हाथ-पैर ने छोड़ा साथ, मुंह से बदली जिंदगी की तकदीर
शत प्रतिशत दिव्यांगता के बावजूद हौसला सातवें आसमान पर, किसी का मोहताज हाेना मंजूर नहीं
शत प्रतिशत दिव्यांग मोनिका शर्मा का हौसला सातवें आसमान पर है और इसी हौसले की बदौलत तमाम दुश्वारियों के बावजूद न केवल दसवीं और स्नातक की शिक्षा पूरी की, बल्कि मुंह से ब्रश पकड़कर कमाल की पेंटिंग्स भी बनाती हैं। कई अवार्ड भी जीते, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही कई तरह की शारीरिक तकलीफें बढ़ने लगी हैं। मोनिका शर्मा चाहती है कि सरकार दिव्यांगजनों के लिए कुछ ठोस कदम उठाये, ताकि वे किसी के माेहताज न रहे। उसे 16 साल से नौकरी का इंतजार है। अब मोनिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी से मदद की अपील की। उसे उम्मीद है कि वे हरियाणा की इस बेटी के लिए आवश्यक कुछ करेंगे। शहर के कांसापुर स्थित रामनगर में राजकुमार शर्मा के घर 28 जनवरी 1986 को जन्मी मोनिका शर्मा जब आठ साल की थी तो वह उसे गंभीर बीमारी ने घेर लिया। इसी चलते उसका पूरा शरीर पैरालाइज हो गया और उसके दोनों हाथ व दोनों पांव निष्प्राण हो गए और आवाज भी चली गई। पिता राजकुमार प्राइवेट नौकरी करते हैं जिससे परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो गया है। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मोनिका का बड़े अस्पतालों में उपचार करवाया। डेढ़ साल के बाद मोनिका की आवाज तो वापस लौट आई मगर उनका शरीर स्वस्थ नहीं हो सका।
हासिल किया मुकाम
आवाज लौटने के बाद मोनिका ने पढ़ाई जारी रखने का इरादा बनाया। मगर किसी भी स्कूल ने उन्हें यह कह कर दाखिला नहीं दिया कि लड़की के हाथ पांव तो चलते नहीं, पढ़ाई कैसे करेगी। बड़े प्रयासों के बावजूद उन्हें रामनगर स्थित राजकीय स्कूल में दाखिला मिल गया। जिसके बाद मोनिका ने मुंह में कलम पकड़कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना शुरु किया। मोनिका ने पहले दसवीं और फिर वर्ष 2010 में स्नातक की परीक्षा पास की लेकिन परिवार की आमदनी कम होने के कारण उन्हें आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
कहा- दिव्यांग लड़कियों के लिए सरकार उठाए कदम
मोनिका शर्मा का कहना है कि दिव्यांग लड़कियां अपने जीवन से संघर्ष करती हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि दिव्यांगों के लिए कोई ठोस योजना बनाएं ताकि वे सम्मान के साथ अपना जीवनयापन कर सकें और किसी की मोहताज बनकर न रह सकें। परिजनों ने बताया कि जैसे-जसे उम्र बढ़ रही है वैसे-वैसे मोनिका की शारीरिक तकलीफ में भी बढ़ रही हैं। पहले वह अपनी कमर को स्पोर्ट देकर बैठकर कुछ काम कर लेती थी। वहीं इस समय उसकी रीड की हड्डी इस कदर मुड़ चुकी है कि बैठना भी संभव नहीं हो पाता। ऐसे में वह दूसरों पर निर्भर रहने लगी है। परिवार के सदस्यों की अपनी भी मजबूरियां हैं। उनके हेल्थ से संबंधित परेशानियां हैं। ऐसे में मोनिका को चाहिए किसी ऐसे अटेंडेंट की जो उसकी देखभाल कर सकें। इस बारे में मोनिका का कहना है कि सरकार ने दिव्यांग के लिए योजनाएं जरूर चलाईं हैं लेकिन धरातल पर उसका असर देखने को नहीं मिलता। सरकार ने उसके लिए कोई नौकरी का बंदोबस्त नहीं किया। इस समय वह दिमागी व आर्थिक रूप से परेशानी की हालत में है। मोनिका का कहना है कि वह अनाउंसर की नौकरी कर सकती हैं। वह चाहती है कि आर्थिक रूप से अपने परिवार पर और बोझ न बने। उन्हें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से उम्मीद है जो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के लिए हमेशा प्रयास करते नजर आते हैं। वहीं दूसरी और मोनिका के पिता राजकुमार का कहना है कि वह 66 वर्ष के हो चुके हैं अब वह मोनिका के भविष्य को लेकर चिंतित है, उन्होंने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से अपील की है कि हरियाणा की इस बेटी के लिए कुछ करें ताकि वह अपनी जिंदगी जी सके। उन्होंने कहा कि अब उन्हें केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नायब सैनी से ही उम्मीद बची है।

