श्रद्धा हत्याकांड : आफताब के ‘कबूलनामे’ की कानूनी वैधता नहीं! : The Dainik Tribune

श्रद्धा हत्याकांड : आफताब के ‘कबूलनामे’ की कानूनी वैधता नहीं!

श्रद्धा हत्याकांड : आफताब के ‘कबूलनामे’ की कानूनी वैधता नहीं!

नयी दिल्ली, 1 दिसंबर (एजेंसी)

विशेषज्ञों के अनुसार श्रद्धा हत्याकांड के आरोपी आफताब अमीन पूनावाला के एक मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान समेत कथित ‘कबूलनामों’ की कोई निर्णायक कानूनी वैधता नहीं है। दिल्ली पुलिस में सूत्रों के हवाले से खबरों में कई बार दावा किया जा चुका है कि आफताब ने श्रद्धा की हत्या करने, उसके शव के 35 टुकड़े करने और उन्हें शहर के अलग-अलग हिस्सों में फेंकने का जुर्म कबूल कर लिया है। बुधवार को ऐसा बताया गया कि उसने रोहिणी की फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) में हुई पॉलिग्राफी जांच में अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है। इससे पहले 22 नवंबर को दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने दावा किया था कि आफताब ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिए मजिस्ट्रेट को बताया कि उसने आवेश में आकर श्रद्धा की हत्या की और यह जानबूझकर नहीं किया। इसके तुरंत बाद उसके वकील ने कहा था कि उनके मुवक्किल ने कभी मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसा कोई कबूलनामा नहीं दिया।

वीडियो कांफ्रेंस के जरिए कबूलनामे पर दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरएस सोढी ने कहा, ‘यह पेश करने का आपत्तिजनक तरीका है। आप नहीं जानते कि वह किस तरह के दबाव में है। उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष शारीरिक रूप से पेश किया जाना चाहिए था।' दिल्ली पुलिस ने दावा कि उसे सुरक्षा के मुद्दे के कारण वीडियो कांफ्रेंस के जरिए पेश किया गया। सेवानिवृत्त न्यायाधीश सोढी का मानना है कि ऐसे कबूलनामे का कोई मतलब नहीं है, दिल्ली पुलिस ‘समय बर्बाद कर रही है और मीडिया को ऐसी सूचना लीक करके प्रचार कर रही है।'

विशेषज्ञों का कहना है कि कानून के अनुसार, मजिस्ट्रेट के समक्ष कबूलनामा स्वीकार्य साक्ष्य है और इससे पुलिस को मामले को सुलझाने में मदद मिलती है लेकिन वीडियो कांफ्रेंस के जरिए किए गए कबूलनामे से जांच एजेंसी का पक्ष मजबूत नहीं होता है, क्योंकि इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं होती है। न्यायाधीश सोढी ने कहा, ‘कानूनी रूप से वैध कबूलनामे के लिए मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आरोपी ने अपनी मर्जी से ऐसा किया है। आरोपी को सोचने का वक्त दिया जाना चाहिए।'

अपराध मामलों के जाने-माने वकील और पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि पुलिस हिरासत में कबूलनामे को तभी स्वीकार किया जा सकता है, जब कोई मजिस्ट्रेट आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 का पालन करता है, जो कहती है कि यह सुनिश्चित करना मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि कबूलनामा मर्जी से किया गया है।'

फिल्म प्रोड्यूसर नीरज ग्रोवर के मामले में अभियोजन पक्ष की पैरवी करने वाले आपराधिक मामलों के वकील आरवी किनी ने आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष शारीरिक रूप से पेश करने पर जोर दिया। ग्रोवर की 2008 में हत्या कर दी गयी थी और उनके शव के टुकड़े-टुकड़े किए गए थे।

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