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धंसती सड़कें-दरकते पुल जिम्मेदार कौन?

जन संसद

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जन संसद की राय है कि सार्वजनिक निर्माण में भ्रष्टाचार और घटिया सामग्री का इस्तेमाल रोकने को जवाबदेही, निगरानी के साथ सख्त कार्रवाई जरूरी है।

जवाबदेही जरूरी

मानसून की बारिश जहां उम्मीद जगाती है, वहीं हमारे कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर की वास्तविकता भी सामने लाती है। हजारों करोड़ की लागत से बने एक्सप्रेस-वे का धंसना और पुलों का ढहना केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और लापरवाही का परिणाम है। ठेकेदारों की मुनाफाखोरी, राजनीतिक संरक्षण और इंजीनियरों की तकनीकी अनदेखी का गठजोड़ राष्ट्रीय संपत्ति और जनहित को नुकसान पहुंचाता है। इसे रोकने के लिए सशक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी राष्ट्रीय नियामक संस्था बनाई जानी चाहिए। निर्माण गुणवत्ता की जवाबदेही तय हो और दोषियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए, तभी जनता का पैसा और विश्वास सुरक्षित रह सकेगा।

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अमृतलाल मारू, इन्दौर, म.प्र.

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कुदरत का ऑडिट

तेज बारिश में राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेस-वे और पुलों का क्षतिग्रस्त होना सार्वजनिक निर्माण की गुणवत्ता पर कुदरत का ‘ऑडिट ऑब्जेक्शन’ है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उद्घाटन के कुछ दिनों बाद ही उन्नाव में एक्सप्रेस-वे का हिस्सा धंसना निर्माण व्यवस्था पर सवाल उठाता है। सड़कों और पुलों की विफलता के लिए केवल घटिया सामग्री या तकनीकी खामियां जिम्मेदार नहीं, बल्कि नेताओं, इंजीनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत भी कारण है। राजीव गांधी का पुराना कथन आज भी व्यवस्था में रिसाव की ओर संकेत करता है। जनधन बचाने के लिए निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, कठोर निगरानी और दोषियों की जवाबदेही आवश्यक है।

ईश्वर चंद गर्ग, कैथल

घटिया निर्माण

करोड़ों रुपये की लागत से बने हाईवे, सड़कों और पुलों का दरकना तथा धंसना मुख्यतः घटिया निर्माण सामग्री और भ्रष्टाचार का परिणाम है। ठेकेदारों से लेकर इंजीनियरों और कनिष्ठ अधिकारियों तक कमीशनखोरी तथा हेराफेरी की प्रवृत्ति निर्माण की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। इसका खमियाजा मानसून में सड़क धंसने, पुल क्षतिग्रस्त होने और दुर्घटनाओं के रूप में जनता को भुगतना पड़ता है। जान-माल की हानि के मामलों में दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और भ्रष्ट ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द किए जाने चाहिए। सरकार को ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और लोकहित को प्राथमिकता देने वाले ठेकेदारों तथा इंजीनियरों को जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

मिलीभगत का खेल

इमारतों, पुलों और एक्सप्रेस-वे का हर वर्ष धंसना घटिया सामग्री, कमजोर डिजाइन और रखरखाव की कमी को उजागर करता है। इसके पीछे केवल तकनीकी त्रुटियां नहीं, बल्कि ठेकेदारों, बिल पास करने वाले अधिकारियों और राजनीतिक स्तर तक संभावित मिलीभगत भी जिम्मेदार है। इसका परिणाम निर्माणाधीन इमारतों के गिरने, सड़कों के धंसने और दुर्घटनाओं के रूप में सामने आता है। समाधान के लिए निर्माण कार्यों की निगरानी करने वाली ईमानदार और स्वतंत्र सरकारी समितियां गठित की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार या लापरवाही के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई हो तथा बेईमान ठेकेदारों को काली सूची में डालकर भविष्य के नुकसान को रोका जाए।

शामलाल कौशल, रोहतक

कड़ी निगरानी

सड़कों और पुलों के बार-बार टूटने का प्रमुख कारण ठेकेदारों द्वारा निम्न गुणवत्ता की निर्माण सामग्री का उपयोग है, जिसमें सरकारी इंजीनियरों की मिलीभगत की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। निर्माण और मरम्मत कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र देखरेख समिति गठित की जानी चाहिए। साथ ही कानून में यह प्रावधान हो कि जिस ठेकेदार को निर्माण कार्य सौंपा गया है, उसकी लापरवाही से दुर्घटना होने पर घायलों और मृतकों के परिजनों को उचित हर्जाना देने की जिम्मेदारी उसी की हो। दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए कठोर दंड का प्रावधान ही जवाबदेही सुनिश्चित कर सकता है।

अभिलाषा गुप्ता, मोहाली

पुरस्कृत पत्र

भ्रष्टाचार की जड़ें तलाशें

सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार के लिए अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत को लेकर केंद्रीय मंत्री स्वयं चिंता जताते रहे हैं, किंतु वर्षों बाद भी इस पर प्रभावी रोक न लगना गंभीर प्रश्न है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध सत्ता में आई सरकारों की प्राथमिकताओं में अब यह मुद्दा कमजोर पड़ता दिखता है। सुधार के लिए प्रशासनिक ढांचे में आमूल-चूल बदलाव, स्वतंत्र एवं जवाबदेह निगरानी तंत्र, विशेषज्ञ समिति से टेंडरों की मंजूरी और परियोजनाओं की पूरी जानकारी व खर्च सार्वजनिक करना आवश्यक है। शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो तथा दोषी फर्मों और उनके मालिकों को काली सूची में डाला जाए। यह सब दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है।

बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उ.प्र.

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