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वंदे मातरम् पर सरकार के फैसले से थरूर नाराज, बोले- मकसद ही न रह जाए अधूरा

कट्टर समर्थकों ने मानवीय स्वभाव के पहलू को नजरअंदाज किया: थरूर ने कहा

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रगीत के गायन को अनिवार्य बनाने के सरकार के कदम की आलोचना करते हुए मंगलवार को कहा कि इससे 'वंदे मातरम्' के प्रति अधिक सम्मान बढ़ाने के लिए लाया गया संशोधित कानून का मकसद शायद पूरा नहीं हो पाए।

थरूर ने इस बात का उल्लेख किया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वंदे मातरम् से संबंधित संशोधन को मंजूरी दे दी है। यह संशोधन संसद में बिना चर्चा के पारित हुआ और इसके तहत किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रगान के अलावा राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को पूर्ण रूप से गाना अनिवार्य किया गया है।

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तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सदस्य थरूर ने कहा कि मैं एक ऐसा व्यक्ति हूं जो दोनों का बहुत सम्मान करता है। राष्ट्र गीत के पहले दो अंतरे गा सकता हूं तथा पूरा राष्ट्रगान भी गा सकता हूं। मैं केवल एक व्यावहारिक पहलू की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं, जिसे हमारे कट्टर समर्थक नजरअंदाज करते दिख रहे हैं, वो है मानवीय स्वभाव। उन्होंने कहा कि 'जन गण मन' के दौरान श्रोताओं से सम्मानपूर्वक खड़े रहने और करीब 52 सेकंड तक अपना ध्यान केंद्रित रखने की अपेक्षा की जाती है।

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थरूर ने 'एक्स' पर पोस्ट किया, ''पूरे राष्ट्रगीत में तीन मिनट 10 सेकंड लगते हैं। तमिलनाडु ने अभी फैसला किया है कि दोनों से पहले तमिल में राज्य गीत भी गाया जाएगा, जिसमें दो मिनट और लगेंगे। क्या हम वास्तव में उम्मीद करते हैं कि हर कार्यक्रम से पहले और बाद में श्रोता छह मिनट तक स्थिर और सम्मानपूर्वक खड़े रहें, यानी कुल 12 अतिरिक्त मिनट? क्या सम्मान और धैर्य को कानून बनाकर लागू किया जा सकता है? मुझे आशंका है कि विधेयक का उद्देश्य, यानी राष्ट्रगीत के प्रति अधिक सम्मान बढ़ाना, पूरा नहीं होगा, बल्कि इसका उलटा हो सकता है।

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