काॅलेजियम के नामों को मंजूरी में देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज : The Dainik Tribune

जजों की नियुक्ति का मुद्दा

काॅलेजियम के नामों को मंजूरी में देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज

काॅलेजियम के नामों को मंजूरी में देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज

नयी दिल्ली, 28 नवंबर (एजेंसी)

न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नामों को मंजूरी देने में केंद्र की ओर से देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नाराजगी जताई। जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एएस ओका की पीठ ने कहा कि आप नियुक्ति के तरीके को प्रभावी ढंग से विफल कर रहे हैं। पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के लिए समय सीमा निर्धारित की थी, उसका पालन करना होगा।

जस्टिस कौल ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इस तथ्य से नाखुश है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को मंजूरी नहीं मिली। लेकिन, यह देश के कानून के शासन को नहीं मानने की वजह नहीं हो सकती। पीठ ने कहा, ‘जब तक कानून है, इसका पालन करना होगा।’

शीर्ष अदालत ने 2015 के अपने फैसले में एनजेएसी अधिनियम और संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014 को रद्द कर दिया था, जिससे शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाली मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली बहाल हो गई थी।

सोमवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि से कहा, जमीनी हकीकत यह है कि कॉलेजियम द्वारा दोहराए गये नामों सहित अनुशंसित नामों को सरकार द्वारा मंजूरी नहीं दी जा रही है। पीठ ने शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा, ‘एक बार जब कॉलेजियम किसी नाम को दोहराता है, तो यह अध्याय समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति नहीं हो सकती, जहां सिफारिशें की जा रही हैं और सरकार उन पर बैठी रहती है। ऐसी स्थिति प्रणाली को विफल करती है। कुछ नाम डेढ़ साल से सरकार के पास लंबित हैं।’ पीठ ने यह भी कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में देरी के कारण कुछ वकील पीठ में पदोन्नति के लिए दी गई अपनी सहमति वापस ले रहे हैं। पीठ ने कहा कि सरकार कभी-कभी कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नामों में से सिर्फ एक नाम चुनती है और इससे वरिष्ठता ‘पूरी तरह छिन्न भिन्न’ हो जाती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कॉलेजियम वरिष्ठता के पहलू को भी ध्यान में रखते हुए नामों की सिफारिश करता है।

... तो ‘डबल बैरल गन’ को काम करना चाहिए

पीठ ने कहा कि इस मामले में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, दोनों पेश हो रहे हैं। पीठ ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, ‘तो डबल बैरल गन को काम करना चाहिए।’ मामले को 8 दिसंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, उसे उम्मीद है कि सरकार को सलाह देने के लिए अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल अपनी भूमिका निभाएंगे ताकि कानून के शासन का पालन किया जा सके।

कानून मंत्री के बयान पर कहा- ऐसा नहीं होना चाहिए था

वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कानून मंत्री किरेन रिजिजू के एक बयान से जुड़ी खबरों का जिक्र किया तो जस्टिस कौल ने कहा, ‘मैं सभी खबरों को नजरअंदाज करता हूं। लेकिन, जब कोई उच्च स्तर का व्यक्ति कहता है कि उन्हें इसे स्वयं करने दें, तो हम इसे स्वयं करेंगे, कोई कठिनाई नहीं है...। लेकिन, मैं बस इतना कह सकता हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था।’ गौर हो कि रिजिजू ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कथित तौर पर कहा था कि यदि कॉलेजियम को लगता है कि सरकार उसकी सिफारिशों को दबाकर बैठी है, तो वह न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अधिसूचना जारी कर सकता है।

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