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Jantar-Mantar Bungalow Dispute : सत्ता से सड़क तक की कहानी... संसद से कुछ कदम दूर ये बंगला क्यों बन गया आंदोलनों का केंद्र?

7, जंतर मंतर रोड: अपनी पुरानी चमक खो रहा है पुराने कांग्रेस मुख्यालय का भवन

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Jantar Mantar Bungalow Dispute : देश की संसद से चंद कदम दूर '7, जंतर मंतर रोड' स्थित बंगला कोई सामान्य पता नहीं है, बल्कि देश के कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों तथा यादों को समेटे हुए है और यह कभी देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस का मुख्यालय हुआ करता था। मौजूदा समय में इस दो मंजिला भवन में एक ट्रस्ट द्वारा संचालित पुस्तकालय है। जंतर मंतर रोड स्थित आकर्षक वास्तुशिल्प वाला यह भवन पिछले कुछ दशकों से कई विरोध प्रदर्शनों का गवाह भी रहा है। इसकी वजह यह है कि जंतर-मंतर लुटियंस इलाके में वह स्थान है जहां प्रशासन द्वारा सामाजिक एवं राजनीतिक समूहों को विरोध प्रदर्शनों की अनुमति दी जाती है।

यह बंगला फिर से चर्चा में है, क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस की उस याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार से पिछले बृहस्पतिवार को जवाब मांगा जिसमें पार्टी के पूर्व मुख्यालय के लिए उसके पक्ष में बैनामा करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने याचिका और अंतरिम राहत के लिए दायर आवेदन पर सरकारों को नोटिस जारी कर दोनों पहलुओं पर उनसे जवाब मांगा है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने अदालत से अंतरिम आदेश पारित करने का आग्रह किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस बीच परिसर किसी और को आवंटित न कर दिया जाये। हालांकि, न्यायमूर्ति कौरव ने रिट याचिका की विचारणीयता पर सवाल खड़ा किया।

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उन्होंने कहा, ''मुझे इसकी विचारणीयता पर संदेह है। इसलिए, अगर आपको अंतरिम राहत के लिए दबाव डालना है, तो आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि याचिका विचारणीय है।'' याचिका में कांग्रेस पार्टी ने कहा कि दिल्ली सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार, फरवरी 1946 से संपत्ति के एक हिस्से पर उसका कब्जा है और 1956 में उसके पक्ष में एक आवंटन किया गया था। इसमें कहा गया कि 1959 में, पार्टी ने बिक्री मूल्य के रूप में भारत सरकार को 6.1 लाख रुपये का भुगतान किया, इसके अलावा उपयोग में परिवर्तन के लिए अतिरिक्त प्रीमियम और अतिरिक्त भूमि किराए के रूप में प्रतिवर्ष 96,962 रुपये और 4,849 रुपये का भुगतान किया। याचिका में कहा गया है कि हालांकि, पार्टी के पक्ष में बैनामा के निष्पादन में कई कारणों से देरी हुई। इन कारणों में किरायेदारों द्वारा मुकदमा दायर करना और पार्टी का 1969 में दो गुटों में विभाजित होना शामिल है।

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प्रतिद्वंद्वी गुट को कांग्रेस (ओ) कहा जाता था और उसने 1975 में लगाए गए आपातकाल को हटाने जाए के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के खिलाफ 1977 का चुनाव लड़ा और उनकी पार्टी को हराया था। पिछले साल जनवरी में कोटला मार्ग पर कांग्रेस के नए मुख्यालय 'इंदिरा भवन' का उद्घाटन हुआ। इससे पहले 47 वर्ष तक '24 अकबर रोड' उसका मुख्यालय था। इस पते से अभी भी कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियां संचालित होती हैं। जनता दल (यूनाइटेड) भी वर्षों से 7, जंतर मंतर रोड के एक हिस्से का उपयोग अपने केंद्रीय कार्यालय के तौर पर करती आ रही है। इस बंगले के भूतल पर सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक न्यास पुस्तकालय है, जिसमें कुछ दुर्लभ पुस्तकें और प्रकाशन शामिल हैं तथा इनमें कांग्रेस पार्टी से जुड़ी पुस्तकें भी शामिल हैं।

पिछले कुछ वर्षों में बंगले ने अपना पुराना आकर्षण खो दिया है और इसके बाहरी हिस्से में मरम्मत की आवश्यकता है। उपलब्ध खातों के अनुसार, यह संपत्ति 1920 में सरदार धरम सिंह को पट्टे के माध्यम से दी गई थी, जिसे बाद में नवाब अब्दुल हसन खान ने खरीद लिया था, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे और केंद्र सरकार ने इसे निष्क्रांत (इवेक्यूई) संपत्ति घोषित कर दिया था। याचिका में कहा गया है कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि पार्टी के विभाजन के बाद याचिकाकर्ता दल 1969 से पहले मौजूद सभी संपत्तियों और कोष का हकदार है, और परिणामस्वरूप, दिल्ली सरकार से 2017 से बिक्री विलेख निष्पादित करने के लिए कई अभ्यावेदन दिए गए, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 14 सितंबर को करना तय किया है।

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