आपकी राय

नस्लभेदी सोच का खात्मा Other

Jan 25, 2021

जन संसद की राय है कि वैश्विक प्रयासों के बावजूद यदि नस्लभेद की सोच बरकरार है तो उसके मूल में अज्ञानता, प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा निहित है। यदि व्यक्ति मानवता के मर्म को समझे तो ऐसे दुराग्रहों से मुक्त हुआ जा सकता है। सामाजीकरण की प्रक्रिया को विस्तार देना जरूरी है।

सामाजिक चेतना जरूरी

सिडनी में खेले गये क्रिकेट टैस्ट मैच के दौरान दर्शकों द्वारा भारतीय खिलाड़ियों के खिलाफ की गई नस्लभेदी टिप्पणी की जितनी निंदा की जाए कम है। इस प्रकार की सोच मानवता की शत्रु है। नस्लभेदी सोच को खत्म करने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्था व सामाजिक चेतना की जरूरत है। यह एक सभ्य समाज के लिए अति अशोभनीय है। खेल के मैदान में खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन की प्रशंसा करने की आवश्यकता है न कि उन पर कोई अभद्र टिप्पणी करने की। सभ्य समाज नस्लभेदी टिप्पणियों की अनुमति नहीं देता।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

अहंकार का भ्रम

आस्ट्रेलिया में दर्शकों ने भारतीय खिलाड़ियों पर नस्लभेदी टिप्पणी करके पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। ऐसे मामलों को उच्चस्तर पर उठाया भी जाता रहा है परन्तु गोरे लोग अब भी इस प्रवृति को छोड़ नहीं पा रहे हैं। आजादी से पूर्व दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी भी नस्लभेद का शिकार हुए थे। हाल ही में अमेरिका में भी एक ऐसी ही घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर के रख दिया। अंग्रेज लोग अपनी मानसिकता को बदलें और उनको यह वहम मन से निकाल देना चाहिए कि वे दूसरों से योग्य और सभ्य हैं। वर्तमान में पूर्वी देशों के लोग उनसे किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं। यही स्थिति रही तो एक दिन नस्लभेदी टिप्पणी करने वाले अलग पड़ जाएंगे।

जगदीश श्योराण, हिसार

संकीर्ण मानसिकता

नस्लवाद या प्रजातिवाद की अवधारणा को किसी भी हाल में सही नहीं ठहराया जा सकता। अश्वेतों की मात्र इसलिए खिल्ली नहीं उड़ाई जानी चाहिए कि वे अश्वेत हैं, क्योंकि ऐसा करना वसुधैव कुटुंबकम की भावना के विपरीत है। इस संकीर्ण मानसिकता का खात्मा तभी संभव हो सकता है जब हम सभी में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना का विकास होगा और यह शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों के विकास से ही संभव हो सकता है। नस्लभेद मानव की तुच्छ व संकीर्ण मानसिकता का परिचायक ही कहा जा सकता है।

सुनील कुमार महला, पंजाब

विविधता का ज्ञान हो

मनुष्य की सोच उसके मन के विचारों पर निर्भर करती है और ऋणात्मक सोच का नाश किया जा सकता है। किसी भी चीज को पूर्णता से खत्म करने के लिए उसकी जड़ को नष्ट करना अनिवार्य है। उसी प्रकार नस्लभेदी सोच का खत्मा भी उसके आधार, घर-परिवार द्वारा ही किया जा सकता है। हमें आवश्यकता है तो आत्म जागरूकता की, अपनी सोच के विकास की। माता-पिता को चाहिए कि वे शुरू से ही बच्चों में एकता और समानता की भावना को विकसित करें, जिससे कि वे भविष्य में नस्लभेदी जैसी विचारधारा का शिकार न हों। विविधता के संपर्क से भी इस सोच का नाश किया जा सकता है। चूंकि विविधता के बारे में ज्ञान हमारी रूढ़िवादी सोच को बदल कर रख देगा।

आकाश धीमान, अम्बाला कैंट

प्रतिभा तो उभरेगी

नस्लभेद, रंगभेद, धर्मभेद और जाति भेद समस्त विश्व की सदियों से सड़ी हुई सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है। कोई समाज शैक्षिक, आर्थिक और तकनीकी स्तर पर कितना ही विकसित हो जाये, सामाजिक विभेद से दूर नहीं हो पाता है। इसका प्रमुख कारक है कि हर समाज में प्रारंभिक अवस्था से सामाजिक विभेद को पोषित किया जाता है। समस्त विश्व के विभिन्न समाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन सामाजिक विभेद समाप्त नहीं हो पाए हैं। प्रतिभा को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। मानसिक स्तर पर विभिन्न सामाजिक विभेदों को समाप्त किये बिना इस प्रकार की घटनाओं को रोकना असम्भव प्रतीत होता है।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

प्रगतिशील सोच हो

इनसानियत का मापदंड अगर रंगों से होता तो नेल्सन मंडेला, बराक ओबामा जैसे महान लोगों को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलता। नस्लभेदी ऐसी सोच है जो देश और दुनिया को दो हिस्सों में बांटती है। इस प्रकार की सोच मानव जाति के लिए खतरा है। दुनिया में समानता, खुशहाली व तरक्की की पहली शर्त है। विज्ञान हर दिन इस मूल तथ्य की पुष्टि कर रहा है कि हम एक ही मानव प्रजाति के हैं। असल में कोई काला या गोरा जीन नहीं होता। सभी तरह की आनुवंशिक भिन्नताएं, जो मनुष्यों के बीच है, वह व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद है। आधुनिक सोच से ही नस्लवाद को खत्म कर सकते हैं।

दिव्येश चोवटिया, गुजरात

पुरस्कृत पत्र

मानवता का अहसास हो

नस्लभेदी सोच विकृति प्रतिस्पर्धात्मक और महत्वाकांक्षी मनोवृत्ति से उपजती है। आजादी से पूर्व महात्मा गांधी ने नस्लभेद मिटाने के लिए कई सालों तक दक्षिण अफ्रीका में रहकर जागृति अभियान चलाया। वैश्वीकरण के इस दौर में रंगभेद पहले की अपेक्षा कम अवश्य हुआ है, मगर समाप्त नहीं। राजनीति, खेल और सिनेमा जैसे घोर प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्रों में अब भी नस्लभेदी टिप्पणियां होती हैं, जो कि अमानवीय हैं। आध्यात्मिक जागरण से ही विश्व से नस्लभेद को मिटाया जा सकता है। जब तक मानव जीवन के रहस्य को नहीं समझा जाएगा तब तक भेद करने की यह प्रवृत्ति बनी रहेगी।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम

वक्त की मांग

Jan 23, 2021

ऑनलाइन बाज़ार में होम डिलीवरी के बढ़ते क्षेत्र को देखकर लगता है कि अब सरकारें भी इस कार्यक्षेत्र को अपनाने वाली हैं। इसके चलते अब जनता को घर-घर राशन पहुंचाया जायेगा ताकि किसी को भी राशन के लिए परेशान न होना पड़े। आंध्र प्रदेश सरकार 1 फरवरी से यह ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है। अगर यही मुहिम सरकार ने महामारी के काल में शुरू कर दी होती तो जनता को घरों से बाहर निकलने की जरूरत नहीं पड़ती।

नवज्योत सिंह, ऊना, हि.प्र.


