Hisar Newborn Death: नवजात की वेंटिलेटर के अभाव में मौत पर हरियाणा मानवाधिकार आयोग का स्वतः संज्ञान
Hisar Newborn Death: हिसार से रोहतक तक भटकता रहा परिवार, आयोग ने स्वास्थ्य व्यवस्था की संस्थागत खामियों पर जताई गंभीर चिंता
Hisar Newborn Death: हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने सरकारी अस्पतालों में कथित रूप से वेंटिलेटर सुविधा उपलब्ध न होने के कारण एक नवजात शिशु की हुई दुखद मृत्यु के मामले का स्वतः संज्ञान (सुओ-मोटो) लिया है। आयोग ने माना है कि यदि समाचार पत्रों में प्रकाशित आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह केवल एक नवजात की मृत्यु का मामला नहीं बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में आपातकालीन नवजात चिकित्सा सेवाओं, रेफरल प्रणाली, चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव तथा अस्पतालों के बीच समन्वय की गंभीर संस्थागत कमियों को दर्शाता है।
आयोग के माननीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति ललित बत्रा, न्यायिक सदस्य कुलदीप जैन तथा सदस्य दीप भाटिया की पीठ ने स्वप्रेरणा से संज्ञान मामला संख्या 1784/7/6/2026 में विस्तृत आदेश पारित करते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, स्वास्थ्य सेवाएं विभाग तथा संबंधित चिकित्सा संस्थानों से व्यापक रिपोर्ट तलब की है।
आयोग ने अपने आदेश में उल्लेख किया है कि समाचारों के अनुसार हिसार के सिविल अस्पताल में सीज़ेरियन ऑपरेशन के माध्यम से जन्मे नवजात को जन्म के कुछ ही समय बाद गंभीर श्वसन संबंधी समस्या उत्पन्न हो गई थी, जिसके लिए तत्काल एनआईसीयू (NICU) में वेंटिलेटर सहायता की आवश्यकता थी। आरोप है कि सिविल अस्पताल हिसार में उपलब्ध एकमात्र नवजात वेंटिलेटर पहले से ही उपयोग में था, जिसके कारण नवजात को महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज, अग्रोहा रेफर किया गया। वहां भी वेंटिलेटर उपलब्ध न होने पर उसे पीजीआईएमएस, रोहतक भेजा गया, लेकिन वहां भी आवश्यक सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। अंततः परिजन नवजात को निजी अस्पताल ले गए, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
आयोग ने इस तथ्य पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की कि समाचारों के अनुसार नवजात के पिता को लगभग 24 घंटे तक विभिन्न सरकारी अस्पतालों के बीच जीवन रक्षक उपचार की तलाश में भटकना पड़ा। आयोग ने कहा कि यदि ऐसा हुआ है तो यह आपातकालीन चिकित्सा प्रणाली की गंभीर विफलता का संकेत है।
आयोग ने अपने आदेश में विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि सिविल अस्पताल, हिसार जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में नवजातों के लिए केवल एक ही वेंटिलेटर उपलब्ध था। साथ ही समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया कि अस्पताल में उपलब्ध लगभग 40 वेंटिलेटरों में से करीब 25 स्टोर में अनुपयोगी पड़े थे तथा लगभग 13 तकनीकी खराबी के कारण बंद थे। कोविड-19 महामारी के दौरान उपलब्ध कराए गए अनेक वेंटिलेटरों के रखरखाव एवं समय पर मरम्मत न होने के कारण उनके उपयोग में न आ पाने के आरोपों को भी आयोग ने अत्यंत गंभीर माना है।
आयोग ने कहा कि किसी भी गंभीर मरीज, विशेषकर नवजात शिशु को रेफर करने से पहले संबंधित अस्पताल का यह दायित्व है कि वह जिस अस्पताल में मरीज को भेजा जा रहा है, वहां आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की वास्तविक उपलब्धता की पुष्टि करे। बिना पुष्टि किए मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजना आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था के उद्देश्य को ही विफल कर देता है तथा मरीज के जीवन को अनावश्यक जोखिम में डालता है।
आयोग ने यह भी कहा कि वर्तमान घटना राज्य में एक एकीकृत एवं रियल-टाइम आपातकालीन रेफरल प्रणाली की आवश्यकता को रेखांकित करती है। आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में आईसीयू, एनआईसीयू, वेंटिलेटर एवं अन्य जीवनरक्षक सुविधाओं की वास्तविक समय पर उपलब्धता की जानकारी सभी सरकारी अस्पतालों के बीच साझा होना आवश्यक है, ताकि गंभीर मरीजों को अनावश्यक रूप से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल न भेजना पड़े।
आयोग ने स्पष्ट किया कि समय पर आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत राज्य पर नागरिकों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का दायित्व भी निहित है। आयोग ने यह भी उल्लेख किया कि भारत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR), बाल अधिकार अभिसमय (CRC) तथा आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा (ICESCR) का पक्षकार है।
