आपकी राय

योग की महत्ता Other

Jun 22, 2021

योग हमारे मन को शांत रखते हैं। प्राचीन काल से चले आ रहे योग मानव जाति को दीर्घायु प्रदान करने वाला एक प्राकृतिक मंत्र है। पहली बार योग दिवस प्रधानमंत्री की पहल के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 21 जून, 2015 को मनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को योग के प्रति जागरूकता करना है। योग करने से व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकता है। इसलिए हम सभी को योग करना चाहिए और बच्चों को भी इसके प्रति आकर्षित करना चाहिए।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

सतर्क रहें

दैनिक ट्रिब्यून में 17 जून को प्रकाशित सम्पादकीय ‘भारी पड़ेगी चूक’ में स्पष्ट उल्लेख है कि अनलॉक में हो रही लापरवाही भारी न पड़ जाये। कुछ राज्यों से बच्चों के संक्रमित होने के समाचार मिलना अच्छा नहीं है। बच्चों को घर में रखना कठिन काम अवश्य है, किंतु बच्चों को पसंदीदा वातावरण उपलब्ध कराते हुए यदि पालक बच्चों के प्रति सतर्क रहें तो सुरक्षा भी संभव है।

बीएल शर्मा, तराना, उज्जैन

अनलॉक के बाद जिम्मेदारी Other

Jun 21, 2021

सतर्कता बचाएगी

अनलॉक में बरती सतर्कता ही हमें तीसरी लहर से बचाएगी। रोजी-रोटी के साथ-साथ टीकाकरण और कोरोना प्रोटोकॉल का पूरा ध्यान रखना होगा। छूट मिलने पर भी हम विवाह और मृत्यु आडम्बर रहित रहें। जब तक संभव हो घर से काम करें, डिजिटल भुगतान करें, भीड़-भाड़ से बचें, बेवजह न घूमें, इत्यादि-इत्यादि। सरकार को उसकी ज़िम्मेदारियों का अहसास कराने के साथ-साथ हमें अपने कर्तव्यों का पालन भी ईमानदारी से करना होगा। हमारी गैर-जिम्मेदाराना हरकत ही कोरोना की तीसरी लहर को भयावह बनाएगी।

बृजेश माथुर, गाज़ियाबाद

सावधान रहें

कोरोना से बचाव केवल परस्पर दूरी को बनाए रखने में ही है। लॉकडाउन से यद्यपि स्वतः ही एक सुरक्षित वातावरण मिलता है। अनलॉक की स्थिति में कोरोना से बचाव के लिये उचित वातावरण बनाने की हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। बहुत आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए। कम व अधिक आयु के लोगों को और गर्भवती स्त्रियों को तो केवल आवश्यकता को देखते हुए बाहर निकलना चाहिए। अनलॉक की प्रक्रिया लोगों की रोटी-रोजी की व्यवस्था को बनाए रखने के लिये एक शासकीय उपक्रम है, जिसे हम सबको समझना होगा। रोग की उग्रता से बचने के लिए हमें स्वयं ही सावधान रहना होगा।

पूनम गक्खड़, हरिद्वार

सजगता आवश्यक

कोरोना संक्रमितों की घटती संख्या को कोरोना की दूसरी लहर का अंत माना जा रहा है। अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब पहली लहर के बाद अनलॉक होने पर बरती गई लापरवाही से सबक सीखकर घर-दफ्तर और केवल जरूरी कामों तक ही सीमित रहने की जरूरत है। निकलना ज़रूरी हो तो घर से बाहर सुरक्षित सामाजिक दूरी बनाकर रखें। कोरोना के साथ इस लड़ाई में टीके के साथ मास्क और सामाजिक-देह दूरी वह अमोघ अस्त्र हैं जो कोरोना रूपी रावण के उर में संचित अमृत के कुंड को सुखाकर संपूर्ण मानवता को उससे मुक्ति दिला सकते हैं।

अनिल कुमार पाण्डेय, पंचकूला

खतरा टला नहीं

हमने कोरोना महामारी की पहली लहर की लापरवाही का खमियाजा दूसरी सुनामी के रूप में भुगता। अब ऐसा न हो कि कहीं दूसरी सुनामी के बाद अपनी लापरवाही व अनदेखी से तीसरी सुनामी को न्योता दे दें। ऐसे में हम अवश्य जान लें कि खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए इसे चुनौती के रूप में लें व देश के सच्चे, सजग नागरिक बनकर अपनी जिम्मेदारियों को समझें। शासन-प्रशासन का सहयोग करते हुए कोविड नियमों का पालन मुस्तैदी से करें। सभी नागरिक लापरवाही छोड़ अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वैक्सीन अवश्य लें।

लाडो कटारिया, गुरुग्राम

सख्ती जरूरी

कोरोना की दूसरी लहर के कमजोर पड़ने के बाद अब जनजीवन सामान्य होने लगा है। अब आम जनता के साथ-साथ सरकार को कठोरता का परिचय देना होगा। अनलॉक होने की स्थिति का सबसे ज्यादा दुरुपयोग कारोबारी करते हैं और यह जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की बनती है। रैली, प्रदर्शन, उद्घाटन, धार्मिक और पारिवारिक उत्सव जैसे आस्था के नाम पर जुटने वाले लोगों की भीड़ पर सख्ती दिखानी होगी। प्रशासन को भ्ाी भीड़ जुटने वाले राजनीतिक और धार्मिक आयोजनों के मामले में सख्ती दिखानी पड़ेगी।

जगदीश श्योराण, हिसार

हमारी जवाबदेही

कोरोना संक्रमण के मामले बढ़े तो हमने हर बार सरकार व प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहराया, जो सही नहीं कहा जा सकता। देश के जिम्मेदार नागरिक होते हुए हमारा कर्तव्य बनता है कि हम कोविड प्रोटोकॉल का ईमानदारी से पालन करें। स्वास्थ्य समेत समस्त जिम्मेदारियां सरकार व प्रशासन की ही नहीं हैं। सरकार के साथ-साथ हम यदि अपने कर्तव्यों का निर्वहन भली प्रकार से करेंगे तो कोई दो राय नहीं कि कोरोना महामारी पर नियंत्रण न पा सकें। कोरोना पर विजय पाने के लिए सरकार के कदमों के साथ कदमताल करना होगा।

