अनैतिक परिदृश्य
तीन मार्च को दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित दो लेखों ने साहित्य की शक्ति पर मेरा विश्वास सुदृढ़ किया है। क्षमा शर्मा ने अमेरिकी लेखिका फ्रीडा मैकफेडन द्वारा लिखे गए तीन उपन्यासों के आधार पर ‘अमेरिका : दादागीरी में छिपी दरिंदगी का सच’ को बखूबी उकेरा है और वहां के कथित स्वर्ग की छवि उधेड़ते हुए अपराध एवं असामाजिक-अनैतिक परिदृश्य को प्रस्तुत किया है। वहीं, ‘उलटबांसी’ में आलोक पुराणिक ने कल्पना और व्यंग्य का सहारा लेकर युद्ध के कारोबार में कार्पोरेट विज्ञापनों के जुमलों का कमाल का परिदृश्य बांधा है। आलेखों के लिए संपादकीय टीम और लेखकों को साधुवाद!
अमृतलाल मदान, कैथल
दोषमुक्ति के सवाल
बाईस फरवरी के दैनिक ट्रिब्यून के संपादकीय ‘आफत में राहत’ में दिल्ली की एक ट्रायल कोर्ट ने शराब घोटाले के मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को दोषमुक्त करार दिया। कोर्ट ने मामले में पर्याप्त सबूतों की कमी और साजिश का संदेह जताया, साथ ही अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया। भाजपा ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की है। केजरीवाल और सिसोदिया भविष्य में भाजपा पर आरोप लगाकर चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।
अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल
विश्वसनीयता पर सवाल
‘बढ़ेगी हमारी मुश्किलें’ संपादकीय दो मार्च, वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है। ईरान पर अमेरिका और इस्राइल के हमले ने छोटे देशों की संप्रभुता को असुरक्षित कर दिया है। भारत के लिए चुनौती दोहरी है—ईरान से ऊर्जा और ऐतिहासिक संबंध, साथ ही अमेरिका-इस्राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी। होर्मुज जलडमरु मार्ग में तनाव से तेल आपूर्ति और महंगाई पर असर पड़ेगा। भारत को संतुलित और हित-आधारित कूटनीति अपनानी होगी।
अमृतलाल मारू, इन्दौर, म.प्र.

