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कला के लिए अटूट समर्पण

एकदा

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सर जोशुआ रेनॉल्ड्स 18वीं सदी के सबसे प्रभावशाली और महान चित्रकारों में से एक थे। एक बार वे अपनी कला को निखारने के लिए इटली गए। वहां उन्होंने वेटिकन में राफेल और माइकल एंजेलो की कलाकृतियों का गहन अध्ययन किया। उनकी कृतियों का अध्ययन करते समय वे अपनी सुध-बुध खो बैठते थे। वेटिकन में बहुत अधिक ठंड थी। रेनॉल्ड्स अपने काम में इतने अधिक रमे हुए थे कि उन्हें बिगड़ते मौसम और ठंड का आभास तक न हुआ। उन्हें गहरी सर्दी लग गई। इस बीमारी का उनकी श्रवण शक्ति पर गहरा असर पड़ा और उनकी सुनने की क्षमता कम हो गई। जब एक व्यक्ति ने उनसे कहा, ‘यदि आप इटली नहीं जाते, तो आपकी सुनने की क्षमता सुरक्षित रहती।’ इस पर रेनॉल्ड्स ने बड़े गर्व से उत्तर दिया— ‘यदि कला को निखारने के लिए मुझे सौ बार भी अपनी सुनने की क्षमता गंवानी पड़े, आंधी-तूफान और बर्फ का दबाव झेलना पड़े, तो मुझे स्वीकार है; मगर कला के साथ समझौता करना स्वीकार नहीं है। वहां जाकर ही मुझे चित्रों में छिपे गूढ़ अर्थ समझ आए हैं।’ कला के प्रति इसी अटूट समर्पण और उच्च मापदंडों के कारण ही वे आज भी विश्व के महानतम कलाकारों में गिने जाते हैं।

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