सुनील कुमार महला, पटियाला

सावधानी बरतें

कोरोना की दूसरी लहर के संक्रमण के घटते मामलों के मद्देनजर कई राज्यों में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई है। अभी पहली लहर के अनलॉक के बाद स्कूल-कॉलेज खुल भी नहीं पाए थे कि अपनी घोर लापरवाहियों के कारण हम दूसरी लहर में फंसते चले गए। इससे सबक लेकर हम सबको अनलॉक में मास्क लगाने, भीड़भाड़ से दूर रहने, हाथ साफ करने और टीका लगवाने जैसी जरूरी सावधानियां बरतने की जरूरत है। कोरोना प्रोटोकॉल को अपनाने की जिम्मेदारी तब और भी ज्यादा बढ़ जाती है जब तीसरी लहर की आशंका है।

देवी दयाल दिसोदिया, फ़रीदाबाद

आपकी राय Other

Jun 19, 2021

टकराव की राजनीति

हाल ही में बंगाल में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए ज़्यादा समय नहीं बीता। कुछ समय बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच ज़ुबानी जंग शुरू हो गयी है। राज्यपाल ने राज्य में बढ़ती राजनीतिक हिंसा के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर भेजा। इसके तुरंत बाद ही राज्यपाल ने यह पत्र ट्विटर पर सार्वजनिक कर दिया, जिसके बाद ममता बनर्जी ने इस पर अपनी नाराजगी प्रकट की। राज्यों के मामलों में ऐसा पहली बार नहीं हुआ, इससे पहले भी राज्यपाल राज्य सरकार पर सवाल दाग चुके हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपालों के बीच मतभेद का यह पहला मामला नहीं है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के बीच भी ऐसी स्थिति बन चुकी है। ऐसे मामलों पर ज्यादा राजनीति करना ठीक नहीं है।

अजय धनगर, दिल्ली


अंतर्कलह के दंश

पंजाब विधानसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे पास आ रहा है, पंजाब की सत्ता पर विराजमान कांग्रेस के बीच अंदरूनी लड़ाई की खबरें भी सुर्खियों में छा रही हैं। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह और कांग्रेस के मंत्री सिद्धू के बीच मनमुटाव का मुद्दा भी सुर्खियों में है। कांग्रेस हाईकमान को इस कलह को जल्दी से जल्दी हल करना चाहिए, ताकि विधानसभा चुनाव में इस पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


मार्गदर्शक सृजन

13 जून के दैनिक ट्रिब्यून के अध्ययन कक्ष अंक में श्याम सखा श्याम की ‘अथ कुदरत मईया व्रत कथा’ कहानी प्रेरक और शिक्षाप्रद रही। आद्यंत उद्देश्य पूर्ण, सारगर्भित, उपदेशात्मक, संकटकाल में अपनों के बिछुड़ने का गम और भविष्य के प्रति सजगता का अहसास दिलवा गयी।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

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Jun 18, 2021

अन्याय का अस्त्र

17 जून के दैनिक ट्रिब्यून में क्षमा शर्मा का ‘अन्याय का अस्त्र बनता सुरक्षा कवच’ लेख महिला कानून के दुरुपयोग का पर्दाफाश करने वाला था। लेखिका ने महिलाओं द्वारा झूठे यौन शोषण के मुकदमे दर्ज कराए जाने का भी वर्णन किया है। ऐसी स्थिति में तो वास्तविक पीड़ितों पर भी कोई विश्वास नहीं करेगा। हाईकोर्ट द्वारा इस प्रकार के मामलों की पहले जांच-पड़ताल की जानी चाहिए और सच्चाई जानने के बाद ही कार्रवाई करनी चाहिए। वास्तव में इस प्रकार के मामले दबंगों द्वारा अपनी राजनीतिक ताकत, बदला लेने या किसी की बढ़ती लोकप्रियता के ऊपर अंकुश लगाने के लिए दर्ज किए जाते हैं।

शामलाल कौशल, रोहतक

अवसरवादी राजनीति

एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार विगत विधानसभा चुनावों में करीब 60 विधायकों ने पाला बदला। सालों तक किसी पार्टी की विचारधारा को मानने वाला एक नेता जब रातो-रात अपनी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है तो उसे व्यक्तिगत अवसरवादिता और सत्ता का मोह ही कहेंगे। ‌एक नेता जो सप्ताह पहले तक जन मंचों से किसी दल या उनकी विचारधारा को समाज के लिए खतरा बता रहा था और अचानक उसी दल में शामिल हो जाए तो जनता अपने आप को ठगा-सा महसूस करती है।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

राहतकारी फैसला

पाकिस्‍तानी सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्‍य बेंच ने हिंदुओं के धार्मिक स्‍थल धर्मशाला पर किसी भी तरह के अतिक्रमण और तोड़फोड़ को तत्‍काल प्रभाव से रोकने का आदेश दिया है। कोर्ट के इस आदेश को पाकिस्‍तान में रहने वाले हिंदू अल्‍पसंख्‍यकों की बड़ी जीत माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जाहिर होता है कि अभी भी वहां की न्यायपालिका में निष्पक्षता कायम है। पाकिस्तान सरकार को अल्पसंख्यक हिंदुओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों को गंभीरतापूर्वक रोकना चाहिए।

सुभाष बुड़ावनवाला, रतलाम

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Jun 17, 2021

सतर्क रहें

आईसीएमआर ने अपने शोध में कहा है कि संस्थान ने उन शहरों को लेकर एक मैप तैयार किया है जहां कोरोना के तेजी से फैलने का खतरा होता है। इस अध्ययन में दिल्ली सबसे आगे है। जबकि दूसरे नंबर पर मुंबई, तीसरे पर कोलकाता, चौथे पर बेंगलुरु और पांचवें पर हैदराबाद है। अध्ययन से पता चलता है कि आम लोगों को टीकाकरण के बावजूद सतर्कता की जरूरत है। तीसरी लहर आने की चेतावनी विशेषज्ञ दे रहे हैं, जिसके लिए हमें अभी से ही तैयार रहने की जरूरत है। 

