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कभी नाव से नदी पार करते थे भगवान जगन्नाथ... 3 नहीं, 6 रथों से पूरी होती थी यात्रा; फिर कहां गायब हो गई मालिनी नदी

जगन्नाथ रथ यात्रा की वह कहानी जो कम लोग जानते हैं

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Jagannath Malini River : हर साल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर तक भव्य यात्रा करते हैं। पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे भव्य धार्मिक आयोजनों में शामिल है। मगर, बहुत कम लोग जानते हैं कि सदियों पहले यह यात्रा एक ही बार में पूरी नहीं हो पाती थी। उस समय श्रीमंदिर और गुंडीचा मंदिर के बीच बहने वाली मालिनी नदी इस यात्रा में सबसे बड़ी बाधा बनती थी।

नदी पार करने के लिए बदलने पड़ते थे रथ

प्राचीन परंपराओं के अनुसार, भगवान के तीनों रथ पहले मालिनी नदी के किनारे तक पहुंचते थे। इसके बाद विग्रहों को पूरी श्रद्धा के साथ रथों से उतारकर खास नावों के जरिए नदी पार कराई जाती थी। दूसरी ओर पहले से तीन नए रथ तैयार रहते थे, जिन पर विराजमान होकर भगवान आगे गुंडीचा मंदिर तक पहुंचते थे। उस समय पूरी रथ यात्रा तीन नहीं, बल्कि 6 रथों पर पूरी होती थी।

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रानी शारदा देवी के सपने ने बदल दी परंपरा

लोककथाओं के मुताबिक, 13वीं शताब्दी में गजपति राजा नरसिंह देव की पत्नी रानी शारदा देवी को स्वप्न में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए। कहा जाता है कि भगवान ने बिना किसी रुकावट के सीधे गुंडीचा मंदिर पहुंचने की इच्छा जताई। इसके बाद रानी ने मालिनी नदी का मार्ग बंद कराने का संकल्प लिया।

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रानी ने श्रद्धालुओं से कहा कि जो भी इस नदी को भरने में मदद करेगा उसे अच्छा ईनाम दिया जाएगा। इसके बाद हजारों श्रद्धालुओं ने नदी को भरने के लिए उसमें रेत डालनी शुरु कर दी लेकिन सारी रेत नदी के साथ बह जाती थी। इसके बाद दोबारा रानी के सपने में आए और कहा कि नदी किसी ईनाम के लालच नहीं बल्कि सच्ची भक्ति से भरेगी। इसके बाद श्रद्धालुओं ने सच्ची भक्ती से समुद्र तट से रेत लाकर नदी के मुहाने को भर दिया।

आज भी जिंदा है 'शारदा बाली' की विरासत

इसके बाद मालिनी नदी का रास्ता बंद हो गया और उसी स्थान को 'शारदा बाली' नाम मिला। 'बाली' का अर्थ रेत होता है, जबकि 'शारदा' रानी की स्मृति का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद से रथ यात्रा बिना रुके केवल तीन रथों के साथ पूरी होने लगी।

क्या कहता है वैज्ञानिक शोध?

सिर्फ धार्मिक मान्यताएं ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध ने भी पुरी की रथ यात्रा से जुड़ी प्राचीन मालिनी नदी की कहानी को सही कहा है। साल 2020 में IIT खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) और पैलियो-चैनल तकनीक की मदद से बड़ा डंडा क्षेत्र का अध्ययन किया। शोध में जमीन के नीचे करीब 128 मीटर चौड़ा प्राचीन सूखा नदी मार्ग मिलने के संकेत मिले। मिट्टी के विश्लेषण में समुद्री रेत जैसी विशेषताएं भी सामने आईं, जिससे कृत्रिम रूप से नदी भरने की संभावना जताई गई।

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