यह सौदा ठीक नहीं...US सेब आयात पर ड्यूटी कटौती से हिमाचल के बागवान चिंतित
US apple import India: अमेरिका से आयात होने वाले सेब पर आयात शुल्क में भारी कटौती ने हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। बागवानों का कहना है कि कम कीमत पर आने वाले अमेरिकी सेब स्थानीय...
US apple import India: अमेरिका से आयात होने वाले सेब पर आयात शुल्क में भारी कटौती ने हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। बागवानों का कहना है कि कम कीमत पर आने वाले अमेरिकी सेब स्थानीय सेब की बिक्री और पूरी सेब अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
हाल ही में अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है, हालांकि इसके साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 50 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है। नई व्यवस्था के तहत अमेरिकी सेब भारत में लगभग 100 रुपये प्रति किलो की कीमत पर पहुंच सकता है, जो हिमाचल के प्रीमियम सेब की कीमत के बराबर है।
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‘ग्राहक आयातित सेब की ओर झुकेंगे’
संयुक्त किसान मंच (SKM) के संयोजक हरीश चौहान ने कहा कि इस कीमत पर अमेरिकी सेब स्थानीय उत्पादकों के लिए बड़ी चुनौती बनेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पहले अमेरिकी सेब 75 रुपये प्रति किलो की दर से भारत पहुंच रहा था, तो वह खुदरा बाजार में 200–250 रुपये प्रति किलो में कैसे बिक रहा था।
CA स्टोरेज पर भी पड़ेगा असर
चौहान ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिकी सेब 100 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध हुआ, तो कंट्रोल्ड एटमॉस्फियर (CA) स्टोरेज में स्थानीय प्रीमियम सेब को रखना घाटे का सौदा बन जाएगा। उन्होंने पूछा, “कोई भी CA स्टोर मालिक 85–90 रुपये में सेब खरीदकर, छह महीने का भंडारण खर्च उठाकर, अमेरिकी सेब से महंगे दाम पर उसे क्यों बेचेगा?”
MIP और बढ़नी चाहिए थी
प्रोग्रेसिव ग्रोअर्स एसोसिएशन (PGA) के अध्यक्ष लोकिंदर बिष्ट का मानना है कि यह निर्णय प्रीमियम सेब उत्पादकों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा। उन्होंने कहा कि MIP कम से कम 100 रुपये प्रति किलो होनी चाहिए थी और आयात पर सीमा तय की जानी चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर प्रीमियम सेब की कीमत गिरी, तो इसका असर निम्न गुणवत्ता वाले सेब पर भी पड़ेगा।”
कुछ बागवान इसे अवसर मानते हैं
हालांकि, सभी बागवान इस फैसले से सहमत नहीं हैं। हिमालयन सोसायटी फॉर हॉर्टिकल्चर एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट के अध्यक्ष डिंपल पंजटा ने कहा कि स्थानीय सेब विदेशी सेब से मुकाबला करने में सक्षम है। उनका मानना है कि संरक्षण की मांग के बजाय सरकार से बेहतर पौध सामग्री, तकनीक और सब्सिडी की मांग की जानी चाहिए।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा बड़ी चुनौती
कोटगढ़ के सेब उत्पादक दीपक सिंघा ने कहा कि अमेरिकी और यूरोपीय किसानों को भारी सब्सिडी और आधुनिक मशीनों का लाभ मिलता है, जबकि भारत में ऐसा समर्थन नहीं है। उन्होंने कहा, “किन्नौर को छोड़ दें तो हिमाचल के अधिकांश इलाकों में आदर्श शीतोष्ण जलवायु भी नहीं है। फिर भी हमें गुणवत्ता सुधारनी होगी—प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि अस्तित्व के लिए।”

