खुरदुरे किरदार जिन्होंने दिल जीता!

खुरदुरे किरदार जिन्होंने दिल जीता!

अब न तो मोगेम्बो का वजूद बचा, न बेडमैन का और न डॉ. डेंग जैसा चेहरा ही परदे पर नजर आया। अब नायक और खलनायक में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रहा! खलनायक 'ग्रे-कैरेक्टर' में बदल गया। यह बदलाव अब कई फिल्मों में दिखा। पर, ऐसे प्रयोग पहले भी हुए, जब कहानी में नायक की भूमिका को खलनायक की तरह रचा गया! लेकिन, फिर भी उस पात्र के साथ दर्शकों की सहानुभूति बनी रही।

हेमंत पाल

फिल्मों में खलनायक का तात्पर्य होता है, ऐसा किरदार जो पूरी फिल्म में नायक के खिलाफ होता है और हर तरह से उसको नुकसान पहुंचाता है। उसमें मानवता नहीं होती और वह जुल्म, ज्यादती का पर्याय होता है। लेकिन, सिनेमा की दुनिया में बीते सालों में जो बदलाव आया उसने कई जिन धारणाओं को खंडित किया उसमें खलनायक की बदली पहचान भी है। खलनायक किसी भी फिल्म का अहम हिस्सा होते हैं! फिल्मों का जो खलपात्र अपनी जिस क्रूरता और शातिराना अंदाज के लिए पहचाना जाता था, वह फिल्मों से लगभग गायब हो गया! किसी फिल्म में खलनायक होता भी है, तो उसके चेहरे पर न तो क्रूरता के भाव होते हैं और न आंखों में वो अंदाज जो उसके खलनायक होने की पहचान होता है। बीते एक दशक में फिल्मों में यह बदलाव तेजी से दिखाई दिया। अब न तो मोगेम्बो का वजूद बचा, न बेडमैन का और न डॉ़ डेंग जैसा चेहरा ही परदे पर नजर आया। अब नायक और खलनायक में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रहा! खलनायक वास्तव में 'ग्रे-कैरेक्टर' में बदल गया। ये बदलाव अब कई फिल्मों में दिखाई देने लगा! पर, ऐसे प्रयोग पहले भी हुए, जब कहानी में नायक की भूमिका को खलनायक की तरह रचा गया! लेकिन, फिर भी उस पात्र के साथ दर्शकों की सहानुभूति बनी रही।

ज्ञान मुखर्जी निर्देशित 'किस्मत' (1943) ऐसी ही फिल्म थी, जिसमें हीरो अशोक कुमार का किरदार खलनायक की तरह था। शायद यह पहली ऐसी हिंदी फिल्म थी, जो खलनायक प्रधान बनी। यह एक युवा चोर की कहानी थी जिसमें अशोक कुमार का किरदार 'शेखर' का था, जो चोर-बदमाश था। लेकिन, सामाजिक रूप से अस्वीकार्य होने पर भी वह दया, करुणा, प्रेम और मित्रता की मिसाल होता है। यह पहली ऐसी फिल्म थी जिसने एक करोड़ की कमाई की थी। यह फिल्म लगातार तीन साल तक थिएटर पर लगी रहने वाली भी पहली फिल्म थी। 1957 में आई 'मदर इंडिया' भी एंटी-हीरो फिल्म ही मानी जाएगी। इसमें सुनील दत्त की भूमिका नकारात्मक जरूर थी, पर उन्होंने दर्शकों का दिल जीत लिया था। वे डाकू जरूर थे, पर गरीबों के मसीहा भी थे। बाद में सुनील दत्त ने 36 घंटे (1974) और मुझे जीने दो (1963) में भी ऐसे ही निगेटिव कैरेक्टर निभाए।

