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विद्रूप खेल Other

Aug 04, 2020

31 जुलाई के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘कांग्रेसी संकट में अवसर तलाशती भाजपा’ लेख में स्पष्ट कहा है कि 14 अगस्त को राजस्थान के विधानसभा सत्र में गहलोत और पायलट के बीच चल रही राजनीतिक उठापटक का पटाक्षेप होगा। नाटकीयता की तरफ बढ़ रही राजनीति में सूत्रधारों का खेल चरम पर है। अगर अध्यक्ष का पद फिर राहुल को चला गया तो कांग्रेस के भीतर ही बाजी पलट जायेगी। बसपा अपने उन विधायकों को लेकर विलाप कर रही है, जिनके बूते पर राजस्थान में सत्ता का गठन हुआ था जो अब पूरी तरह दूसरी डाल के पंछी बन चुके हैं। इन स्थितियों में सत्तापक्ष अवसर तो तलाशेगा ही। इस रंगमंच पर खेल जारी है। पर, मतदाता को कब समझ में आयेगा कि वही यह स्थिति पैदा कर रहा है और दलों को विद्रूप खेल खेलने का मौका दे रहा है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

असली हीरो

सोनू सूद की जितनी प्रशंसा हो उतनी कम है। उन्होंने इंसानियत की एक मिसाल पेश की है। वैश्विक महामारी कोरोना काल के समय में नायक सोनू ने प्रवासी मजदूरों के दर्द को अपना दर्द समझा। असल में वे ही लोगों के सच्चे हीरो हैं।

निधि जैन, लोनी, गाजियाबाद

जग की धुरी नारी Other

Aug 03, 2020

तान्या गोडबोले

बदलते वक्त के साथ गृहिणियों की भूमिका भी बदल गई है। उनकी जिम्मेदारियां कम न होकर और बढ़ गई हैं। गृहिणी शहरी हो या ग्रामीण, दोनों का जीवन बहुत आपाधापी वाला होता है। जिम्मेदारियां तो पहले भी थीं, लेकिन दायरा सीमित था। मगर आज दायरा असीमित है। आज महिला घर से लेकर बाहर तक की जिम्मेदारी के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई से लेकर सब का भविष्य बनाने और भविष्य की बचत योजना तैयार करने में जुटी रहती है। बात अगर ‘शहरी गृहिणियों’ की करें तो उनका जीवन इतना आसान नहीं होता। बाहरी जिम्मेवारियों का निर्वहन करने के साथ उनसे घर की जिम्मेवारियों को भी बेहतर से निभाने की आशा की जाती है। शायद इसी आशा को बनाए रखने के लिए वे अपने ऊपर इतना बोझ ले लेती हैं कि कभी-कभी वे अवसाद जैसी मानसिक बीमारियों तक की शिकार हो जाती हैं। उनके पास इतना वक्त नहीं होता कि वे स्वयं के लिए कुछ विचार कर सकें। रोज पति, बच्चों और घर के अन्य सदस्यों की देखरेख में इतनी व्यस्त रहती है कि खुद को हमेशा दोयम दर्जे पर ही रखती है। वह दूसरों की शर्तों, इच्छाओं और खुशियों के लिए जीने की इतनी आदी हो जाती है कि अगर किसी काम में जरा सी भी कमी रह जाए तो अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती है।

लेकिन उसके बाद भी उसके काम का श्रेय और सम्मान उसके हिस्से नहीं आता। शहरी गृहिणियां परिवार की जिम्मेवारियों को पूरा करते हुए अपने पति की सहभागी भी बन जाती हैं। यही कारण है कि परिवार के खर्चे को बांटने के लिए वे घर से बाहर नौकरी करने को निकलती हैं। नौकरी से मिलने वाले पैसे से अपने परिवार की सहायता करने के साथ-साथ वे अपने आपको आत्मविश्वासी भी बनाती है। शहरी गृहिणियों का यही आत्मविश्वास उन्हें कभी पीछे हटने नहीं देता। घर से बाहर तक स्थापित करना उनके लिए आसान हो जाता है, अगर उनका कोई साथ देने वाला हो। वे आत्मविश्वास से लबरेज उस सूर्य के समान होती हैं जो बादल होने पर छुप तो सकता है लेकिन अपनी रोशनी नहीं खो सकता। यही आत्मविश्वास है कि किसी भी कठिन परिस्थिति होने पर वे घर से बाहर हरेक मोर्चे को एक योद्धा की तरह संभालती हैं। शायद औरत की यही विशेषता होती है कि नारी को जग की धुरी कहा जाता है।

साभार : साभार ब्लूपैड डॉट इन

श्रमिकों से अन्याय Other

Aug 01, 2020

देश में श्रमिकों को जो मजदूरी का भुगतान किया जाता है, वह बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत कम है। यदि श्रम सुधार के नाम पर मजदूर वर्ग की सौदेबाजी की शक्ति को और कम कर दिया जाता है तो यह खतरनाक रूप से उस देश में असमान वितरण को जन्म देगा। निस्संदेह देश को और अधिक निवेश आकर्षित करने की आवश्यकता है और तेजी से औद्योगिकीकरण और रोजगार सृजन के लिए प्रयास करना चाहिए लेकिन गरीब और कमजोर लोगों के शोषण के माध्यम से नहीं। गरीबी और व्यापक आर्थिक असमानताएं, आतंकवाद और अतिवाद के लिए एक प्रजनन भूमि के रूप में कार्य करती हैं।

कुशल, चंडीगढ़

प्रकृति को संवारें

प्रकृति के आगे किसी का कोई जोर नहीं चलता। प्रकृति समय-समय पर आपदाओं के रूप में इनसान को याद दिलाती रहती है कि इनसान अभी भी प्रकृति के आगे बौना है। इनसान ने विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन किया है। अपने पैर पर अगर कोई खुद कुल्हाड़ी मारकर दर्द से बेहाल हो जाए तो उसमें किसकी गलती होगी? हर प्राकृतिक आपदा, जिसमें बाढ़ भी शामिल है, के लिए इनसान खुद जिम्मेवार है। प्रकृति को संभालने की कला सीखनी होगी।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

मुश्किल में अवसर

कोरोना महामारी ने विश्व के सभी विकसित देशों की आर्थिकी को बुरी तरह प्रभावित किया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत इस महामारी के कारण विश्व में एक विकसित राष्ट्र के रूप में उभरकर सामने आएगा। संभवतः आ भी जाए, लेकिन क्या अब भारत में व्याप्त शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान आत्महत्या जैसी जटिल समस्याओं का निदान हो पाएगा? भारत को इन समस्याओं का निदान प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए।

मनकेश्वर भट्ट, मधेपुरा, बिहार