ईरान संकट : पंजाब के निर्यातक चिंतित, रास्ते में हैं कई कंटेनर
अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने पंजाब के निर्यातकों के लिए उच्च जोखिम वाला माहौल बना दिया है। राज्य से बासमती चावल, होजरी, ऑटो पार्ट्स, खेल का सामान और औजारों आदि का निर्यात करने वाले व्यापारी पश्चिम...
अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने पंजाब के निर्यातकों के लिए उच्च जोखिम वाला माहौल बना दिया है। राज्य से बासमती चावल, होजरी, ऑटो पार्ट्स, खेल का सामान और औजारों आदि का निर्यात करने वाले व्यापारी पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण चिंतित हैं।
निर्यातकों का कहना है कि उनके कई कंटेनर रास्ते में हैं। उन्हें इस बात की चिंता सता रही है कि क्या ये खेप ईरान, सऊदी अरब, यूएई एवं कतर तक सुरक्षित पहुंच पाएंगी और भुगतान कैसे होगा।
तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने अपने सदस्यों को सलाह दी है कि वे खाड़ी क्षेत्र के देशों के लिए कोई नया ‘सीआईएफ’ करार न करें। जहां संभव हो, बिक्री को एफओबी (फ्री ऑन बोर्ड) शर्तों पर अंतिम रूप दें, ताकि मालभाड़ा, बीमा और संबंधित जोखिम अंतर्राष्ट्रीय खरीदार के जिम्मे रहें।
पंजाब के प्रमुख चावल निर्यातक रणजीत सिंह जोसन ने कहा, ‘बासमती निर्यातकों पर दबाव बहुत अधिक है। यह संघर्ष भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे बासमती व्यापार को सीधे प्रभावित करेगा। ईरान ऐतिहासिक रूप से भारतीय बासमती का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। एक समय पर शिपमेंट लगभग 15 लाख टन प्रति वर्ष तक पहुंच गया था, जिससे पंजाब और हरियाणा में खेती के पैटर्न में बड़ा बदलाव आया।’
उन्होंने बताया कि हाल के महीनों में बढ़ते तनाव के कारण भारत से ईरान को सीधे शिपमेंट पहले ही धीमे हो गए थे। निर्यातक दुबई के जेबेल अली बंदरगाह के पुराने मार्ग पर निर्भर थे, जहां से छोटे जहाजों द्वारा माल ईरान के छोटे बंदरगाहों तक पहुंचाया जाता था। व्यापार सूत्रों के अनुसार, पिछले तीन महीनों में इस मार्ग से लगभग 3 लाख टन बासमती ईरान भेजा गया। जोसन ने कहा कि अब बैंकिंग प्रतिबंधों, अंतर्राष्ट्रीय भुगतान निपटान में देरी और लाल सागर तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते जोखिम को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
उन्होंने बताया कि ईरान की सरकारी व्यापारिक संस्था, गवर्नमेंट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ ईरान (जीटीसी) ने हाल ही में लगभग 1.60 लाख टन भारतीय बासमती चावल की खरीद के निर्देश जारी किए थे। युद्ध शुरू होने के बाद अनिश्चितता गहरा गई है। सुरक्षित भुगतान गारंटी के बिना निर्यातक माल भेजने से हिचक रहे हैं। बड़े शिपमेंट भारतीय बंदरगाहों पर अटकने का जोखिम है, जिससे घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
निर्यातकों को यह भी डर है कि मालभाड़ा और बीमा दरें बढ़ सकती हैं। बताया जा रहा है कि कई वैश्विक शिपिंग कंपनियों ने जहाजों को कुछ बंदरगाहों पर रुकने या उनसे बचने के निर्देश दिए हैं। मुद्रा अस्थिरता भी एक बड़ी चिंता है। पहले लगाए गए प्रतिबंधों के दौरान ईरानी मुद्रा में भारी गिरावट आई थी, जिससे निर्यातकों को भुगतान में देरी का सामना करना पड़ा था। कई पश्चिम एशियाई देशों को निर्यात करने वाले ओसवाल इंडिया के प्रबंध निदेशक विकास जैन ने कहा, ‘अधिकांश निर्यातक घबराहट में हैं, क्योंकि किसी को नहीं पता कि युद्ध का परिणाम क्या होगा या रास्ते में जा रही हमारी खेपों का क्या होगा।’
निर्यातकों का यह भी कहना है कि ईरान के सबसे बड़े वाणिज्यिक बंदरगाह बंदर अब्बास में संभावित व्यवधान का असर अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तुर्की, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, आर्मेनिया और रूस से जुड़े व्यापार पर भी पड़ सकता है।
सामान पहुंचाने में लग सकते हैं 15–20 दिन अतिरिक्त
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस के अध्यक्ष एससी रालहन ने कहा कि यदि मार्ग परिवर्तन लंबे समय तक जारी रहे, तो यूरोप और अमेरिका के लिए शिपमेंट को ‘केप ऑफ गुड होप’ के रास्ते मोड़ना पड़ सकता है, जिससे सामान पहुंचाने में 15–20 दिन अतिरिक्त लगेंगे। उन्होंने कहा कि भारतीय निर्यातकों ने पहले भी बाधाओं के बीच मजबूती दिखाई है, लेकिन इन महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में लगातार अस्थिरता रहने पर प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने के लिए नीतिगत समर्थन और करीबी निगरानी की आवश्यकता होगी।

