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Bank Fraud Conviction: दिल्ली कोर्ट ने सात करोड़ रुपये के यूको बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में तीन को ठहराया दोषी

Bank Fraud Conviction: दिल्ली की एक अदालत ने वर्ष 2001 में जाली दस्तावेजों के आधार पर यूको बैंक से सात करोड़ रुपये का ऋण लेकर उसका दुरुपयोग करने के मामले में कपड़ा कंपनी के तीन पूर्व निदेशकों को दोषी ठहराया।...

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सांकेतिक फाइल फोटो
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Bank Fraud Conviction: दिल्ली की एक अदालत ने वर्ष 2001 में जाली दस्तावेजों के आधार पर यूको बैंक से सात करोड़ रुपये का ऋण लेकर उसका दुरुपयोग करने के मामले में कपड़ा कंपनी के तीन पूर्व निदेशकों को दोषी ठहराया। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी केवल इस आधार पर अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि उन्होंने बैंक के साथ समझौता कर लिया है।

विशेष न्यायाधीश सुधांशु कौशिक ने द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड (डीएसएल) के पूर्व निदेशक अमित चतुर्वेदी, संजय चतुर्वेदी और परवीन जुनेजा को आपराधिक साजिश रचने, धोखाधड़ी करने तथा जाली दस्तावेजों को असली बताकर इस्तेमाल करने का दोषी ठहराया। वहीं, अदालत ने यूको बैंक के पूर्व अधिकारी बिकाश बसु को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि वह साजिश में शामिल थे।

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अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि उन्होंने कोई अवैध लाभ लिया या आपराधिक मंशा से काम किया। यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा वर्ष 2009 में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। प्राथमिकी के अनुसार, आरोपियों ने वर्ष 2001 में यूको बैंक की संसद मार्ग शाखा से सात करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त करने के लिए साजिश रची थी। शुरुआत में उन्होंने दावा किया था कि यह राशि भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आईएफसीआई) के ऋण का अग्रिम भुगतान करने के लिए ली जा रही है।

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सीबीआई के अनुसार, ऋण स्वीकृत होने के बाद कंपनी के निदेशकों ने बैंक से झूठ कहा कि आईएफसीआई ने अग्रिम भुगतान लेने से इनकार कर दिया है। इसके बाद उन्होंने बैंक को यह ऋण सरकार की प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (टीयूएफएस) के तहत मशीनरी खरीद के लिए दिए जाने वाले ऋण में बदलने के लिए राजी कर लिया।

जांच एजेंसी ने बताया कि ऋण की राशि जारी कराने के लिए आरोपियों ने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) का फर्जी प्रमाणपत्र और एक फर्जी कंपनी के नाम से तैयार नकली बिल जमा किया, ताकि यह दिखाया जा सके कि नई मशीनें खरीदी और स्थापित कर दी गई हैं। सीबीआई की जांच में सामने आया कि वास्तव में कोई मशीनरी खरीदी ही नहीं गई थी और ऋण की राशि समूह की अन्य संबद्ध कंपनियों में भेज दी गई।

अदालत ने 29 जुलाई को सुनाए गए 160 पृष्ठों के फैसले में कहा, '' परिस्थितियां स्पष्ट करती हैं कि बैंक को धोखा देने की आपराधिक मंशा शुरू से ही मौजूद थी और सभी आरोपी स्वीकृत ऋण राशि को दूसरी जगह भेजने के उद्देश्य से मिलकर काम कर रहे थे।''

अदालत ने कहा, ''इस बात के पर्याप्त और ठोस साक्ष्य हैं कि आरोपियों ने बैंक के साथ धोखाधड़ी की और जारी की गई ऋण राशि का दुरुपयोग किया।''

बैंक अधिकारी बिकाश बसु को बरी करते हुए अदालत ने कहा कि उन्हें अकेले इस मामले के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, क्योंकि उनके द्वारा की गई सिफारिश का मूल्यांकन उनसे वरिष्ठ दो अन्य अधिकारियों ने भी किया था। अदालत अब इस मामले में दोषियों को दी जाने वाली सजा की अवधि पर बाद में सुनवाई करेगी।

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