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Regularisation Policy : हरियाणा के कच्चे कर्मचारियों को SC से संजीवनी: 2014 की नियमितीकरण नीति पर लगी मुहर

हरियाणा के हजारों परिवारों को बड़ी राहत , सुरक्षित रहेगी नौकरी

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सुप्रीम कोर्ट।
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Regularisation Policy : हरियाणा में 2014 की नियमितीकरण नीति (Regularisation Policy) के तहत पक्के हुए हजारों अनुबंध कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी आई है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 2018 के फैसले को पलटते हुए इस नीति से जुड़ी दो महत्वपूर्ण अधिसूचनाओं को वैध करार दिया है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने 16 अप्रैल को सुनाए गए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इन अधिसूचनाओं के तहत लाभ पाने वाले कर्मचारियों की सेवा जारी रहेगी।

हाईकोर्ट का फैसला बदला, दो अधिसूचनाएं वैध

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 16 जून 2014 और 18 जून 2014 को जारी की गई अधिसूचनाएं पूरी तरह से वैध हैं। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें इन अधिसूचनाओं को असंवैधानिक बताया गया था। शीर्ष अदालत के इस फैसले से उन कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जिन्हें हाईकोर्ट के फैसले के बाद अपनी नौकरी जाने का डर सता रहा था। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जो कर्मचारी इन अधिसूचनाओं के तहत लाभ के हकदार हैं, वे सभी राहतों के पात्र होंगे, बशर्ते सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनका सत्यापन (Verification) किया जाए।

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जुलाई की अधिसूचना रद्द, पर नौकरी को खतरा नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने 7 जुलाई 2014 को ग्रुप 'बी', 'सी' और 'डी' के कर्मचारियों के लिए जारी दो अधिसूचनाओं को "मनमाना और अवैध" बताते हुए रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने मानवीय आधार पर और मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए एक बड़ा निर्णय लिया। अदालत ने कहा कि जो कर्मचारी इन अधिसूचनाओं के तहत लाभ प्राप्त कर चुके हैं और वर्तमान में सेवा में हैं, उन्हें सेवा से नहीं हटाया जाएगा। न्यायमूर्ति चंदुरकर ने फैसला लिखते हुए हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और निर्देश दिया कि इन कर्मचारियों को उनके पद के न्यूनतम वेतनमान (Lowest Pay Scale) पर रखा जाए।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद हरियाणा सरकार द्वारा 2014 में जारी की गई नियमितीकरण नीतियों से जुड़ा था:

2011 की अधिसूचना: 10 साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को एक बार के उपाय के रूप में नियमित करने का प्रस्ताव था।

जून 2014 की अधिसूचना: 3 साल की सेवा पूरी करने वाले ग्रुप 'बी', 'सी' और 'डी' के अनुबंध कर्मचारियों को नियमित करने के लिए जारी की गई थी।

जुलाई 2014 की अधिसूचना: इसमें 31 दिसंबर 2018 तक 10 साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को नियमित करने का प्रावधान था।

मई 2018 में, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इन नीतियों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ये सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'उमादेवी मामले' में दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करती हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि नियमित भर्ती प्रक्रिया के बजाय अनुबंध के आधार पर नियुक्तियां करना और फिर उन्हें नियमित करना सही नहीं है।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न्यायमित्र (Amicus Curiae) और वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता द्वारा दी गई सहायता की भी सराहना की। अदालत ने स्पष्ट किया कि जो कर्मचारी पहले हाईकोर्ट गए थे और जिन्हें इस अपील के फैसले के बाद कदम उठाने की अनुमति मिली थी, वे अब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के आलोक में उचित कानूनी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं।

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