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Apr 10, 2021

ताऊ की विरासत

छह अप्रैल के अंक में राजकुमार सिंह के लेख ‘ताऊ और तीसरी धारा की राजनीति’ हरियाणा के विराट व्यक्तित्व चौधरी देवी लाल की गौरवशाली राजनीतिक यात्रा का परिचय कराने वाला था। इसमे दो राय नहीं कि चौधरी देवी लाल ने केंद्र की राजनीति में हरियाणा की प्रतिष्ठा को स्थापित किया। वैसा कद हरियाणा का दूसरा राजनेता केंद्र की राजनीति में हासिल नहीं कर पाया। उस आदमी का बड़प्पन देखिये कि उसने तीसरी धारा की राजनीति को कांग्रेस का विकल्प बनाने के लिये प्रधानमंत्री का पद ठुकराकर उपप्रधानमंत्री बनना स्वीकार किया। वे अपनी तरह के खास राजनेता थे। एक गौरवशाली राजनीतिक युग का स्मरण कराने के लिये साधुवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की, हरिद्वार


नैतिकता ताक पर

उ.प्र. के माफिया डान मुख्तार अंसारी को पंजाब की रोपड़ जेल से उ.प्र. की बांदा जेल में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को बेवजह अधिक महत्व दिया गया। इस तरह की कवरेज से अपराधियों का न केवल मनोबल बढ़ेगा अपितु नवागंतुक अपराधी भी ‘बदनाम हुए तो क्या, नाम तो होगा’ की तर्ज़ पर बड़े से बड़े अपराध करने से भी नहीं घबराएंगे। लाइव मीडिया एक गलत परम्परा कायम कर रहा है। चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए नैतिकता को ताक पर रख देना, कहां तक न्यायोचित है?

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली


सेहत के सरोकार

सात अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस जीवन में स्वास्थ्य के महत्व को याद करवाने के लिए मनाया जाता है। उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति, खुशहाल जीवन और देश की अर्थव्यवस्था में किसी व्यक्ति के योगदान के लिए पूर्वापेक्षित है। स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च के मामले में देश विश्व के सबसे कम खर्च करने वालों वाले देशों में से एक है। देश को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यू.एच.सी.) की ओर बढ़ना चाहिए। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए आयुष्मान भारत योजना को इसकी पहली सीढ़ी माना जा सकता है। ऐसी सुविधा देश के हर नागरिक के लिए सुनिश्चित की जानी चाहिए।

डिंपी भाटिया, नयी दिल्ली

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Apr 09, 2021

गहरी पड़ताल

छह अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के लेख ‘ताऊ और तीसरी धारा की राजनीति’ में देवीलाल की राजनीतिक क्षमताओं का आकलन करके लेखक ने दशकों पूर्व के ऐतिहासिक घटनाक्रम का परिप्रेक्ष्य सामने रखा है। ताऊ देवीलाल ने तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीति में जो पहल की उसने इतिहास के पन्नों में नयी क्रांति ही रच डाली। देवीलाल ने कांग्रेस के वर्चस्व के ज़माने में अपने पांव जमाए थे। दांवपेंचों के बीच ताऊ ने उपप्रधानमंत्री पद स्वीकार भले ही कर लिया था परन्तु इसमें उनका त्याग भी शामिल है। लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, बीजू पटनायक, नीतीश कुमार और तुर्क नेता चन्द्रशेखर के उदयकाल में ताऊ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। राजा विश्वनाथ प्रताप के लिए ताऊ देवीलाल का त्याग अविस्मरणीय ही माना जायेगा। लेखक का निष्कर्ष है कि पीढ़ी भी बदली और राजनीतिक शैली भी बदली है परन्तु चिन्ता तो संस्कार और सरोकारों की है। लेखक ने गहरी पड़ताल के साथ अपने मत को सामने रखा है।

