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Economic Survey 2025-26: निर्मला सीतारमण ने पेश की आर्थिक समीक्षा, आर्थिक वृद्धि दर 6.8 से 7.2% रहने का अनुमान

Economic Survey 2025-26: यह चालू वित्त वर्ष के 7.4 प्रतिशत के अनुमान से थोड़ा कम

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फोटो स्रोत संसद टीवी एक्स
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Economic Survey 2025-26: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बृहस्पतिवार को लोकसभा में वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा पेश की। उन्होंने सदन में प्रश्नकाल समाप्त होते ही सदन में आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत की। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आवश्यक कागजात प्रस्तुत कराए।

उन्होंने पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल देशों की संसद के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का भी उल्लेख किया। इसके बाद कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई। सीतारमण आगामी रविवार, एक फरवरी को वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्रीय बजट पेश करेंगी।

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संसद के वर्तमान बजट सत्र का पहला चरण बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण के साथ शुरू हुआ। सत्र का पहला चरण 13 फरवरी तक चलेगा, जिसमें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर चर्चा होगी और उसे पारित किया जाएगा। इसी चरण में केंद्रीय बजट पर भी चर्चा होगी। इसके बाद सदन की बैठक दोबारा नौ मार्च को शुरू होगी और दूसरे चरण की समाप्ति के लिए दो अप्रैल की तारीख निर्धारित की गई है।

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अमेरिका के साथ व्यापार समझौते बातचीत इस साल पूरी होने की उम्मीद

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के लिए जारी बातचीत इस वर्ष पूरी होने की उम्मीद है। इससे बाहरी मोर्चे पर अनिश्चितता कम हो सकती है। लोकसभा में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया।

बजट से पहले पेश 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत के लिए वैश्विक परिस्थितियां तात्कालिक व्यापक आर्थिक दबाव के बजाय बाहरी अनिश्चितताओं में तब्दील हो रही हैं। प्रमुख व्यापार साझेदार देशों में धीमी वृद्धि, शुल्क के कारण व्यापार बाधा और पूंजी प्रवाह में अस्थिरता समय-समय पर निर्यात और निवेशक धारणा पर असर डाल सकती है।

इसमें कहा गया, ''वैसे अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ता इस वर्ष पूरी होने की उम्मीद है, जिससे बाहरी मोर्चे पर अनिश्चितता कम हो सकती है।'' भारत और अमेरिका पिछले साल मार्च से द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। अब तक छह दौर की बातचीत हो चुकी है।

आर्थिक वृद्धि दर वित्त वर्ष 2026-27 में 6.8 से 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान

देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की वृद्धि दर अगले वित्त वर्ष 2026-27 में 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है। यह चालू वित्त वर्ष के 7.4 प्रतिशत के अनुमान से थोड़ा कम है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया है।

बजट से पहले पेश समीक्षा में कहा गया है, ''कुल मिलाकर वैश्विक अनिश्चितता के बीच वृद्धि का दृष्टिकोण मजबूत है। इसके लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है, लेकिन निराशावादी होने की जरूरत नहीं है।''

आर्थिक वृद्धि अनुमान में हाल के वर्षों में किए गए नीतिगत सुधारों के प्रभाव को ध्यान में रखा गया है। इससे अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की वृद्धि क्षमता सात प्रतिशत के करीब पहुंच गई है। इसमें कहा गया, ''घरेलू कारकों की प्रमुख भूमिका और वृहद आर्थिक स्थिरता के मजबूत होने के कारण, वृद्धि से जुड़े जोखिमों को लेकर स्थिति मोटे तौर पर संतुलित बनी हुई है।''

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में असमानता की चुनौती से जूझ रहा है इस्पात क्षेत्र

घरेलू इस्पात क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में असमानता और कच्चे माल की सुरक्षा से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बृहस्पतिवार को जारी आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश की।