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी

आंतरिक लोकतंत्र

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच एक बड़ा संघर्ष चल रहा है। कांग्रेस आलाकमान को इस पर ध्यान देना चाहिए। अगर पूरे भारत को देखें तो कांग्रेस कहीं भी अच्छी स्थिति में नहीं है। यह सोचने का विषय है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सवाल उठाया है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और यह परिवार की पार्टी बन गई है। इसलिए, आलाकमान को नेताओं के साथ संवाद करना चाहिए। 

नरेंद्र शर्मा, जोगिंदर नगर

सार्थक प्रयास

दिल्ली और महाराष्ट्र में कोरोना के मामले धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। लोगों की लापरवाही की वजह से दिल्ली में स्थिति बहुत ही भयंकर हो गयी थी लेकिन लॉकडाउन और कर्फ्यू के बाद महामारी काबू में आयी। इसलिए सभी लोग एकजुट होकर इस वैश्विक महामारी से अपना-अपना बेहतर देकर छुटकारा पायें।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

बचकानी राजनीति

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा दिए गए अनुच्छेद-370 के बयान पर बवाल मच गया है। सत्ता में बैठी भाजपा के नेताओं को इस प्रकार के बेतुके बयानों को अनावश्यक तूल नहीं देना चाहिए। देश की जनता इस समय रोजी-रोटी, महंगाई, बेरोजगारी व कोरोना जैसी बीमारी के इलाज के अभाव से त्रस्त है। विपक्ष के इन बयानों का माकूल जवाब तो जनता अपने वोट के जरिए दे देगी।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

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Jun 16, 2021

कुत्तों का कहर

भारतीय संस्कृति की दृष्टि में आत्मवत‍् सर्वभूतेषु है, जिसमें कीड़ी-कुंजर दोनों की बात की गई है। भारत सरकार और पशु प्रेमी जितना चाहे कुत्तों का संरक्षण करें, उनके स्वास्थ्य और परिवार नियोजन पर काम करें। उन्हें सुरक्षित बाड़ों में रखकर अच्छा भोजन, गर्म कपड़े और डाक्टरी सुविधा दें पर यह तो बता दें कि जिन हजारों लोगों को देश में कुत्तों ने काट-काट कर मार दिया है, उनका संरक्षक कौन है? उन्हें न्याय कौन देगा? अभी तीन सप्ताह पहले पानीपत मेंे बच्चे को कुत्तों ने नोच-नोच कर खा लिया। पंजाब में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं, उनके लिए न कोई संरक्षक, न कोई आंसू बहाने वाला। किसी एक गली-कूचे में कुत्ता रोता-चीखता था तो वह अपशकुन माना जाता था। अब तो बाजारों में रात को कुत्ते ही चीखते व रोते हैं। लोगों के पीछे दौड़ते और काटते हैं। वर्ष 2020 में ही एक लाख से ज्यादा लोगों को पंजाब में कुत्तों ने काटा था। शासन-प्रशासन आमजन को कुत्तों के कहर से बचाएं।

लक्ष्मीकांता चावला,

पूर्व स्वास्थ्य मंत्री, पंजाब

सहिष्णुता का भाव

चिकित्सा पद्धतियों के वर्चस्व को लेकर हाल ही में रामदेव व इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बीच उपजा विवाद दुर्भाग्यपूर्ण है। ‌दुनियाभर में चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों को अपनाया जाता है। एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेदिक व यूनानी हर एक के पास अपनी श्रेष्ठता के दावे हैं। ऐसे में हर पद्धति के प्रति सहिष्णुता का भाव रखने की दरकार है।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

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Jun 15, 2021

बिखरती राहुल कांग्रेस

बारह जून के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘बनने से पहले बिखरती राहुल कांग्रेस’ कांग्रेस पार्टी में ‘आया राम गया राम’ की हकीकत बताने वाला था। पहली बात तो राहुल गांधी में वह राजनीतिक धीर-गंभीरता नजर नहीं आती कि वे अपने सिपहसालारों के आत्मसम्मान की रक्षा कर सकें। वहीं अनुभव व नई ऊर्जा में तालमेल बैठाने में भी पार्टी नाकाम रही। साफ-सी बात है कि पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने वाले युवा कांग्रेसियों को पार्टी में भविष्य उज्ज्वल नजर नहीं आता है। साथ ही हाल फिलहाल केंद्रीय सत्ता में कुछ साल कांग्रेस की संभावना भी उन्हें नजर नहीं आती। महत्वपूर्ण लेख के लिए साधुवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, उत्तराखंड

सेहत के सरोकार

छह जून के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में पुष्पेश पंत का ‘थाली में कुछ ठंडा हो जाये’ लेख बदलते समय के अनुसार खानपान के तौर-तरीकों का खुलासा करने वाला तथा शिक्षाप्रद रहा। बर्गर चाऊमीन, हॉट डॉग, पिज़्ज़ा रसायन मिश्रित खाद्य पदार्थों में पौष्टिकता का अभाव शारीरिक व्याधियों का कारण बनता है। डॉक्टरों और दवाइयों के सहारे चलती जिंदगी रोगों का ही कारण है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

सात साल में हासिल

Jun 14, 2021

मुश्किलों का दौर

भाजपा सरकार का सात सालों में उन्नति के स्थान पर गिरावट का ही अक्स दिखा। कोरोना की दूसरी लहर ने भयंकर तबाही मचाई। इलाज की व्यवस्था तो दूर की कौड़ी ही सिद्ध हुई है। मरने के पश्चात गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार भी लोगों को उपलब्ध नहीं हो पाया। जीडीपी रिकार्ड गिरावट में जा चुकी है। बेरोज़गारी और महंगाई का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। इनके लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल और पर्याप्त भोजन की उपलब्धता अभी दिवा-स्वप्न ही है। बहुप्रचारित अनुच्छेद-370, तीन तलाक कानून, अयोध्या विवाद का निपटारा, स्वच्छता मिशन, चीन का मुकाबला और पाक को सबक सिखाना तब तक बेमानी है जब तक प्रत्येक भारतीय का जीवनस्तर ऊपर न उठे।