मीरा गौतम, जीरकपुर

लोकतंत्र की विडंबना

पश्चिमी बंगाल में चुनावी प्रक्रिया जारी है। लेकिन इन दिनों टीवी और समाचारपत्र में देख और पढ़ रहे हैं कि कई राज्यों में लाखों करोड़ों रुपये पुलिस के हाथों लग रहे हैं। साफ है कि निर्वाचन प्रक्रिया में पहले जैसा साफ-सुथरा परिवेश नहीं रहा है। इसके लिए नेताओं को दोषी ठहराना उचित नहीं क्योंकि पैसे लेने वाले आम जनता भी समान रूप से दोषी है। पैसों की लालच में आकर वोट बेचना एक शिक्षित समाज में शोभा नहीं देता।

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

ऑनलाइन करें रिपोर्ट

कई राज्यों में कोविड की रिपोर्ट में 7 दिनों तक की देरी हो रही है, जिसे कोविड मामलों में वृद्धि का कारण माना जा सकता है। जो लोग स्वस्थ हैं, वे रिपोर्ट लेने जाते हैं, इस प्रकार कोविड का खतरा और बढ़ जाता है। रिपोर्ट ऑनलाइन मिलनी चाहिए।

निष्ठा, यमुनानगर

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

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Apr 08, 2021

शिक्षा पर संकट

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के अनुसार ‘कोविड-19 की अवधि में शिक्षा को बचाना’ इस समय सबसे मूल्यवान है। इस अवधि के दौरान शिक्षा बहुत अधिक प्रभावित हुई है। ऑनलाइन शिक्षा ही शिक्षा प्रदान करने का विकल्प बन गई है। शिक्षकों और छात्रों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क समाप्त हो गया है। वर्तमान में देश ऐसी शिक्षा के लिए तैयार नहीं है। घर में उनके जागने, खाने, खेलने, पढ़ाई और सोने आदि का निश्चित समय नहीं रह गया है।

नरेंद्र कुमार शर्मा, भुजड़ू, जोगिंदर नगर

यू-टर्न के मायने

दैनिक ट्रिब्यून में तीन अप्रैल का सम्पादकीय ‘पाक का यू-टर्न’ इस विषय पर प्रकाश डालने वाला था कि भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते स्थापित करने के निर्णय को कट्टरपंथी समूहों के विरोध के कारण पलटना पड़ा। सम्पादकीय में ठीक ही कहा गया है कि पाकिस्तान को अपनी तरक्की के लिए अपने फैसलों में लचीलापन दिखाने की जरूरत है।

सतीश शर्मा, माजरा, कैथल

श्ाीघ्र पलायन रोकें

कोरोना संक्रमण में बढ़ोतरी से व्यापार, व्यवसाय और औद्योगिक क्षेत्रों में भय का माहौल है। इस बार फिर महानगरों से मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। ऐसी स्थिति में मजदूरों को अपने कार्यस्थल पर रोकने की योजना बनाए जाने की महती जरूरत है, जिससे तालाबंदी में भी उत्पादन प्रभावित न हो। सरकार को जल्द ही पहल करनी होगी।

अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, म.प्र.

ताऊ का स्मरण

छह अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का लेख ‘ताऊ और तीसरी धारा की राजनीति’ राजनीति के इतिहास में ताऊ देवीलाल के योगदान की याद ताजा करवाने वाला रहा। स्वच्छ राजनीति के प्रेरणा स्रोत ताऊ देवीलाल की चर्चा सदैव जुबान पर रहेगी।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com

कैसी अहद-ए-वफा Other

Apr 07, 2021

दो अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह का विचारोत्तेजक लेख ‘राजनीति से अहद-ए-वफा चाहते हो’ पढ़ा। लेख राजनीति की हकीकत को बेनकाब करने वाला था। देखिये, राजनीति किस स्तर तक जा गिरी है कि सत्ता के लिये सारी राजनीतिक मर्यादाएं ताक पर रख दी जाती हैं। न पार्टी के प्रति वफादारी है और न ही जनता के प्रति, जिन्होंने उन्हें चुना है। चुनाव आते ही उछलकूद शुरू हो जाती है। बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। कुर्सी के लिये सारी नैतिक हदें पार कर दी जाती हैं। पश्चिम बंगाल में तो पाला बदलने की होड़ लगी है। मौजूदा राजनीति की हकीकत बयां करने के लिये धन्यवाद!