सरकारी दस्तावेज के अनुसार, इस्पात क्षेत्र औद्योगीकरण एवं अवसंरचना की रीढ़ है जो भारत को विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कच्चे इस्पात का उत्पादक बनाता है। निर्माण और विनिर्माण क्षेत्रों से मजबूत घरेलू मांग से पिछले पांच वर्ष में इस क्षेत्र में व्यापक बदलाव आया है।

समीक्षा कहती है, '' हालांकि, इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मूल्य असमानता और कच्चे माल की सुरक्षा से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-अक्टूबर) के दौरान इस्पात का शुद्ध आयातक रहा जिसका मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम कीमतें रहीं। इसके चलते निर्यात पर मुनाफा कम हुआ और आयात सस्ता हुआ।''

भारत लौह अयस्क के मामले में हालांकि काफी हद तक आत्मनिर्भर है लेकिन उद्योग को आयातित कोकिंग कोयले पर गंभीर निर्भरता का सामना करना पड़ता है। वैश्विक आपूर्ति जोखिमों को कम करने के लिए कोयला मंत्रालय ने 2022 में मिशन कोकिंग कोल की शुरुआत की। इसका उद्देश्य 2030 तक घरेलू कच्चे कोकिंग कोयले के उत्पादन को बढ़ाकर 14 करोड़ टन करना था।

विशेष इस्पात के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भी 2021 में 6,322 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ शुरू की गई ताकि इस क्षेत्र की वृद्धि को बनाए रखा जा सके और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सके। अक्टूबर, 2025 तक पीएलआई योजना के तहत संचयी निवेश 23,022 करोड़ रुपये तक पहुंच गया जिसमें 23.4 लाख टन विशेष इस्पात का उत्पादन हुआ। वित्त वर्ष 2025-26 में, कच्चे इस्पात उत्पादन में सालाना आधार पर 11.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि तैयार इस्पात उत्पादन 10.8 प्रतिशत बढ़ा। साथ ही खपत में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

भारत में बने वाहनों की वैश्विक बाजार में बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है निर्यात वृद्धि

वाहनों के निर्यात में तेज वृद्धि वैश्विक बाजारों में भारत में निर्मित वाहनों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है। बृहस्पतिवार को संसद में पेश वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई है। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान यात्री वाहन, वाणिज्यिक वाहन, दोपहिया और तिपहिया श्रेणियों को मिलाकर 53 लाख से अधिक वाहनों का निर्यात किया गया।

इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में भी वाहन निर्यात में दहाई अंक में वृद्धि दर्ज की गई। इसमें कहा गया है कि कोविड महामारी के बाद मांग पक्ष में मजबूत सुधार देखने को मिला है, जिससे वाहनों का उत्पादन और बिक्री दोनों में वृद्धि हुई है।

पिछले एक दशक यानी वित्त वर्ष 2014-15 से 2024-25 के दौरान वाहन उद्योग में लगभग 33 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि दर्ज की गई है। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, व्यापक विनिर्माण आधार और मजबूत वाहन कलपुर्जा परिवेश के समर्थन से यह उद्योग प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से तीन करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है और देश के कुल जीएसटी संग्रह में भी करीब 15 प्रतिशत योगदान करता है।

इसके मुताबिक, वाहन उद्योग भारत की आर्थिक वृद्धि का एक प्रमुख चालक बना हुआ है। भारत दोपहिया एवं तिपहिया वाहनों का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है जबकि यात्री एवं वाणिज्यिक वाहनों के मामले में वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा बाजार है।

आर्थिक समीक्षा कहती है कि वाहन और वाहन कलपुर्जा उद्योग के लिए 'उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन' (पीएलआई) योजना, उन्नत रसायन सेल (एसीसी) बैटरी भंडारण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम, पीएम ई-ड्राइव योजना और पीएम ई-बस सेवा–पेमेंट सिक्योरिटी मैकेनिज्म (पीएसएम) जैसी सरकारी पहल से हाल के वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के पंजीकरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अलावा समीक्षा कहती है कि मार्च, 2024 में अधिसूचित भारत में इलेक्ट्रिक यात्री कारों के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना (एसएमईसी) भी इस क्षेत्र की वृद्धि में मददगार बन रही है।