सब्सिडी खत्म

अब सांसदों को संसद की कैंटीन में मिलने वाले भोजन पर सब्सिडी नहीं मिलेगी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बताया है कि अब नये सत्र से कैंटीन में मिलने वाले भोजन पर सब्सिडी को पूर्णतः बंद कर दिया गया है। वहीं सब्सिडी खत्म किए जाने से लोकसभा सचिवालय को सालाना आठ करोड़ रुपये की बचत होगी। वैसे सब्सिडी को खत्म करने की मांग वर्षों से की जा रही थी। वहीं आम लोगों में सरकार के उचित व सकारात्मक कदम की सराहना की जा रही है।

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी


चिंता की बात

देश में बच्चियों के गायब होने और दुर्व्यवहार का सिलसिला कठोर कानून लागू होने के बाद भी न थमना दुर्भाग्यपूर्ण है। बच्चियों की शिक्षा के साथ सुरक्षा भी जरूरी है। न्यायिक प्रक्रिया ऐसी हो कि सजा में अत्यधिक विलंब न हो। इसी तरह शिक्षक, पालक, समाज सुधारक तथा विशेष तौर से महिला वर्ग बच्चों को चरित्र निर्माण और जागरूकता हेतु प्रेरित करते रहें।

बीएल शर्मा, तराना, उज्जैन


सार्थक फैसला

जेईई एवं नीट भारत के शिक्षा क्षेत्र में होने वाली कठिन परीक्षाएं मानी जाती हैं। इस वर्ष सरकार ने पाठ्यक्रम को न बदलने का जो फैसला लिया है, वह सराहनीय है। सरकार के इस फैसले से छात्रों को कोरोना काल में राहत मिलेगी क्योंकि छात्र इस वर्ष हर वर्ष की भांति तैयारी करने में असमर्थ रहे हैं।

अक्षरा गुरबानी, चंडीगढ़

तार्किक हो समाधान

Jan 22, 2021

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गई कमेटी की पहली बैठक के बाद कमेटी ने तीनों कृषि कानूनों को किसानों के हक में बताया है। लेकिन किसान संगठनों ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया है। किसान जिन कानूनों को वापस लेने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, उनमें एक कानून आपातकाल के अलावा हर वक़्त भंडारण की भी अनुमति देता है। इसके फलस्वरूप आमजन के लिए भी खाद्य सामग्री महंगी होने की बहुत संभावनाएं हैं। लेकिन सरकार की यह बात भी सही है कि कानूनों को वापस लेना संभव नहीं।

सुमित कुमार चौधरी, अम्बाला


आक्रामकता नहीं हल

20 जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित राजकुमार सिंह के ‘आक्रामक राहुल गांधी बदल पाएंगे कांग्रेस की किस्मत’ लेख पार्टी की नब्ज पर हाथ रखने वाला था। जरूरत इस बात की है कि पार्टी संगठन को मजबूत किया जाए। ऐसी ही आक्रामकता राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह सरकार के दौरान प्रस्तावित विधेयक की प्रतियां फाड़ कर दिखायी थी। उसके बाद मोदी सरकार सत्ता में आई थी। जरूरत संगठन को मजबूत करने और जनाधार बढ़ाने की है। विचारोत्तेजक लेख हेतु साधुवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार


महापुरुषों की राह

19 जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में विश्वनाथ सचदेव का लेख ‘महापुरुष ही नहीं, उनके विचार भी अपनायें’ राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ते स्वार्थ का खुलासा करने वाला रहा। चुनावी उम्मीदवार महापुरुषों का अनुसरण मात्र वोट बैंक भुनाने के लिए करते हैं। चुनाव जीतने के बाद वादे, जनता का विश्वास धराशायी हो जाता है। उनकी करनी और कथनी में काफी अंतर दिखाई पड़ता है। जनहित राजनेताओं की आंखों से ओझल हो जाता है। स्वच्छ राजनीति महापुरुषों के आचरण के अनुसरण से ही संभव है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

बदलाव लाए कांग्रेस

Jan 21, 2021

दैनिक ट्रिब्यून में 20 जनवरी को प्रकाशित राजकुमार सिंह के ‘आक्रामक राहुल बदल पायेंगे कांग्रेस की किस्मत’ लेख में राहुल की निरन्तर आक्रामकता पर बहुत महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं। राहुल को पुनः अध्यक्ष बनाने का संकेत भी स्पष्ट समझ में आ रहा है। यह भी कि कांग्रेस को मौजूदा राजनीति में स्वयं को नये सिरे से परिभाषित करने की ज़रूरत है। लेखक का मानना है कि राहुल को समझना चाहिए कि तथ्यों पर आधारित आक्रामकता ही कारगर होती है। जब राहुल देश की सुरक्षा और एकजुटता के सवाल पर आक्रामक हो जाते हैं तो पार्टी का क्षरण शुरू हो जाता है।

मीरा गौतम, जीरकपुर


गर्व का क्षण

भारतीय क्रिकेट टीम ने आस्ट्रेलिया को उसकी धरती पर हराकर जो बेमिसाल जीत हासिल की है, वह बुलंद हौसलों की जीत है। सभी ने मिल-जुलकर जिस तरह से कंगारुओं को छकाया व जो जीत हासिल की, वह ऐतिहासिक जीत बन गई। ऐसे ही साझा प्रयास टीम को न केवल जीत की दहलीज पर ले जाते हैं, बल्कि हार को जीत में बदलने वाले खिलाड़ी मील के पत्थर साबित होते हैं। यह इन सभी खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है कि केवल नामचीन होना ही काफी नहीं है। टेस्ट क्रिकेट में यह क्षण भारतीयों के लिए गर्व का क्षण है|

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.


अमेरिका में भारतीय

अमेरिका में भारतीय मूल के 20 लोगों को जो बिडेन की सरकार में नामित किया गया है। माना जा सकता है कि कई लोग शक्तिशाली पद प्राप्त करेंगे। जो बाइडेन ने 20 जनवरी को अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। इसी दिन कमला हैरिस भी अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगी। शायद यह पहली बार है जब भारतीय मूल के इतने लोग अमेरिका में शक्तिशाली पदों की कमान संभालेंगे। यह भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को और अधिक बढ़ावा देगा।

नरेंद्र कुमार, भुजड़ू, मंडी, हि.प्र.