मधुसूदन शर्मा, रुड़की

बड़ी कार्रवाई हो

छत्तीसगढ़ के सुकमा तथा बीजापुर जिलों की सीमा पर नक्सलियों से मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के जवानों के बेरहमी से मारे जाने की घटना बहुत ही दुखदायक है। केंद्रीय गृह मंत्री ने अपराधियों को सबक सिखाने का वादा किया है। परंतु क्या समय का इंतजार करना उचित होगा? पूर्व वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल प्रदीप नाईक ने नक्सलियों की समस्या का अंत करने के बारे में कहा था। लेकिन वायुसेना का प्रयोग नहीं किया जा सका। नक्सलियों के पास ड्रोन गिराने तक के हथियार हैं। लिहाजा हवाई हमले के अतिरिक्त और कोई रास्ता बचा ही नहीं है।

अनिल रा. तोरणे, तलेगांव, महाराष्ट्र

टीके से सुरक्षा

कोरोना संक्रमण के मामलों में आ रही तेजी बेहद चिंताजनक है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने स्तर पर समुचित कदम उठा रही हैं, लेकिन महामारी की रोकथाम में हर नागरिक को भी अपना योगदान देना होगा। कुछ लोग टीका लगवाने में हिचकिचा रहे हैं। यह समझना जरूरी है कि टीका ही वायरस से सुरक्षा का टिकाऊ उपाय है।

नितेश मंडवारिया, नीमच, म.प्र.

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Apr 06, 2021

राजनीतिक पराभव

दो अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून में राजकुमार सिंह के ‘राजनीति से अहद-ए-वफा चाहते हो!’ लेख ने अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है। राजनीति से अहद-ए-वफ़ा की उम्मीद की ही नहीं जा सकती। किसी भी दल की ज़रा-सी हलचल क्या होती है कि अपनी निष्ठा बेचने वाले दर-दर खड़े मिलेंगे। अब सब बाज़ारवाद का हिस्सा बन चुका है। इसके लिए क़ानून क्यों नहीं बनता? क्योंकि, यह हर दल को सूट करता है! चुनाव के समय यह खेल चरम पर होता है पूरी मृदंग की थाप के साथ। अगर इस पर क़ानून बन गया तो पूरी राजनीति ही बैठ जायेगी। राजनीतिक दलों द्वारा धरती पर स्वर्ग उतार लाने की बात भी हवा-हवाई हो जाती है। मतदाता इस ठगोरी में क्यूं आ जाता है। सार्थक पड़ताल के लिए साधुवाद!

मीरा गौतम, जीरकपुर


विरोध की तार्किकता

दक्षिण भारत की फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत को ‘दादासाहेब फालके’ पुरस्कार मिला है। इस पुरस्कार के असली हकदार निश्चित रूप से रजनीकांत ही है। लेकिन इस समय परिस्थिति गलत है। तमिलनाडु में यह समय विधानसभा चुनाव का है। विरोधी राजनीतिक नेताओं का कहना है कि इस समय अवार्ड क्यों दिया गया है? व्यक्ति सही है लेकिन समय गलत है?

चंदन कुमार नाथ, गुवाहाटी, असम

घोषणा पत्रों का भ्रमजाल Other

Apr 05, 2021

रोकें भ्रमजाल

चुनाव का बिगुल बजते ही लुभावने वादों के साथ जन प्रतिनिधि जनता के दरबार में सेवक की भांति पेश होते दिखाई देते हैं। गरीबी उन्मूलन, बेरोज़गारी दूर करना, मुफ्त बिजली-पानी, मकान, मुफ्त शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं, किसानों का कर्ज़ माफ़ व उनकी आय दोगुनी करना ये ऐसे कुछ वादे हैं जिन्हें अपने चुनाव घोषणा-पत्र में शामिल कर राजनीतिक पार्टियां सालों से अपनी रोटियां सेंकती आ रही हैं। चुनाव घोषणा-पत्र इनके लिए महज़ एक विज्ञापन से ज्यादा कुछ भी नहीं होता। बेहतर होगा अगर निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों द्वारा जारी चुनाव घोषणा पत्रों पर ही रोक लगा देे।

