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Gulmarg Gondola Incident : बारिश, डर और इंतजार... गुलमर्ग रोपवे हादसे ने दहला दिया दिल, 5 घंटे तक आसमान में फंसे रहे 300 पर्यटक

पीने के लिए पानी तक नहीं मिला... गुलमर्ग रोपवे के यात्रियों ने बयां किया दर्दनाक अनुभव

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Gulmarg Gondola Incident : धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर के खूबसूरत पर्यटन स्थल गुलमर्ग में उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एशिया के सबसे प्रसिद्ध रोपवे प्रोजेक्ट्स में से एक गुलमर्ग गोंडोला अचानक तकनीकी खराबी का शिकार हो गया। एक महत्वपूर्ण पुर्जा टूटने के बाद पूरा सिस्टम ठप हो गया और दर्जनों केबिन हवा में ही रुक गए। कुछ ही मिनटों में सैर-सपाटे का रोमांच डरावने अनुभव में बदल गया।

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हवा में अटके 300 पर्यटक

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हादसे के समय रोपवे के 62 केबिन संचालित हो रहे थे, जिनमें करीब 300 पर्यटक सवार थे। जैसे ही सिस्टम रुका, सभी केबिन बीच रास्ते में ठहर गए। सैकड़ों फीट ऊंचाई पर लटके यात्रियों के लिए हर गुजरता मिनट चिंता और डर बढ़ाने वाला था। कई लोग अपने परिवारों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे, जबकि कुछ दहशत में मदद के लिए पुकार रहे थे।

साढ़े चार घंटे का भयावह इंतजार

केबिनों में फंसे लोगों के लिए यह समय किसी परीक्षा से कम नहीं था। एक पर्यटक ने बताया कि वह दोपहर से लेकर शाम तक करीब साढ़े चार घंटे हवा में लटका रहा। कई यात्रियों के पास पानी तक नहीं था। बंद केबिनों में बैठे बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं लगातार घबराहट का सामना कर रहे थे। बारिश और खराब मौसम ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं।

सेना बनी देवदूत

स्थिति गंभीर होने पर सेना और बचाव दल को तुरंत बुलाया गया। जवानों ने जोखिम उठाते हुए केबल पर चढ़कर यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाला। कई विदेशी पर्यटकों ने सेना के साहस और पेशेवर रेस्क्यू ऑपरेशन की सराहना की। हालांकि इस दौरान उन्हें जिस मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा, उसे वे आसानी से नहीं भूल पाएंगे।

विदेशी पर्यटकों का टूटा भरोसा

ऑस्ट्रेलिया से आई एक महिला पर्यटक ने बताया कि वह करीब पांच घंटे तक केबिन में फंसी रही। उन्होंने कहा कि यह अनुभव बेहद डरावना था। कुछ पर्यटक इतने परेशान हो गए कि उन्होंने भविष्य में दोबारा कश्मीर नहीं आने की बात तक कह दी। कई यात्रियों के कपड़ों पर लगा कीचड़ और चेहरे पर दिख रहा डर उनकी तकलीफ साफ बयां कर रहा था।

अब उठ रहे हैं बड़े सवाल

इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा व्यवस्था पर खड़ा हो गया है। आखिर दुनिया के सबसे ऊंचे और चर्चित रोपवे सिस्टम में ऐसी तकनीकी खराबी कैसे आई? क्या नियमित रखरखाव में कोई चूक हुई? और सबसे अहम, आपात स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक योजना क्यों मौजूद नहीं थी? इन सवालों के जवाब अब प्रशासन और संबंधित एजेंसियों को देने होंगे, ताकि भविष्य में किसी पर्यटक को ऐसा खौफनाक अनुभव न झेलना पड़े।

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