Pakistan Diplomacy : अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता का दिखावा, सऊदी अरब में सेना की तैनाती; पाकिस्तान का खतरनाक 'डबल गेम'
मिडिल ईस्ट संकट में पाकिस्तान की 'भाड़े की फौज' वाली कूटनीति, कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान को सिर्फ डॉलर से प्यार, 'दैनिक ट्रिब्यून' के पॉडकास्ट में पूर्व आईएएस आरके कौशिक ने किए कई बड़े खुलासे।
Pakistan Diplomacy : दुनिया इस समय एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच 40 दिन के भीषण युद्ध के बाद हुआ सीजफायर अब खटाई में पड़ता दिख रहा है। लेकिन इस पूरे वैश्विक संकट के बीच कंगाली से जूझ रहा पाकिस्तान एक खतरनाक 'डबल गेम' खेल रहा है। वह एक तरफ ईरान का पड़ोसी और मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते उसे गुपचुप हथियार देने की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के इशारे पर सऊदी अरब में अपनी फौज तैनात कर रहा है।
'दैनिक ट्रिब्यून' के विशेष पॉडकास्ट में पाकिस्तान मामलों के गहरे जानकार और पूर्व आईएएस अधिकारी आरके कौशिक ने पाकिस्तान की इस 'भाड़े की फौज' वाली कूटनीति का विस्तार से विश्लेषण किया है।
वार्ता विफल, मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान नाकाम
पॉडकास्ट में पूर्व आईएएस आरके कौशिक ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को लेकर चल रही बातचीत पूरी तरह विफल हो गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के समय के अनुसार सुबह 6 बजे ही वापस लौट गया। इस वार्ता में मुख्य पेच ईरान की परमाणु गतिविधियों और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) को लेकर फंसा है। पाकिस्तान ने इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका के दबाव में काम करने वाले पाकिस्तान की इसमें भूमिका महज एक 'पोस्टमैन' जैसी ही रही। खुद पाकिस्तान के अंदर ईरान को लेकर भारी विरोधाभास है, क्योंकि वहां की 20 फीसदी आबादी और सेना में करीब डेढ़ लाख जवान शिया समुदाय से हैं।
सऊदी अरब भेजी 11वीं कोर और फाइटर जेट्स
पाकिस्तान इस पूरे संकट में किसी एक पक्ष का साथ देने की बजाय दोनों तरफ से फायदे तलाश रहा है। आरके कौशिक ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपनी 11वीं कोर (पेशावर) से एक पूरी डिवीजन और JF-17 थंडर फाइटर जेट्स के दो स्क्वाड्रन तैनात किए हैं। इसका मकसद ईरान द्वारा हमला किए जाने की स्थिति में सऊदी अरब की ओर से जवाबी कार्रवाई करना है। इसके पीछे अमेरिका का भारी दबाव है। यहां तक कि सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई एक विशेष मुलाकात में भविष्य के 'गाजा डेवलपमेंट बोर्ड' के लिए भी अपनी फौज (एक या दो ब्रिगेड) भेजने का वादा किया है।
यूएई ने वापस मांगा कर्जा, रोके वीजा
पाकिस्तान की इस अवसरवादी कूटनीति के पीछे उसकी दिवालिया हो चुकी अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा कारण है। कौशिक के अनुसार, वर्तमान में पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार कागजों पर 21.2 अरब डॉलर दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत में यह 7 से 8 अरब डॉलर ही है। बाकी सारा पैसा चीन, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का 'पार्किंग अमाउंट' है, जिसे पाकिस्तान अपनी मर्जी से खर्च नहीं कर सकता। हालत यह हो गई है कि यूएई ने पाकिस्तान से अपने रिश्ते सख्त करते हुए 23 अप्रैल (2026) तक अपने 3.5 अरब डॉलर वापस मांग लिए हैं और पाकिस्तानियों के वीजे भी बंद कर दिए हैं। चंद अरब डॉलर्स के लिए पाकिस्तान जो कूटनीतिक चालें चल रहा है, उसका एक भी गलत कदम खुद उसके वजूद को गहरे संकट में डाल सकता है।