रतिका ओबरॉय, चंडीगढ़


जवाबदेही तय हो

चुनाव आते ही घोषणापत्रों का भ्रमजाल छाने लगता है। शब्दजाल व आंकड़ों की बाजीगरी का बोलबाला हो जाता है। घोषणा पत्र राजनीतिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है जिस पर जवाबदेही समय की मांग है। कानून बने, जिसमें ऐसा प्रावधान हो, जिसके तहत राजनीतिक दलों को वादे पूरे नहीं करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सके। नेता भी जानते हैं कि हकीकत के धरातल पर हर वादा पूरा करना संभव नहीं फिर भी झूठे वादे कर निष्पक्ष चुनाव की जड़ को हिलाना क्या उचित है?

रवि नागरा, नौशहरा, साढौरा


समय सीमा तय हो

जब-जब चुनाव का दौर शुरू होता है तब-तब पार्टियां सत्ता हासिल करने के लिए घोषणा पत्रों को तैयार करने के लिए कोई भी कसर नहीं छोड़ती। सत्ता हासिल करने के बाद घोषणा पत्र को लागू करना भूल जाते हैं और केवल कागजों में ही सिमट कर रह जाते हैं। इस मामले पर निर्वाचन आयोग को घोषणा पत्र लागू करवाने के लिए तय सीमा सुनिश्चित करनी चाहिए। अगर यह तय सीमा में लागू नहीं होता है तो आयोग को सतारूढ़ पार्टी के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे भ्रम फैलाने वाले घोषणा पत्रों से बचा जा सके।

संदीप कुमार वत्स, चंडीगढ़


जिम्मेदार बनायें

चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों में जनता के लिए लुभावने घोषणा पत्र लाने की होड़ मची हुई है। चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां प्रयत्न करती हैं लेकिन हकीकत के धरातल पर हर वादा पूरा करना संभव नहीं होता। जनता इन घोषणा पत्रों के जाल में फंस कर अपने को ठगा-सा महसूस करती है। राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि वादे वही किए जाएं जो पूरे किए जा सकें। चुनाव आयोग व उच्च न्यायालय सुनिश्चित करे कि विभिन्न पार्टियों द्वारा दिए गए प्रलोभन राजनीतिक दलों द्वारा पूरे किए जाएं।

पूनम कश्यप, बहादुरगढ़


सजग मतदाता

चुनाव से पूर्व हर राजनीतिक पार्टी अपने घोषणा-पत्र में लोकलुभावनी घोषणाएं करती हैं। इसलिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं ताकि घोषणा पत्र में ऐसी बातें रखी जाएं, जिससे जनता को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके। परन्तु अब जनता इन राजनेताओं के वादों, घोषणाओं से पूरी तरह सावधान रहती है। बेशक अब ये कितनी ही बातें कह लें, कितनी ही रैलियां कर लें, उन्हें पता है कि किसे वोट देना है और किसे पटखनी देनी है। जनता अब सारा जोड़-तोड़ कर पार्टी अथवा उम्मीदवार को वोट देती है।

सत्यप्रकाश गुप्ता, गुरुग्राम


जनता की नियति

हिंदी में एक कहावत है कि ‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’। यह कहावत राजनीति दलों के चुनावी घोषणा पत्रों पर सटीक बैठती है। चुनाव चाहे लोकसभा के हो या फिर विधानसभा के, राजनीतिक दल जनता को छलने के लिए लोकलुभावन घोषणा पत्र जारी करते हैं और चुनाव जीतने के बाद घोषणा पत्र में किए गए वादों पर बहुत ही कम खरे उतरते हैं। जनता हर बार नेताओं के शब्दजाल और आंकड़ों की बाजीगरी के जाल में फंस जाती है। अब चुनावों में ठगा जाना जनता की नियति बन गई है।

राम मूरत ‘राही’, इंदौर, म.प्र.