कृषि क्षेत्र वृद्धि के बावजूद जलवायु एवं जल संबंधी चुनौतियों का कर रहा है सामना

भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने में कृषि क्षेत्र की अहम भूमिका रहेगी। हालांकि यह क्षेत्र हाल की वृद्धि के बावजूद स्थिरता एवं उत्पादकता संबंधी महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दोनों सदनों में वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा पेश की। समीक्षा में उर्वरक क्षेत्र में सुधार, शोध एवं विकास को बढ़ावा देने, सिंचाई प्रणालियों को मजबूत करने और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने सहित प्रमुख सुधारों का आह्वान किया गया। इसमें कहा गया है कि कृषि और उससे संबंधित गतिविधियां राष्ट्रीय आय में लगभग एक-पांचवां हिस्सा योगदान करती हैं लेकिन कार्यबल का 46.1 प्रतिशत हिस्सा इन गतिविधियों में संलग्न है। इस तरह यह क्षेत्र देश के समग्र वृद्धि पथ के केंद्र में है। स्थिर कीमतों पर पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र ने औसतन 4.4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है जिसमें पशुधन एवं मत्स्य पालन का योगदान सबसे अधिक रहा है।

वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा गया, ''कृषि क्षेत्र विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने, समावेशी विकास को गति देने और लाखों लोगों की आजीविका में सुधार लाने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।''

हालांकि इसमें आगाह किया गया है कि जलवायु परिवर्तन से कई गंभीर चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं जिनमें अनियमित मौसम, बढ़ते तापमान और फसल उपज को प्रभावित करने वाली प्रतिकूल घटनाएं शामिल हैं। मानसूनी बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में पानी की कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। भारत की कृषि वृद्धि दर वैश्विक औसत 2.9 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके बावजूद अनाज, मक्का, सोयाबीन और दालों सहित कई फसलों की पैदावार वैश्विक औसत से कम है

। सकल सिंचित क्षेत्र 2001-02 में कुल फसल क्षेत्र का 41.7 प्रतिशत था जो बढ़कर 2022-23 में 55.8 प्रतिशत हो गया। लेकिन राज्यों तथा फसलों के बीच सिंचाई 'कवरेज' में काफी अंतर बना हुआ है जहां सिंचाई 'कवरेज' बाजरा के लिए 15 प्रतिशत से कम और चावल के लिए करीब 67 प्रतिशत तक है।

सरकार ने ऋण एवं प्रौद्योगिकी तक पहुंच बढ़ाने के लिए सहकारी समितियों और किसान-उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को मजबूत किया है। डिजिटल कृषि मिशन और ई-एनएएम मंच जैसी डिजिटल पहल पारदर्शिता बढ़ा रही हैं। समीक्षा में कहा गया, ''फिर भी, छोटा भू-स्वामित्व, जलवायु जोखिम, उत्पादकता में अंतर और कमजोर बाजार एकीकरण जैसी संरचनात्मक चुनौतियां कृषि आय पर लगातार दबाव डाल रही हैं।''

इसमें कहा गया है कि भविष्य में व्यापक सुधारों, जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने, किसान संगठनों को सशक्त बनाने, बाजार एवं लॉजिस्टिक व्यवस्था में सुधार करने और जोखिम प्रबंधन को बढ़ाने की आवश्यकता है। समीक्षा में कहा गया है कि निरंतर निवेश एवं नवाचार के साथ कृषि क्षेत्र अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी और आय बढ़ाने वाला क्षेत्र बन सकता है। खाद्य प्रसंस्करण, शीत भंडारण और उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मजबूत करना घरेलू एवं निर्यात बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए महत्वपूर्ण होगा।

