Inquiry Panel Row : लोकसभा स्पीकर की जांच समिति पर जस्टिस यशवंत वर्मा का सवाल, सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक टकराव
Inquiry Panel Row : इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने उनके खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित समिति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। जस्टिस वर्मा...
Inquiry Panel Row : इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने उनके खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित समिति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। जस्टिस वर्मा का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान और जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के अनिवार्य प्रावधानों के खिलाफ है।
जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष दलील दी कि यदि किसी न्यायाधीश को हटाने से जुड़े महाभियोग प्रस्ताव एक ही दिन लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पेश किए जाते हैं, तो जांच समिति दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से गठित की जानी चाहिए।
रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के उपसभापति द्वारा प्रस्ताव खारिज किए जाने के बावजूद लोकसभा स्पीकर ने जांच समिति गठित कर दी, जो कानून की दृष्टि में ‘नॉन एस्ट’ है, यानी उसका कोई वैधानिक अस्तित्व नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 124(5) और जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट की अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन है।
संयुक्त प्रक्रिया अनिवार्य होने का तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होता है। इसके तहत लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव आवश्यक है। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद ही जांच समिति गठित की जा सकती है, जो विभागीय जांच जैसी प्रक्रिया अपनाती है और उसके बाद सदन में बहस होती है।
रोहतगी ने पीठ का ध्यान दिलाया कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव 21 जुलाई 2025 को दोनों सदनों में एक ही दिन पेश किए गए थे। ऐसे में यदि दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार नहीं होते, तो कानून के अनुसार संयुक्त समिति के बिना आगे की कार्रवाई नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ की टिप्पणी
हालांकि, पीठ ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो एक सदन में प्रस्ताव खारिज होने पर दूसरे सदन की कार्यवाही को स्वतः अमान्य ठहराता हो। न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता ने पूछा कि राज्यसभा में प्रस्ताव अस्वीकृत होने के बाद लोकसभा को जांच समिति गठित करने से रोकने वाला स्पष्ट प्रतिबंध कहां है।
इस पर रोहतगी ने कहा कि जब दोनों सदनों में एक ही दिन विधिवत प्रस्ताव पेश होते हैं, तो कानून संयुक्त प्रक्रिया को अनिवार्य करता है। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो पूरी कार्यवाही ही विफल मानी जानी चाहिए।
यह है मामला
गौरतलब है कि 14 मार्च 2025 को नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास से जली हुई मुद्रा मिलने के बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट वापस भेजा गया था। शीर्ष अदालत ने 16 दिसंबर को उनकी याचिका पर सुनवाई के लिए लोकसभा स्पीकर और संसद के दोनों सदनों के महासचिवों को नोटिस जारी किए थे।
इससे पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित इन-हाउस समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा को कदाचार का दोषी पाया था। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 12 अगस्त को बहुदलीय प्रस्ताव स्वीकार करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसकी वैधता को अब जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मामले की सुनवाई जारी है।

