खेतां विच फिक्की पई सरकारी त्यारी, कणक-झोने दा मोह न छुट्टया!
लोकसभा में हरसिमरत बादल के प्रश्न पर केंद्र का जवाब- पंजाब में धान का रकबा बढ़ा, वैकल्पिक फसलें और सिमटीं
पंजाब के खेतों में ‘कणक-झोने’ (गेहूं-धान) की जोड़ी का दबदबा बरकरार है। फसल विविधीकरण के नाम पर वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, किसानों को नयी फसलों के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है और लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन खेतों की तस्वीर अब भी बहुत नहीं बदली।
लोकसभा में केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है कि पिछले पांच वर्षों में पंजाब में धान का रकबा और बढ़ा है, जबकि मक्का, दलहन, तिलहन जैसी वैकल्पिक फसलें सिमट गई हैं। सरकार ने यह भी माना कि लगातार एक ही फसल चक्र अपनाने का असर अब ‘धरती मां’ की सेहत पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
यह जानकारी केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल के प्रश्न के लिखित जवाब में दी। जवाब से साफ संकेत मिलता है कि फसल विविधीकरण की सरकारी मुहिम अभी किसानों का भरोसा जीतने में सफल नहीं हो सकी है।
सरकार द्वारा लोकसभा में रखे गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021-22 में पंजाब में धान का रकबा 29.69 लाख हेक्टेयर था, जो 2025-26 में बढ़कर 32.68 लाख हेक्टेयर पहुंच गया। इसके विपरीत, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी वैकल्पिक फसलों की हिस्सेदारी 8.6 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत रह गई। फल एवं सब्जियों का रकबा जरूर कुछ बढ़ा है, लेकिन राज्य की खेती अब भी मुख्य रूप से ‘कणक-झोने’ के इर्द-गिर्द ही घूम रही है।
किसान का भरोसा जीतना बड़ी चुनौती :
केंद्र के जवाब से यह भी स्पष्ट होता है कि पंजाब में चुनौती केवल नयी फसलें उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि किसान का भरोसा जीतने की है। धान और गेहूं की सरकारी खरीद, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी और तैयार बाजार आज भी किसानों के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प बने हुए हैं। यही वजह है कि वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने की तमाम कोशिशों के बावजूद उनका रकबा बढ़ने के बजाय घटता गया।
‘धरती मां’ भी देने लगी संकेत
कृषि मंत्रालय ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के दीर्घकालिक अध्ययनों का हवाला देते हुए माना कि लगातार धान-गेहूं की खेती, एक जैसी जुताई, जैविक पदार्थों के सीमित उपयोग और फसल चक्र नहीं अपनाने से मिट्टी की संरचना, जैविक गुणवत्ता और जल धारण क्षमता प्रभावित हुई है। हालांकि, सरकार का कहना है कि दलहनी फसलों को बढ़ावा, वैज्ञानिक फसल चक्र, प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और संतुलित उर्वरक प्रबंधन से मिट्टी की सेहत को फिर बेहतर बनाया जा सकता है।
करोड़ों की मदद, लेकिन असर सीमित
केंद्र ने बताया कि वर्ष 2026-27 में फसल विविधीकरण कार्यक्रम के तहत पंजाब को 13.52 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। खरीफ मक्का को बढ़ावा देने के लिए 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की सहायता भी किसानों तक पहुंचाने का दावा किया गया है। इसके अलावा प्राकृतिक खेती, सॉयल हेल्थ कार्ड, पीएम-प्रणाम, परंपरागत कृषि विकास योजना और ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ जैसी योजनाओं पर भी काम जारी है।

