Delhi Riots Case : जमानत नियम है, जेल अपवाद... UAPA पर SC टिप्पणी, कहा- छोटी बेंच नहीं कर सकती बड़े फैसले की अनदेखी
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करने के फैसले पर सवाल उठाए
Delhi Riots Case : सप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि “बेल नियम है और जेल अपवाद।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी अवधि तक जेल में बंद रहने की स्थिति में संवैधानिक अदालतें जमानत देने का अधिकार रखती हैं, भले ही UAPA की धारा 43D(5) में सख्त प्रतिबंध क्यों न हों।
न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna और Ujjal Bhuyan की पीठ ने सोमवार को यह टिप्पणी करते हुए कहा कि तीन जजों की बेंच के ‘के.ए. नजीब’ फैसले को कोई छोटी पीठ नजरअंदाज नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि न्यायिक अनुशासन यही मांग करता है कि बड़ी पीठ के फैसले का पालन किया जाए या संदेह होने पर मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाए।
दरअसल, यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत जम्मू-कश्मीर के रहने वाले सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दे रही थी, जो पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से नार्को-टेरर मामले में जेल में बंद हैं। एनआईए के अनुसार, अंद्राबी सीमा पार से हेरोइन तस्करी और उससे प्राप्त धन आतंकी संगठनों तक पहुंचाने वाले गिरोह का हिस्सा थे। उन पर NDPS Act, UAPA और आपराधिक साजिश से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
पीठ ने अप्रत्यक्ष रूप से जनवरी 2026 में आए उस फैसले पर भी सवाल उठाए, जिसमें न्यायमूर्ति Aravind Kumar और N. V. Anjaria की बेंच ने Umar Khalid और Sharjeel Imam की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। उस फैसले में अदालत ने कहा था कि आरोपियों की कथित भूमिका केवल स्थानीय घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्यापक साजिश और रणनीतिक दिशा-निर्देश से जुड़ी थी, इसलिए धारा 43D(5) की कठोर शर्तें लागू होती हैं।
हालांकि, न्यायमूर्ति भुयान ने कहा कि ‘गुलफिशा फातिमा’ मामले में की गई व्याख्या से ऐसा प्रतीत होता है मानो ‘नजीब’ फैसला केवल एक अपवाद हो, जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 21 और 22 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और UAPA की कठोरता भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।

