जन संसद की राय है कि वैश्विक संकट के बीच सरकार करों में कटौती करे, नेता सादगी अपनाएं और नागरिक कार पूलिंग व सार्वजनिक परिवहन अपनाकर ईंधन की बचत में अपना योगदान दें।
तेल बचत अभियान
अमेरिका-ईरान तनाव के कारण पूरी दुनिया पेट्रोलियम संकट से जूझ रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री द्वारा पेट्रोल और डीजल बचाने की अपील पर गंभीरता से अमल करना हम सबका दायित्व है। विपक्ष को राजनीति करने के बजाय रचनात्मक सहयोग देना चाहिए। यदि विदेशों से तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो महंगाई का बोझ आम जनता पर ही पड़ेगा। डीजल महंगा होने से परिवहन तथा दैनिक वस्तुएं भी महंगी होंगी। इसलिए नागरिकों को निजी वाहनों का कम उपयोग, कार पूलिंग तथा सार्वजनिक परिवहन अपनाना चाहिए। संकट की इस घड़ी में जिम्मेदार नागरिक बनकर देशहित में ईंधन बचाना समय की मांग है।
राजेश कुमार चौहान, जालंधर
मितव्ययता की जरूरत
जब देश किसी संकट से गुजर रहा हो तो प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्रहित में योगदान दे। खाड़ी क्षेत्र के तनाव के कारण पेट्रोलियम संकट बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे समय में नेताओं और अधिकारियों को स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। सबसे अधिक ईंधन की बर्बादी बड़े काफिलों और अनावश्यक सरकारी वाहनों से होती है। यदि वे सादगी अपनाएंगे तो आम लोग भी प्रेरित होंगे। यह अभियान केवल दिखावे या फोटो तक सीमित न रहकर स्थायी आदत बनना चाहिए। सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग, अनावश्यक यात्राओं से बचाव और संयमित जीवनशैली अपनाकर ईंधन की बचत की जा सकती है। मितव्ययता जीवन को सरल, सुंदर और सुगम बनाती है।
सत्यप्रकाश गुप्ता, बलेवा (रेवाड़ी)
संकट में संयम
खाड़ी संकट की आग अब आम आदमी की जेब तक पहुंच चुकी है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से हर वस्तु की कीमत प्रभावित हुई है। इस परिस्थिति में सरकार, विपक्ष और नागरिक—तीनों का समान दायित्व है। सरकार को आम जनता को राहत देते हुए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, इथेनॉल, सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना चाहिए। विपक्ष को भी राजनीति छोड़ सकारात्मक सुझाव देने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका नागरिकों की है। यदि लोग सप्ताह में एक दिन वाहन न निकालें, छोटी दूरी पैदल तय करें, कार पूलिंग अपनाएं और ईंधन की बचत करें तो करोड़ों लीटर तेल बचाया जा सकता है। सामूहिक प्रयास ही देश को संकट से उबार सकता है।
मनोज वशिष्ठ, रेवाड़ी
जनता पर बोझ
पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ता, विशेषकर मध्यम वर्ग और गृहिणियों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता था तब कंपनियों ने भारी मुनाफा कमाया, लेकिन जनता को राहत नहीं दी गई। अब घाटे की भरपाई के लिए लगातार कीमतें बढ़ाई जा रही हैं, जिससे लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है। सरकार को चाहिए कि पेट्रोलियम उत्पादों पर करों में कटौती करे और तेल कंपनियां भी कुछ बोझ स्वयं उठाएं। वर्तमान संकट में उपभोक्ताओं को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। निजी तथा सरकारी वाहनों का सीमित उपयोग, साझा वाहन व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन अपनाकर काफी मात्रा में ईंधन बचाया जा सकता है।
अनिल कौशिक, क्योड़क (कैथल)
बचाने का दायित्व
वैश्विक पेट्रोलियम संकट को देखते हुए प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है कि वह अपने उपभोग व्यवहार में बदलाव लाकर तेल की खपत कम करे। “तेल की बचत ही तेल का उत्पादन है” इस विचार को जीवन में अपनाने की आवश्यकता है। निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, कार पूलिंग तथा अनावश्यक यात्राओं से बचाव जैसे छोटे कदम भी बड़े परिणाम दे सकते हैं। इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों तथा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देकर देश की तेल निर्भरता घटाई जा सकती है। साथ ही समाज में जागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है ताकि लोग ईंधन बचत के महत्व को समझें। विवेकपूर्ण व्यवहार से ही देश इस चुनौती का प्रभावी सामना कर सकेगा।
ईश्वर चंद गर्ग, कैथल
पुरस्कृत पत्र
ईंधन बचत की आदत
खाड़ी क्षेत्र के तनाव के कारण पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। इससे आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा है और विपक्ष ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। तेल कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से उन्हें भारी नुकसान हो रहा था। हालांकि सवाल यह भी उठता है कि जब कीमतें कम थीं तब उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं दी गई। सरकार को चाहिए कि पेट्रोल-डीजल पर करों में कुछ कमी करे ताकि जनता को राहत मिल सके। साथ ही तेल कंपनियों और उपभोक्ताओं को भी संकट का बोझ साझा करना चाहिए। नागरिकों को ईंधन की बचत की आदत अपनानी होगी।
शामलाल कौशल, रोहतक