आपकी राय

Jan 20, 2021

जीत के हकदार

16 जनवरी को देश में वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया गया। भारत आत्मनिर्भरता के साथ इस कोरोना महामारी से लड़ने में सक्षम हुआ है तो केवल सरकार की दूरदर्शिता के कारण। सरकार ने विपरीत परिस्थिति में जिस कुशलता के साथ कार्य किया वह प्रशंसनीय है। देश को कई महीनों तक लॉकडाउन में रखना देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक था परंतु सरकार इस खतरे को बर्दाश्त करने के लिए तैयार थी। तारीफ के लायक हैं देश के सभी फ्रंटलाइन वर्कर, जिन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। इसलिए आज देश कोरोना महामारी से जीतने के लिए तैयार है।

चेतना, किन्नौर, हि.प्र.

कीमतों की मार

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें आसमान को छूती नजर आ रही हैं। पिछले दिनों हुई मूल्यवृद्धि से इसकी दर सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब पहुंच गई है। सरकार के भारी-भरकम टैक्स के चलते सबसे महंगा पेट्रोल डीजल उपभोक्ता खरीदने को मजबूर हो रहा है। पिछले साल भर से हाथ पर हाथ धरे बैठा आम आदमी पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा है, ऐसे में मूल्यवृद्धि उसकी दशा बिगाड़ने का ही काम करेगी। सरकार को इस दिशा में पहल करके भाव को स्थिर रखने का प्रयास करना चाहिए।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, दसई धार, म.प्र.

गर्व की बात

शौर्य, पराक्रम और साहस का प्रतीक तेजस, अब भारतीय वायुसेना में छाने की ओर बढ़ चला है। लगभग 48 हजार करोड़ रुपए की लागत से, तेजस विमानों का निर्माण वर्ष 2024 तक संपन्न होगा। अत्याधुनिक तकनीक से लैस तेजस लेज़र सुविधा, राडार और रॉकेट, बम से भी वार करने में सक्षम है। अगर सम्पूर्ण निर्माण भारत में हो रहा है तो यह देश के लिए गर्व की बात होगी।

अमन जायसवाल, दिल्ली

घर वापसी हो Other

Jan 19, 2021

18 जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में सुरेश सेठ का ‘चुनौतियों से मुकाबले को चाहिए नयी दृष्टि’ लेख भारत द्वारा अपने बलबूते पर दो प्रभावी वैक्सीन का आविष्कार कर नये वर्ष में उम्मीदों को जगाने वाला था। इस समय हमारी अर्थव्यवस्था में सबसे ताकतवर कृषि क्षेत्र है परंतु देश के अन्नदाताओं को केंद्र सरकार द्वारा पास किए हुए तीन खेती कानून स्वीकार्य नहीं हैं। सरकार को इनकी मांगें मानकर आंदोलनकारी किसानों को घर भेजना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए यह लोग कृषि के उत्पादन को और बढ़ा सकें।

शामलाल कौशल, रोहतक


सख्ती जरूरी

मुरैना, म.प्र. में जहरीली शराब पीने से 20 लोगों की मौत हो गई। निश्चित ही यह जहरीली शराब अवैध तरीकों से अपना कारोबार चला रहे धंधेबाज लोगों से खरीदी होगी। अब सरकारी नौकरी व 20 लाख की मदद की मांग समझ से परे है। ऐसी मांगे अगर मानी जाती है तो निश्चित ही लोग अवैध शराब पीने से बाज नहीं आएंगे। जबकि अवैध शराब के धंधे को तो हतोत्साहित करना चाहिए।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.

मन का भी हो शृंगार निवेदिता श्रीवास्तव

Jan 18, 2021

निवेदिता श्रीवास्तव

शृंगार चिन्ह के औचित्य पर मनन करने से भी प्रबल प्रश्न मेरे मन में यही उठता है कि शृंगार है क्या... क्या मात्र तन को नानाविध सज्जा करना ही शृंगार है या मन को सज्ज करना भी! बहुधा हम मन को भूल ही जाते हैं और विविध सामाजिक और पारिवारिक परम्पराओं की ही टीका करते रह जाते हैं। बस इसीलिये जो बात सामान्यतः बाद के लिये छोड़ देते हैं, मैं उसको सबसे पहले लेकर आना चाहूंगी। चेतना का बोध होते ही सबसे पहले मन को शृंगारित करना चाहिए। मनन की धारा सन्तुलित करके आत्मबल को दृढ़ करना चाहिए, साथ ही वाणी पर संयम भी हो। वाणी पर संयम का अर्थ मात्र इतना ही है शब्दों का चयन और बोलने का तरीका कटु न हो। मन के इस सौंदर्य के साथ हम शृंगार चिन्ह की तार्किकता पर मनन करें तो औरों के लिये भी स्वीकार्य होगा।

तथाकथित प्रचलित सोलह शृंगार की बात करूं तो यह एक आदत की तरह सोच में शामिल हो गयी है, जो विभिन्न अवसरों पर मुखरित हो उठता है और शकुन-अपशकुन के मकड़जाल में फंसाये रखता है। सनातन काल से स्त्री घरों के अन्दर ही रहती थी और परिवार की प्रतिष्ठा की द्योतक भी समझी जाती थी। स्त्रियों के साज-शृंगार को भी इसी से जोड़ा जाता था। जितना अधिक सम्पन्न घर, उतने ही अधिक आभूषणों और शृंगार से सज्जित होगी उस घर की स्त्री।

साथी की मृत्यु के बाद स्त्री के लिये शृंगार वर्जित करने के पीछे पुरुषवादी सोच का मूल कारण उसको अधिकारहीन अनुभव करवाना ही रहता होगा। इन शृंगार चिन्हों को धारण करने के पीछे स्वयं के आकर्षक दिखने से मिलने वाला आत्मविश्वास भी एक कारण है। इनके पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं। पति के न रहने पर शृंगार न करने देना सर्वथा अमानवीय कृत्य है। वह कैसे रहना चाहती है, यह निर्णय स्वयं स्त्री का होना चाहिए। जो और जैसे करने से उसके मन को शान्ति मिले, वही करना चाहिए।

परम्पराओं को मात्र परम्परा न मान कर जीवित रहने में सहायक की तरह ही अपनाना चाहिए, न कि किसी के मन को और भी तोड़ने के लिये और तन से ज्यादा मन के शृंगार के प्रति सजग और सन्नद्ध रहना चाहिए। तन के साथ मन का भी शृंगार हो और सबका हो।

साभार : निवेदिता-माइस्पेस डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

सहयोग करें Other

Jan 16, 2021

सर्वोच्च न्यायालय ने वर्तमान कृषि कानूनों के क्रियान्वयन को अगले आदेश तक निलंबित किए जाने और एक किसान कमेटी बनाने का सराहनीय फैसला दिया है। किसान कमेटी में सरकार, किसान संगठनों के नुमाइंदे होंगे, जो कृषि कानूनों की खामियों का विश्लेषण कर नया प्रारूप प्रस्तुत करेंगे। यद्यपि किसान संगठनों ने कमेटी में प्रतिनिधित्व अपनी मर्जी से करने, कमेटी के निर्णय को नहीं मानने, प्रदर्शन जारी रखने के जो बड़े बोल निकाले हैं, उनको जनसमर्थन प्राप्त नहीं है। सरकार को भी समझ आ गया है कि कृषि कानूनों के कार्यान्वयन में जरूर कोई कमी रही है। अब किसान संगठन अपना धरना-प्रदर्शन समाप्त करें।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद


समाधान जरूरी

‘तिरछी नज़र’ के अन्तर्गत ‘नाक के सवाल पर जारी बवाल’ में शमीम शर्मा ने किसान आंदोलन से आम जनता को निरन्तर हो रहे नुकसान की ओर संकेत किया है। अब तक इस आन्दोलन की वजह से अर्थव्यवस्था को हजारों करोड़ का चूना लग चुका है। लेखिका का कथन शतप्रतिशत सही है कि ‘जिन लोगों का खेतीबाड़ी से दूर-दूर का कोई लेना-देना नहीं है, वे भी बिना वजह अपनी नाक घुसा कर आन्दोलन को तूल देने की कोशिश कर रहे हैं।’ वास्तव में ये वही लोग हैं जो इस समस्या के समाधान में रोड़ा अटका रहे हैं।

लाजपत राय गर्ग, पंचकूला


यादगार दिन

वर्ष 2021 की 16 जनवरी देश के लिए गौरवमयी तारीख के रूप में याद की जाएगी। आज से कोरोना वायरस से नागरिकों को बचाने के वैक्सीन लगाने का काम आरंभ हो रहा है। यदि टीके शतप्रतिशत सकारात्मक परिणाम देने लगेंगे तो इससे देश के हालात वैसे ही हो जाएंगे जैसे कि कोरोना काल से पहले थे। सभी ओर सामान्य गति से जिंदगी रफ्तार से दौड़ेगी वहीं वैक्सीन को लेकर फैलने वाली अफवाहों को रोकने के लिए सरकार और प्रशासन को सख्ती बरतनी होगी।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

चीन का शिकंजा Other

Jan 15, 2021

दैनिक ट्रिब्यून 7 जनवरी के अंक में प्रकाशित पार्थसारथी का ‘चीनी कर्ज जाल में छटपटाती पाक संप्रभुता’ लेख में चीनी कर्ज तले दबती पाक सरकार का विश्लेषण करने वाला था। कैसे चीन, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में 62 खरब डॉलर का निवेश कर रहा है। इस गलियारे के माध्यम से चीन के समुद्र तटविहीन प्रांतों की पहुंच फारस की खाड़ी तक पहुंचाना है। पाकिस्तान कर्ज चुकाने की एवज में चीन की भूराजनीतिक महत्वकांक्षाओं में सहयोगी बनने को तैयार है। 1970 में भी शक्सगम घाटी चीन को उपहार के रूप में दी थी। भविष्य में पाकिस्तान जल्द ही चीनी ऋण के नीचे दबा हुआ देखने को मिलेगा।

नवज्योत सिंह, ऊना


जाग्रत विपक्ष

13 जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून मे गुरबचन जगत का ‘जीवंत लोकतंत्र को चाहिए जाग्रत विपक्ष’ लेख देश की राजनीति पर विचार-विमर्श करने वाला था। लेखक ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों मे सामान्य जनता की बात को सामने रखा है। देश के लोकतंत्र को जरूरत है एक मज़बूत और जाग्रत विपक्ष की। मौजूदा समय में सरकार के खिलाफ विरोध करने वाले की आवाज़ को अक्सर दबा दिया जाता है, मगर वही बात विपक्ष दल करे तो उसका गहरा प्रभाव पड़ता है। देश को आवश्यकता है सशक्त विपक्ष की जो आम जनता के सही विषयों पर चर्चा करे।

आकाश धीमान, अम्बाला कैंट


मर्मस्पर्शी कथा

दस जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून के अध्ययन कक्ष पृष्ठ में वनमाली की ‘संतरे वाली’ कहानी रोमांचकारी जीवन की प्रस्तुति रही। कथानायिका चंदा का रोबिला व्यक्तित्व बाह्य पक्ष की पहचान कराते हुये विषय वस्तु को प्रभावशाली बना रहा था। अबनि और चंदा का मिलन निर्लेप-निष्काम भावना का एकीकरण दर्शा रहा था। पाठक हृदयग्राही जिज्ञासा, अतृप्त, अनुत्तरित प्रश्न लिये आंतरिक पक्ष संभालते तब तक नायिका अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा गायब हो जाती है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

बंगाल में उफान Other

Jan 14, 2021

बिहार के बाद अब बंगाल में सियासत तेज हो गई है। नड्डा टीम ने पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा नेतृत्व में बंगाल को अपने चंगुल में करने के लिए, कई दांव खेले जा रहे। नड्डा ने सभी भाजपा कार्यकर्ताओं को गांव-गांव जाकर, किसानों से एक मुट्ठी चावल लेने की नई मुहिम की शुरुआत की है, जिससे कि किसानों से जुड़ा जा सके। टीएमसी भी अपनी धाक जमाने का हरसंभव प्रयास कर रही है। अगले कुछ महीनों में बंगाल में चुनाव होने की संभावना है। देखना यही होगा कि बंगाल की जनता आखिर किसको ताज सौंपती है?

अमन जायसवाल, दिल्ली


जनमत का सम्मान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनके समर्थक चुनाव के परिणामों को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हैं। लोकतंत्र में जनता की राय सर्वोपरि है। ट्रम्प के समर्थकों ने अमेरिका की संसद में अराजक स्थिति पैदा कर दी है। उन्हें नियंत्रित करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी। चुने गए राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस घटना को देशद्रोह बताया है। यह घटना अमेरिका के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज की जाएगी। ट्रम्प और समर्थकों को जनता की राय का सम्मान करना चाहिए।

नरेन्द्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, मंडी,


फैसले का सम्मान हो

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी राकेश टिकैत समेत धरने पर बैठे किसान संगठनों ने धरना नहीं हटाने का फैसला किया है। वहीं कमेटी के सामने पेश होने पर भी असमंजस जैसी स्थिति पैदा कर दी है। इस तरह की बातें किसानों के लिए ठीक नहीं हैं। बातचीत द्वारा ही हल निकाला जा सकता है। अब किसानोंं के लिए जो उच्च कमेटी बनेगी उसे समय देना चाहिए। अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए आंदोलन को समाप्त करना चाहिए।

प्रदीप कुमार दुबे, देवास

विवेकानंद का मंत्र Other

Jan 13, 2021

स्वामी विवेकानन्द का जन्म ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं। उनका दर्शन, उनका सम्पूर्ण जीवन देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भारत की शक्ति उसके युवा में है। युवाओं की कुशलता हमेशा से देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है। यह संकल्प केवल विवेकानन्द जी जैसे आदर्श के कारण ही आ सकता है। सारे विश्व को वेदांत का पाठ सिखाने का समय आ चुका है। आज विवेकानंद जी का वह वाक्य ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये’ आज के युवाओं का मूल मंत्र है, जिससे वे प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होंगे।

चेतना, किन्नौर, हि.प्र.


