मनुष्य को अभिमान का ज्ञान होना जरूरी : ज्ञानानंद
गीता ज्ञान संस्थानम में आयोजित 5 दिवसीय गीता चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए स्वामी ज्ञानानंद ने ज्ञान योग की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान का अभिमान नहीं अपितु अभिमान का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। जब मनुष्य...
गीता ज्ञान संस्थानम में आयोजित 5 दिवसीय गीता चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए स्वामी ज्ञानानंद ने ज्ञान योग की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान का अभिमान नहीं अपितु अभिमान का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। जब मनुष्य अपने अंदर उत्पन्न होने वाले अहंकार को पहचान लेता है तो वह वास्तविक ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने तत्व ज्ञान की अनुभूति व उसके लक्ष्णों का वर्णन करते हुए बताया कि सच्चा ज्ञान मनुष्य को विनम्र, सहज और करुणामय बनाता है। उन्होंने कहा कि जब अहंकार हो तो मनुष्य को 2 स्थानों को अवश्य देखना चाहिए, एक अस्पताल और दूसरा श्मशानघाट। इससे जीवन को नश्वरता का बोध होता है। ज्ञान योग की साधना में साक्षी भाव को अनिवार्य बताते हुए स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि मनुष्य को यह भावना रखना चाहिए कि कर्त्ता मैं नहीं हूं, सब कुछ प्रभ की कृपा से होता है। उन्होंने सदोगुण, रजोगुण और तमोगुण की चर्चा करते हुए कहा कि सदोगुण ज्ञान की ओर ले जाता है और व्यक्ति में दूसरों की भलाई करने का भाव पैदा होता है। रजोगुण से लोभ की वृद्धि होती है और तमोगुण अज्ञानता को बढाता है।

