एसआईआर के सवाल
तीन सितंबर के विचार पृष्ठ पर प्रकाशित संपादकीय ‘एसआईआर के सवाल’ महत्वपूर्ण चिंता उठाता है। मतदाता सूची का शुद्धीकरण आवश्यक है, किंतु इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम छूटना लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए गंभीर विषय होगा। चुनाव आयोग को पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करते हुए नागरिकों को दावे-आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा अवसर देना चाहिए। मतदाता सूची तभी विश्वसनीय होगी, जब वह शुद्ध भी रहे और कोई वास्तविक मतदाता मताधिकार से वंचित भी न हो।
जयभगवान भारद्वाज, नाहड़
दूरदर्शिता का परिणाम
‘इसरो की कामयाबी’ संपादकीय के संदर्भ में कहना उचित होगा कि इसरो की यह सफलता केवल एक पड़ाव नहीं, बल्कि निरंतर परिश्रम, सही रणनीति और सामूहिक दूरदर्शिता का परिणाम है। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और प्रतिबद्धता ने इस उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त किया। संसाधनों का कुशल प्रबंधन और समयबद्ध कार्यशैली भी सराहनीय है। अब इस सफलता से मिली सीख को भविष्य की योजनाओं में शामिल कर सकारात्मक गति बनाए रखना आवश्यक है।
अमृतलाल मारू, इंदौर, म.प्र.
असुरक्षित लड़कियां
दिल्ली में चलती स्लीपर बस में एक 16 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार होना निंदनीय है। बदलते परिवेश में लड़कियों को न केवल दिन बल्कि कई बार रात को भी अकेले सफर करना पड़ता है। ऐसे में लड़कियों की सुरक्षा खतरे में है। सरकार को सार्वजनिक परिवहन वाहनों में महिलाओं को नियुक्त कर लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
अभिलाषा गुप्ता, मोहाली
मनुष्यता को न बांटें
पांच सितंबर के दैनिक ट्रिब्यून में विश्वनाथ सचदेव का लेख ‘धर्म के नाम पर न बांटने दिया जाए मनुष्यता को’ विचारोत्तेजक है। भारत की पहचान उसकी ‘अनेकता में एकता’ में है। हमारा संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र मानता है। अतः किसी भी धर्म के नाम पर नफरत फैलाना या किसी समुदाय को देश से बाहर भेजने की बात करना अनुचित है। हम सबसे पहले भारतीय हैं।
शामलाल कौशल, रोहतक