कौशल विकास

12 जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का लेख ‘कौशल विकास की आधारशिला मजबूत हो’ श्रमिकों के हालात पर पर चर्चा करने वाला था। लेख के अनुसार जापान की तरफ से भारत से कुशल श्रमिकों की मांग किए जाना उत्साहवर्धक है। दूसरी तरफ अफसोस की बात भी है कि देश में उस किस्म के कुशल श्रमिकों की कमी है, जिस किस्म के कुशल श्रमिकों की आवश्यकता देश को है या विदेशों में है। प्रधानमंत्री ने कौशल विकास मंत्रालय की स्थापना तो की है लेकिन यह मंत्रालय केवल उच्च वर्ग के विद्यार्थियों के लिए ही फायदेमंद है। शिक्षा प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन करने की आवश्यकता है। इससे देश का विकास करने में भी बहुत सहायता मिलेगी।

शामलाल कौशल, रोहतक

आपकी राय Other

Jan 12, 2021

दर्ज हो मेहनत

ग्रामीण महिलाएं अक्सर खेती के कामों में मदद करती हैं। वे मवेशियों के खानपान का भी ध्यान रखती हैं। महिलाएं चाहे अपनी पसंद से या फिर सामाजिक या सांस्कृतिक नियमों के तहत भले ही ऐसा करती हों लेकिन उनके कामों को पहचान देना जरूरी है। उनके कामों के जरिए घर की आर्थिक हालत को मजबूती मिलती है और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की दृष्टि से यह उचित होगा कि गृहिणियों के कार्यों के मूल्य को भी जीडीपी में सम्मिलित किया जाए।

राकेश सूदन, कुरुक्षेत्र

फिर सोचें

दैनिक ट्रिब्यून के 6 जनवरी के अंक में प्रकाशित देविंदर शर्मा का ‘बाजार भरोसे खेती छोड़ने का जोखिम’ में बताया है कि अगर बाज़ार के भरोसे खेती छोड़ दें तो कौन-सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कैसे ब्रिटेन में दुग्ध विपणन बोर्ड को खत्म किया, जिसके बाद वहां डेयरी फार्मों की संख्या न के बराबर रह गई। अमेरिका में भी पिछले दो दशकों से डेयरी फार्म बहुत कम हो चुके हैं। भारत को भी इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।

नवज्योत सिंह, ऊना, हि.प्र.

निकायों की कार्यप्रणाली Other

Jan 11, 2021

जन संसद की राय है कि देश की राजनीतिक विसंगतियां लोकतंत्र की छोटी इकाई स्थानीय निकायों में भी घर कर गई हैं। इससे मुक्ति के लिये जहां पारदर्शी व्यवस्था, निष्पक्ष व कर्मठ प्रतिनिधियों की जरूरत है। वहीं जनता को भी जागरूक होने की जरूरत है ताकि सुशासन का मार्ग प्रशस्त हो सके।

विसंगतियों का प्रशासन

महानगरों, नगरों व कस्बों में स्थानीय विकास निकायों द्वारा ही होता है। सबका साथ, सबका विकास यहां भी नहीं होता। बहुमत पक्ष के कार्य प्राथमिकता और शीघ्रता से हो जाते हैं जबकि विपक्षी सदस्यों को अपने गली-मोहल्लों में काम करवाने के लिए जूझना पड़ता है। स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली वैसी ही है, जैसी ऊपरी सभाओं की है। राजनीतिक उठापटक और जूतम-पैजार निकायों में भी होती है। निकायों में सबसे बड़ी खामी यह है कि महिला प्रतिनिधियों के निर्वाचन के उपरांत पूरे कार्यकाल में उनके पति अथवा बेटों द्वारा उनका दायित्व निभाया जाता है।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम

सही प्रतिनिधि चुनें

निःसंदेह स्थानीय निकाय प्रशासन अपेक्षित विकासपरक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने में पूर्णतया विफल रहे हैं। संवेदनशील, परिश्रमी और ईमानदार व्यक्तित्व को जनप्रतिनिधित्व नहीं मिलना विफलता का प्रमुख कारण है। सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता स्थानीय निकाय प्रशासन में बेहतरीन निर्वाचन और प्रभावी प्रबंधन का प्रमुख कारक साबित हो सकता है। जन सामान्य द्वारा जिम्मेदारी और सावधानी से अपने प्रतिनिधि का चुनाव परम आवश्यक है ताकि स्थानीय स्तर पर आने वाली समस्याओं का वह सही समय पर निवारण कर सके।

सुखबीर तंवर, गढ़ी नत्थे खां, गुरुग्राम

सचेत रहें

स्थानीय निकायों का दायित्व बनता है कि वे बिना किसी आंशिक पक्षपात के कार्य का निर्वहन करें। देखा गया है कि ये निकाय पारदर्शिता व संवेदनशील तरीके से काम नहीं करते। इनमें सुधार तभी संभव हो सकता है जब स्थानीय नागरिक चुनावों के समय ही आदर्श व्यवहार करने वाले, प्रशासन के हरेक काम में पारदर्शिता व निष्पक्षता रखने वाले एवं वैधानिक कर्तव्यों के प्रति सचेत रहने वाले प्रतिनिधियों का ही चुनाव करें। इसके साथ ही आमजन को भी दैनिक जीवन से जुड़े कार्यों को समय पर करवाने तथा स्थानीय निकायों से सुविधाओं को लेने के लिए भी सचेत होना पड़ेगा।

सुनील महला, पटियाला, पंजाब

सुविधाओं का संकट

आज हालात ऐसे हो गए हैं कि इस छोटी संसद का कार्यरूप भी बड़ी संसद की तरह राजनीतिक होने लगा है। जो पार्टी सत्ता में होती है वह अपने चहेतों को ही आगे बढ़ाने के चक्कर में रहती है। लाखों रुपए खर्चने के बाद भी अधिकतर जगहों पर सफाई व्यवस्था के हालात सुधरे नहीं हैं। जल निकासी के नाम पर आम आदमी के टैक्स का पैसा पानी की तरह बहा दिया जाता है मगर बरसात आने पर वही हाल हो जाता है। बुनियादी सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। नागरिक चार्टर भी सिर्फ नाम के ही बन कर रह गए हैं।

जिनेश कुमार जैन, अम्बाला शहर

भ्रष्टाचार की छाया

शहरी स्थानीय निकाय क्षेत्र की जनता से सीधे जुड़े होते हैं क्योंकि ये मुख्यतः स्वच्छता और अन्य मूलभूत जन सुविधाओं के लिए होते हैं, मगर इन सब के बाद भी इन शहरी क्षेत्रों की हालत संतोषजनक नहीं है। प्रायः गलियां, सड़कें, नालियां, नाले और पार्क आदि में सफाई और रखरखाव आदि का कार्य सही से नहीं होता। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, सही नियोजनाभाव और भ्रष्टाचार के कारण अवैध कालोनियां, सड़कों और फुटपाथों आदि पर अतिक्रमण जोरों पर है। भ्रष्टाचार के कारण निर्माण कार्यों में गुणवत्ता भी निरंतर गिर रही है।