शेर सिंह, हिसार


विफलता के दंश

विगत सात वर्षों में अनुच्छेद-370, तीन तलाक कानून एवं राममंदिर निर्माण से राष्ट्र के सामान्य जनमानस को सामान्यतः कोई सरोकार नहीं है। लेकिन सरकार नोटबंदी, बेरोजगारी, निरंतर बढ़ती महंगाई, सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस, साम्प्रदायिक और जातिगत सहिष्णुता, चिकित्सा और अर्थव्यवस्था के विषय पर विफल रही है। कोरोना की प्रथम लहर से सबक न लेते हुए दूसरी लहर में मरीजों का चिकित्सा सुविधाएं और पैरा-मेडिकल स्टाफ के अभाव में मौत का ग्रास बन जाना बहुत बड़ी विफलता है।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम


आर्थिक मानक

मोदी सरकार के सात साल पर सवाल करते समय प्रमुख आर्थिक मानदंडों का मूल्यांकन किया जाना समीचीन होगा। उनमें से महत्वपूर्ण कारक जीडीपी में वृद्धि है। सकल घरेलू उत्पाद की औसत वार्षिक वृद्धि दर अब सुधार की ओर है। विदेशी मुद्रा भंडार में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। कृषि-निर्यात के मोर्चे पर थोड़ा खराब प्रदर्शन अवश्य हुआ है। कृषक सुधार बिल पर विवाद महामारी के साथ-साथ भी बना हुआ है। मोदी सरकार की बेहतरीन उपलब्धि रही है। फिलवक्त विदेशों से वैक्सीन, किट, ऑक्सीजन, कंसंट्रेटर आदि की व्यवस्था कराने में सरकार सफल होती दिख रही है।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद


भरोसा हासिल करें

कोरोना काल में अचानक हुई तालाबंदी ने श्रमिक वर्ग को जिस तरह से सड़कों पर ठोकरें खाने को विवश किया, उसे पूरी दुनिया ने देखा। वैसे देश में अनुच्छेद-370, तीन तलाक कानून और राममंदिर से कहीं अधिक स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त-दुरुस्त करने की आवश्यकता हमेशा से रही है। चीन और पाक को सबक सिखाने की बातें केवल भाजपा ही कर रही है। किसान आंदोलन ने सरकार की छवि को धूमिल किया है। महंगाई और बेरोजगारी से आज हर घर त्रस्त है। सरकार ने केवल जनता के भरोसे को दरकिनार कर प्रचार तंत्र के सहारे सुर्खियां अधिक बटोरी हैं।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम


प्राथमिकता तय हो

मोदी सरकार ने अनुच्छेद-370, तीन तलाक कानून, अयोध्या विवाद, स्वच्छता मिशन और पाक और चीन को सही सबक सिखाने आदि कई अच्छे कार्य किये हैं। मगर दूसरी ओर, बेरोजगारी, महंगाई, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, भ्रष्टाचार, कोरोना और किसान आंदोलन आदि मुद्दों पर विफल ही नजर आ रही है। वहीं कोरोना की मार ने चिकित्सा तंत्र की पोल खोल कर रख दी है। इसलिए मोदी सरकार को समय रहते अामजन की मूलभूत आवश्यक सुविधाओं की ओर ज्यादा ध्यान देने की सख्त जरूरत है।

वेद मामूरपुर, नरेला


सकारात्मकता भी

मोदी सरकार ने तीस मई को सेवा दिवस के रूप में मनाया। भाजपा कार्यकर्ता, विधायकों ने गांव-गांव जाकर कोरोना महामारी से बचाव के लिए लोगों को वैक्सीनेशन के लिए राजी किया। मोदी सरकार ने इन सात सालों में अनुच्छेद-370, तीन तलाक का मुद्दा और पाक आतंकवादियों को सर्जिकल स्ट्राइक द्वारा चोट देने में सफलता पाई। अब तो जम्मू-कश्मीर में भी एक झंडा एक देश एक विधान लागू हो गया। वहीं देश ने वैक्सीन का उत्पादन कर विदेशों में वैक्सीन भिजवा कर मानवता की सेवा का बीड़ा उठाया। जब द्वितीय लहर भारत में आई तो ऑक्सीजन सिलेंडर, इंजेक्शंस की कमी को अन्य देशों ने अपने यहां से भेजकर दूर किया। यह सिर्फ मोदी सरकार द्वारा विश्व में भारत की उज्ज्वल छवि बनाने के कारण संभव हुआ।

भगवानदास छारिया, इंदौर


पुरस्कृत पत्र

गफलत से दिशाहीनता

मोदी सरकार सातवें साल में बचाव की मुद्रा में नजर आ रही है। पहले किसान आंदोलन और फिर कोरोना संकट की दूसरी लहर का आकलन न कर पाने और उसके निपटने में हुई चूकों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले छह सालों में नागरिकता संशोधन अधिनियम, तीन तलाक से निजात और जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35ए हटाने वाले ऐतिहासिक कार्य हुए, मगर कोरोना की दूसरी लहर की अनदेखी से सरकार पूरी तरह से विफल रही। जरूरी है सरकार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विपक्ष को भी साथ लेकर इस महामारी से लड़ने के लिए योजना बनाए।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़

बातचीत करें

Jun 12, 2021

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की। सभी संवैधानिक संस्थान उनके मुद्दों को हल करने में विफल रहे हैं। फिर ममता बनर्जी क्या करेंगी? उनका कहना है कि यह आंदोलन 2024 तक जारी रहेगा। अधिकतर किसान तीन कृषि कानूनों के पक्ष में हैं। वे अपने उत्पादों को किसी भी बाजार में बेच सकते हैं। वे अपने उत्पाद को बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। सरकार ने आश्वासन दिया है कि एमएसपी पहले की तरह रहेगा। इसलिए सभी मुद्दों को हल करने के लिए सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदरनगर


जवाबदेही का वक्त

11 जून के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘सतर्कता से अनलॉक’ कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर के बाद जीवन को सामान्य बनाने तथा अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए लॉकडाउन में ढील देने से उत्पन्न खतरों से सावधान करने वाला था। विशेषज्ञों ने कोरोना वायरस महामारी से बचने के लिए गाइडलाइन की अवहेलना के खिलाफ चेतावनी दी है। बेशक विभिन्न सरकारों ने किसी न किसी कारण से लॉकडाउन में ढील दे दी हो, लेकिन महामारी से बचने के लिए सभी लोगों को टीका लगवा लेना चाहिए। सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।