पुरस्कृत पत्र

सख्त हो आयोग

पांच साल बाद होने वाले चुनाव में हर बार नया घोषणा पत्र और नये वादे लेकर नेता लोग जनता के बीच में आते हैं। चुनाव के समय जनता को भ्रमित करने के लिए जनप्रतिनिधियों द्वारा इतने सारे झूठे और खोखले वादे किए जाते हैं शायद दूसरे देशों के लोग इस पर हंसते होंगे कि यह कैसा प्रजातंत्र विकसित कर लिया है, जहां केवल थोथे नारे लगाने वालों की बात को ही सुना जा रहा है। इन नारों और वादों को रोक पाना आम आदमी के बस की बात नहीं है, इसलिए चुनाव आयोग को सख्त निर्णय लेना चाहिए कि जो नेता या पार्टी अपने घोषणा पत्र को पांच साल में लागू नहीं कर पाएगी उस पार्टी की मान्यता रद्द कर दी जाएगी। तब देखें कौन कितने वादे करता है।

जगदीश श्योराण, हिसार

और भी हैं मुद्दे

Apr 03, 2021

दो अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून में चर्चित व्यक्ति के अंतर्गत ‘नंदीग्राम रणभूमि में नये सारथी शुभेंदु’ के बारे में लेख कुछ हद तक सही है। लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने उनको रातोंरात बंगाल की राजनीति का महानायक बना दिया है। तृणमूल कांग्रेस में उनकी गिनती कोई विशेष नहीं होती थी। दिल्ली सरकार और मीडिया को भी आज बंगाल के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता। चुनाव तो अन्य चार राज्यों में भी हो रहे हैं, फिर सारा फोकस बंगाल पर क्यों किया जा रहा है! क्या जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी, किसान आंदोलन से भुलाने के लिए इतना कुछ किया जा रहा है।

जगदीश श्योराण, हिसार


सबको लाभ मिले

पंजाब सरकार ने हाल ही में पंजाब की सरकारी बसों में महिलाओं और लड़कियों को मुफ्त सफर का तोहफा दिया है। कुछ लोग इसे पंजाब विधानसभा चुनाव पास आते देख पंजाब सरकार का लॉलीपॉप भी बता रहे होंगे। लेकिन फिर भी सरकार के इस फैसले से गरीब और मध्य वर्गीय परिवारों को बसों के भारी-भरकम किराये से राहत तो जरूर मिलेगी। लेकिन यह उन महिलाओं और लड़कियों के साथ बेइंसाफी है जो दूसरे राज्यों से आकर पंजाब में नौकरी या पढ़ाई कर रही हैं। कैप्टन सरकार को इसका भी कोई हल निकालना चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


अन्न का संरक्षण

समर्थन मूल्य पर गेहूं जैसी उपज की सरकारी खरीद जारी है। खबरों के मुताबिक कई केंद्रों पर उपज को सुरक्षित रखने के माकूल इंतजाम नहीं हैं। पिछले वर्ष भी जब सरकारी खरीदी की गई और बेतरतीब मौसम की बेरुखी के चलते पानी गिरने से बेशकीमती गेहूं पानी में भीगने से सड़-गल गया था। ऐसे में सरकार पिछले साल के कटु अनुभव को ध्यान में रखते हुए अभी से उचित उपाय करने चाहिए।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन, म.प्र.

निंदनीय कृत्य

Apr 02, 2021

एक अप्रैल के दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय ‘अशोभनीय कृत्य’ से सहमत होते हुए कहना है कि पंजाब में भाजपा नेताओं के साथ दुर्व्यवहार आंदोलन के प्रति लोगों की सहानुभूति को कम कर सकता है। दोषियों को गिरफ्तार न किया जाना सबसे बड़ा सवालिया निशान है। यह काम किसान आंदोलन के लंबा खिंचने के कारण उत्पन्न निराशा तथा कुछ शरारती लोगों का काम भी हो सकता है। ऐसे कृत्यों से आम लोगों की सहानुभूति आंदोलनकारियों के प्रति कम हो सकती है। इसकी किसान नेताओं को निंदा करनी चाहिए और अपने आंदोलन से शरारती लोगों को दूर रखना चाहिए।