इसमें कहा गया कि बागवानी, कृषि वानिकी, दुग्ध, मुर्गी पालन और मत्स्य पालन जैसे उच्च वृद्धि वाले क्षेत्रों का विस्तार खासकर ग्रामीण समुदायों के लिए समावेशी आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन को अधिक बढ़ावा दे सकता है। आर्थिक समीक्षा कहती है कि हाल की प्रगति के बावजूद दुग्ध क्षेत्र को चारे एवं पशु आहार की कमी का सामना करना पड़ रहा है जबकि मत्स्य पालन क्षेत्र को निर्यात पर निर्भरता कम करने के लिए मूल्यवर्धन एवं प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार करने की जरूरत है।

मुक्त व्यापार समझौते भारत की व्यापार रणनीति के लिए मददगार

पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा किए गए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का बढ़ता नेटवर्क वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विश्वसनीय बाजार पहुंच प्रदान कर देश की व्यापार रणनीति को मजबूती दे रहा है। बृहस्पतिवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2025-26 में यह बात कही गई।

समीक्षा के अनुसार, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत के व्यापार प्रदर्शन की गति को बनाए रखने के लिए देश सक्रिय रूप से एक विविधीकृत व्यापार रणनीति पर काम कर रहा है। भारत ने ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड, यूरोपीय संघ (ईयू), ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) सहित विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। संसद में पेश दस्तावेज में कहा गया, ''एफटीए का विस्तार वैश्विक अनिश्चितता के दौर में विश्वसनीय बाजार पहुंच प्रदान कर भारत की व्यापार रणनीति का समर्थन करता है।''

समीक्षा में कहा गया कि ये समझौते निर्यात-केंद्रित कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) में बेहतर तरीके से एकीकृत होने में सक्षम बनाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ''इसके अलावा, घरेलू कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का मंच उपलब्ध कराकर एफटीए निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करते हैं। इससे कंपनियां केवल रियायतों पर निर्भर रहने के बजाय उत्पादकता और विश्वसनीयता को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित होती हैं।''

निर्यात मोर्चे पर बार-बार नीतियों में बदलाव से आपूर्ति व्यवस्था होती है बाधित

कृषि निर्यात में व्यापार नीति का उपयोग कीमतों और उत्पादन में अस्थिरता के बीच अल्पकालिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है, लेकिन बार-बार नीतिगत बदलाव आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करते हैं, अनिश्चितता पैदा करते हैं, विदेशी खरीदारों को दूसरे जगह ले जाते हैं और खोए हुए निर्यात बाजारों को पुनः प्राप्त करना कठिन बना देते हैं। बृहस्पतिवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया है।

वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि कृषि निर्यात खाद्य सुरक्षा, प्रसंस्करण सुविधाओं, बुनियादी ढांचे की बाधाओं और विभिन्न नियमों सहित आपूर्ति-पक्ष के कई कारकों से प्रभावित होते हैं। हालांकि, घरेलू कीमतों और कुछ वस्तुओं के उत्पादन में अस्थिरता को देखते हुए, व्यापार नीति का उपयोग प्राय: अल्पकालिक घरेलू उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है। इसमें निर्यात प्रतिबंध या न्यूनतम निर्यात मूल्य जैसे उत्पाद-आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना शामिल है।

इसमें कहा गया है कि हालांकि ये उपाय अस्थायी रूप से घरेलू कीमतों में स्थिरता ला सकते हैं, लेकिन इनसे दीर्घकालिक रूप से साख को नुकसान होने का खतरा है। इसका कारण भारत को व्यापक रूप से उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों का प्रमुख स्रोत के रूप में माना जाता है। समीक्षा के अनुसार, ''बार-बार नीतिगत बदलाव निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं को काफी हद तक बाधित कर सकते हैं, बाजार में अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं और विदेशी खरीदारों को अन्य स्रोतों की ओर रुख करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। एक बार खोए हुए निर्यात बाजारों को आसानी से वापस नहीं पाया जा सकता।''