श्यामलाल कौशल, रोहतक


खतरा समझें

लॉकडाउन से अनलॉक की शुरुआत हो गई है। दिल्ली मेट्रो सहित महाराष्ट्र और उ.प्र. के बाजारों में हुजूम दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या अनलॉक भारी पड़ने वाला है? इन तस्वीरों से पैदा हुए खतरे को समझना जरूरी है। सरकार को जिला स्तर पर कुछ ऐसी टीमें नियुक्त कर देनी चाहिए जो बाजारों और चौराहों पर कोविड नियमों का पालन करा सकें। यदि अभी फूंक-फूंक कर कदम नहीं उठाए तो कोरोना फिर से हावी हो जाएगा।

रितिक सविता, दिल्ली

वनों को बचाएं

Jun 11, 2021

हर वर्ष गर्मियों में देश के कुछ वन संपदा के धनी राज्यों के जंगलों में भयंकर आग लगने की खबरें पढ़ने, सुनने और देखने को मिलती हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। हिमाचल में कुछ लोग गर्मियों के दिनों में बेकार की घास-फूस को जलाने के लिए जंगलों या खेतों में आग लगा देते हैं, जिस कारण सैकड़ों वृक्ष भी आग की बलि चढ़ जाते हैं। वहीं बेशकीमती जड़ी-बूटियां भी स्वाह हो जाती हैं। वहीं जंगलों की आग जंगली जीवों को भयंकर नुकसान पहुंचाती है। जब हरेभरे जंगल नष्ट हो जाते है तो कई हिंंसक जंगली जानवर रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


सख्त कदम उठाएं

भारत में सोशल मीडिया और सरकार के बीच कानून के पालन काे लेकर गहराया विवाद दुनिया के अन्य देशों में भी प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। नाइजीरिया सरकार ने ट्विटर को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर अपने सख्त इरादे जाहिर कर दिए हैं। अगर भारत के कानून को देश में ही अहमियत नहीं मिले तो सरकार को भी ऐसे ही कदम उठाने चाहिए। यह उचित ही है कि कोई देश अपनी संप्रभुता और अखंडता पर पैदा होते खतरे के मद्देनजर चुप कैसे बैठ सकता है? भारत सरकार भी सख्त कदम उठाए।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, म.प्र.


उम्मीदों की राह

हाल ही में प्रधानमंत्री ने सभी देशवासियों को मुफ्त में टीकाकरण करने के लिए प्रतिबद्धता जतायी है। उन्होंने टीकाकरण को तेज करने के लिए सभी संदेहों को दूर किया है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा। अब आमजन को कोरोना से बचाव के टीके लगवाने के लिए आगे आना चाहिए। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार अच्छा मानसून और मजबूत निर्यात की मांग हमारी अर्थव्यवस्था को चलाने के कारक होंगे। अब उम्मीद है कि ये सभी कारक आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेंगे।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

सुसंगत निर्णय लें Other

Jun 10, 2021

केंद्र सरकार ने बारहवीं के बोर्ड विद्यार्थियों को बिना परीक्षा के पास करने का निर्णय लिया, वहीं स्नातकोत्तर और पीजी के छात्रों की मुश्किलें अभी कम नहीं हुईं। कुछ राज्य सरकारों ने तो छात्र हित में निर्णय लेते हुए, प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों को प्रोन्नत करने का अभूतपूर्व काम किया। लेकिन अभी भी कुछ विश्वविद्यालय और कॉलेज इस बात पर अड़े हुए हैं कि परीक्षाएं करायी जाएं। क्या महामारी काल जैसे माहौल के बीच परीक्षा कराना उचित होगा? इलाहाबाद विश्वविद्यालय को अपने निर्णय पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है। चूंकि, अगर स्नातक के प्रथम और द्वितीय वर्ष को पास किया जा रहा तो अंतिम वर्ष को क्यों नहीं?

अमन जायसवाल, दिल्ली

महत्वाकांक्षाओं का टकराव

8 जून के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘कांग्रेस की कलह’ पंजाब में कांग्रेसियों द्वारा एक-दूसरे की पगड़ी उछालने का विश्लेषण करने वाला था। सभी अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। पंजाब में अकालियों का दबदबा कम होने तथा आप में गुटबाजी के चलते कांग्रेसजनों को आगामी विधानसभा चुनावों में जीत सामने नजर आ रही है। उधर, नवजोत सिंह सिद्धू कैप्टन के खिलाफ आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। शायद कांग्रेसी सत्ता को अपनी झोली में पड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में कहीं एक और राज्य कांग्रेस के हाथ से न निकल जाए।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

पाक में अल्पसंख्यक

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। हर रोज हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथियों का शिकार हो रहे हैं। पाकिस्तान की पुलिस और प्रशासन हिन्दू धर्मावलम्बियों के साथ सौतेला व्यवहार करती हैं। उनके साथ अत्याचार को नजर अंदाज किया जाता है। वहीं अल्पसंख्यक सिख और ईसाई समुदाय के लोग पाकिस्तान में दुःखी है।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

राजनीति न हो

Jun 09, 2021

केंद्र सरकार ने राज्यों को मुफ्त वैक्सीन देने का बहुत सराहनीय फैसला लिया है। यह वैक्सीन अभियान भी तभी कामयाब होगा जब कांग्रेस शासित प्रदेश इस अभियान पर राजनीति करने से परहेज करेंगे। यहां वैश्विक महामारी कोरोना को हराने के लिए वैक्सीन का इस्तेमाल सरकारों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है, इस चुनौती से निपटने के लिए सरकारों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। केंद्र सरकार ने कोरोना वैक्सीन अभियान की कमान अपने हाथ में लेकर इसे मुफ्त लगाने का जो एेलान किया है, वह गरीबों को राहत पहुंचाने का अच्छा प्रयास है।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


सख्ती जरूरी

कोरोना की दूसरी लहर ने भारत को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। महामारी का वर्तमान रूप धीरे-धीरे भले ही नियंत्रण में आ रहा हो लेकिन सचेत रहने की जरूरत अभी भी है। नि:संदेह कोरोना की दूसरी लहर का कारण सरकार और जनता की लापरवाही ही है। इसलिए जरूरत है कि सरकार और जनता को मिलकर आगे के लिए तैयार रहना होगा, जिससे कि कोरोना की तीसरी लहर हावी न हो पाए। जिन राज्यों में धीरे-धीरे अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो रही है, उन्हें अभी भी भीड़ पर सख्ती बरतनी होगी।