शामलाल कौशल, रोहतक


अमानवीय बर्ताव

म्यांमार में सेना द्वारा सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद की गई बर्बरता ने दुनिया को चिंता में डाल दिया गया है। तख्तापलट के बाद प्रदर्शनकारियों पर जिस तरह सेना गोलियों की बौछार कर रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। अमेरिका सहित यूरोपीय देश भी म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली का इंतजार कर रहे हैं। वहीं चीन ने म्यांमार की घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। उसका म्यांमार में बहुत बड़ा आर्थिक निवेश है और चीन नहीं चाहता कि उसकी पूंजी प्रभावित हो। भारत को म्यांमार की समस्या को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।

कांतिलाल मांडोत, सूरत


शिक्षा का संकट

कोरोना की वजह से बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा का सहारा लेना पड़ रहा है। पंजाब में भी कोरोना पाबंदियों को 10 अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है। शिक्षा संस्थान बंद रखने के फैसले से अभिभावक खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि इसका बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ रहा है। शहरी बच्चे तो ऑनलाइन शिक्षा से पढ़ पा रहे हैं लेकिन ग्रामीण बच्चों की हालत ठीक नहीं है। शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। ऑनलाइन शिक्षा से अभिभावकों और बच्चों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

राघव जैन, जालंधर

नेताओं को छूट

Apr 01, 2021

हर राज्य की सरकार ने आम जनता के लिए कोरोना गाइडलाइन बनाई है, ताकि संक्रमण नहीं बढ़े। मध्य प्रदेश में भी आम जनता के लिए गाइडलाइन बनी है। लेकिन मंगलवार को मध्य प्रदेश के दमोह उपचुनाव के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में जनसभा को सम्बोधित किया। बंगाल, असम, केरल में भी हजारों की संख्या में प्रतिदिन लोग चुनावी सभा में मौजूद रहते हैं। जनता भीड़ करे तो दंड और नेता भीड़ करे तो सब माफ। जनता के लिए तो शासन ने गाइडलाइन बना दी। नेताओं के लिए कौन गाइडलाइन बनाएगा।

प्रदीप कुमार दुबे, देवास


महामारी और सवाल

वैश्विक महामारी कोरोना, एक बार फिर अपना पैर पसारती नजर आ रही है। ऐसे में न सिर्फ सरकार को बल्कि आम जनता को स्वयं जागरूक और सतर्क रहना होगा, अन्यथा आने वाले दिनों में स्थिति और भी बदतर हो सकती है। महाराष्ट्र समेत पंजाब एवं अन्य राज्यों में इसके नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी में भी मामले बढ़े हैं। वहीं दूसरी तरफ यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या महामारी सिर्फ उन्हीं राज्यों में फैल रही है जहां चुनाव नहीं हैं। अगर चुनाव हो सकते हैं तो क्या बच्चों के स्कूल, कॉलेज और परीक्षाएं समय से नहीं हो सकतीं?

अमन जायसवाल, दिल्ली


राजनीति और कोरोना

सरकार आम जन को कोरोना महामारी को लेकर सभी प्रकार की हिदायत दे रही है। क्या संक्रमण केवल स्कूल तथा हमारी संस्कृति के त्योहारों तक ही सीमित है? शिक्षा मंत्रालय ने विद्यार्थियों की परीक्षाएं स्थगित करवा दी, होली के त्योहार को अपने घर तक ही सीमित कर दिया। ममता बनर्जी नंदीग्राम में सड़क पर रोड शो कर रही हैं, जिसमें हज़ारों की तादाद में जनता भी साथ थी। न कोई मास्क, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग। क्या कोरोना विद्यार्थियों के भविष्य तक ही सीमित है? क्या कोरोना संक्रमण चुनावी रैलियों में नहीं आएगा?

खुशबू वेद, कराड़िया, आलोट, म.प्र.