगे ये चुनाव' वास्तव में इन राज्यों का राजनीतिक तापमान बताने वाला था। लेखक ने इस लेख में चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य का अतीत, वर्तमान और भविष्य का चित्र उभार दिया। सही बात है कि भाजपा पूर्व, पूर्वोत्तर तथा दक्षिण में विस्तार के लिए कमर कस चुकी है। वास्तव में भारतीय जनता पार्टी की सोच है कि यदि उत्तर में एंटी इन्कंबेन्सी से कुछ नुकसान हो तो उसकी पूर्ति दक्षिण भारत से की जा सके। मार्गदर्शक लेख के लिए हार्दिक आभार।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की


खिलौना उद्योग

हाल ही में प्रधानमंत्री ने इंडिया टॉय फेयर का उद्घाटन किया। यह भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बेहतर कदम है। खिलौना उद्योग भारत में एक बड़ा उद्योग है। भारतीय खिलौने पर्यावरण के अनुकूल, सस्ते और टिकाऊ हैं। व्यापारियों को बड़े पैमाने पर खिलौने बनाने के लिए विकसित उद्योग लगाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक रोजगार पैदा हों। यह हमारी विदेशी मुद्रा को भी बचाएगा। यह उद्योग 5 खरब की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगा और शीर्ष देशों में भारत की स्थिति को सर्वश्रेष्ठ बनाने में भी सहायक होगा।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर


कड़ा हो प्रहार

तीन मार्च के दैनिक ट्रिब्यून में संपादकीय 'जहर पर प्रहार' शराब के कारोबार के प्रति जागरूक करने वाला रहा। चोरी-छिपे चल रहे कारोबार पर कड़ा रुख अपनाकर इस पर पाबंदी लगाई जा सकती है। कठोर दंड का प्रावधान ही लोगों को भयभीत कर शारीरिक-मानसिक रोगों से मुक्ति दिला सकता है। सरकारों का दायित्व है कि प्रदेश में शराब छोड़ो केंद्र स्थापित कर मुहिम चलायी जाये।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

राजनीति का आईना

Mar 03, 2021

27 फरवरी के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित ‘दरअसल’ के अन्तर्गत ‘देश का मिजाज भी बतायेंगे ये चुनाव’ में राजकुमार सिंह ने चार राज्यों व एक केन्द्रशासित प्रदेश में आगामी चुनावों के परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक दलों की रणनीति पर सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। जहां असम में भाजपा को अपनी सरकार को दुबारा स्थापित करने के लिए चुनाव लड़ना है, वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से सत्ता छीनने का प्रयास करना है। केरल में भाजपा को पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-वाम मोर्चा गठबंधन एक चुनावी मुद्दा मिल गया है, जिसका कुछ फायदा तो अवश्य होगा। पुडुचेरी में कांग्रेस का आंतरिक विद्रोह भाजपा को कामयाबी दिला सकता है।

लाजपत राय गर्ग, पंचकूला


स्वागतयोग्य पहल

इंटरनेट मीडिया पर भारत ने नकेल कसने के लिए जो दिशा निर्देश जारी किए हैं, वे स्वागतयोग्य हैं। विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफार्म को इन नियमों का पालन करना चाहिए। आज इन प्लेटफार्म पर जो भी सामग्री परोसी जाती है, उस पर उपभोक्ता असली-नकली की पहचान नहीं कर पाता। फेक न्यूज़, भड़काऊ, धार्मिक उन्माद, अश्लील, देश विरोधी सामग्री तथा भाईचारे व सांप्रदायिक उन्माद को फैलाने वाली सामग्री पर विशेष रूप से नकेल कसनी होगी। भारत सरकार का कदम देर आयद दुरुस्त आयद है।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन


शिक्षकों की सुनें

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने दिल्ली सरकार से कई बार गुजारिश की है कि उनकी ग्रांट और तनख्वाह को दिया जाए। लॉकडाउन के बाद से, बिना वेतन के शिक्षक अपनी क्लास और बच्चों के सिलेबस को तय समय पर पूरा कर रहे हैं। शिक्षकों को वेतन न मिलने से बच्चों की कक्षाएं निरंतर नहीं चल पा रही। चूंकि शिक्षकों को अपने हक के लिए शांतिपूर्ण तरीके से धरने करने पड़ रहे हैं, ऐसे में शिक्षकों के तकलीफ को सुना जाए।

अमन जायसवाल, दिल्ली

नब्ज पर हाथ Other

Mar 02, 2021

27 फरवरी को दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित ‘देश का मिजाज भी बतायेंगे ये चुनाव’ लेख में संकेत है कि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केन्द्रशासित प्रदेश पुड्डचेरी में होने वाले चुनावों की घोषणा, इस बदले परिदृश्य में, राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित ज़रूर करेगी। एक चुनाव होकर निपटता भी नहीं कि, सारे दल किसी अघोषित चुनाव की शतरंजी बिसात पर दांव खेलने लगते हैं। पश्चिम बंगाल में हिंसा देखायी दे रही है, उसकी जड़ें कांग्रेस और वाम मोर्चा के ज़माने से ही चली आ रही हैं। आज कांग्रेस और वाममोर्चा गठबंधन ममता के ख़िलाफ़ खड़ा है। भाजपा दस्तक दे चुकी है और ममता से उसका सीधा मुक़ाबला है। आक्रामक ममता के वजूद का सवाल है। अपने बूते सरकार बनाने वाली बीजेपी को असम भी बचाना है। सीएए असम और बंगाल में कितना प्रभावी होगा, इसका देश को इन्तज़ार है। केरल में बंगाल के साथी वाममोर्चा के एलडीएफ और कांग्रेस की यूडीएफ आमने-सामने होंगे। पुड्डचेरी में वी. नारायणसामी की सरकार गिरने के बाद का खेल समय तय करेगा। लेख ने पूरे परिदृश्य को सामने रख रखा। गहरी छानबीन के लिए साधुवाद!