रितिक सविता, दिल्ली


मार्गदर्शन करें

स्कूली बच्चे इस समय बेहद नाजुक व संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। दसवीं व बारहवीं के छात्र असमंजस में हैं कि क्या करें। न तो प्रतियोगिता परीक्षा का अता पता है, न ही भविष्य का कुछ प्लान। सरकार को चाहिए कि कुछ ऐसा प्लान करे कि बच्चों का कीमती साल भी बेकार न हो व उनका एडमिशन भी उनकी मनचाही स्ट्रीम में हो जाये। इस समय अभिभावकों व टीचर्स की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों का सही से मार्गदर्शन करें।

विनय मोहन, खारवन, जगाधरी

घाट की उपेक्षा

Jun 08, 2021

उत्तर भारत के प्रसिद्ध शिव पीठ बैजनाथ का खीरगंगा घाट पूरी तरह उपेक्षित है। इस घाट में अस्थियां विसर्जित करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। सामान्य स्थितियों में भी यह स्थल लोगों की आस्था का केंद्र है। जो लोग आर्थिक तंगी आदि के कारण हरिद्वार नहीं जा पाते वह पूर्वजों के फूल खीरगंगा में ही विसर्जित करते हैं। वर्तमान में इस स्थान की दुर्दशा देखकर बहुत दुख होता है। महिलाओं के लिए तो यहां स्नानघर है लेकिन पुरुष इस सुविधा से वंचित हैं। यहां घाट भी कोई नहीं है, जहां बैठकर लोग फूल विसर्जन और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी कर सकें। बारिश की स्थिति में बैठने के लिए कोई कमरा या बरामदा भी नहीं है।

वर्तिका शर्मा, बैजनाथ


महंगाई की मार

एक तरफ कोरोना से लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर कमरतोड़ महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। बेकारी बढ़ गई है, लोगों की आमदनी कम हो गई है। तेल और पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं। सब्जियों और दालों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। एलपीजी गैस महंगी होती जा रही है। सरकार को जहां कोरोना के साथ जंग लड़नी पड़ रही है, वहीं महंगाई पर नियंत्रण करने के लिए कोशिश करनी चाहिए ताकि लोगों को राहत मिल सके।

शामलाल कौशल, रोहतक

कामयाबी और भटकाव

Jun 07, 2021

चिंता की बात

देश के खिलाड़ी पहले तो बड़ी लगन और सख्त मेहनत से कामयाबी हासिल करके प्रसिद्धि- प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। यहीं से उनकी उलटी गिनती आरंभ हो जाती है। उसका कारण अहंकार, घमंड तथा स्वार्थ इनके सिर चढ़कर बोलने लगते हैं। विलासिता पूर्ण जीवन जीने की लालसा तथा अनेकानेक इच्छाओं, आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अधिकाधिक धन-लोलुपता और मन का भटकाव इन्हें जुर्म की अंधी गलियों में धकेल देता है। यहीं से उपजता है शॉर्टकट रास्ता अपनाना, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति और गैंगवार से तक हाथ मिलाना। वास्तव में यह देश और समाज के लिए बहुत ही चिंतनीय है।

लाडो कटारिया, गुरुग्राम


दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति

बाहुबल और ताकत वे शब्द हैं जब हम स्वयं को सुपरमैन और सुपर हीरो समझने लगते हैं। प्रसिद्धि, पैसे और बाहुबल के गठजोड़ से इंसान दूसरों पर हुकूमत और राज करने की ख़्वाहिश पालने लगता है। इस सारे किस्से से ज़ाहिर है कि सुशील कुमार के कदम भी भटकाव की ओर बढ़ चुके थे। अतः कानून को उचित कार्रवाई कर सम्बन्धित पक्ष को न्याय दिलवाना चाहिए। पदक विजेता की छवि और अपने बाहुबल के बल पर गैंग बनाकर असामाजिक तत्वों में शामिल होना समाज और देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

मनजीत कौर ‘मीत’, गुरुग्राम


दौलत-शोहरत हजम नहीं

ओलंपिक विजेता और कुश्ती के सिरमौर खिलाड़ी का हत्या के मामले में नाम आना और फिर गिरफ्तार हो जाना लाखों खेल-प्रेमियों के लिए गहरा आघात है। आखिर कौन-सी कमी रह गई थी जिसे उनको पूरा करने के लिए अपराध की दुनिया में जाना पड़ा। जब बल के साथ धन भी ज्यादा हो जाए तो अक्सर अहंकार भी आ जाता है। इसके लिए हमारी खेल नीतियां भी कम दोषी नहीं हैं। मेडल लाने से पहले गुमनाम खिलाड़ियों की पैसे से झोली भरने की परम्परा हमारे देश में ही है। खिलाड़ी को मिले अथाह धन को वे हजम नहीं कर पाते।

जगदीश श्योराण, हिसार


अहंकार कारक

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। सफलता के लिए लक्ष्य को तय करने, उसकी प्राप्ति के लिए योजना बनाने तथा उसको हासिल करने के लिए निरंतरता बनाये रखने की जरूरत होती है। कामयाबी और भटकाव दोनों ही जीवन के अंग हैं। इच्छाएं आदमी के दुख का मूल कारण हैं। अहंकार अंधा होता है, पर इच्छाशक्ति में दृष्टि होती है। इच्छाएं वास्तव में अहंकार से उत्पन्न होती हैं, जो नकारात्मक दुनिया में ले जाती हैं। कामयाबी के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए, लेकिन अहंकार को त्याग देना चाहिए, सफलता तभी संभव हो सकती है।

सुनील कुमार महला, पटियाला, पंजाब


सफलता और संयम

हर कोई जीवन में कुछ पाने का चाहवान होता है और इसी चाह को पाने के लिए भरसक प्रयास करता है। लेकिन कामयाबी सब को नसीब नहीं होती। परंतु कामयाब होने से भी अधिक कठिन होता है कामयाबी को वहन करना। इस का नशा अक्सर सीधे सिर पर चढ़ जाता है। अभिभावकों एवं गुरुजनों का कर्तव्य होता है कि जहां वे अपने बच्चों या शिष्यों को सफलता के लिये तैयार करें, वहीं सफलता मिलने पर संयम कैसे रखना है, इसके लिये भी अपने बच्चों तथा शिष्यों को मानसिक रूप से तैयार करें।

अनिल कुमार शर्मा, चंडीगढ़


अपने दांव पर चित्त

खेल के मैदान में पहलवानों को चित करने वाला सुशील कुमार आज खुद अपने ही दांव में चित हो गया। कहावत है कि गलत सोहबत का असर गलत ही पड़ता है। वही सुशील के साथ हुआ। हालांकि, सुशील ने जिस इज्जत, शोहरत और दौलत को छू लिया था, उसके लिए ऐसी संगत का दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए था। रहीम का दोहा याद आता है, जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग। देश में ऐसी घटनाएं तो होती रहती हैं। मगर, सुशील कुमार जैसे लोगों की वजह से घटित घटनाओं से देश और समाज का मर्म आहत होता है।

भागवंती मंडवारिया, नीमच, म.प्र.


