रेवड़ी कल्चर के खतरे : The Dainik Tribune

जन संसद

रेवड़ी कल्चर के खतरे

रेवड़ी कल्चर के खतरे

विकास में बाधक

‘रेवड़ी कल्चर’ यानी कि मुफ्त की सौगातें देश के विकास के लिए नुकसानदेह हैं। ऐसे चलन से एक तरफ तो वित्तीय अस्त-व्यस्तता होती है तो दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है। जिसकी मार कर दाताओं पर पड़ती है तथा सेवाओं की गुणवत्ता की कमी से आमजन को इसके परिणाम झेलने पड़ते हैं। श्रीलंका संकट हमारे सम्मुख है। मुफ्त की सौगातें देने की बजाय सरकारें जनता को रोजगार, महंगाई से राहत, बिजली-पानी का उचित प्रबंध करें। केवल शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं ही मुफ्त हों बाकी मुफ्त की चीजें इंसान को निकम्मा बना देती हैं।

रवि नागरा नौशहरा, साढौरा

वित्तीय असंतुलन

राजनीतिक दलों द्वारा वोटों के धुव्रीकरण के लिए मुफ्त सेवाएं देने की योजनाएं बनाना राष्ट्र को पराभव की ओर धकेलने के समान है। इस मामले में कोई भी दल एक-दूसरे पर उंगली उठाने लायक नहीं है। हमाम में सब एक जैसे हैं। ऐसी योजनाओं से लोगों में अकर्मण्यता पैदा होती है। सामाजिक विद्वेष बढ़ता है। वित्तीय संतुलन डगमगाने लगता है। जिन्हें इस तरह की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता वे भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। उच्चतम न्यायालय ऐसी योजनाओं पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाए।

सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’, महम

घातक प्रभाव

रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए घातक है। चुनावों के समय विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने जाल में फंसाने के लिए जो मुफ्त की सुविधाएं देने का वादा करते हैं उन्हें पूरा करने के लिए सरकार को या तो नए टैक्स लगाने पड़ते हैं या फिर उधार लेना पड़ता है जिसका कि विकास, कल्याण तथा देश की सुरक्षा पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सार्वजनिक निवेश कम होता है, उत्पादन तथा रोजगार कम होता है और महंगाई बढ़ती है और स्थिति श्रीलंका की तरह हो जाती है। अतः आर्थिक सुशासन यही कहता है कि रेवड़ी कल्चर समाप्त कर दी जाए।

शामलाल कौशल, रोहतक

निहित स्वार्थ त्यागें

चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों द्वारा सत्ता के लालच में लोकलुभावन वादों की झड़ी लगा दी जाती है। यानी जनता के लिए सब ओर मुफ्त की रेवड़ियां तैयार होती हैं। देश के माननीय ये सब सुविधाएं कहां से लायेंगे। ऐसे में विदेशी कर्ज की गठरी लगातार भारी होती जाती है। अर्थव्यवस्था बढ़ते अतिरिक्त व्यय के भार से चरमराने लगती है। श्रीलंका का ताजा उदाहरण हमारे सामने है। जनता को पंगु बनाने से अच्छा है कि उन्हें स्वाभिमान के साथ जीने के अवसर दिये जायें। निहित स्वार्थ त्यागकर देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये।

नरेन्द्र सिंह नीहार, नयी दिल्ली

भविष्य के लिए खतरनाक

रेवड़ी कल्चर देश के भविष्य के लिए खतरनाक है। मुफ्त वाली योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट का रुख भी सख्त है। मुफ्त के सामान बांटने की राजनीतिक दलों की प्रवृत्ति अंततः देश के राजकोष को पलीता ही लगाती है। मुफ्त की योजनाओं के कारण ईमानदारी के साथ अपना टैक्स अदा करने वाले समुदाय के साथ अन्याय होता है। इसके साथ ही सरकारें मुफ्त की स्कीम चला कर लोगों को पंगु भी बना रही हैं। ऐसी योजनाओं के कारण लोग काम करना नहीं चाहते हैं।

ललित महालकरी, इंदौर, म.प्र.

वोट बैंक की राजनीति

चुनावी दौर में राजनीतिक दल जनता को भरमाने के लिए लोकलुभावने वादे करके वोट बैंक बनाने में जुटे रहते हैं। फ्री सुविधाओं से राजकोष का घाटा बढ़ता है। जनकल्याण की अनदेखी कर दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दामों में वृद्धि कर घाटे की भरपायी की जाती है अथवा अन्य टैक्स लगाकर आमजन की सुख-सुविधाओं की बलि चढ़ा कर पूरा किया जाता है। ऐसे में व्यवसाय व उत्पादन प्रभावित होते हैं। आर्थिक व्यवस्था की मजबूती के लिए रेवड़ी कल्चर की स्वार्थी भावना से ऊपर उठना चाहिए। सरकार को पूंजीपति व्यवसायियों पर सब्सिडी समाप्त कर देनी चाहिए।

अनिल कौशिक, क्योड़क, कैथल

पुरस्कृत पत्र

करदाताओं पर भार

मुफ्त में सौगात बांटना, राष्ट्र के विकास के लिए अवरोध उत्पन्न करना है। मुफ्त की योजनाओं की घोषणाएं पूरी करने के लिए सरकार को करदाताओं पर अतिरिक्त भार डालना पड़ता है। जिसके कारण कर्मठ, अनुशासन प्रिय, कर्तव्यनिष्ठ राष्ट्रभक्त लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसकी कीमत राष्ट्र को किसी न किसी रूप में चुकानी पड़ती है। सरकार को मुफ्त की योजनाएं वास्तव में असहाय, विकलांग, जरूरतमंद लोगों के लिए ही बनानी चाहिए, जिससे सरकार को राष्ट्र के विकास की गति में वित्तीय संकट का सामना न करना पड़े।

जय भगवान भारद्वाज, नाहड़

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