अनुमान के अनुसार, देश में अगले चार वर्षों में कृषि, समुद्री उत्पादों और खाद्य एवं पेय पदार्थों के संयुक्त निर्यात का आंकड़ा 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की क्षमता है। समीक्षा कहती है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से आवश्यक खाद्य पदार्थों का रियायती वितरण, बफर स्टॉक का प्रबंधन और मुक्त बाजार बिक्री योजना के माध्यम से बाजार में हस्तक्षेप जैसे उपाय घरेलू बाजार में उचित कीमतों पर कृषि उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध नीतिगत विकल्प हैं।

घरेलू उपलब्धता और कीमतों को स्थिर रखते हुए किसानों को बेहतर आय के लिए वैश्विक बाजारों का लाभ उठाने में सक्षम बनाना संभव है। घरेलू मांग को पूरा करने और निर्यात क्षमता का उपयोग करने के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखते हुए, कृषि उत्पादन में भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियां निर्यात-आधारित वृद्धि में तब्दील हो सकती हैं। इससे देश कृषि निर्यात में 100 अरब अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य हासिल कर सकता है।

इसमें कहा गया, ''बढ़ती अर्थव्यवस्था की आयात आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारत को निर्यात आय बढ़ाने के सभी अवसरों का पता लगाना चाहिए। कृषि निर्यात ऐसा क्षेत्र है जिसमें काफी संभावनाएं हैं और इसे बढ़ाना भी आसान है।'' समीक्षा के अनुसार, इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलती है और नीतियों को इस अनिवार्यता के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।

राज्यसभा में रखी गयी आर्थिक समीक्षा, बैठक रविवार तक के लिए स्थगित

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बृहस्पतिवार को राज्यसभा में आर्थिक समीक्षा 2025-26 की प्रति पटल पर रखी और इसके बाद उच्च सदन की बैठक रविवार तक के लिए स्थगित कर दी गयी। वित्त मंत्री सीतारमण ने उच्च सदन में प्रश्नकाल समाप्त होने के ठीक बाद आसन की अनुमति से आर्थिक समीक्षा की प्रति पटल पर रखी।

इससे पहले, वह दोपहर बारह बजे लोकसभा में आर्थिक समीक्षा पेश कर चुकी थीं। आर्थिक समीक्षा सरकार द्वारा पेश वह महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है जिसमें देश के लगभग हर आर्थिक मोर्चे की बारीक समीक्षा कर आगामी वर्ष में उसके विकास और उसके समक्ष आने वाली चुनौतियों को पेश किया जाता है।

उच्च सदन में आज शून्यकाल और प्रश्नकाल के दौरान सामान्य ढंग से कामकाज हुआ। वित्त मंत्री द्वारा आर्थिक समीक्षा रखे जाने के बाद सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदन की बैठक को रविवार को लोकसभा में आम बजट पेश किए जाने के एक घंटे बाद तक के लिए स्थगित कर दिया। वित्त मंत्री सीतारमण एक फरवरी को लोकसभा में आम बजट 2026-27 पेश करेंगी और उस दिन लोकसभा स्थगित होने के एक घंटे बाद राज्यसभा में इसकी प्रति सदन के पटल पर रखी जाएगी।

मांडविया का दावा- बीते एक साल में 2.22 करोड़ लोगों को रोजगार मिला

सरकार ने बृहस्पतिवार को बताया कि पिछले एक साल में 18 हजार रोजगार मेले आयोजित किए गए हैं जिनमें कुल मिला कर 2.22 करोड़ लोगों को रोजगार दिए गए। श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने राज्यसभा में यह जानकारी दी।

उन्होंने प्रश्नकाल के दौरान भाजपा सदस्य भीम सिंह के पूरक प्रश्न के उत्तर में बताया कि सरकार युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया ''पिछले एक साल में 18 हजार रोजगार मेले आयोजित किए गए हैं जिनमें कुल मिला कर 2.22 करोड़ लोगों को रोजगार दिए गए। इनमें से 11 लाख 39 हजार लोगों को सरकारी नौकरी दी गई है।'' एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि देश में बेरोजगारी घट रही है तथा रोजगार बढ़े हैं।

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