महा-पंजाब में MLA रहे 105 वर्षीय सही राम बिश्नोई का निधन, बैलगाड़ी के दौर से इंटरनेट युग तक देखा
Sahi Ram Bishnoi: परिवार को रखा राजनीति से दूर, अबोहर से 5724 वोटों से रहे थे विजयी
Sahi Ram Bishnoi: देश के बंटवारे और महा-पंजाब की सियासत के चश्मदीद रहे 105 वर्षीय पूर्व विधायक सही राम बिश्नोई का निधन हो गया है। शुक्रवार सुबह 4 बजे डबवाली उपमंडल के गांव सकताखेड़ा में उन्होंने अंतिम सांस ली। 1957 में जनसंघ के टिकट पर अबोहर से चुनाव जीतकर वे पंजाब विधानसभा पहुंचने वाले बिश्नोई समाज के पहले विधायक थे। इस चुनाव में उन्होंने श्री ख्याली को 5724 वोटों के अंतर से हराया था।
सही राम बिश्नोई का जन्म 12 जनवरी 1922 को तत्कालीन संयुक्त भारत (अब पाकिस्तान) की बहावलनगर रियासत के तालिया गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्टेट हाई स्कूल, बहावलनगर से हुई और बाद में उन्होंने डी.एम. कॉलेज मोगा (फिरोजपुर) से पढ़ाई की। उन्होंने लाहौर और शिमला के लॉ कॉलेज से बी.ए., एलएल.बी. की डिग्री हासिल की थी। पंजाब विधानसभा के मुताबिक सही राम फुटबाल व बालीबाल के खिलाडी भी थे।
पढ़ाई के दौरान उन्होंने अगस्त 1947 के बंटवारे का दर्दनाक मंजर देखा। भारत आकर बसने के बाद, उन्होंने पंजाब में हिंदी भाषा के सम्मान के लिए हुए आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और तीन महीने फिरोजपुर जेल में काटे। वे सादगी पसंद, बेदाग छवि और सीधे जनता से जुड़े जमीनी नेता थे। मौजूदा राजनीति को 'गंदी' मानकर उन्होंने अपने परिवार को इससे पूरी तरह दूर रखा।
100 साल की उम्र में भी वे बिना चश्मे के अखबार पढ़ते थे और अंतिम समय तक उनकी याददाश्त बेहतरीन थी। उन्होंने बैलगाड़ी के धीमे सफर से लेकर इंटरनेट की तेज रफ्तार वाली दुनिया का बदलाव अपनी आंखों से देखा। पेशे से एक किसान होने के नाते लंबे सार्वजनिक जीवन के बावजूद वे हमेशा खेती-किसानी से जुड़े रहे और आखिरी दिनों तक अपने खेतों की देखभाल खुद करते थे।
31 जनवरी 2026 को पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के प्रतिनिधिमंडल ने गांव सकताखेड़ा आकर उन्हें ‘साइटेशन ऑफ ऑनर’ से नवाजा था। विश्वविद्यालय ने अपने सबसे वरिष्ठ जीवित पूर्व छात्र और अविभाजित पंजाब के सबसे उम्रदराज पूर्व विधायक को यह खास सम्मान दिया। 104 साल की उम्र में भी उन्होंने लाहौर और संयुक्त पंजाब की अपनी पुरानी यादें विस्तार से साझा की थीं।
उम्र का शतक पार करने के बाद भी उनमें एक विद्यार्थी व नौजवान जीवंत झलकता था। वे लैपटॉप को अंग्रेजी के लेख बड़े चाव से पढ़ते थे और कंप्यूटर सीखने की इच्छा रखते थे। वे अब भी बिना चश्मे के अखबार पढ़ते थे और अंतिम समय तक उनकी याददाश्त बेहतरीन थी। उन्होंने बैलगाड़ी के धीमे सफर से लेकर इंटरनेट की तेज रफ्तार वाली दुनिया का बदलाव अपनी आंखों से देखा। लंबे जीवन में वे हमेशा खेतीबाड़ी से जुड़े रहे और आखिरी दिनों तक अपने खेतों की देखभाल खुद करते थे।
बंटवारे का दर्द हमेशा बना रहा
भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दर्द उनके मन में ता-उम्र रहा। बंटवारे के वक्त पाकिस्तान में उनकी करीब 5000 बीघा ज़मीन छूट गई थी। इसके बदले जब भारत में ज़मीन अलॉटमेंट का आखिरी चरण आया, तो उनके परिवार को गांव सकताखेड़ा में केवल 500 बीघा अर्थात सिर्फ 10 प्रतिशत ज़मीन ही मिल पाई।
'अखंड भारत' की चाहत रही ‘कायम’
फरवरी 2022 की अबोहर रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच पर एडवोकेट सही राम से आशीर्वाद लिया था। बंटवारे का दर्द उनके जेहन में हमेशा ताजा रहा। उनके भीतर 'अखंड भारत' की तस्वीर हमेशा जीवित रही। उन्होंने मीडिया व मंत्रियों के जरिए पीएम मोदी तक अपना यह सीधा संदेश पहुंचाया था कि ‘पाकिस्तान वाला बॉर्डर हटा दो और भारत को एक कर दो।‘
