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Delhi Fire Accident : हवा में उड़ाए HC के आदेश, 'Stay' तो लिखा था, लेकिन बचने का रास्ता नहीं था; अग्निकांड की भयावह सच्चाई

अदालत के 7 जनवरी के आदेश का पालन नहीं किया

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राष्ट्रीय राजधानी के मालवीय नगर स्थित 'फ्लरिश स्टे बेड एंड ब्रेकफास्ट (बी एंड बी) होटल' में बुधवार को लगी भीषण आग में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई। इस घटना से लगभग पांच महीने पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने शहर के अधिकारियों को राष्ट्रीय राजधानी के होटलों, रेस्तरां और अन्य आतिथ्य प्रतिष्ठानों में अपर्याप्त अग्नि सुरक्षा उपायों की चिंताओं को तत्काल दूर करने का निर्देश दिया था।

व्यापक कार्य योजना तैयार करने की थी आवश्यकता 

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हालांकि, याचिकाकर्ता अर्पित भार्गव के अनुसार, अधिकारियों ने अभी तक अदालत के 7 जनवरी के आदेश का पालन नहीं किया है, जिसमें उन्हें इस मुद्दे को उठाने वाली जनहित याचिका की पड़ताल करने, सुरक्षा मानकों को मजबूत करने तथा आग से संबंधित घटनाओं को रोकने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार करने की आवश्यकता थी। हाल के वर्षों में शहर में हुई सबसे घातक अग्निकांडों में से एक मालवीय नगर के हौज रानी स्थित फ्लरिश स्टे होटल में लगी आग के मद्देनजर इस आदेश का महत्व और भी बढ़ गया है।

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अध्यक्ष को बार-बार पत्र भेजकर याद दिलाया

भार्गव ने दावा किया कि उन्होंने आदेश का पालन करने के लिए दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव, दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के आयुक्त और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) के अध्यक्ष को बार-बार पत्र भेजकर याद दिलाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। छह दिसंबर 2025 को गोवा के एक नाइट क्लब में लगी आग में 25 लोगों की मौत के बाद दायर अपनी जनहित याचिका में उन्होंने दावा किया था कि दिल्ली में कई प्रतिष्ठान सुरक्षा 'प्रोटोकॉल' का खुलेआम उल्लंघन करते हुए चल रहे हैं।

निर्देशों का पालन करने का आग्रह किया गया था

वकील भार्गव ने बताया कि अदालत से कार्य योजना तैयार करने के स्पष्ट निर्देश मिलने के बावजूद कोई निर्णय नहीं लिया गया है। मैंने पत्र भेजकर याद दिलाया था, जिनपर ध्यान नहीं दिया गया। पूरी तरह से उदासीनता है। अधिकारियों को आखिरी बार 5 मई को याद दिलाया गया था, जिसमें उनसे पिछले कुछ महीनों में हुई कई आगजनी की घटनाओं के मद्देनजर निर्देशों का पालन करने का आग्रह किया गया था।

उचित निर्णय लेने का आदेश दिया था

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने 7 जनवरी को याचिका के प्रतिवादियों (दिल्ली सरकार, एमसीडी और एनडीएमसी) को भार्गव की जनहित याचिका को एक अभ्यावेदन के रूप में मानने और उचित निर्णय लेने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि हम इस रिट याचिका का निपटारा इस निर्देश के साथ करते हैं कि रिट याचिका को ही याचिकाकर्ता का अभ्यावेदन माना जाए, जिस पर प्रतिवादियों द्वारा शीघ्रता से ध्यान दिया जाए और उस पर उचित निर्णय लिया जाए।

पीठ ने आदेश दिया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा इस आदेश के तहत लिया जाने वाला निर्णय नियमों/कानूनों के अनुसार होगा। इसमें मुद्दों का समाधान किया जाएगा तथा सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए एक कार्य योजना तैयार की जाएगी। हम यह प्रावधान करते हैं कि इस आदेश के तहत निर्णय शीघ्रता से लिया जाएगा। भार्गव ने हौज खास और राजौरी गार्डन जैसी जगहों का व्यक्तिगत रूप से दौरा करके होटलों, क्लबों और रेस्तरां में "अपर्याप्त और/या न के बराबर" अग्नि सुरक्षा प्रोटोकॉल के बारे में जानकारी प्राप्त की थी, जहां कई ऐसे प्रतिष्ठान संकरी गलियों में संचालित होते थे, जिनमें केवल एक ही प्रवेश/निकास द्वार होता था।

उन्होंने एक समाचार पत्र की खबर का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली में लगभग 1,000 लाइसेंस प्राप्त आतिथ्य प्रतिष्ठानों में से केवल 52 होटलों और 38 क्लबों के पास दिल्ली अग्निशमन सेवा से अग्नि सुरक्षा के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) है। भार्गव ने अपनी याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला कि किसी प्रतिष्ठान को अग्नि सुरक्षा के लिए एनओसी जारी होने के बाद वह तीन साल के लिए वैध होती है, लेकिन नियमित निरीक्षणों के अभाव में अनुमोदन के बाद होने वाले किसी भी उल्लंघन की अक्सर जांच नहीं हो पाती है।

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