मीरा गौतम, जीरकपुर

आंदोलन का अधिकार

Mar 01, 2021

तार्किक हो हल

सुप्रीम कोर्ट ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के शांतिपूर्वक व अहिंसात्मक तरीके के विरोध प्रदर्शन के हक को सुनिश्चित किया है, परन्तु आंदोलन कहीं भी, कभी भी नहीं किया जा सकता। आंदोलन के नाम पर मार्गों के अवरुद्ध होने से आमजन की परेशानियां बढ़ जाती हैं फिर भी स्थानीय लोगों और प्रदर्शनकारियों के मेलजोल व अनुशासन के बिना किसी भी आंदोलन को महीनों तक जारी रखना असम्भव है। ऐसी दिक्कतों से बचाने के लिए प्रदर्शन के तरीके बदलने व सरकारों को सहानुभूति का भाव रखकर आंदोलनरत लोगों की मांगों का तार्किक हल निकालने की जरूरत है।

देवी दयाल दिसोदिया, फरीदाबाद


विकल्प तलाशें

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि आंदोलन के नाम पर अन्य देशवासियों के आवागमन को बाधित करके उनके नागरिक अधिकारों का उल्लंघन करने से बचा जाए। देश और प्रदेशों की अर्थव्यवस्था वर्तमान किसान आंदोलनों द्वारा समय-समय पर रेल यातायात, सड़क यातायात को बाधित करने से बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसलिए आंदोलनकारियों को अपनी व्यवस्था इस तरह से बनानी चाहिए कि आमजन को कोई परेशानी न हो। आंदोलनकारी सरकार द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक सार्वजनिक स्थलों पर अपनी सभाएं करके अपनी बात रख सकते हैं।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद


कर्तव्यों की मर्यादा

किसानों द्वारा नये कृषि कानून का विरोध करने के लिए राजधानी के प्रवेश मार्गों को अवरुद्ध करने से आम लोगों को परेशानी हुई। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार आंदोलन के नाम पर आम लोगों को परेशान कर उनके अधिकारों को बाधित नहीं कर सकते। प्रत्येक नागरिक के अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं। अतः अपने अधिकारों की मांग कर्तव्यों की मर्यादा निभाने की है। सरकार की नीतियों के विरोध के लिए धरना आदि तरीके इस्तेमाल करते समय आंदोलनकारियों को दूसरों की असुविधाओं का भी ध्यान रखने की जरूरत है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


संवेदनशील हो सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिकों के मूल अधिकारों के प्रति अपना रुख स्पष्ट किया है। इसके साथ ही उसने आंदोलन के अधिकार को तो जायज ठहराया है परन्तु इससे आम जनता को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। यहां एक दूसरा पहलू भी है कि जब सरकारें ही आम आदमी के अधिकारों के प्रति असंवेदनशील रुख अपनाएं और उनकी उचित मांगों की सुनवाई करने के स्थान पर आंदोलन को खंडित करने के लिए नये-नये तरीके अपनाये तो स्वाभाविक है कि आम जनता परेशान अवश्य होगी। यह भी सत्य है कि जब शासन-प्रशासन सुनवाई नहीं करता है तो आंदोलन की कोई सीमा नहीं रह जाती। बशर्ते कि आंदोलन की मांग जायज और अहिंसात्मक हो।

जगदीश श्योराण, हिसार


अधिकारों की रक्षा

हमारे संविधान ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और प्रदर्शन करने का हर नागरिक को अधिकार दिया है। लेकिन वहीं अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला दिया था कि सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा जमाना स्वीकार योग्य नहीं है। अचानक कुछ प्रदर्शन हो सकते हैं लेकिन लंबे समय तक असहमति या प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक स्थानों पर लगातार कब्जा नहीं किया जा सकता, जिससे दूसरे लोगों के अधिकार प्रभावित हों। सार्वजनिक आंदोलनों की रोकथाम के लिए सरकार को संज्ञान लेना चाहिए ताकि आम नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा हो सके।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़


सीमित दायरे में

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सही है कि किसान आंदोलन हो या कोई भी आंदोलन, लेकिन इसे कहीं भी और कभी भी का रूप नहीं दिया जा सकता। आंदोलन को लेकर मार्ग अवरुद्ध करना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना बहुत ही गलत है। इससे आम आदमी को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सभी को आंदोलन का अधिकार है लेकिन सीमित दायरे में रहकर। आंदोलन अहिंसात्मक तरीके और शांति के साथ होे। गलत तरीके से किया गया आंदोलन का खमियाजा देश 26 जनवरी को भुगत चुका है, जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता।

सतपाल सिंह, करनाल


पुरस्कृत पत्र

संवैधानिक कर्तव्य

विरोध प्रदर्शन हर भारतीय का लोकतांत्रिक अधिकार है। इस विषय को उच्चतम न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है। निःसंदेह व्यापक जनहित में आंदोलन को ‘कहीं भी और कभी भी’ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन जब केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आंदोलन को दमन की नीति से अवरोध पैदा करें तो फिर जनभावनाओं का उग्र होना कोई नया विषय नहीं। जनभावना का सम्मान, आंदोलन का निष्पक्ष आकलन और समाधान और सामान्य नागरिक के अधिकारों का संरक्षण केंद्र सरकार का संवैधानिक दायित्व है। इन दायित्वों की अनुपालना व्यवस्था का संवैधानिक कर्तव्य भी है।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम