Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

रिटायरमेंट से ठीक पहले कई आदेश पारित करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले ‘बहुत सारे आदेश’ पारित करने की जजों की ‘बढ़ती प्रवृत्ति’ पर आपत्ति जताई और इसकी तुलना मैच के अंतिम ओवरों में बल्लेबाज द्वारा ‘छक्के मारे जाने’ से की। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले ‘बहुत सारे आदेश’ पारित करने की जजों की ‘बढ़ती प्रवृत्ति’ पर आपत्ति जताई और इसकी तुलना मैच के अंतिम ओवरों में बल्लेबाज द्वारा ‘छक्के मारे जाने’ से की। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ मध्य प्रदेश के एक प्रधान और जिला जज की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कुछ संदिग्ध न्यायिक आदेशों के संबंध में उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति से ठीक 10 दिन पहले उन्हें निलंबित करने के हाईकोर्ट के सामूहिक फैसले को चुनौती दी थी। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी इस पीठ में शामिल थे।

पीठ ने बुधवार को कहा,‘याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति से ठीक पहले छक्के लगाने शुरू कर दिए। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है। मैं इस पर विस्तार से चर्चा नहीं करना चाहता।’

Advertisement

मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी 30 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे और उन्हें कथित तौर पर उनके द्वारा पारित दो न्यायिक आदेशों के कारण 19 नवंबर को निलंबित कर दिया गया।

Advertisement

उनकी ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन सांघी ने बताया कि उनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग है और उन्हें वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों में लगातार उच्च अंक प्राप्त हुए हैं। सांघी ने निलंबन की वैधता पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि न्यायिक अधिकारियों को केवल न्यायिक आदेश पारित करने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

प्रधान न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि 20 नवंबर को उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार को राज्य में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 61 वर्ष करने का निर्देश दिया था। इसके परिणामस्वरूप, न्यायिक अधिकारी अब 30 नवंबर, 2026 को सेवानिवृत्त होंगे। प्रधान न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि विवादित आदेश पारित करते समय अधिकारी को सेवानिवृत्ति की आयु में विस्तार की जानकारी नहीं थी।

पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी। पीठ ने हाईकोर्ट को चार सप्ताह के भीतर अभ्यावेदन पर विचार करने और निर्णय लेने का निर्देश दिया।

Advertisement
×