पुरस्कृत पत्र

देश के योगदान का अहसास

सुशील कुमार द्वारा ओलम्पिक में पदक प्राप्त करना बहुत बड़ी उपलब्धि रही है। किन्तु इन विजेताओं को इतना महिमामण्डित किया जाता है कि वे अपने आपको अति श्रेष्ठ समझने लग जाते हैं। कामयाबी और अहंकार उनके सिर चढ़कर बोलने लगते हैं। जिस ओलम्पिक तक वे पहुंचते हैं, परिश्रम उनका होता है किन्तु उन पर किया जाने वाला व्यय, अभ्यास, प्रयास सब देश करता है। इसका अहसास उन्हें कभी भी नहीं कराया जाता। इतनी उपलब्धियों के बाद वे खेल के प्रति अथवा देश के प्रति क्या उत्तरदायित्व निभा रहे हैं, कोई पड़ताल नहीं होती। उन्हें कोई कर्तव्यबोध नहीं कराया जाता। यही नीतियां उन्हें नाकारा, उच्छृंखल और अपराधी बना देती हैं।

कविता सूद, पंचकूला

फैसले की तार्किकता

Jun 05, 2021

तीन मई के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘वक्त का फैसला’ बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा करवाने के बारे में अनिश्चितता दूर करने वाला था। प्रधानमंत्री ने उच्च अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श करके बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा रद्द करने का जो फैसला लिया है वह स्वागतयोग्य है। सरकार ने होशियार विद्यार्थियों के लिए हालात सामान्य होने पर परीक्षाएं देने का विकल्प खुला रखा है। वैसे अभी से स्कूलों, कॉलेजों तथा यूनिवर्सिटियों के विद्यार्थियों को कोरोना वायरस महामारी से बचने के लिए वैक्सीनेशन का काम युद्धस्तर पर शुरू कर देना चाहिए ताकि अगले शिक्षा स्तर से नियमित तौर पर शिक्षा संस्थाएं खोली जा सकें।

शामलाल कौशल, रोहतक


बुरा वक्त

30 मई के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में अदिति टंडन का ‘कोरोना से महासंग्राम और कितना कोहराम’ लेख महामारी के भूत-वर्तमान अंजामों का विश्लेषणात्मक व भविष्य के प्रति सारगर्भित सुझावों का खजाना रहा। लॉकडाउन के प्रथम दौर की अपेक्षा दूसरे दौर में संक्रमण आंकड़ों में वृद्धि व स्वास्थ्य सेवाओं, अस्पतालों में बेडों, वैक्सीनेशन ऑक्सीजन के इंतजाम-अभावों में कालाबाजारी धंधों के कारण, अपनों का अपनों से बिछुड़ने की त्रासदी से दिल सिहर उठा।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


मन में है विश्वास

देश में खासकर गांवों में कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने कहर बरपा रखा है। लेकिन सरकार के अथक प्रयासों के चलते यह लहर तेजी से थम रही है। सख्त सावधानियों और नियमों के चलते टीकाकरण भी जोरों पर है। माना जा रहा है कि तीसरी लहर का असर बच्चों पर अधिक पड़ेगा। उम्मीद है कि सरकार और आमजन के प्रयासों से इसे हम आसानी से पार कर लेंगे।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

सहयोग करें

Jun 04, 2021

कोरोना की तीसरी लहर की आशंका ने सभी देशों को अलर्ट कर दिया है। महामारी की प्रत्येक लहर में अलग-अलग आयु वर्ग के लोग चपेट में आए हैं। चूंकि, भारत में अब 18 साल से ऊपर के व्यक्तियों को टीकाकरण जारी है। अगले कुछ महीनों में 18 साल से ऊपर ज्यादातर लोगों को कोरोना का टीका लग चुका होगा। सरकार को वैक्सीनेशन का काम और तेजी से करने की जरूरत है। ऐसे में तीसरी लहर बच्चों को अपनी गिरफ्त में न ले ले, इसलिए बच्चों के लिए वैक्सीन तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से तीसरी लहर की तैयारी अभी से करने के लिए कहा है। ऐसे में हम सभी लोगों का भी नैतिक कर्तव्य है कि सभी नियमों का पालन कर, सरकार का सहयोग करें।

गौरव रावत, दिल्ली


सजगता जरूरी

कोरोना काल में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर परिजनों की जान बचाते लोग न सिर्फ अवसाद में हैं बल्कि आर्थिक स्थिति ने भी उन्हें चिंतित किया है। महामारी के संक्रमण में कई परिवारों में दो या तीन या अधिक संक्रमित भी निकले हैं। ऐसे में उनकी क्या गत हुई होगी, समझा जा सकता है? मास्क और सामाजिक दूरी के पालन की उपेक्षा ही सजा संक्रमण के रूप में मिली है। अभी तीसरी लहर से सतर्कता के लिए सजगता ही बड़ा उपाय है। इसकी उपेक्षा भारी पड़ सकती है।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, म.प्र.