वेद मामूरपुर, नरेला

आदर्श व्यवहार हो

इसमें कोई दो राय नहीं कि स्थानीय निकायों द्वारा किये जाने वाले कार्यों का जनता से सीधा संबंध होता है। ऐसे में निकायों का उनके कार्यों के प्रति दायित्व और अधिक हो जाता है। इन निकायों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का होना अति अनिवार्य है ताकि स्वच्छता आदि जरूरी कार्य निरंतर सुचारु रूप से चलते रहें और विकास के कामों में कोई रुकावट न आए। इसके अतिरिक्त यह भी जरूरी है कि निकायों के निर्वाचित सदस्यों व निकायों से संबंधित सभी लोगों का जनता के साथ व्यवहार सौहार्दपूर्ण हो। निकायों के प्रशासन में आदर्श व्यवहार दिखाई देना चाहिए।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

पुरस्कृत पत्र

बदलाव की पहल हो

आज कदाचार, राजनीति और अपराध के गठबंधन में देश सर्वोपरि है और हम यथा प्रजा तथा राजा की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। स्थानीय निकायों की लचर कार्यप्रणाली से हमारे श्मशान भी शांत, सुरक्षित नहीं हैं। सभी सेवा ऑनलाइन, समयबद्ध, पारदर्शी व शीघ्रता से क्रियान्वित हो। भ्रष्ट अधिकारी, नेताओं के सामाजिक बहिष्कार के साथ स्वच्छ, सच्चरित्र गुणी समाज निर्माण पर बल दिया जाये। कानून व दण्ड व्यवस्था का सख्ती से पालन हो। उच्चस्तरीय मूलभूत सुविधाओं के साथ श्रेष्ठ तकनीकों को अपनाया जाये। समाज के लोग भी अधिक जागरूक बनें। अपनी समस्याओं के प्रति किसी का इंतजार न करें। स्वयं आगे चलकर समस्या का समाधान कराएं।

आचार्य रामतीर्थ, रेवाड़ी

वक्त की आवाज Other

Jan 09, 2021

आठ जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘मोदी करें किसानों से सीधी बात’ लेख में किसान आंदोलन और कोरोना के नित नये संकट पर महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल खड़े किये गये हैं। दोनों पर सियासत तेज़ है जबकि दोनों ही समस्याएं राष्ट्रीय, सामाजिक और मानवीय प्रश्नों से जुड़ी हुई हैं। कोरोना चीन की देन है। किसान आन्दोलन हमारे घर में हो रहा है, जिसके आंगन में, संयुक्त परिवार के बासन आपस में खड़क रहे हैं, ज़िद की सीमाओं को लांघने को तत्पर! हर तरफ़ से बॉर्डर को घेरने और गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड की धमकी देने वाले भाई तो कोरोना को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता को दरकिनार करने पर तुले हैं। बात, ऐसे माहौल में, किस तरह होगी-यह विचारणीय सवाल है। लेखक ने संकेत दिया है कि चुनाव में पराजित और हताश विपक्ष किसान आन्दोलन का इस्तेमाल विरोधी माहौल बनाने में कर रहा है। प्रासंगिक लेख के लिये साधुवाद!

मीरा गौतम, जीरकपुर


किसानों की सुनें

आठ जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘मोदी करें किसानों से सीधी बात’ किसानों के आंदोलन में पैदा हुए गतिरोध को दूर करने की राह दिखाने वाला रहा। सही बात है कि यह प्रधानमंत्री की सर्वस्वीकार्यता की परीक्षा की घड़ी भी कही जायेगी। अक्सर प्रधानमंत्री मन की बात करते हैं, अब की बार उन्हें किसान के मन की बात भी सुननी चाहिए। भले ही इस आंदोलन के मूल में राजनीतिक कारण रहे हों। यह अच्छा नहीं लगता कि अन्नदाता रक्त जमाती सर्दी में सड़कों पर बैठा रहे।

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार

ट्रंप की हठधर्मिता

अमेरिका की सीनेट और कांग्रेस में हुई हिंसा अपने आप में विचलित करने वाली घटना है। देख सकते हैं कि हार की अस्वीकार्यता लोकतंत्र को कितना घातक बना सकती है। ट्रंप की हठधर्मिता कहीं किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में ऐसी परंपरा को अंकुरित न कर दे। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में यदि सहनशीलता और विनम्रता न हो तो वह एक समस्या बन सकती है।

विनय प्रकाश सती, चंडीगढ़

अतार्किक सवाल Other

Jan 08, 2021

देशभर में दो वैक्सीनों के आपातकालीन इस्तेमाल की मंज़ूरी के बाद उस पर कुछ राजनीतिक दलों के सियासती हमले शुरू हो चुके हैं जो निंदनीय है। इस महामारी के समय, जहां देश के सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर देश के लोगों में वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ानी चाहिए, वहीं कुछ राजनीतिक दल लोगों को गुमराह कर रहे हैं। वैक्सीन किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है बल्कि इस देश के वैज्ञानिकों की देन है। किसी दल को नीचा दिखाने के लिए वे उन वैज्ञानिकों की मेहनत पर भी सवाल उठा रहे हैं।

इशिता कुकरेजा, लुधियाना


मानवता शर्मसार

देश की परम्परा सदैव नारी सम्मान, उसके त्याग की कहानी सुनाती है। उसी देश में नारी अब स्वयं को असुरक्षित महसूस करती है। निर्भया कांड के पश्चात देश का दिल दहल गया था परंतु वह सिलसिला अब भी नहीं थमा है। अब फिर बदायूं कांड सामने आया है। धर्मस्थल में गयी महिला के साथ दुष्कर्म किया गया। इस घटना के बाद प्रश्न उठता है कि महिलाएं कब सुरक्षित होंगी? इस प्रकार की हैवानियत करने वाले लोग केवल समाज को ही नहीं बल्कि पूरी मानवता को शर्मसार करते हैं।

चेतना, किन्नौर, हि.प्र.


वैक्सीन पर राजनीति

कोरोना से बचाव हेतु बनी वैक्सीन पर अब राजनीति स्तर पर वाद-विवाद होने लगा है। कुल मिलाकर महामारी से बचाने वाली दवा भी देश में सस्ती राजनीति का शिकार हो गई है। होना तो यह चाहिए था कि सभी दलों के नेताओं को वैक्सीन लगवाने के लिए आगे आना चाहिए ताकि देश के लोग जागरूक हों और कोरोना महामारी से सुरक्षा प्रदान की जा सके। वहीं हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने सबसे पहले टीका लगवाया और उन्होंने देश के सामने एक मिसाल पेश की ताकि जो भ्रम, शंका फैलाई जा रही है उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके।

हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, म.प्र.

