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खाने से किया इनकार, पिता से मांगा कपड़ा… फिर बना डाले 150 से ज्यादा तिरंगे, भारत के मौन गांव की 3 बहनों का अनोखा जज्बा

स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत के 'साइलेंट विलेज' में तीन बहनों ने छतों पर फहराया तिरंगा

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India Independence Day : जम्मू-कश्मीर के डोडा जिला स्थित एवं 'भारत के मौन गांव' से मशूहर धदकई गांव की तीन मूक बहनों ने तब तक खाना खाने से इनकार कर दिया, जब तक उनके पिता उन्हें राष्ट्रीय ध्वज बनाने के लिए कपड़ा नहीं दिला देते। तीनों बहनों की जिद थी कि उनके पिता उन्हें कपड़ा दिलाएं, ताकि वे उससे तिरंगे बना सकें और इन तिरंगों को स्वतंत्रता दिवस से पहले अपने गांव में लोगों के बीच बांट सकें।

रेशमा बीबी, परवीन कौसर और सायरा खातून अब तक 150 से अधिक तिरंगे बांट चुकी हैं। उन्होंने देशभर में चल रहे 'हर घर तिरंगा' अभियान में शामिल होकर यह सुनिश्चित करने में मदद की है कि गांव के हर घर तक राष्ट्रीय ध्वज पहुंचे। जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में पहाड़ी की चोटी पर बसे इस सुदूर गांव तक अबतक 'तिरंगा' अभियान नहीं पहुंच पाया था। समुद्र तल से 9,150 फुट की ऊंचाई पर स्थित और सड़क संपर्क से वंचित धदकई गांव की आबादी करीब 2,000 है। यहां रहने वाले सभी लोग आदिवासी गुज्जर समुदाय से हैं।

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इस गांव के 90 से अधिक लोग जन्मजात रूप से सुनने और बोलने में असमर्थ हैं, जिसके कारण इसे 'साइलेंट विलेज' के नाम से जाना जाता है। पिता रेहम अली को अपनी तीनों बेटियों पर बहुत गर्व है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटियों ने तिरंगे सिलने का अपना संकल्प जताया और इसके लिए जरूरी कपड़े लाने की जिद की। मैं भेड़ों के साथ चारागाह में गया था। जब मैं घर लौटा तो उन्होंने इशारों के जरिये साफ कर दिया कि उन्हें तिरंगे के लिए कपड़े चाहिए। वे अपनी बात को लेकर इतनी अडिग थीं कि जब तक मैंने उनकी मांग पूरी करने की हामी नहीं भर दी, उन्होंने खाना खाने से भी इनकार कर दिया। मैं बाजार गया, कपड़े खरीदे और उन्हें दे दिया।

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उन्होंने गर्व से कहा, ''पिछले पांच दिनों में उन्होंने 150 से अधिक तिरंगे सिले और बांटे हैं। मुझे अपनी बेटियों और उनकी उपलब्धि पर बेहद गर्व है।'' स्थानीय लोगों ने बताया कि वे लोग वर्ष 2022 में शुरू हुए 'हर घर तिरंगा' अभियान के बारे में जानते थे, लेकिन अब तक यह अभियान धदकई-बी तक नहीं पहुंच पाया था। यह दूरदराज का गांव सीधी ढलान वाली पहाड़ी पर स्थित है।

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