तंबाकू का कहर

कोरोना महामारी के इस दौर में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तंबाकू निषेध दिवस पर धूम्रपान करने वालों की बढ़ती जा रही संख्या पर चिंता व्यक्त की है। हर पांच पुरुषों में से एक की मौत धूम्रपान की वजह से होने वाली बीमारियों से हो रही है। तंबाकू सेवन में विश्व के टॉप पांच देशों में भारत दूसरे नंबर पर बताया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो धूम्रपान करके फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों में कोविड की गंभीरता और मौत का जोखिम 50 फीसदी ज्यादा होता है। यह चिंता का विषय है।

भगवती प्रसाद गहलोत, मंदसौर

शिक्षा की चुनौती

Jun 03, 2021

वैश्विक महामारी कोरोना ने जब से भारत को लॉकडाउन में बंद किया, उसके बाद से शिक्षा व्यवस्था अभी तक पटरी पर नहीं लौटी। हालांकि, ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा को आगे बढ़ाने का काम जारी है। लेकिन अभी भी बहुत से ऐसे छात्र हैं, जिनके पास बुनियादी संसाधन की कमी है। जहां एक ओर सीबीएसई और अन्य बोर्ड दसवीं के विद्यार्थियों को प्रमोट और पास करने का फैसला कर लिया गया था। अब वहीं बारहवीं के छात्रों के भविष्य की असमंजसता को खत्म कर दिया गया है। नि:संदेह अगर परीक्षाएं होतीं तो केन्द्र और राज्य सरकार इस जिम्मेदारी का निर्वहन शायद ही कर पाती।

अमन जायसवाल, दिल्ली


कोरोनाकाल के दंश

दो जून के दैनिक ट्रिब्यून में गुरबचन जगत का ‘नाकामी से उपजी चुनौतियों से मुकाबले का वक्त’ लेख वर्तमान राजनीति के सत्तापक्ष में चल रहे आपसी अंतर्द्वंद्वों का खुलासा करने वाला रहा। कोरोना महामारी के चलते विपक्षी सत्तारूढ़ प्रदेश सरकारों से आपसी टकराव, देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता हुआ लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं। मोदी सरकार के सात वर्षीय योजना विकास कार्यों की अमिट छाप जनता के दिलों पर है। लेकिन सुरसा मुख-सी बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी जैसी चुनौतियों का सामना करना एक गंभीर विषय है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल


महामारी पर भारी

कोरोना महामारी की भयावहता के बीच अब ब्लैक फंगस फैलने लगा है। कोरोना की दूसरी लहर के बाद ब्लैक फंगस के मरीज ज्यादा सामने आ रहे हैं। शहर के निजी और सरकारी अस्पताल में रोजाना नए ब्लैक फंगस के मरीज भर्ती हो रहे हैं। देश में कोरोना संक्रमण की स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार धारा 144 आगामी जून तक जारी रखेगी। इसमें सार्वजनिक स्थानों पर हर व्यक्ति को मास्क पहनने और दो गज की दूरी का पालन करना अनिवार्य है। ब्लैक फंगस की बीमारी पर गांवों में सतर्कता बरती जानी चाहिए। ऐसे में ग्रामीण स्तर पर पुख्ता इंतजाम होने चाहिए।

कांतिलाल मांडोत, सूरत

नाकामी के साल

Jun 02, 2021

28 मई के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का ‘सातवें साल के मुश्किल सवाल’ लेख राजग के शासनकाल के पिछले 7 सालों के शासन का लेखा-जोखा करने वाला था। इस अवधि में किसी को कोई विशेष फायदे के मुकाबले में नुकसान ज्यादा हुआ है। बेशक प्रधानमंत्री सीएए, अनुच्छेद-370 तथा तीन तलाक कानून पास कराने में सफल हो गये हों, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर में मानवीय क्षति रोकने में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं। सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी तथा किसान आंदोलन को लेकर नाकामी प्राप्त की है। अगर कहीं देश में विपक्ष सशक्त तथा एकजुट होता तो सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ती। यह सरकार की नाकामियों का ही परिणाम है कि इसके समर्थक भी अब पहले की तरह जोश में नहीं दिखाई देते।

शामलाल कौशल, रोहतक


जनसंख्या नीति

दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश चीन ने बड़ा फैसला लेते हुए अपनी ‘टू चाइल्ड पॉलिसी’ को खत्म कर दिया है। हालांकि ये तो देर-सवेर होना ही था क्योंकि चीन को आशंका है कि जन्म दर में आई यह गिरावट यदि आगे भी जारी रही तो खुद को सुपर पावर बनाए रखने का उसका सपना टूट सकता है। हालांकि, चीन के लोगों में इस नई नीति को लेकर संशय है। दरअसल, इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि बच्चों की परवरिश काफी महंगी हो गई है। युवा पीढ़ी बच्चे पैदा करने से ज्यादा अपने करिअर को ज्यादा अहमियत दे रही है। जाहिर है कि सेना में जवानों एवं अफसरों की कमी उसे चिंता में डालने वाली है।

गौरव रावत, दिल्ली

तार्किक सवाल Other

Jun 01, 2021

28 मई को दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित राजकुमार सिंह के ‘सातवें साल के मुश्किल सवाल’ लेख में 30 मई को सात साल पूरा कर लेने वाली भाजपा पर लेखक ने गंभीर विश्लेषण कर कुछ सवाल उठाएं हैं कि कोरोना संकट में चिकित्सा-व्यवस्था को दुरुस्त करने के बजाय भाजपा राजनीति को प्राथमिकता दे रही है। लेखक का विचार है कि सरकार विपक्ष को साथ लेकर कोरोना नियंत्रण और टीकाकरण की ओर ध्यान दे। अनुच्छेद-370 और 35-ए, बालाकोट प्रकरण, तीन तलाक का मुद्दा, नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे फैसले चुनौतियों की तरह सामने थे और सरकार विरोधियों की खलकत के बावजूद पार लगी। लेखक का मानना है कि किसानों से जुड़े मुद्दों पर सरकार ने आनन-फानन में फैसले लिए, जिससे समस्याएं आज तक भी सुलझ नहीं पायी हैं। सरकार के सामने कोरोना की असली चुनौती से निपटना अग्निपरीक्षा से गुज़रने के समान है। लेखक के ज्वलंत प्रश्न विचारणीय हैं।

मीरा गौतम, जीरकपुर

बेहतर अमल हो

प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी में अपने माता-पिता को खोने वाले बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और अन्य लाभों की घोषणा की है। ये सभी लाभ पीएम केअर फण्ड से मिलेंगे। सरकार की यह योजना सराहनीय है। वास्तव में सरकार इस योजना पर अमल भी करे तभी असली विकास होगा।

नेहा जमाल, मोहाली