आयोग ने कहा कि UDHR के अनुच्छेद 3 एवं 25 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाओं का अधिकार प्रदान करते हैं, जबकि CRC के अनुच्छेद 6 एवं 24 प्रत्येक बच्चे के जीवन, अस्तित्व, विकास तथा सर्वोत्तम उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने का दायित्व राज्य पर डालते हैं। आयोग ने अपने आदेश में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के परमानंद कटारा बनाम भारत संघ तथा पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के ऐतिहासिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन रक्षक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना प्रत्येक अस्पताल और राज्य का संवैधानिक दायित्व है तथा प्रशासनिक अथवा आधारभूत संरचना संबंधी कमियां इसका बहाना नहीं बन सकतीं।
आयोग ने यह भी उल्लेख किया कि भारत, मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, बाल अधिकार अभिसमय तथा आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों संबंधी अंतरराष्ट्रीय वाचा का पक्षकार है, जिनके अंतर्गत प्रत्येक बच्चे को सर्वोत्तम संभव स्वास्थ्य सुविधा एवं जीवनरक्षक उपचार उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व है।
आरोपों की गंभीरता एवं व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए जस्टिस ललित बत्रा की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ ने सम्बंधित अधिकारियों/विभागों से निम्नलिखित बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है|
(i) अतिरिक्त मुख्य सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, हरियाणा सरकार
- आपातकालीन नवजात रेफरल एवं अंतर-अस्पताल समन्वय संबंधी वर्तमान नीति।
- राज्य के प्रत्येक जिले में सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध NICU एवं नवजात वेंटिलेटरों का विवरण।
- वर्तमान घटना के उपरांत आपातकालीन नवजात चिकित्सा व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु उठाए गए कदम।
- क्या राज्य स्तर पर ICU, NICU एवं वेंटिलेटरों की वास्तविक समय (Real-Time) उपलब्धता की निगरानी हेतु कोई प्रणाली विद्यमान है? यदि नहीं, तो उसे लागू करने की प्रस्तावित समय-सीमा।
(ii) महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं, हरियाणा
- सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कुल वेंटिलेटरों (नवजात वेंटिलेटरों सहित) की संख्या, उनकी कार्यशील स्थिति एवं उपयोग का विवरण।
- मरम्मताधीन, अनुपयोगी अथवा खराब पड़े वेंटिलेटरों का विवरण, जिनमें कोविड-19 के दौरान उपलब्ध कराए गए वेंटिलेटर भी शामिल हों।
- पिछले दो वर्षों में वेंटिलेटरों एवं अन्य क्रिटिकल केयर उपकरणों का कोई राज्यस्तरीय ऑडिट किया गया है अथवा नहीं तथा उसके आधार पर की गई सुधारात्मक कार्रवाई।
- समाचारों में वर्णित प्रारंभिक जांच के आधार पर की गई कार्रवाई।
(iii) निदेशक, पंडित भगवत दयाल शर्मा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (PGIMS), रोहतक
- नवजात को प्रदान किए गए उपचार का विवरण तथा वेंटिलेटर उपलब्ध न होने के कारण।
- घटना के समय NICU बेड एवं वेंटिलेटरों की उपलब्धता एवं अधिभोग (Occupancy) की स्थिति।
- कुल उपलब्ध, कार्यशील, खराब, मरम्मताधीन एवं स्टोर में रखे NICU वेंटिलेटरों का विवरण।
- क्या नवजात को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने हेतु कोई वैकल्पिक व्यवस्था अथवा अंतर-अस्पताल समन्वय स्थापित किया गया था?
(iv) निदेशक, महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज, अग्रोहा
- क्या नवजात को इस संस्थान में रेफर किया गया था? यदि हाँ, तो उसके संबंध में की गई कार्रवाई।
- घटना के समय NICU बेड एवं वेंटिलेटरों की उपलब्धता की स्थिति।
- उपलब्ध, कार्यशील, खराब, मरम्मताधीन एवं स्टोर में रखे वेंटिलेटरों का विवरण तथा उपचार उपलब्ध न करा पाने के कारण।
(v) सिविल सर्जन, हिसार
- नवजात के जन्म से लेकर मृत्यु तक उपचार, रेफरल एवं अस्पतालों के बीच आवाजाही का संपूर्ण घटनाक्रम तथा संबंधित चिकित्सा अभिलेख।
- घटना के दिन सिविल अस्पताल, हिसार में उपलब्ध नवजात एवं अन्य वेंटिलेटरों की संख्या तथा उनमें से कितने कार्यशील, उपयोग में, मरम्मताधीन अथवा अनुपयोगी थे।
- नवजात को रेफर करने से पूर्व क्या निकटवर्ती सरकारी अस्पतालों से संपर्क स्थापित किया गया था? यदि नहीं, तो उसके कारण।
- संबंधित अधिकारी/कर्मचारी के विरुद्ध की गई कार्रवाई तथा अतिरिक्त नवजात वेंटिलेटर स्थापित किए जाने की वर्तमान स्थिति।
(vi) जिला चिकित्सा लापरवाही बोर्ड, हिसार
- बोर्ड द्वारा की जा रही जांच की वर्तमान स्थिति।
- अब तक के प्रारंभिक निष्कर्ष।
- क्या किसी प्रकार की चिकित्सीय लापरवाही, संचार विफलता अथवा प्रशासनिक त्रुटि पाई गई है? यदि हाँ, तो उसके लिए उत्तरदायी अधिकारियों का विवरण।
आयोग के असिस्टेंट रजिस्ट्रार डॉक्टर पुनीत अरोड़ा ने बताया कि ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपनी विस्तृत रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम-से-कम एक सप्ताह पूर्व आयोग के समक्ष प्रस्तुत करें। मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

