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Women Against Drugs: देहरादून के गांव में नशे के खिलाफ महिलाओं की मुहिम, हाथों में लाठियां और सख्त पहरा

Women Against Drugs: देहरादून के ओल्ड मसूरी रोड पर बसे थानी गांव में शाम ढलते ही एक असामान्य तस्वीर दिखाई देती है। जिन हाथों में दिनभर घर की जिम्मेदारियां होती हैं, उन्हीं हाथों में रात होते-होते लाठियां आ जाती हैं।...

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वीडियोग्रैब। सोशल मीडिया
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Women Against Drugs: देहरादून के ओल्ड मसूरी रोड पर बसे थानी गांव में शाम ढलते ही एक असामान्य तस्वीर दिखाई देती है। जिन हाथों में दिनभर घर की जिम्मेदारियां होती हैं, उन्हीं हाथों में रात होते-होते लाठियां आ जाती हैं। कोई महिला खाना बनाकर निकली है, तो कोई बच्चों को सुलाकर और कोई नौकरी से लौटने के बाद लाठियां थामे सड़क पर आ गई है। इनका मकसद एक है - अपने गांव की गलियों को नशे के कारोबार से बचाना।

गांव में शाम के बाद किसी भी अनजान व्यक्ति को रोककर वे कुछ आसान सवाल पूछती हैं, जैसे - आप कहां जा रहे हैं, आप किससे मिलने आए हैं और आप यहां क्यों आए हैं। इतना ही नहीं संदेह होने पर उन्हें आगे जाने से रोक दिया जाता है।

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पहाड़ियों के बीच बसा थानी गांव पहली नजर में शांत और खूबसूरत इलाका लगता है। चारों ओर हरियाली, ठंडी हवा और शांत गलियां हैं। लेकिन इसी खूबसूरती के बीच लगा एक पोस्टर यहां की दूसरी कहानी सुनाता है। इस पोस्ट पर लिखा है, ''भांग-गांजा प्रतिबंधित है। बेचने और खरीदने वालों पर कार्रवाई हो सकती है।''

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इसी पोस्टर के आसपास कई बार महिलाएं लाठी-डंडे लेकर पहरा देती दिखाई देती हैं। उन्हें जो भी संदिग्ध लगता है, उसे रोककर पूछताछ करती हैं और जिनके बारे में लगता है कि वे मादक पदार्थ के लिए गांव की ओर जा रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है। यह किसी सरकारी अभियान का हिस्सा नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं द्वारा 'नारी जागृति संगठन' के बैनर तले शुरू की गई निगरानी व्यवस्था है।

स्थानीय निवासी सुधा बधानी बताती हैं कि एक समय स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित होने लगा था। उन्होंने कहा, ''सड़क पर आना मुश्किल हो गया था। हम टहलने तक नहीं निकल पाते थे। बच्चे दुकानों तक नहीं जा सकते थे। बाहर निकलने में डर लगता था।''

महिलाओं का दावा है कि पास की एक बस्ती में लंबे समय से नशीले पदार्थ बिकने की शिकायतें रही हैं और इन्हें खरीदने आने वाले लोग थानी गांव की सड़क का इस्तेमाल रास्ते के रूप में करते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दौरान समस्या और बढ़ी। शुरुआत में महिलाओं ने कार्रवाई के लिए पुलिस और प्रशासन से संपर्क किया। शिकायतें की गईं और आवेदन दिए गए।

हालांकि, सुधा बताती हैं कि जब हालात नहीं सुधरे तो महिलाओं ने खुद पहरा देने का फैसला किया। वह कहती हैं, ''पहले लगा कि यह हमारा काम नहीं बल्कि पुलिस-प्रशासन का है। लेकिन जब पानी सिर के ऊपर चला गया तो हमें खुद निकलना पड़ा।'' करीब दो महीने पहले शुरू हुआ यह अभियान अब गांव की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।

महिलाओं की अलग-अलग टोलियां निगरानी करती हैं। किसी संदिग्ध व्यक्ति के दिखते ही महिलाओं के व्हाट्सएप समूह में संदेश जाता है, ''सब पहुंचो।'' इसके बाद जो महिला जहां होती है, अपना काम छोड़कर निकल पड़ती है। इस मुहिम में करीब 20 साल की युवतियों से लेकर 60-70 साल की महिलाएं तक शामिल हैं।

दिन में घर संभालने वाली महिलाएं शाम की जिम्मेदारी लेती हैं, जबकि नौकरीपेशा महिलाएं रात में पहरा देती हैं। कभी यह निगरानी आधी रात तक चलती है और कभी उससे भी आगे। स्थानीय निवासी ललित धीमान बताते हैं कि इसके लिए लगभग पाली जैसी व्यवस्था बन गई है। उनका दावा है कि अभियान के शुरुआती दिनों में एक दिन में 100 तक लोगों को इलाके में जाने से रोका गया, हालांकि अब संख्या काफी कम हो गई है। महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चिंता अपने बच्चों को लेकर है।

अनसुइया रौतेला कहती हैं, ''हम सब मां हैं। हम नहीं चाहते कि किसी दूसरी मां के बच्चे की जिंदगी भी नशे की वजह से खराब हो।'' उनका कहना है कि कई बार महिलाओं को अपशब्द सुनने पड़ते हैं, धमकियां मिलती हैं और झगड़े का खतरा भी रहता है, लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

रौतेला ने कहा, ''एक साल लगे या दो साल, हम इसे पूरी तरह खत्म होने तक जारी रखेंगे।'' 'नारी जागृति संगठन' की अध्यक्ष सुनीता शर्मा कहती हैं कि स्थिति तब गंभीर हो गई जब बच्चों और बुजुर्गों का सड़क पर निकलना मुश्किल होने लगा। उनका आरोप है कि कुछ लोग घरों तक पहुंचकर नशे के बारे में पूछने लगे थे। इसके बाद महिलाओं ने बैठक कर संगठन बनाया और निगरानी शुरू की।

गांव की निवासी रीता का कहना है कि विरोध के कारण महिलाओं को गालियां और धमकियां भी मिलती हैं और उनके बीच विवाद पैदा करने की कोशिश की जाती है। उन्होंने कहा, ''हम जानते हैं कि अगर हम आपस में टूट गए तो यह मुहिम भी टूट जाएगी।'' महिलाएं यह भी स्पष्ट करती हैं कि वे पुलिस की जगह लेने नहीं निकली हैं।

पुलिस की गश्त और कार्रवाई होती रही है और कुछ संदिग्ध लोगों को पुलिस के हवाले भी किया गया है। फिर भी सवाल बना हुआ है कि किसी गांव की महिलाओं को अपने बच्चों, घरों और गलियों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए आधी रात तक पहरा क्यों देना पड़ रहा है? थानी की महिलाएं मानती हैं कि सिर्फ नशीले पदार्थ बेचने वालों पर कार्रवाई से समस्या खत्म नहीं होगी। जब तक नशे की मांग रहेगी, कोई न कोई नया रास्ता तलाश लिया जाएगा। इसलिए उनकी निगरानी खरीदने और बेचने वाले दोनों पर है।

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