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Yamuna River Pollution : UP में सियासी सरगर्मी बढ़ा रहा यमुना जल के प्रदूषण का मुद्दा, विपक्ष ने तेज किए हमले

विपक्षी दल इस मामले पर सरकार को घेरने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं

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यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण का मसला वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मथुरा में तेजी से एक अहम राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है और विपक्षी दल इस मामले पर सरकार को घेरने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के फरवरी 2026 के आंकड़े केसी घाट, विश्राम घाट और गोकुल बैराज जैसी अहम जगहों पर प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुंचने की गवाही देते हैं। इन सरकारी आंकड़ों के आधार पर यमुना के पानी के नमूनों का विश्लेषण करने वाले 'बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी' के के.पी. सिंह ने कहा कि हालांकि तापमान और पीएच स्तर जैसे बुनियादी पैमाने स्वीकार्य सीमा के भीतर हैं लेकिन प्रदूषण के कई अहम संकेतक सुरक्षित मानकों से कहीं अधिक हैं।

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उन्होंने कहा कि तीनों जगहों पर गंदगी, बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) का उच्च स्तर 'नदी में भारी जैविक प्रदूषण' को जाहिर करता है। विश्लेषण के अनुसार, विश्राम घाट में सबसे अधिक गंदगी और जीवाणुओं का संक्रमण पाया गया जिससे यह यमुना के प्रवाह क्षेत्र की सबसे प्रदूषित जगह बन गई है, वहीं गोकुल बैराज में घुलित ऑक्सीजन का स्तर बेहतर था लेकिन जैविक भार सबसे ज़्यादा था, जबकि केसी घाट में प्रदूषण का स्तर भी अधिक पाया गया। रिपोर्ट में सभी जगहों पर मल-संबंधी कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की बहुत ज़्यादा मात्रा भी पाई गई, जो संकेत देता है कि सीवर का पानी भी इसमें मिल रहा है।

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विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसी स्थितियां पानी को इंसानों के पीने के लिए असुरक्षित बनाती हैं और बिना उचित शोधन के इस पानी से नहाना भी जोखिम भरा है। उन्होंने कहा कि साथ ही यह जलीय जैव विविधता के लिए भी खतरा पैदा करता है जिससे केवल प्रदूषण सहन करने की अधिक क्षमता वाली प्रजातियां ही जिंदा रह पाती हैं। निष्कर्षों में यह भी बताया गया है कि दिसंबर 2025, जनवरी 2026 और फरवरी 2026 में पानी की गुणवत्ता 'डी' श्रेणी में बनी रही, जो केवल जलीय जीवन के लिए ही उपयुक्त है।

रिपोर्ट में मलजल को उपचारित किए बगैर उसे नदी में बहाना, घाटों के किनारे बढ़ती मानवीय गतिविधियां और अपर्याप्त अपशिष्ट जल प्रबंधन प्रणालियों को इस गिरावट का कारण बताया गया है। पर्यावरण कार्यकर्ता गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने कई अदालती आदेशों और नीतियों के बावजूद कार्यदायी संस्थाओं के 'सुस्त रवैये' को यमुना की इस हालत के लिए दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि पीतल की पॉलिशिंग और अन्य कार्यों में सफाई के लिए साइनाइड जैसे बेहद ज़हरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।

फिर इस पानी को बिना उपचार किए नदी में बहा दिया जाता है। शोधन संयंत्र, सीवेज को साफ करने के लिए बनाए जाते हैं, न कि रसायनों को साफ करने के लिए। रसायनों से भरे नदी के पानी को पीने योग्य बनाने के लिए क्लोरीन और फिटकरी से साफ करना व्यर्थ है, क्योंकि दोनों ही रसायनों को साफ नहीं कर सकते। चतुर्वेदी ने सख्त अनुपालन की भी मांग की और कहा कि जिन सीवेज उपचार संयंत्रों में नालियां पंपिंग स्टेशनों से जुड़ी हैं, वहां से किसी भी प्रकार का ओवरफ्लो नहीं होने दिया जाना चाहिए।

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