'गंगा जमुना' (1961) भी ऐसी ही फिल्म थी, जिसमें दिलीप कुमार ने दो भाइयों की अपराध के खिलाफ लड़ने की प्रवृत्ति को उबारा था। दिलीप कुमार ने गंगा की भूमिका की थी, जो अन्याय का खात्मा करता है। उसका भाई जमुना पुलिस में रहता है। दोनों भाइयों के बीच टकराव भी होता है। लेकिन, कहानी में डाकू बना पात्र दर्शकों को ज्यादा प्रभावित करता है। कुछ इसी तरह की कहानी 'दीवार' में थी, जिसमें अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार को जीवंतता से निभाया था। कुछ ऐसा ही रमेश सिप्पी की 'शोले' (1975) में भी था। ये भले ही क्रूर डाकू गब्बर सिंह के आतंक की कहानी हो, पर दर्शकों को यही डाकू ज्यादा याद रहा। जय और वीरू बने अमिताभ और धर्मेंद्र उसके बाद याद आते हैं। फिल्म में गब्बर सिंह वो खलनायक था, जिसने दो नायकों को उबारने में पूरी मदद की। क्योंकि, खलनायक ही वो किरदार होता है, जो नायक को नायक बनाता है। 1978 में आई 'डॉन' में भी अमिताभ बच्चन ने अंडरवर्ल्ड डॉन की नकारात्मक भूमिका निभाई और यह अमिताभ की सबसे सफल फिल्मों में एक है। फिल्मों में सामान्यतः यह खलनायक वाला किरदार है, पर 'डॉन' में यह नायक ने निभाया। बाद में इसका रीमेक भी बना। इसमें अमिताभ वाला रोल शाहरुख खान ने अदा किया। अमरीश पुरी अपने समय काल के सबसे सफल खलनायक रहे हैं। उनकी भारी संवाद अदायगी और आंखों से टपकती क्रूरता का अपना अलग ही अंदाज था। लेकिन, 'मिस्टर इंडिया' (1987) में उनका मोगेम्बो वाला पात्र बेहद दिलचस्प था। खलनायक होते हुए दर्शकों को उस पर कभी गुस्सा नहीं आया। उनका एक डायलॉग 'मोगेम्बो खुश हुआ' बरसों तक बच्चे-बच्चे की जुबान पर रहा।

कौन भूल सकता है लंगड़े त्यागी को!

रामगोपाल वर्मा की बेहतरीन फिल्मों में 'सत्या' (1998) को गिना जाता है। इस फिल्म में संगठित अपराधों की कहानी थी। फिल्म का कथानक सौरभ शुक्ला और अनुराग कश्यप ने लिखा था। इसमें मनोज बाजपेयी ने भीखू म्हात्रे का किरदार निभाया था। एक अपराधी किरदार होते हुए भी भीखू म्हात्रे से दर्शकों को सहानुभूति होती है। 2006 में आई विशाल भारद्वाज की फिल्म 'ओंकारा' को आज भी दर्शक जिस किरदार की वजह से याद करते हैं, वो था ईश्वर त्यागी उर्फ ’लंगड़ा त्यागी' जिसने अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया था। सैफ अली खान ने इस किरदार को बखूबी निभाया था। शाहिद कपूर की फिल्म 'कमीने' (2009) भी ऐसी ही फिल्म थी जिसमें जुड़वां बच्चों में होने वाला मुकाबला बताया गया था। शाहिद ने फिल्म में नकारात्मक किरदार निभाया था। फिल्म में यथार्थवादी किरदारों की सराहना की गई और बताया गया था कि अच्छाई और बुराई का कोई अंत नहीं होता! इन दोनों के बीच के अंतर को समझा जाना जरूरी है।

याद रखने योग्य ये नकारात्मक किरदार

2012 में प्रदर्शित फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की तुलना अक्सर 'ओंकारा' से की जाती है। एक बड़े दर्शक वर्ग ने इस फिल्म को बेहद पसंद किया था। इसमें मनोज बाजपेयी ने खलनायक सरकार खान का रोल निभाया था। फिल्म में यह ऐसा किरदार है, जिससे दर्शकों ने नफरत नहीं की। शेक्सपियर की कृति 'हेमलेट' के जीवन पर बनी फिल्म हैदर (2014) में शाहिद कपूर की भूमिका को भी नायक जैसा नहीं कहा जा सकता। इसमें हैदर (शाहिद कपूर) एक ऐसा व्यक्ति है, जो अपने पिता की तलाश में निकलता है और अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। फिल्म देखते हुए कभी महसूस नहीं होता कि हैदर का किरदार नकारात्मक है। कुछ ऐसा ही 'पद्मावत' देखते हुए दर्शकों को खिलजी (रणवीर सिंह) को देखकर लगा। खिलजी के क्रूर किरदार से दर्शकों को लगाव सा हो जाता है। शाहरुख खान ने भी बाजीगर, डर और 'अंजाम' जैसी फिल्मों में जो किरदार निभाए, वो खलनायक जैसे ही थे। 1993 में बनी 'डर' एक थ्रिलर प्रेम कहानी थी। इसमें शाहरुख ने पागल प्रेमी का किरदार निभाया था। जूही चावला के लिए शाहरुख ने जो पागलपन दिखाया, उसे देखकर दर्शकों को गुस्सा नहीं आया, बल्कि सहानुभूति हुई। ऐसे ही 1994 की फिल्म 'अंजाम' गलती के अंजाम पर केंद्रित है। यह फिल्म महिलाओं पर किए अत्याचारों पर बनी थी। इसमें भी शाहरुख ने नकारात्मक किरदार निभाया था, जिसके लिए उन्हें भी फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। वैसे शाहरुख खान ने 'डुप्लीकेट' में भी निगेटिव किरदार ही निभाया था। 

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