मौतों की जवाबदेही Other

Jan 07, 2021

मुरादनगर में गाजियाबाद के श्मशान घाट में निर्दोष लोगों का असामयिक निधन हो गया। यह हृदय विदारक घटना है। भ्रष्टाचारियों ने श्मशान घाट के निर्माण को भी नहीं बख्शा। योगी आदित्यनाथ सरकार के दावे भी अब खोखले साबित रहे हैं, जिसमें गैरकानूनी काम करने वालों, नियम कानून हाथ में लेने वालों को नहीं बख्शा जाएगा। सरकार श्मशान घाटों की दुर्दशा को संज्ञान में लेते हुए कड़े फैसले व कठोर दंड की व्यवस्था करे।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद


कारगर उपाय हों

इन दिनों कोरोना टीकाकरण को लेकर उम्मीदें जगी हैं तो वहीं देश के अलग-अलग राज्यों में बर्ड फ्लू के संक्रमण के मामले तेजी से फैलते जा रहे हैं। हि.प्र. के पोंग डैम में कई हजार प्रवासी पक्षी मृत पाए गये। राजस्थान में भी बड़ी संख्या में कौवों और मोर समेत अन्य पक्षियों की मौत हुई है। सरकार को इनके सैंपल लेकर रोकथाम के लिए शीघ्र ही कारगार उपाय करने चाहिए ताकि खतरनाक संक्रमण पर काबू पाया जा सके।

नितेश कुमार सिन्हा, मोतिहारी


संकट में बदलाव

हाल ही में हरियाणा के सरकारी विद्यालयों में नये विद्यार्थियों की रिकॉर्डतोड़ बढ़ोतरी हुई है। इसका कारण है कि कोविड महामारी की मध्य वर्ग पर पड़ी आर्थिक मार। निजी स्कूलों के खर्चों के बोझ के तले दबे अभिभावक मजबूर होकर सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला करवा रहे हैं। देखना यह होगा क्या सरकारी शिक्षा प्रणाली निजी स्कूलों के मुकाबले छात्रों को उत्तम शिक्षा दे पाती है या नहीं।

जस्टी उमन, फरीदाबाद


युवाओं की भागीदारी

देश की राजनीति में युवाओं का योगदान प्रभावशाली रहा है। प्रधानमंत्री का कहना है कि भारतवर्ष एक युवा तथा नयी पीढ़ी का देश है। इसलिए सरकार को भी राजनीति में नयी पीढ़ी को आगे बढ़ने के लिए मदद करनी चाहिए। इससे विकास को नयी दिशा मिलेगी।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

खर्चों में कटौती Other

Jan 06, 2021

6 जनवरी के दैनिक ट्रिब्यून में भरत झुनझुनवाला का ‘वित्तीय अनुशासन से ही सुधरेगी आर्थिकी’ कोरोनाजनित मंदी के फलस्वरूप बढ़ते सरकारी खर्च और तेज़ी से घटते राजस्व के मद्देनजर आय के वैकल्पिक स्रोतों पर बल देने वाला था। नि:संदेह गैर-उत्पादक सरकारी खर्चे में कमी कर देनी चाहिए। सरकारी राजस्व में वृद्धि करने के लिए सरकार को आयात करों में वृद्धि करनी चाहिए। लेकिन लेखक ने जो सेवकों के वेतन में 50 प्रतिशत कमी करने की बात कही है, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। मंदी के कारण लोगों की आय के अतिरिक्त साधन पहले ही कम हो गये हैं और दूसरे, महंगाई के कारण उनका बहुत बुरा हाल हो रहा है। कोशिश हो कि लोगों की आमदनी तथा मांग बढ़े।

शामलाल कौशल, रोहतक


पढ़ने की उम्र

दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख ‘रिटायरमेंट के बाद डाॅक्टरी की पढ़ाई’ बहुत ही रोचक लगा। लेख ने साबित कर दिया कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। अगर जीवन का लक्ष्य हासिल करने के लिए कोई मन में दृढ़ संकल्प कर ले तो देर-सवेर सफलता मिल ही जाती है। लेख में तमाम बाधाओं के बावजूद उनके हौसले बुलंद हैं और वे तमाम ऐसे लोगों के लिए प्रेरणापुंज बने हैं जो देशकाल परिस्थिति के चलते अपने सपने पूरे नहीं कर पाते।

संदीप कुमार वत्स, चंडीगढ़


रास्ता निकालें

किसान नेताओं और सरकार के बीच हुई सातवें दौर की बैठक बेनतीजा खत्म हो गई। कंपकंपाती सर्दी में भी किसान आंदोलन चल रहा है, लेकिन फिर आंदोलन को समाप्त करने का कोई हल आखिर क्यों नहीं निकल रहा? सरकार और किसानों को एक-दूसरे को समझना चाहिए, तभी यह आंदोलन समाप्त हो सकता है।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

किसका नुकसान Other

Jan 05, 2021

किसान आंदोलन में जिस चीज का डर था अब वही होने लगा है। आंदोलन सिर्फ तीन कृषि बिलों के विरोध में शुरू हुआ था लेकिन अब रिलायंस के स्टोर बन्द करवाये जा रहे हैं, जिओ के टावर तोड़ने की घटना भी सामने आई है। क्या इसमें सरकार का कोई नुकसान है, निश्चित तौर पर नहीं। रिलायंस स्टोर में देश का आम आदमी ही काम करता है। इस तरह की घटनाओं से उनका रोजगार छिन रहा है। यह सब करने वालों को सोचना चाहिए कि वह नुकसान किसका कर रहे हैं सरकार का या खुद का।

सुनील सहारण, फतेहाबाद

पाक में अल्पसंख्यक

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर हर दिन प्रश्न उठते हैं। चाहे हिन्दू-सिखों की बेटियों का जबरन धर्म परिवर्तन हो या उनके धर्म स्थलों का अनादर। हाल ही में पाक के खैबर-पख्तूनवा प्रांत में सैकड़ों कट्टरवादियों की भीड़ ने सौ वर्ष से भी पुराने मंदिर में तोड़-फोड़ एवं आगजनी की। बेशक भारत सरकार ने अल्पसंख्यक विदेशी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान आसान किया है लेकिन इसका जमीनी स्तर पर काम बहुत धीमी गति से चल रहा है।

मनसिमर कौर, अमृतसर

भीतर जो होगा वही निकलेगा Other

Jan 04, 2021

घुघूती बासूती

यह बात हम हर समय देखते हैं। सबसे अधिक तब जब व्यक्ति को चोट लगे, बहुत पीड़ा हो। हमारे बचपन में हम ऐसे में हे राम, उई मां, कुमांऊनी में ओ ईजा (मां), ओ बौज्यू (पिता) सुनते थे। आजकल शिट, फ़... सुनते हैं। स्कूली दिनों में एक बार बहुत कष्ट में अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में रहना पड़ा था। एक व्यक्ति भद्दी गालियां दे रहा था, चीख-चीख कर। एक बार उसने एक डॉक्टर को झन्नाटेदार थप्पड़ भी मारा जो सबको सुनाई दिया। मैंने डॉक्टर से इस विषय में पूछा तो उसने कहा कि वह एक सड़क दुर्घटना में घायल है। बचने की आशा नहीं है। बहुत दर्द है, इसलिए ऐसा कर रहा है। परिवार में मैंने तब तक कभी अपशब्द नहीं सुने थे। किन्तु मस्तिष्क में बैठ गया कि अति कष्ट में अपशब्द निकलना सामान्य है। एक भय भी कि कभी मैं भी ऐसा करूंगी। तीन-चार साल बाद पिताजी को स्ट्रेन्ग्युलेटेड हर्निया में दर्द से तड़पते हुए देखा, उन्हें रिक्शे में लाद अस्पताल ले गई। दर्द असह्य होने पर वे रिक्शे से उतर जमीन पर लेट तड़पने लगे। मुझे भय था कि अब गालियां बरसेंगी किन्तु वे हे राम और ओ ईजा, ओ बौज्यू ही कहते रहे। जब तक डॉक्टर ने हर्निया को ठीक नहीं किया, वे राम और माता-पिता को ही गुहार लगाते रहे।

