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अमेरिकी टैरिफ की मार, पानीपत का वेल्वेट उद्योग मंदी की चपेट में

पीक सीजन में ठप पड़ा कारोबार, दाम घटे फिर भी बिक्री नहीं

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पानीपत में फैक्टरी में कपड़ा बुनते कारीगर।  -वाप्र
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अमेरिकी टैरिफ के चलते पानीपत के वेल्वेट कारोबार को बड़ा झटका लगा है। इन दिनों जब वेल्वेट का सीजन पीक पर होता है, तब अमेरिका को निर्यात में आई भारी गिरावट के कारण पानीपत में बनने वाले विसकोस कॉटन वेल्वेट उद्योग को मंदी का सामना करना पड़ रहा है। उद्योगों में लगातार स्टॉक बढ़ता जा रहा है। कारोबारियों के अनुसार वेल्वेट फैब्रिक के भाव 20 रुपये प्रति किलो तक घटाने के बावजूद उठाव नहीं हो पा रहा। यदि यही हालात बने रहे तो अगले दो-तीन महीनों में कई उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे। पानीपत में विसकोस कॉटन वेल्वेट का सालाना कारोबार लगभग 200 से 300 करोड़ रुपये का है। यहां करीब 5,000 से अधिक लूम लगे हुए हैं। वेल्वेट फैब्रिक से कुशन कवर, रनर और पर्दों का कपड़ा तैयार किया जाता है। इसके अलावा यह फैब्रिक पैचवर्क में भी उपयोग होता है। यहां के वेल्वेट उद्योग सीधे निर्यात न कर स्थानीय निर्यातकों को माल सप्लाई करते हैं। निर्यातक इस कॉटन वेल्वेट को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल कर विभिन्न हैंडलूम उत्पाद बनाते हैं और उन्हें अन्य देशों में निर्यात करते हैं।

कारोबारियों का कहना है कि आमतौर पर इस समय सीजन जोर पर रहता है, लेकिन इस बार उद्योगों में स्टॉक का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। इससे उद्यमियों की नींद उड़ी हुई है और सरकार को भी राजस्व नुकसान झेलना पड़ रहा है। वेल्वेट उद्योग से जुड़े हजारों लोगों के रोजगार पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वेल्वेट कारोबारी रजिंदर खुराना ने बताया कि पानीपत के वेल्वेट उद्योग में इतनी अधिक मंदी उन्होंने पहली बार देखी है। एक ओर जहां वेल्वेट फैब्रिक बनाने में इस्तेमाल होने वाले धागे के दाम 10 रुपये प्रति किलो तक बढ़ चुके हैं, वहीं तैयार माल के दाम 20 से 25 रुपये प्रति मीटर घटाने के बावजूद बिक्री नहीं हो रही। उन्होंने बताया कि इन दिनों पानीपत में आधे से भी कम लूम चल रहे हैं, जबकि पीक सीजन में 24 घंटे लूम चलते थे। कारोबारियों ने सरकार से मांग की है कि इस पर तुरंत ध्यान दिया जाए, अन्यथा कई इकाइयों को बंद करना पड़ेगा। पानीपत में केवल विसकोस कॉटन वेल्वेट का ही उत्पादन होता है, जिसमें 2/40 कॉटन यार्न और 6 से 12 यूवी क्लियर धागे की खपत होती है। उद्योग की मांग है कि सरकार ऐसी नीति बनाए जिससे धागों के दामों में अनियंत्रित बढ़ोतरी न हो।

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