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Khaleda Zia and Democracy : सैन्य तानाशाही के खिलाफ जन आंदोलन की आवाज रहीं खालिदा जिया

खालिदा जिया (1945–2025): बांग्लादेश पर बेगम का प्रभाव : 1981 में उनके पति और राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद खालिदा जिया राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुखता से उभरीं

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Khaleda Zia and Democracy : बांग्लादेश की राजनीति में जन संघर्ष, सत्ता संघर्ष और लोकतांत्रिक पुनर्स्थापना की सबसे प्रभावशाली आवाजों में गिनी जाने वाली खालिदा जिया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष रहीं खालिदा जिया ने सैन्य तानाशाही के खिलाफ जन आंदोलन का नेतृत्व कर 1990 में तत्कालीन तानाशाह और पूर्व सेना प्रमुख एच.एम. इरशाद के पतन में निर्णायक भूमिका निभाई।

तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष से सत्ता तक

1971 में पाकिस्तान से स्वतंत्रता के बाद बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट के दौर से गुजरा। खालिदा जिया के पति जियाउर रहमान ने 1977 में सेना प्रमुख के रूप में सत्ता संभाली और 1978 में बीएनपी की स्थापना की। 1981 में उनकी हत्या के बाद खालिदा जिया ने सैन्य शासन के विरुद्ध जन आंदोलन को संगठित किया। इस संघर्ष का परिणाम 1990 में इरशाद शासन का अंत रहा।

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पहली महिला प्रधानमंत्री और हसीना से प्रतिद्वंद्विता

खालिदा जिया 1991 में देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद उनके और शेख हसीना के बीच दशकों चली राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने बांग्लादेश की राजनीति को दिशा दी। 1996 के शुरुआती चुनावों में बीएनपी ने भारी जीत दर्ज की, लेकिन कार्यवाहक सरकार की मांग के चलते उनकी सरकार केवल 12 दिन चली। जून 1996 में नए चुनाव हुए।

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दूसरा कार्यकाल, विवाद और आरोप

2001 में खालिदा जिया फिर सत्ता में लौटीं। उनके दूसरे कार्यकाल (2001–06) में भारत-विरोधी बयानबाजी, उग्रवाद को लेकर आरोप और 2004 के ढाका ग्रेनेड हमले जैसे विवाद सामने आए। इसी अवधि में उनके बड़े बेटे तारिक रहमान पर भ्रष्टाचार और ‘समानांतर सत्ता’ के आरोप लगे।

सजा, रिहाई और इलाज

खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के दो मामलों में 17 साल की सजा सुनाई गई। बीएनपी ने इन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। 2020 में बीमारी के आधार पर रिहाई के बाद वह ढाका में किराए के घर में रहीं। 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने उन्हें विदेश में इलाज की अनुमति दी। वह जनवरी में लंदन गईं और मई में स्वदेश लौटीं।

अंतिम समय और विरासत

नवंबर में उन्हें ढाका छावनी के एक सैन्य कार्यक्रम में व्हीलचेयर पर देखा गया था। सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बावजूद मृत्यु तक वह बीएनपी की अध्यक्ष बनी रहीं। उनकी राजनीतिक विरासत लोकतंत्र की बहाली, जन आंदोलन और सत्ता संघर्ष के जटिल अध्यायों से जुड़ी रही।

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