जब बेटियों का जन्म होना था तो मुझे फिर भय था कि प्रसव पीड़ा में कहीं मुंह से गालियां न बरसें। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। फिर कितने ही ऑपरेशन हुए, हर्निया हुआ, हर बार होश में आने पर पति से यही पूछा कि मैं बेहोशी में क्या बड़बड़ा रही थी। अपशब्द कभी नहीं थे। पिताजी ने पूरी शक्ति से हे राम कहकर प्राण त्यागे। सो कष्ट और अपशब्दों का सम्बन्ध हमारे भीतर क्या है से है, न कि पीड़ा से। किन्तु अब बाहर, घर परिवार सब जगह ये ही शब्द सुनाई देते हैं। कोई इसे बुरा नहीं समझता, यदि समझता होता तो इसका इलाज करता। इलाज बहुत कठिन नहीं है। जिन शब्दों को हम बोल रहे हैं, उनको कल्पना में देखो, सूंघो महसूस करो। शायद बोलने का मन न करे। राम या भगवान की जगह नास्तिक कुछ अन्य शब्द बोल सकते हैं, मां, पिता, गुलाब, कमल, कार्ल मार्क्स, माओ, अमेरिका, चीन या कुछ भी। वे सब शिट और फ़... से तो बेहतर ही होंगे अपने भीतर संजोने को।

साभार : घुघूती बासूती डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

ईंधन का विकल्प Other

Jan 02, 2021

पेट्रोल एवं डीजल के बढ़ते दामों को लेकर भारत की जनता चिंतित है। सरकार इस समस्या को गंभीरता से ले रही है। इसीलिए कैबिनेट द्वारा एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। एथेनॉल का उत्पादन अनन्य प्रकार के अनाजों से किया जाता है, हालांकि, इसे तैयार होने के लिए काफी क्रियाओं से निकलना पड़ता है। एथेनॉल किफायती होने के कारण बचत में तो योगदान देगा ही परन्तु इसके साथ हमारे पेट्रोलियम आयात पर होने वाले भारी व्यय पर भी अंकुश लगाएगा। अब इसमें कोई शक नहीं कि देश का किसान ईंधन भी उगाता है।

कवरीन कौर, लुधियाना


बैंकों की असलियत

दैनिक ट्रिब्यून के 29 दिसंबर के अंक में प्रकाशित भरत झुनझुनवाला के लेख ‘बैंकों की सुनहरी तस्वीर के अंतर्विरोध’ मेंे जमीनी व सटीक आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। छोटे ऋणधारकों की ऋण चुकाने की हालत पर बैंकों को राहत देने के साथ ट्यूशन, शिक्षण व कोचिंग से जुड़े सभी प्राइवेट व्यक्तियों की चिंताजनक स्थिति के अनुसार नीति-निर्धारण की सोच के साथ आगे आना चाहिए। छोटी इकाइयों के लिए सरकार ने रिपेमेंट थोड़े समय के लिए स्थगित की है। कमजोर वर्ग को ऋण देने में बैंकों की सुदृढ़ता की सही परीक्षा होगी।

आचार्य रामतीर्थ, रेवाड़ी


हकीकत से रूबरू

27 दिसंबर के दैनिक ट्रिब्यून के लहरें अंक में प्रमोद जोशी का ‘सुंदर सपनों को तोड़ने वाला साल’ लेख सामयिक, जीवन की कड़वी सच्चाइयों का खुलासा करने वाला रहा। कोरोना वायरस, आतंक, अत्याचार, संघर्षरत जिंदगियां टकटकी बांधे आने वाले कल के इंतजार में है। टूटती प्राचीन परंपराएं, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की पहचान धूमिल हो रही है। देश को बचाने के लिए निस्वार्थ विचारधारा में सामंजस्य स्थापित करते हुए सत्ताधीशों को सतर्क रहने की आवश्यकता है।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

चुनावी सरगर्मी Other

Jan 01, 2021

हरियाणा में ग्राम पंचायतों की चुनाव प्रक्रिया हेतु राजनीतिक चहल-पहल के चलते ग्रामीण अंचलों में पंचों, सरपंचों, ब्लॉक विकास समिति के सदस्यों, जिला पार्षदों की उम्मीदवारी के लिए ताल ठोकने वाले भावी प्रतिनिधियों ने कमर कस ली है। हरियाणा के मतदाता अब काफी बुद्धिमान, जागरूक एवं राजनीतिक सूझबूझ रखने वाले हैं। वह पुराने प्रतिनिधियों का तो आकलन कर ही रहे हैं, साथ में नये दावेदारों से भी अपेक्षाएं रख रहे हैं। मतदाताओं की आकांक्षाओं पर खरा उतरने की उम्मीदवारों से अपेक्षा की जाती है।

युगल किशोर शर्मा, खाम्बी, फरीदाबाद


तिब्बत की स्वतंत्रता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 2020 की तिब्बती नीति और सहायता अधिनियम पर हस्ताक्षर किए हैं। अब यह कानून बन गया है। यह कानून चीन के हस्तक्षेप के बिना अगले दलाईलामा को चुनने के लिए तिब्बत के समर्थन में है। यह नया कानून तिब्बत की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। अमेरिका के इस कदम से यह साबित होता है कि यह कानून चीन के खिलाफ अमेरिका की नयी विदेश नीति की शुरुआत है। वर्तमान में अन्य देश भी इस कानून का समर्थन करने के लिए आगे आ रहे हैं।

नंदनी जांगिड़, पंचकूला


सौगातों की उम्मीद

साल 2020 कोरोना वायरस ने आम आदमी के जीवन की गतिविधियों पर विराम चिन्ह लगा दिया। इस साल को कभी भुलाया नहीं जा सकता। चूंकि यह साल स्वास्थ्य विभाग के लिए भी नयी चुनौती लेकर आया और वे इस चुनौती को बखूबी से निभा रहे हैं। वहीं कोरोना वायरस के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था और शिक्षा पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा है। दूसरी ओर यह साल बेरोजगारी के लिए थम-सा गया। आशा करते हैं कि 2021 सभी क्षेत्रों के लिए अच्छी सौगात लेकर आये।

संदीप कुमार वत्स, चंडीगढ़